भाग 12 जगदगुरु शंकराचार्य जी के श्रीमुखसे श्रीमद्भागवत कथा अमृतपान, विश्व कल्याण आश्रम

Swami Swaroopananda Saraswathi explains the metaphysical meaning of Radha-Krishna's divine play: how the multiplicity of Krishnas and gopīs are manifestations of līlā, and how devotion differs from desire. He uses stories of Sukadeva's renunciation and Radha's parrot to illustrate, then describes spiritual types and yoga-māyā, the power that lets the Lord manifest the world.
Chapters
का ध्यान करते हुए स्वयं राधा बन जाते हैं। राधा कृष्ण का ध्यान करते हुए राधा कृष्ण बन जाती हैं। कौन कृष्ण है, कौन राधा है? 1 दूसरे को स्वयं अपने आप को पहचान ही नहीं पाते। आत्म विस्मृति ही ब्रह्मा स्मृति है, आत्म स्मृति ही ब्रह्म। स्वरूप में अवस्थित 2 लीला के द्वारा बड़े बड़े महा पुरुष उस ब्रह्म का अनुसंधान करते हैं। तो ये ब्रह्म अनुसंधान की लीला रास लीला है। तो भगवान श्री कृष्ण अनेक और रूप धारण करते हैं। जब गोपियाँ 1 अनेक हैं तो 1 से कैसे पति बनेंगे। जितनी गोपियां होंगी, उतने ही कृष्ण होगा। और राधा भी अपनी नख मनी चंद्रिका से अनेक गोपियां बना लेती हैं। 1 काय की लीला है, 1 साथ अनेक रूप धारण करके 1 अनेक होकर ये लीला कर रहे हैं तो ये गोपियों के संबंध में पहले जान लेना आवश्यक होता है। अन्यथा लोगों के मन में प्राकृतिक वृद्धि हो जाती है कि गोपियां कहीं की ग्वालिन थीं, मनुष्य थीं, ऐसा कुछ नहीं है। भगवान बिताती सरदोंफुमल्लीक। पहली बात हैं सु श्री शुक बाज। इस रासलीला के कथाकार श्री शुकदेव जी महाराज, श्री शुकदेव जी महाराज वो हैं, जो अत्यंत वीत राग हैं। आपने सुना जन्म लेते ही चल पड़े सन्यास लेकर और उस सरोवर के किनारे से निकले, जहां पर देवांगनाएं नगद नहा रही थीं, लेकिन जिन्होंने पर्दा नहीं किया। ब्यास जी को देखकर पर्दा किया। जब उन्होंने पूछा कि मेरे युवा पुत्र को देखकर, तुमने लज्जा क्यों नहीं की? बोले वो तो स्त्री पुरुष का भेद समझते ही नहीं। लज्जा उससे होती है जो पुरुष अपने को समझता है, जो 1 परम से बीत राग है, उसको पता ही नहीं है कि हम शरीर हैं तो लज्जा कैसे होगी? ऐसा वीतराग जीवन मुक्त राजलीला का प्रवक्ता है। to hi आत्माराम समन, निरगरनथामeगरवत, गुण, री, बडे बडे। आत्मा राम मुनि भी भगवान के गुणों से आक्षिप्त मति होने के कारण उनके गुण गुणों का वर्णन और श्रवण करते है। आत्मा राम आत्मा मे ही जिनको आराम है। जिनको आराम के लिए किसी दूसरे की आवश्यकता नहीं है। निर्ग्रनथा जिनकी जड़ चेतन की ग्रंथ थी, खुल चुकी है निर्गरणथापकररमे। ये संसार के लोग जो हैं, क्यों संसार में आसक्त होते हैं। जड़ चेतन ही ग्रंथी भरी गई, जदपीमखाचूटजरके साथ चेतन का तादात्म हो गया है। तो जड़ के कारण जल में