अमृतवाणी पूज्य शंकराचार्य स्वामीश्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज कोलकाता चातुर्मास्य 2019

Pujya Shankaracharya Swami Swaroopananda Saraswathi teaches on bhakti and jñāna, using stories from the Rāmāyana and Surdas to show why devotion requires a softened heart. The lecture opens with 'Śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma' and weaves scriptural wisdom with practical guidance for spiritual practice.
Śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma.
Śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma.
Śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma.
Sri Ram Jai Ram Jai Jai Ram.
Sri Ram Jai Ram Jai Jai Ram.
Sri Ram Jai Ram Jai Jai Ram Śrī Rāma Jaya Rāma Jaya Jaya Rāma Śrī Rāma Jaya Rāma Jaya Jaya Rāma śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma जये जये राम।.
दार्म की जय हो। अधर्म का नाश हो। प्राणियों में सद्भावना हो। विश्व का कल्या हो। वो माता की जय हो। वो हत्या बन हो। हर्मनमारी।।।।।।।।।।।।।।। हमने एक दो आफ़ा सनाया था तुरसी संद्समागम संगल लाभ कश्वान बिन्भरिकर्बान मिन्हीतो गावहिवेद पुरान संद्समागम से बढ़कर कोई लाभ नहीं है कौन सा लाभ है प्रसुत्रह मुनुष्य का जो हमारा अपरा अन्ताकरन है उसकी भवदा कारता यदि आ जाती है तो ये सबसे बड़ा रहा होता है तो ये तभी होगा जब हमारा हर्दे द्रवित होगा ऐसा माना जाता है कि जैसे लाक या चपड़ा है उसमें यदि हम कोई रंग डालना चाहें तो वो उपर ही उपर नहीं चाहेंगा उसमें बिलेगा नहीं उसमें यदि रंग डालना है, बीटा डालना है तो उसको बिगरना पड़ता है तो इसलिए आप दिखिए जब कोई मोर लगाता है तो पहले आंच देकर उस लाग को गग्राता है तब उसमें मोर का आकार बनता है तो हमारा आपका जो अंत्वाकरण है वो लाग के समान कठोर है उस कठोर हुदय को द्रवित करने आवश्चक है यदि ये गुद्रवित नहीं होगा तो भगवान के आकार को ग्रहन नहीं कर पाएगा यही कारण है देखिए जब हम भगवान का भजन करने बैठते हैं तो चाहते तो यह हैं कि भगवान हमारे रिदे में आ जाएं उनका हम स्मर्ण पुरुरुप से करने लग � भगवान भी नहीं लगता। उसी समयत अनेकों परकार की बातें आती हैं। तो बात क्या है कि हमारा हर्दे अभी कठोर है। उस कठोर हर्दे को जुद्ध होने की करने की आवच्छता है। तो ये बताया है जुद्धस्य भगवत धर्मात धारा वाहि रतान्गता तर्रेशे मनसो वृत्ति भक्ति रित्यम् दियते। भगवान के, भगवधर्म का आचन करने से। भगवधर्म क्या है? नौधा भक्ति है। स्रमन, कीर्तन, महन्दन, पात्से, मनन, या सबरी को जो भगवान ने उपदेश दिया है, प्रसमभक्ति सुन्धनकरसंगा दूसरिरज्जिमं कथाप्रसंगा गुरुपद पंकजशेवा तीसरिगर्तिम्भवत्यमान चोत्यववतिमं गुणगण करें कपलतेगान मन्तजापन्मो दिलविष्वासा पंचमभजन सुवेदप्रकाशा चट्र इस तरह से बग्वान में शबरी को नौदव देवदेशी। यह भक्ती नहीं है। भक्ती से फिर भक्ती होगी। यह भक्ती के सादन है। भक्ती के सादन कहाँ बहुत नहीं। तो भक्ती क्या है। बग्वान के चरणों की जो अनुरक्ति है। निरंतर भगवानाकार वृत्ति है� वो भकती है। तो उसके लिए अपने हुदायको द्रवित करने की आवसक्ता है। भकती और ज्ञान में क्या अंतर है? निर्विषय अंतह करन की ब्रह्मा