A mother in rural Pakistan defies dire odds during pregnancy, learns to take charge of her health, and transforms her community. HANDS Pakistan has spent 45 years building grassroots education and sanitation projects in villages like hers. The video is a Ramadan appeal for Zakat donations to continue this work.
मुझे सब छोटी बुलाते हैं। मगर मैं बहुत बड़ा सोचती हूँ, बिल्कुल अपनी माई की तरह।
अरे यहाँ कौन जाएगा?
माई कहती है, हालात खुद से नहीं बदलते, हालात को खुद से बदलना पड़ता है।
एक कदम में रखा है कई कदम का फासला मंजिल को जाना हो तो खुद चल निकलेगा चल ओ बंदिया हो ओ बंदिया हो छोटी जल्दी आजा हाथों के खाना खा ले और मेरी माई ने हमेशा खुद से ही हालात को बदला है।
जब मैं पैदा होने वाली थी न, तो गाँव वालों ने कहा की माई का बचना मुश्किल है और हॉस्पिटल ले जाने से कुछ नहीं होगा।
अरे मार्मी आ गई, मार्मी आ गई, मार्मी आ गई।
बस बुला बस सब ठीक हो जाएगा इसको फॉर्म हॉस्पिटल लेकर जाना होगा सब ठीक हो जाएगा लेकिन माई ने बदल दिया अपने आज से अपने कल को हो खुद कैसे बदलेगा बस बैग उठाया और बन गई हैंड्स की मार भी होए कर कभी खुद पढ़ा कभी किसी को सिखाया सफाई का मतलब सबको समझाया आमे चाचा की दुकान खलवाई बदलना है कल को तू खुद ही से बदलेगा और सबको आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया। लेकिन मार्वी और हैंड्स का काम अभी खत्म नहीं हुआ। बहुत से रास्ते, बहुत सी बस्तियाँ और बहुत सी जिंदगियाँ अभी भी बदलना बाकी हैं।
तो आए इस रमजान अपनी जकात से बनाए किसी के छोटे से कल को बहुत बड़ा और शामिल हो जाए 45 सालों से जारी हैंड्स के