अल्पता है, कमी है। जहां कमी होती है वहां शोक होता है। जहां शोक होता है वहां किसी की अपेक्षा होती है। और जहां कोई कमी का अनुभव न हो, उसको किसी की अपेक्षा नहीं। ऐसे निरंत मुनि भी भगवान की भक्ति करते हैं। इसका कारण क्या है? भगवान नकिलहैयपरतनिक अचिंतयानंतकुणगणिक निलय है। उनके अचिंत गुण गुणों में 1 गुण है। आत्मा काम आत्माराम जित्ता कर्षकतगणआत्मारामों के चित्र को भी आकृष्ट करने वाला है। तो जीवन मुक्त महामुनि जी हरि गुण सुन तरते जो जीवन मुक्त महामुनि है, वो भी भगवान के गुण गुणों का श्रवण करते हैं। तो ये शुभ देवजी जीवन मुक्त हैं, समझना चाहिए और का। 3 प्रकार के महात्मा होते हैं 1 हंस, दूसरे परमहंस और तीसरे शिपर्स। जो प्रकृति पुरुष का विवेक कर लें, आत्मानात्मा को पृथक कर के जान लें। वो हंस जैसे हंस दूध पानी दोनों साथ में मिले हों तो दूध दूध पीकर पानी को अलग कर देता है। उसी तरह से जो पुरुष को प्रकृति से अलग करके जान ले, वो हो गया हंस और और उसके ऊपर परमपुरुष परमात्मा की अनेकता का भ्रम छोड़कर और प्रकृति और प्रकृति में जो सत्त्व बुद्धि है, उसका त्याग कर दे। 1 ब्रह्म का साक्षात्कार करके उसे जिस की उस में निष्ठा हो जाए, वो कहलाता है। परमहंस परमहंस महात्मा और तीसरा परम ब्रह्म परमात्मा का साक्षातकार कर लेने के पश्चात भी भगवान की भक्ति का त्याग नहीं करते। क्योंकि भक्ति ज्ञान की शोभा भक्ति से है। सोहन राम प्रेम बिनु ज्ञान करणधारबिणुजिमि जल जाना। राम के प्रेम के बिना ज्ञान की शोभा नहीं है। जिस प्रकार कर्ण दहाल के बिना जल जान की शोबानी नईकरमानशोबेजान वाला रंजन अच्छतभावसेरहेत जो नई कर्म है सन्यास, त्याग, जीवन मुक्ति अगर भगवान के चरणों में प्रेम नहीं है तो उसकी शोभा नहीं है। तो जो परब्रहम परमात्मा का साक्षात कर करके परम होकर भी भगवान की भक्ति, अस, विचार, पंडित, मुईभजहींपायुज्ञान भगति नहीं, ज्ञान को प्राप्त करके भक्ति का त्याग नही करते, उन महा पुरुषों को कहते हैं। sesuka शीशुकआवाजमें सी चुका जो सीखा शुक वो कैसे कहते हैं। श्री राधा रानी विश्माननंदनी किशोरी जी को भगवान श्री कृष्ण के दर्शन से प्रतिक्षण व्याकुल रहती थी। दिन बीत जाए तो तो और कठिनाई होती थी। कुछ अधिक समय बीत जाने से भगवान के दर्शन से के बिना व्याकुल हो गए। बेर के दुख से वचित होकर उन्होंने 1 सुख को सुख मानित तोता मे टू जिसको वो पालती थी और पाल के उसको बढ़ाती थीं वत्त कृष्ण पढ़ वत्तकृष्णपठवत्तकृष्ण पढ़ कृष्ण के नाम का पाठ पढ़ाती थीं। उस सुख को श्री कृष्ण के पास संदेश लेकर भेजा संदेश देकर भेजा जाओ। हमारी विरा बयता उनको सुनाना जोरा जनवरी रति। guru baba ka श्री किशोरी जी के शुक बरसाने से उड़के नंद गाँव जाते हैं और नंद भवन के सामने 1 वृक्ष में बैठकर बोलते हैं। वत्स कृष्ण पठ। वत् कृष्ण