कार्पता का नाम ज्ञान है। मन जब विषयों का चिंतन छोड़ देता है जगत के प्रदी मिठ्या बुद्धी होने बर उसके प्रदी जो राहान है वो त्याग करके उसकी चिंतन से रहित हो जाता है तो उस समय भी विशयमन जब महावाग के अर्थ को समझकर ब्रह्माकार हो जाता है इसका नाम घ्यान है और दृत अंतःगर्ण अंतःगर्ण जब � उस समय जो भगवान का आकार रण कर लेता है तो जैसे लाग को पिछडा कर उसको खूब छान दिया जाए और फिर उसमें कोई रंग ढाला जाए तो उसके अनु अनु परमानु परमानु में रंग लग जाएगा फिर लाग चाहें कि हम रंग छोड दें यह रंज जाया है कि हम लाग छोड़ रहे हैं तो यह नहीं हो पाए। अभी आप लोग सूर्णात जी के समवन में सुन रहे थे। इनी की एक कथा है कि सूर्णात जी गोकुन की ओर जा रहे थे। अकेले से कोई रास्ता दिखाने बारा नहीं था। तो रास्ते से तो उस समय उनकी रक्षा कौन करता? यह बताया भगवान ने सिमन्द भागवत की एक अदर ससंद में निर्पेक्षम् मुनिम्शान्तम् निर्वैनम् समधर्शिनम् अनुब्रजाम् में हमनित्यम् तुयेत्यं विरेनुभी इसका अर्थ है जो निर्पेक्ष हैं, किसी प्रगार की जिन्द के मन में इच्छा नहीं। जो मन में शीर हैं, सांत हैं, किसी से बहर नहीं रखते हैं। और सब में परमात्मा को देखते हैं। भगवान कहते हैं, मैं उनके पीछे-पीछे चलता हूँ। क्यों चलते हैं? कि उनके चरणों की � तो भगवान अपने भक्तों के पीछे चलते हैं किसी कवी ने कहा है गाथी तो माने नहीं मानत हू सो कुछाएं तिन के बीचे हल फिरें तो वू के ना रहे जाएं जो महत्मां गाथ में कुछ बानते नहीं हैं तो मानने में भी संगुच करते हैं बगवान पीछे पीछे चलते हैं कि कहीं मेरा ये भक्त गुख है न ले जाये तो बगवान श्री किष्ण एक बालक की रूप में वहाँ पहुँझ जाते हैं और कहते हैं बाबा तु गढडे में गिर बड़ा है अपना हाथ बड़ा मैं तुझे निकाल लेता हूँ खीच की उ सूर्दास जी ने हाथ बढ़ाया, भगवान ने हाथ कीछा सूर्दास तो गढड़े से निकाल गये थे सड़क पर लाये सूर्दास जी ने भगवान के हाथ का इसपर्ष जब किया तो उनके हुदे में आनद का शौल लेगा रोब रोब प्रभुलित हो गया प्रभुलित प्र भगवान लेकर आये वो कहा बाबा यही रास्ता है सीधे चले जाना। वो कही बाबा लाला हमको तुम वहाँ तक पहुचा दो। वो कही नहीं हमारी मारा इसमन करती होगी सांग के समय मुझा है हमको घर लोटना है। तो सुर्जाजी ने भगवान को अची तरह पकड़ रिया पहले भगवान ने सूलदात को पगड़ा था अब सूलदात ने भगवानों पगड़ लिया तो अंदे की पगड़ बड़ी कड़ी होती है जोर से भगवान के हाथ, भगवान के हाथ को जब सूलदात ने पगड़ा तो भगवान ने जटका दिया और जटका दे के अपना हाथ तो सूर्लाज बोलते हैं हत्मवच्छिप्रजातोसी बनातकिष्णकिमदभुतम।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� सुर्दात जी को यी चेलेंज लेने की शक्ती कहां से आ गई? जवित अंता करण से उनका अर्दें भगवदाकार हो गया था और जिसका अर्दें भगवदाकारा कारित हो जाये कभी-कभी वो प्रेम से भी हुता है और कभी कभी देशे भी होता है। जिससे अपना प्रेम होता है। तो भगवान के प्रेम थे जब मन रंज आता है। तो चाहे जैसा भी भाव हो, भगवान नहीं को एस मन करता। जैसे हमारी किती दे दोस्ती रही हो, बाद में दुश्मनी हो जाए, तो हम जब कभी चर्षा उसी के याद कर रहे थे क्योंकि मन में वो बेट जाया है तो भगवान जिस भावस सही मन में बेट जाया है तो जो सुर्दाजी ने जब ये कहा हाथ शड़ाये जातो निवर्जायन के मुले हिर्देते जाओगे मर्द बदांगो तो तो भगवान खड़े हो गया। और खड़े ही नहीं हो गया। तो राज जी को आँख दे दी। उन्होंने भार आँख भगवान शुरृ कृष्ण को देखा। एक तर देखती नहीं रह गया। अब भगवान बोले कि या बाबा, हमको जाने दो। बेड़े जाओ। ये जो त� कहा क्यों मैं तुमको आँगे देदी कहा इससे बड़की और कोई बस्तु है जिसको देखने के लिए आँग रखो। आपसे बड़कर, आपसे कोई सुन्दर बस्तु संसार में अगर होती तो मैं इन आँग रखता अब मैंने इसका दर्शन कर लिया और मैंने कोई द्रि� तो यह स्वाभामिक है कि जब भगवान के गुणों का भगवान के सब्द का, इसपर्ष का, रूप का, रस का, गंध का उनकी लिलाओं का चिंतन हम करते हैं तो और कोई चर्चा फिर अच्छी ही नहीं लगती फिर सब म्रीरस हो जाता है यह जो भगवान की लिला है इसी लिए भगवान ने ये निर्वण नराकार होते हुए भी सवन ताकार सवरुभदान किया है कि सेज में ही मनुष्यनतार से बिमकोकर पगुहर्म के सम्मक हो जाया है यहाँ अभी आप सुन रहे थे रामण सशिराहू भगवान रामचन्द जी को साहू के लिया तो बात यह है, रहू क्या था? कप्टी था। उसने देख्तियों का साथ छोड़कर सर्चे देवता बन लिया था। तो ये भी तो यही कर रहे हैं। साक्षात परब्रम परमात्मा होते हुए भनुश बन रहे हैं। क्योंकि पिला मनुष्य बने तरावण को मारी नहीं सकते था क्योंकि हम काओ के मारही न मारे मानर मनुजातों मारे और दूसी चीजी है अभी आपने सना की भगवान स्री रामचन्द जी भक्तने सबकुछ अपना समर्पण कर रखा है अपना परिवार छोड़के सब कुछ छूड के भगवान की शरना आया है। लक्षमर जी जब कंद मूल फल लेने के लिए जाते हैं तो भगवान सरी राम जानकी जी से कहते हैं सुनुप्रियाः व्रतरुजीतु सुरीला मैं कजु करवरलितन रदीला तुम पावकमह करवने वासा जबला कर तो मैं एक नल लीला करना चाहेता हूं। तो नल लीला इपना की रावन मरेगा नहीं। तो तुम तब तक पावक में निवास करो। अगनी में निवास करो। जिससे तमारा कोई सपर्श भी न कर सके। तो सीता जी ने भगवान के चरणों का इसमन करके स्वेम अगनी में प्र और एक छाया सीता वहां छोड़ती अब वो छाया सीता जो थी वो कहती हैं भगवान राम से कि ये जो महरीच म्रिग बन के आया है कि ये बड़ा सुन्दर है इसको आप पकड़ लीजी अगर पकड़ लिया आयुद्याली चलेंगे कीरामग बनाएंगे सीरामग बनाएंगे और अगर पकड़ में ना आये तो सुमालीजी ये तो इसकी सुन्दर स्थाल बनाकर इसकी आपको आसन बनाकर बशाएंगे अब आप सोचीए कोन कह रही है वास्तव नकली सिद्धा गय रहे हैं और उसके कहने से आप दोड़ रहे हैं और उसके बाद जब लोटकर आते हैं हाँ इसी बीच में क्यों होता हैं रक्षमजी ने बगवानाम ने कहा था कि देखो समें देखते हुए सीता जी की रक्षा करना यहां लाक्षत रोग उपद्रोग करते हैं तो लक्षमर जी ने दिश्चा कर लिया कि सीता जी को छोड़के हम नहीं जाएं लेकिन उस मारीच ने क्या किया फ़ग्वान ने जब उसको बान मारा तो पहले हा लक्षमर कहा फिर बा� पड़ा पक्का अन्याई था वो मरते मरते भी अपना स्वामी का साथ नहीं छोड़ा तो हाँ लक्षमर जब सुना जानकी जी ने तो लक्षमर जी से जानकी जी ने कहा कि तुमारे भाई की पर बड़ा संकत है तुम मुझे छोड़ो वहाँ जाओ और उसकी साथ नहीं करो भगवान राम बोले भगवान लच्मन जी बोले कि भगवान राम की ऊबर कभी कोई बिवत्ति आई नहीं जाती कोई संसार में ऐसा नहीं है जो उनको जीच सके लेकिन मरा महमचन जो सीदा बोला हरी