भाग 25 वेदान्त-पञ्चदशी जगद्गुरु शंकराचार्य महाराज श्री के श्री मुख से

A Shankaracharya explains why souls stay bound even though God creates and destroys the world, and how three types of karma keep us trapped. Knowledge from a guru can free you, but only through practice: mantra, controlling the mind, and moving from savikalpa to nirvikalpa samadhi to overcome lust, anger, and attachment.
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PरसNgजLरहा था, eshurcrtsisti और जीवकरृत सृष्टि। ईश्वर के सृष्टि के रहते हुए भी हम मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं और ईश्वर को सृष्टि के न रहने पर भी मुक्ति से वंचित हो सकते हैं। कैसे? क्योंकि ईश्वर जगत की सृष्टि करता है और उसके पश्चात प्रलय हो जाता है तो प्रलय काल में स्वाभाविक रूप से ही जगत नहीं रहता। जब नहीं रहता तो सबकी मुक्ति हो जानी चाहिए, पर हो गया तो मुक्ति हो जानी चाहिए। परंतु मुक्ति फिर भी नहीं होती। इसलिए कि हमारे कर्म अवश्य रहते हैं। उन कर्मों के बने रहने के कारण कई प्राणियों के जो कर्म हैं, उन्हीं का फल देने के लिए ईश्वर पुनः सृष्टि करते हैं। तो इसका मतलब है कि सिटी के पहले से काम नहीं बना। जैसे सो जाने से संसार नहीं बदल जाता, सो जाने से हम थोड़ी देर के लिए भी समिति तो हो जाती है, लेकिन वो संसार तो जो का तो इसी तरह से सृष्टी के न रहने पर भी बंधन रहता है और सृष्टि रहे। और यदि हम आचार्य और गुरु के द्वारा जगत के मिकात को समझ ले, जीव ब्रहम के अक को समझ ले तो मुक्ति हो सकती है। 1 बार इस बात को इस प्रकरण में बताया गया। दूसरी बात यह है कि लोगों के मन में यह भ्रम रहता है कि जब तक ईश्वर ज्ञान का उपदेश्य नहीं देगा तब तक हमारा ज्ञान दूर नहीं होगा। हम भगवान को गुरु मानते है। बहुत से लोग हम मनुष्य को गुरू नहीं मानते, भगवान गुरु हैं जहा हम काशी में मरेंगे। तो काशी में मरने के बाद भगवान हमको तारक मंत्र का देश देले। उनके उद्देश्य से ही हमारी मुक्ति होगी। आज की जो गुरु महाराज हैं 12 भी रहता है। तो इसका मतलब यह है कि अब कुछ करो ही मत मरने की परीक्षा करो। जो अपना काशी में रहो और जब तक मर जा तब तक वो भगवान तारक मंद का उद्देश देंगे। नहीं। इस पर 1 तर्क है। ईश्वर अर्जुन के सामने था। अर्जुन को जब मोह हुआ तो सुख संवेदन माग संवेदन मानता हो गया। उस हालत में भगवान ने उसके मुह को नीलू किया। जब ये कहा कि सत्य शाधिमाम टॉम प्रबंध, मैं आपका शिष्य हूँ। जब भगवान को गुरु के रूप में वर्णन किया तब अर्जुन का गुरु ईश्वर में मोलर दिया। तो मोल वर्क जो है ईश्वर तो नहीं है मो वर्त गुरु तुम है। इसलिए भगवान ने कहा तदबिणiपतेरदेशंत ज्ञान, ज्ञान, तत्व दर्शना। इसलिए अर्जुन तू सरक ज्ञानी, तत्व दर्शन, बानी ज्ञानी के 2 विशेष ज्ञानी, गुरु के 2 विशेष ज्ञानी का शोतीकाअर्थहैब्रह्म नष्ट। तो स्रोत गुरु की शरण में तुम जाओ। यह गीता कार्वी कहते हैं। इसलिए और दूसरी बात ये हम लोग यह मानते हैं कि ईश्वर ही गुरु रूप में आते हैं। ईश्वर रात में थी, मूर्ति भेज विभाग ने more man का कोई मजा दुख दूर न हो। जैसे स्वप्न में हमारा सिर कट गया, अब हम बहुत दुख क्यों हो रहे, हमारा सिर कट गया, मर गए, हमारे शरीर को अर्थी में रखकर चिता तक ले जाया गया। व आग लग गई, मर गए, हमारे शरीर का नाश हो गया। अब सोच रहे हैं कि परिवार का क्या होगा, संसार का क्या होगा? अब चिंतित हो। तो जो सपने सिर काटे कोई, जहां सुकृपा से ब्रह्म, टी जाई, गिरजा, सो कृपा, जिसकी कृपा से यह ब्रह्मा राई, गिरजा गुरु में और ईश्वर में कोई अंतर नहीं है। बल्कि लोग कहते हैं, ईश्वर ने बांधा और गुरु ने छोड़ा तो गुरु बड़ा। संसार बना के ईश्वर ने बांध लिया। ओ गुरु ने ज्ञान पर ज्ञान दे कि आपको मुख फेर दिया। इसलिए कौनसा रोग हुई। बचपन tom फेस कर्म शास्त्रा दिरंग। बीच में 1 शास्त्र आर्थ आ गया। शिष्य ने कहा कि हमको ब्रह्म का ज्ञान हो गया। तो तब तक ज्ञान से मुक्ति तत्काल हो जाती है। ज्ञान से जब अज्ञान का नाश हो गया तो अज्ञान ही तो मुक्ति का बंधन का कारण था। तब तब तक जाना नि श्री, तब तक जहां से मिश्री हो, श्री हो गया। तो अब स्थिति की। इस स्थिति में हमको अब कुछ नहीं करना है। जो हमारे लौकिक और दूसरे कर्म सामने है, उनके बारे में हमको अब कोई प्रेत नहीं करना है। बीच में भी काम, क्रोध, हाली आ जाए। उनको रोकने की कोई आवश्यकता नहीं है। अब ज्ञान हो गया। मुक्ति तो होनी है। वे मुक्ति हुई जाती है। जीवन मुक्ति नहीं होती। बात अलग है। तुम्हारे जीवन मुक्ति हो, न हो, मुक्ति तो है है। तो किसी ने कहा कि अगर तुम अपने मन को नियंत्रित नहीं करोगे, सभ्यास नहीं करोगे, केवल ज्ञान के भरोसे रहोगे। तो हो सकता है कि तुम्हारे जो मन में काम खुल जाएगा, तो मनमाना जन करने से आपका नष्ट हो जायेगा, हो जायेगा, कैसे हो जाएगा। पूर्वा, पूर्वा वो क्या है? जो मन परमात्मा के सुरूप बोध से पूर्व और आगामी जो अंग हैं, उनका नाश हो जाता है। तो पूर्व का जो विनाश हो जाता है, संचित कर्मों का नाश हो जाता है। और जो आगामी कर्म है, उनका श्लेष नहीं होता। हाँ, यह है बुरा सूत्र, तरजुमा, उत्तर पुरवा, असलेशविनाशो, उत्तर माने ज्ञान के पश्चात जो आग माने पाप पुन्य है, उनका तो अखिलेश होगा। और पूर्व जो है, उनका विनाश है। प्रारंभ रहेगा, प्रारम्भ क्यों रहेगा। ईश्वर का संकल्प था। मृत्यु के समय जीव के समस्त संचित कर्म सम्मुख आये, वन पाप भी थे, पूर्ण भी थे। उन संचित कर्मों में से ईश्वर कुछ कर्मों को चाट कर। 1 साथ तो सब कर्मों का फल दिया नहीं जा सकता। उनमें से कुछ का ही फल दिया जा सकता है। तो उनमें से कुछ कर्मों को छांट कर ईश्वर ये संकल्प कर देता है। इन कर्मों के अनुसार यह जीव इस यवनी में जाकर। इतने समय तक इन सुख दुखों का भोग करें। ये जो उन कर्मों का को लेकर ईश्वर का संकल्प है, उसी का नाम प्रारम्भ है। इसको प्रारंभ देखते है। अब उस प्रारंभ का नाश ध्यान से तत्काल नहीं हो पाता। उदाहरण लिया की आपने देखा, गायों के बीच में भाग आ गया, बाग बाग बुद्धी से किसी ने बाड़ छोड़ दिया। अब वो तो जाएगी बाघ हो चाहे गायब हो लगेगा। इसी तरह से जब तक की उस मान में भीग रहेगा, बीच में नहीं रोक सकते हैं। जहाँ तक उसका लक्ष्य है, जहाँ तक भी रहेगा तब तक वो जाएगा। इसी तरह से कर्मों का भी। प्रारंभ में जो भी संकल्प वो पेट की शांति जब तक नहीं होगी तब तक वो रहेगा। कुम्हार घड़ा बनाता है, वो चक्र को घुमाता है, घुमाते, घुमाते, वो घुमाना छोड़ देता है, पर जोर देता है, लेकिन थोड़ी देर तक घूमता रहता है। क्योंकी भेग रहता उसका। इसी तरह से वेग के कारण मनुष्य के ज्ञान हो जाने पर भी शरीर बना