पढ़ तो भगवान श्री कृष्ण समझ जाते हैं कि प्रिया जी का सुख आया है, पुचकार कर पास में बुला लेते हैं, अपने हाथ में बैठाते हैं, अनार के बीज खिलाते है, पुकार के बोलते हैं बस राधा, कृष्ण पर बस राधा, कृष्ण पर राधा और जोड़ देते हैं। और वो ये कथा सुनाता है। और भगवान के पास आगे वहीं रम जाता है। लौट के जाता नहीं है। किशोरी जी कहते हैं ललिता सखी से की जाकर। जरा देखो। तो वो तोता जो गया है, सुख हो गया है, वह संदेश लेकर आया नहीं, वहां से तो ललिता सखी आती है। देखा कि कृष्ण के कंधे पर शिवा जी बैठे हुए बस राधा कृष्ण पर ही पढ़ रहे हैं। तो ललिता सखी ने भगवान श्याम सुंदर से कहा कि कृष्ण आप तो दधि माखन की चोरी करते थे, अब दूसरों के सुख भी चुराने लगे, दूसरों का तोता भी चुराने लगे। ये कहा का काम है। बोले हमने किसका तोता चलाया हमारे स्वामी जी का है। बोले तो हमारा है, दर्जा बोले नहीं, हमारे, स्वामी जी का है। भगवान बोले नहीं, हमारा है। ललिता जी ने पूछा कि इसी से पूछ लो कि तुम किसके हो? निर्णय, यही करेगा। तो उसी तोते से पूछा गया अच्छा तू बता, तू किसका है? राधा का है, कृष्ण का है। तो वो कहता है? गाढानुरागभरनिर्वर बंगुरायाकृष्णे, ति नाम मधुर, मृदु पाठयंत्यादिगमाधन, चन, चर, जाति 27 तस्या करमुरकोरकतसुतोसमी, गार अनुराग के बाहर से, जो निर्भर बंगो रो रही हैं श्री कृष्ण के प्रेम के बाहर से, जो अत्यंत छीन काय हो रही हैं मेरा से। और जो मुझे भगवान श्री कृष्ण का मधुर मृदु नाम बढ़ाती थीं, मुझे मुझे कार है, जो अपनी जाति के दोस्त, उनके कार्य कमल से च्युत होकर यहां आ गया। तो इस तरह से ललिता सखी की विजय होती है। और ये शोक फिर लौटकर वहीं जाता है। यही शोक दूसरे जन्म में सुखदेव बनता है। तो ये भगवत थी कि भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का अंतरंग, लीलाओं का साक्षी होने के कारण इसका वक्ता बना हुआ है। shri तरह से बोले भगवान बिताती, योग मायामुबाशिदा, भगवान आप, भगवान, भगवान किसको कहते हैं? ऐश्वर्य समग्र धर्मसयससश्रिया, ज्ञान, व राग, श्ामबगितीरणा, समग्र, ऐश्वर्य समग्र धर्म, समग्र, यश, समग्र, सी, समग्र, ज्ञान और समग्र ब्रा, ये 6 जो गुण हैं, इनका नाम है भग और उनमें आग लगा मतुप्रतयमतुप्रत भगवान में वान हो जाता है। तो जो मधुपर भूम निंदा प्रशंसा, सुनित योगेश संबंधित विवक्षा भवंतमतुवादया, अधिक अर्थ में, निन्दा के अर्थ में, प्रशंसा के अर्थ में, संबंध के अर्थ में, अस्थि की विवक्षा में और नित्य योग की विवक्षा में मत आदि प्रत्यय हुआ करते हैं। तो यहाँ पर जो महत्व प्रत्य है, वह नित योग में है। माने यह भग समग्र, ऐश्वर्य समग्र धर्म, समग्र, समग्र, श्री ज्ञान, ज्ञान समग्र में राग, जिनमें निरंतर रहे। वो भगवान। तो भगवान अभी, जिसके भीतर कभी राग है, नहीं, कभी ज्ञान से