प्रेरिद लच्मन मन बोला सीदा नहीं बोली सीता बोला सीता के द्वारा भवान राम बोले आप सुचिए ये कपड़ किया की नहीं तो रावन रुपी सशी को राहू बनके इन्होंने गरसा वो भी तरह से भवान का वैरभक्त था वैरभक्त से भवान को बचता था वहाँ आता है कि जब सुर्पनखा रामण के पास गई नाग कटी थी, कान कटे थे और खून सूग गया था तो उसने रामण को भटका रहा पर क्या बात है तो उसने कहा कि तुम राज करते हो, राज दिन सोते हो तुम्हारे शत्तु तुम्हारे चल पर है तुमको ओश है? राज नीति नहीं हो राज नीति भिन धन भिन धर्मा अलीत अमर्भी भिन सत्कर्मा सुर्थितार्जी दुर्श्टों के द्वारा में एची बात सुभाते हैं कहते हैं बिना नीति के राज नहीं हो सकता बिना धर्म के धन का कोई मुद्ध नहीं है और सत्कर् तो रावणत भी भीशिरित नहीं हुआ। उसने ये कहा कि वो जो मनुष्य आये हैं जिन्नोंने खरदुशर दिश्र को मारा हैं उनके साथ बड़ी सुन्दर विश्री तब उसी बुद्धी भीशिरित नहीं हुआ। लेकिन फिर भी उसने सोचा कि खरदुशर मोसम बल� पग्वान कुछ उर्गी मुझे मार नहीं सकता हो सकता है कि सुररजन भजन में मारा हरी रगवार्जनी नहीं मतारा तो एसी की में अब मैं तमो गुरी हूं मुझे से भजन तो हो नहीं सकता बेर भक्ती से उनके हाथ से मारा जाओं तो ही मेरा उद्धार हो सकता है इसलिए उसने भगवान से बैश की जानी है और यही बात आती है कहते हैं जब भगवान नाम ने समुद्र को मादा सेसु बंदल कराया बार्णों से तो राविश्वर की प्रदिष्ठा कराई रामेश्वर की प्रेश्था के लिए पंडित की आवश्यत्ता थी। तो उन्होंने सुना कि रामण शंकर जी का बड़ा भात है। अभी आप लोग तानुरत्त सुन रहे थे। ये शंकर जी का इस तोत्र है। पूरा का पूरा। कला निनें पंडित हरी निकुरि निकूर लुक्त दुर्मति सदात तरस्मा जलिबान। रावन कहता है कि निलिबन देवताओं की निलिबन देवताओं की निलिबन देवताओं की निलिबन देवताओं की निलिबन देवताओं की निलिबन देवताओं की निलिबन देवताओं की निलिबन देवताओं की निलिबन दे� कदा सुखी भगवान है। ये कहता है। तो रावन को ही प्रोहित बना कर भगवान ने प्रतिच्छा कराई। खबर बेगी। पंडिजी, हम स्रुभी की इस्तापना करना चाहते हैं। आप आखे लगाओ दीजिये। रावन ने सोचा कि बिना पत्मी की काम मनेगा नहीं तो सीदा जी को लेके आया। यहीं गता है। और सीदा जी को भगवान स्रिराम के दाइने अंग में बिठाल के विधिवत प्रदेच्छा कराये। अप्रदेच्छा के पस्चार भगवान राम ने कहा कि पंडिश जी दक्षणा ले लेगी। पहले क्या दक्षणा तुम देव तुम्हारी निचियत क्या है? पर देखिए जो भी हो बिना दक्षणा के किसी का जो सदकाली है वो सिद्ध नहीं होता तुम्हें आपको दक्षणा तो लेनी ही चाहिए आप बताईए और क्या लेंगे आप? उरे तुम को देखके जो कभी कभी प्रेम और भक्ति उत्पाल हो जाती हैं। यह नहों यहीं देखना देते। तो इस तरह से रावण भी भगवान का महर भक्त करने वाला था। और उसका बग होना भी जरूरी था। लेकिन बिना भगवान अपने सुरूप को छिपाए बिना सीता जी को छल करके वहाँ भेजे। क्योंकि अगर सीता जी नहीं वहाँ पन नहीं जारता तो जगड़े का काउं कहना। जगड़े का जगड़े की जड़तीन। जल जोर जमीन। तो आकस्थान। बिना खारण के रावण के पर आकरण करते हैं तो लोग उन्हीं को दु अपने आपको शेबाया और इसलिए भी कहा और दूसरी बात नहीं बात है कि अपने निष्कपट वक्त से छल करना भगवान को पसंद नहीं आया इसलिए उनका राम और सशीराम अस्तु भगवान