रहता। पीवी प्रश्न है भेदवादी। यही तो प्रश्न करते हैं। साहब। आप कहते हैं ज्ञान। ज्ञान से संसार ज्ञान हुआ तो संसार का नाश होगा तो संसार भी उत्तर आपका। शरीर भी तो है। तो शरीर का विनाश हो जाने शरीर हो जाएगा। जितना ज्ञानी है तुरंत ज्ञान ले के मर शिष्य कहाँ से आ जाएगा? तुम्हारा अहित सम्प्रदाय है। यह तो खत्म ही है। तो जीवन मुक्ति माननी पड़ेगी। अर्थात ज्ञान के होने पर भी बधान मृत्ति होती रहती है। यह बाधान वृत्ति को ही सिद्धांत लिज। संग्रह में अविद्या देश कहते हैं अविद्या का देश रहता है। जैसे बर्तन में यदि हींग रखी गई हो, हींग को हटा देने के बाद भी कुछ न कुछ गंध बनी रहती है। इसी प्रकार अविद्या के नष्ट होने पर अविद्या देश से शरीर बना रहता है तो अपने आप को वो मानता है कि अब्राह्मण सी है। क्योंकि व्यवहार की भी तो अविद्या का नही पड़ेगा। तो वो अविद्या नहीं विद्या का देश। अब ये प्रश्न आया। ठीक है। कर्मों का नाश तो हो गया। और आगे जो कर्म है उनका शेष नहीं होगा। तो प्रारब्ध के अनुसार काम आए क्रोध? हाय लो आय। होने 2। तो कहा की उसके अनुसार जिद्दा जलन करने पर हमको तो दोष। लगेगा ने जानी। तो उन्होंने कहा भाई ऐसा यानी का मतलब यह नहीं है कि आप पशु बज जाए। आप कुत्ता और सुवर के समान अपवित्र वस्तु का वरण करें। ज्ञानी और अज्ञानी के अंदर कहते हैं सर्दी दोष संत्यांत्यागरोगई पूज देवत। समस्त बुद्धियों के दोषों का त्याग करके लोगों से पूजी के समान पूजित रहो, जो के समान पूजित हो जाओ। तो यही कहा अब भी। इसके बाद ये कहते हैं की सच बात तो ये है कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए काम, क्रोध, रोग हो। इन सब का त्याग करके ही कोई ज्ञानी बनता है। जब तक कि आप साधना नहीं करेंगे तब तक ज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी की साधना के लिए बताया है। संतुष्ट 2 किसी भी प्राणी से देश मत करो। क्रोध कर? मित्र जो कोई व्यक्ति हमारे समान हो, उसे इशारा करके उसमें मित्रता का भाव जो हीन विचार के लोग हैं, उनकी वृद्धि करुण हो जा और जो देशी हैं उनकी उपेक्षा मैत्री करुणा। मित्रता उपेक्षा ये समान वालों से मैत्री मिस, विचारों के प्रति करुणा। और जो अपने से आगे बढ़ रहे हैं, उनकी को लेकर मुदित। और जो विरोधी हैं उनकी उपेक्षा, इसको प्रतिपक्ष भावना के प्रतिपक्ष भावना से मन को शांत किया जा सकता है। तो आगे बढ़कर के बताया की स्वाभाविक। स्वाभाविक बात तो यही है, जो पहले साधना के संस्कार है। वो संस्कार बोध के पश्चात जकदेपियाबदकी छुट्टी हो गई। 7 के ऊपर हो गया। वो शासक पर कैसे होगे? 7 है आपको पहचाने का तभी जगेगा। जब हम पहचानेंगे की सदानंद है, तब सदानंद को कर। बताएंगे पहचाने ली। तो 7 पहचानता है, वर्ण आश्रम जाना है। जब आप ब्राह्मण बन के आओगे तो सास का तुम्हारा कर्तव्य है। क्षत्री बन के आओगे। तो ये कर्तव्य है। वश्य बनोगे तो यह है। तो सूर्य बनो। तो ये कर्तव्य है। ब्रह्मचारी बनो को, ये है बनो को। ये है बारबरस बनोगे। तो यह सन्यास। जब आप कुछ बनोगे, तब आपके ऊपर वृद्धि लागू होगा। प्रामरकोदूढ़ीउपदेश्य करता है जो पावर है, जो अपने कुछ मानते ही, उनको क्या उपदेश करोगे। पावर को साथ पहचानते ही नहीं है। जो ब्राह्मण नहीं, जो मनुष्य, जो ब्रह्मचारी, बाल, ब्रत, यहां तक कि जो अपने को मनुष्य भी नहीं मानता, उसको शांत क्या