मुक्त ज्ञान जिनके हृदय में सदा विद्यमान है, अज्ञान का लेख नहीं। क्यों रमण करेंगे। परंतु भगवान अभी या अनुचित। तब भी भगवान पिता, राती, राती, दाने, राधा ने हातू से रात्रि बना। जो श्री कृष्ण को प्रेम का दान करें। वो गोपियां गोपियां भगवान श्रीकृष्ण को दान करती हैं, प्रेम का दान करती हैं। इसका मतलब ये है काम में और प्रेम में अंतर है। काम किसको कहते हैं? और प्रेम किसको कहते हैं? जहाँ अपने सुख में सुखी होता है, प्राणी उसको काम कहते हैं। और जिसमें जिससे हमारा प्रेम है, उसके सुख में हम सुखी हैं। तत सुख सुख, तुम उनके सुख में सुखी होना प्रेम है। तो गोपियां अपने सुख में सुखी नहीं हैं। वो श्रीकृष्ण के सुख में सुखी है। नजांगमबयागोपयाममेत में कि गोपियां अपने अंग की जो रक्षा करते हैं, शरीर में उबटन लगाती हैं, स्नान करती है, सुंदर वस्त्र पहनती है, किसों को सवारती है, आँखों में काजल लगाती है, आभूषण पहनती है। इसलिए नहीं की उनको प्रसन्नता होगी, श्री कृष्ण को प्रसन्नता होगी, उनकी प्रसन्नता के लिए सब कुछ कर रही है। तो ऐसी जो गोपियां हैं, ता गोपी, जो प्रेमदान करने वाली हैं। या वो गोपी जो नित गोपी है, जो सिद्ध गोपियां हैं, जो साधन सिद्धा हैं, जो वेद की रखाएं हैं, जो मंत्र हैं, ये सब के सब साकार होकर भगवान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। तो ताभी उनको देखा, भगवान पिता गोपियों को देखा और दूसरे ब्रह्मा की अनेकों रात्रियों ने तपस्या की है कि हम में आपकी लीला हो जाए। तो ता रात्रि बीच ब्रह्मा की अनेको रात्रियों को देखा। वो हाथ जोड़कर खड़ी है कि भगवान आपकी लीला का अवसर आ गया है। और तीसरे ताहा जो वन की शोभा है, सरदोदफुलमल्लिकावि मल्लिका का पुष्प जो है, बसंत में फूलता है। लेकिन भगवान ने देखा कि शरद में ही फूल गया है। अथवा जो भी राजशीला की सामग्री है, वो सामग्री कहीं बाहर से नहीं आई। भगवान ने अपने भीषण से ही उनको उत्पन्न कर दिया। क्योंकि परमात्मा ने देखा, भगवान संसार की रचना के लिए कोई परिश्रम नहीं किया करते। भारतवसी मिश्र ने अपने ग्रंथ में भगवान की स्तुति करते हुए कहा है कि यसनिशतिदमवेदा vice पर महात्मा है। सोए सोए, जब श्वास छोड़ देते हैं one song, so, i और आँख खोल के देख लिया तो विष में 10 पंच भूतानी, पृथ्वी, जल, आकाश, भाई, अग्नि 5 भूत उत्पन्न हो गए और थोड़ा मुस्कुरा दिए तो उसकी मुस्कराहट से 5 भूत हो चराचर जगत के रूप में परिणत हो गए, अनंत ब्रह्मांड के रूप में पुष्पित हो गए और इतने में भगवान थक गए। सुपर महाल्या भगवान ने जैसी आंखें मुनी पड़ रहा हो गया। संसार। तो भगवान के ईक्षण से ही संसार की रचना हो जाती है। तो भगवान ने केवल ईक्षण से ही उन गोपियों को सगुण साकार बना लिया, ब्रह्मा की रात्रियों को बना लिया और शरद ऋतु में मल्लिका को