अन्ताकरण की भवदाकारता भक्ती है और निर्विषय अन्ताकरण की प्रम्हाकार्था ज्यान है तो ये सच्चंग से ही होता है और इसे बढ़के संसार में और क्या लाग है? लाग वस्तु क्या होता है? आपको धन मिल जायें दौरद मिल जायें कुई वस्तु मिल जायें आखिर तो उसका मिलने का फल क्या है? सुखी तो है आप सुख नहीं मिले तो कुछ भी मिल जाये कोई कीमत नहीं है। तो जब आपको सच्चा सुख मिल गया तो और क्रिवस्तु की आवश्यक्ते ही नहीं है। इसलिए सम्रलाबख जुआ समागम से जो सुख मिलता है। इसलिए लगनी के सिर्फे जब भगुराणने تُو کہتی تَعْتْ سَرْغِ اَمْوَرْغِ سُكْحِ نَرِي تَلَا اَيْكْ اَحْنْ تُو لَمْ تَعْی سَرْغِ تَقَلْمِنِ يُوْلُفِ لَوْتَ سَتْسَنْقِ تَعْتْ سَرْغِ اَمْوَرْغِ سُكْحِ ایک طرف ہے اور لَوْمَتْ کا سَتْسَنْق ایک طرف ہے لَوْمَتْ کا سَتْسَنْق یعنی انوان جی کا سَنگ ہے اس کو جیلانتی جی کو ملا ہے وہ سمجھت संसान का सुक इसके परबर है ही नहीं क्योंकि इसकी द्वारा मुनुष्य को भक्ति ही प्राप्ति हो जाती है महाबुरुषों के करकमन का मस्तक पर स्वर्ष हो जाना उसके हिदाय को परिवर्थित कर लेता है इसलिए किसी कवी न कहा है नभवति भवति च नशिरम भवति चेद भवति खले विशंवादी कोपस्तत्पुर्णाम तुल्दस्नेहेन निचाराम कहते हैं नभवति भवति च नशिरम भवति च लंचेद खले विशंवादी कोपत सत्पुर्छाना कहते हैं जो महापुर्छों का कोप है महापुर्छ कभी किसी के उपर क्रोण करते ही नहीं निजब्रह्मायमदी कहीं जगत कासन करहें भिरोत है उनके मन में कभी क्रोण आता नहीं और आता भी है कभी तो पानी की लखीब आये आवशर आगे नशिरम और अगर किसी के प्रदी उनके मन में क्रोध आ भी जाये तो जिसके उपर क्रोध कर देंगे उनका कर्णा नहीं करेंगे रामण के उपर क्रोध कर देंगे उनका कर्णा नहीं करेंगे कभी भी कोई महाबुरुष ने किसी को भी शाल दिया है तो उ مُنِ شَابَ جُدِينَ آتِ بَلَقِينَا پَرْمَا نُقْرِحَ مِنْ مَعْنَا مُنِ شَابَ جُدِينَ آتِ بَلَقِينَا پَرْمَا نُقْرِحَ مِنْ مَعْنَا مُنِ شَابَ جُدِينَ آتِ بَلَقِينَا پَرْمَا نُقْرِحَ مِنْ مَعْنَا مُنِ شَابَ جُدِينَ آتِ بَلَقِينَا پَرْمَا نُقْرِحَ مِنْ مَعْنَا مُنِ तो महापूर्ष شَابَ यदी किसी के उबर क्रोध करें جُدِينَ तो آت उसका फर उल्डि होता है। जैसे कि दुर्च लोगों होते हैं। दुर्च लोगों का जो प्रेम है नवभती। जो खर हैं वो किसी से प्रेम नहीं करते हैं। और करें भी तो दामी दमक रहे न घनमाही खलकी बीदी ये सातेल नहीं। जिसी बीदी चमक के निष्ट हो जाती है एसे दुष्टों का खलों का जो प्रेम है वो दिखता तो है लेकिन तुरंद नष्ट हो जाता। और अगर किसी खर ने आप से प्रेम कर लिया तो बिना सरवनाश की नहीं छोड़ेगा। उससे प्रेम यदी हो गया तो वो बिना आपको सतातल में पहुंचाए नहीं रहें। तो ये संतों के संग सबसे बड़ा लाव है और लाव यही है कि वो हमको भगवान के साथ जोड़ देते हैं। पतां प्रसंगान्वाभीजी संभिदो भवन्तिकर्णर्थायनाकतां तज्योशनास्पवर्गवरत्मनि सद्धातिर्भक्तिरनुत्तुमिष्यकि सत्वशों के संग से भगवान की आईश्वरी का बोध होता है। उनकी कथा � इसकी सेवन से मोक्ष की मार में सद्धारती और भक्ती क्रम से आते हैं। पर इतने ही करम ना प्रोजन दूर्ण करते हैं। नार्म की अधर्म का प्राणियों में सद्भावना हो विश्व का खल्याँ हो अराहरमादे.
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