पुष्पित करवा दिया। भगवान अविता राती, सरदोतपुलमल्लिका, वि्रंतुममनसचके, उनको देखकर रंदुममनषचकरे। अभी तक भगवान बिना मन के थे, अब प्राण बना शुब्रा प्राण है। मन मन चक्कर। तो भगवान ने भीषण द्वारा मन बनाया, मन का निर्माण किया। कैसे गलिया, योग माया, योगमाया का से लेकर योग माया उसको कहते हैं जो जो गठित होने वाली वस्तु है, उसको गठित करके दिखा दे, जो निराकार है, उसको साकार कर दे, जो निर्गुण है, उसको सगुण बना दे, जो जो वस्तु, जो नहीं है, उसको यथावत रखते हुए उसके दूसरे रूप में उसको दिखा दे, उसका नाम योगमाया है। भगवान का जो अवतार होता है, भगवान अवतार लेकर बदलते नहीं हैं, जो पिन अजन्मा है या यात्मा है, सब प्राणियों के ईश्वर हैं, परंतु योग माया से अपने स्वरूप में रहते हुए ही सगुण साकार बन जाते हैं। तो योग माया मुपाशीधा, योगमाया का आश्रय लेकर। तो योगमाया भगवान की माया है। माने। जो माया भगवान की अधीन है, भगवान की इच्छा का अनुविधाअनुविधाइनी है। जो भगवान चाहते हैं, वो करती है। अथवा योगा या मां योग के लिए जो मां लक्ष्मी, शोभा, व, योग माया या जो प्राणियों को आपस में मिलाने वाली है, राजा राजेश्वरी माता, तरब्रसंदरी जीवों को प्रेम के बंधन से बांधने वाली वो, योग माया और योगा या माँ योग के लिए, कृष्ण को मिलाने के लिए 1 मात्र जो साधन और साध्य है, वो क्या है? श्री राधा रानी है, उनकी इच्छा है, वो चाहती है कि रासक्रिडा हो। योग माया मुपासिता, भगवान बता रात्रि शरद फुल मल्लिका बिखर तुम मन चक्रे। योगमाया मुबाशा। भगवान ने मने मन बनाया। जब भगवान के भक्तों के मन में भगवान की लीलाओं का अनुसंधान दर्शन करने की उत्कट उत्कंठा उत्पन्न होती है तो भगवान की भी भावना हो जाती है। ये यथा माम प्रबंधन ते ताल तथवबजाममेहम जो मेरे या जिस भाव से भजन करता है, मैं भी उसका उसी भाव से बजन करता हूँ। उसके बाद भगवान वंशी बजाते हैं, बंशी बचती है। कृष्ण की आप देखिए, कृष्ण ने बंसी क्यों बजाई गोपियां तो कहती है? शाम बंशी क्यों बजाई मैं तो आई रही थी। तुम ने बंशी क्यों बजाई बात क्या थी। काम ने कहा था कि हम गोपियों के अंग रूप विमान किले में दुर्ग में रहेंगे तो गोपियों के मन में जा के छिप जाता कि जिससे कि कोई उनको देख न पड़े। और बोबे मारे दुश्मन को मारने के लिए आदमी छिपके मारता है। तब सफलता होती। तो ये कृष्ण को छुप के मरना चाहता था और गोपियों के अंग रूपी दुर्ग में ये उनके मन में जाकर छिप गया था। और इसका नाम मनोज भी है। मन से की उत्पत्ति होती है। तो मन में जाकर ये सो गया था। भगवान ने सोचा कि सोए हुए के मारने में सोई को मारने में कौनसी वीरता है? दुश्मन को जगाओ उठो आओ मौका लड़ना चाहते थे। तो काम का 1 स्वरूप है अग्नि काम अग्नि कहलाती है न। तो सुनार हैं ये आप को तेज करने के लिए बांस की 1 पोखनी रखते हैं। और भोंक भोंक के उसको और तेज करते। तो भगवान ने मानो बंशी से मनोज को सोते हुए काम को जगाया भु बंशी बजा और दूसरा उसका मुख्य अर्थ यह भी है कि कोई भी महत्वपूर्ण कार्य करने के पहले अपने इष्टदेव का स्मरण कर लेना चाहिए। तो भगवान श्री कृष्ण ने भी सोचा कि रासलीला करने जा रहे हैं पहले इष्टदेव का तो स्मरण करने। तो उनके देवता कौन हैं? शो शो का। अब कहाँ शिविलिंग खोजने जाएं। तो उन्होंने सोचा कि जो वंशी हैं न, इसी को लडदोतोमंशीसिमा हो जाएगा। तो वंशी को ही शो बना लिया। तो सूजी की आराधना पूरी होनी चाहिए कि मीनू सिवबराधेलाइनकोटी जोग सादे जब तक शिव की आराधना नहीं करता तब तक इस चित फल की प्राप्ति नहीं होती है। तो भगवान शिव को वंशी के रूप में श्री कृष्ण ने अपने अधर पल्लों का आसन कर बैठाया अधार पल्लों का आसन दिया और जो मयूर पुच्छ का मुकुट है, उसी का मानो छत्र लगाया, कानों के कुंडल से मानो उसकी आरती की, अधर अमृत का भोग लगाया और कोमल अंगुली दलों से पास सवाल। इस तरह से भगवान श्री कृष्ण ने बंसी बजाई कहते तो रुराकगरीरमुखमरा उसी समय जिस समय भगवान ने मन किया, प्राची दिशा में पूर्ण चंद्रमा का उदय हुआ। उसकी अरुणाचल की जो अरुण किरणें थीं, उनसे वनभूमि वनभूमि जब अरुण हो रही थीं, वो वनभूमि क्या थी। मानो रमा के मुखी लालिमा थी। उदाहरण दिया है कि जैसे किसी प्रोषित भर्ती का का पति बहुत दिनों से परदेश गया हो और वो सहसा आ जाए और उसके मुंह को केसर से रंग दें, उस तरह से बेरैइणीप्राची दिशा के मुख को प्राची दिशा में प्राची दिशा के मुख को पूर्ण चंद्रमा ने आरक्त कर दिया और उसकी जो प्रतीक्षाएं हुई, उससे बन की भूमि है। अरुण वरणा हो गई उससे और उत्साहित होकर जगह कलम उन्होंने कल गान किया। बाहमदशाम मनोहरम गोपियों के मन को खींचने वाला गान गाया बाहमदशाममनोहरम कहते हैं कौन सा बीज मंत्र गाया है तो काम बीज गाया है। क्लीन बामाशा मनोहरम। तो इस तरह से भगवान श्री ने जब वंशी बजाई, उस वंशी की धनी को सुनकर गोपियाँ भगवान श्रीकृण से मिलने के लिए घर से चल पड़ी। अब बहुत लम्बा हो जायेगा तो शेष बचा तो कल सुनाएंगे। अब यहीं बराम करते हैं श्री राम जै राम जय जय राम, श्री राम जय राम जय जय राम, श्री राम जै राम जै जै राम राम रे जरा। तो मन में विचारो क्या साथ लाए, अरुरी चलोगे लाता, सदा साथ। यह पुकारो सदा साथ। गोविन्द दामो दरमा ज बेटी गोविन्द दामो दरमा बेटी गोविन्द दामो दरमा जेटी गोविंद दामो दबाभबेटीकृष्णहेयआ दब सकेती कहेराखबहेसहेकी श्री कृष्ण गोविन्द हरे मोरा रे कृष्ण गोविंद हरे मुरारे ना ना रा बा सुदेवा हे नारा। यरवा सुदेव धर्म की जो अधर्म का हो, प्राणियों में सदभावना हो, विश्व का याहू गो माता की जय हूँ गो हत्या बंद हो हर हरमान।
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