करेगा? शांत तो तभी लागू होगा, जब आप कुछ हो जाएंगे। जब तक कुछ नहीं बनोगे, तब तक कुछ लागू में। विनोद की बात सुनाते हैं कि गुरु शिषि रहे थे। तो गर्मी के चलते चलते शिशुता राजा के महल के सामने पलंग पड़े हुए थे मैदान में। क्योंकि गर्मी के दिन में बाहर तो होते हैं अच्छे, अच्छे रंग तकिया। और गद्दा। शिष ने कहा गुरुजी, राजा राजराज रंग में फसा हुआ है। तब तक हम सोल का बेटा ऐसा है कि दूसरे के विस्तर मनी होना चाहिए। कर थोड़ी देर, सो लेते हैं, पर चल देंगे। तो उन्होंने कहा कि अब ठीक है, अब सो लेते हैं। हम भी सो लेंगे। तो हम सो लो। लेकिन कुछ बनना मत का ठीक है। दोनों सो गए। गैरी। अब राजा का गान समाप्त हुआ। तो नौकर आए। यहां देखा कि 2 बाबा सो रहे हैं। तो 1 नौकर कौन। गुरु। महाराज चेला ने साधु का साधु बिस्तर में सोते हैं। दूसरों मार पड़ गई। मार बढ़ने के बाद बिट बिट गए। और कुछ बना होगा। जब तक बनोगे नहीं, तब तक भी दिन लागू नहीं होगा। 2 बिधीनिशेदसे ऊपर हो गया। जब आप ये कह रहे हैं कि न ब्राह्मण, न त्रि है, न बस है, न शूध। मनुष्य कुछ भी नहीं है। आप तो साथ किस को पचाने आपको। उत्तर खुलेगा। तो जो व्यक्ति कुछ हैं, जब उसका व्यक्तित्व रहेगा, तब उसके ऊपर 7 लागू होगा। विदेशी लागू होगा। जो ब्रह्मी भूत हो गया, जो ब्रह्म हो गया, जो अपने आप को कुछ मानते ही नहीं है। और फर्थ हैं। सास लुक है तो सास तो उससे निवृत हो जाता। पर और जीवन मुक्त से सास कुछ नहीं बोलता। विषय और साधक। ये सास अनुकूल नियंत्रित करता है। बिशी उसको कहते हैं जो सास के अनुकूल इस संसार के लोगों को बोलता हुआ सात्रानुसार पर रोग को प्राप्त करके उनका भूख सहायता हो, उसको विषय कहते हैं केवल विषय के प्रेमी को वशी नहीं कहेंगे। जो शास्त्र से विषय भोगता है, वो विशी के रहा है। विषय सा बिशी साधक 3 प्रकार के जीव हैं। पॉवर को तो जीव की कोटि में गिना है। वो अपने को कुछ नहीं है, इसलिए भी नहीं। तो ऐसी स्थिति में 7 ऊपर हो गए है। शास्त्र हमारे ऊपर कंट्रोल अप करेगा? नहीं बिजली लागू नहीं होगा। इसलिए जो भी हमारे मन में भावना, आएगी हम वो करेंगे। कुछ दिनों से 1 व्यक्ति बहुत सिद्ध हो गया, रजनी, उसका नाम था का। चित। रतन को सुद्ध नहीं करना चाहिए। 84 से दूर है। वो भी यही कहते हैं। चित रतन मन में काम, क्रोध, लोभ की वृत्ति उत्पन्न होती है, तो उसको दबाओ मत, उसको कि दबाने से चित हो जाएगा। हे उनका। तो ऐसी स्थिति में या फिर प्राप्त हो गया। यतीसाचरणप्राप्त हो जाने के बाद यह तीषायचरणआपकरेगे क्यों करेंगे? काम क्रोध के वशीभूत होकर आप यथेचाचरणक्यों करेंगे। क्योंकि आप संसारिक सुख प्राप्त करने के लिए अभी अपने आप को नियंत्रित नहीं करना चाहते। तो जब कुछ सांस्थानिक भूखों के लिए आप काम क्रोध का नियंत्रण नहीं कर रहे हैं तो फिर आपने स्वर को क्यों छोड़ा? क्योंकि स्वर्ग तो इससे बडा था। यहाँ के क्रम से, यहाँ के लोगों से जो सुख मिलता, उससे अधिक सुख वहाँ मिलता था। उसको जब छोड़ा तो भैया क्या ये नित्य हैं, इनमें क्यों बस? इसलिए जो बोध के पश्चात भी काम, क्रोध, दीदी, आते हैं, तो उनका नियंत्रण करना चाहिए। काम, क्रोध और मनोराज्य उनका त्याग करें। और साथ ही साथ गीत के भी 2 भेद है। h badaya came to a कहते हैं कमाल दोष की दृष्टि से पहले जो सरकारी सुख है, आपने उनको छोड़ा। आज कुछ लोगों के लिए आप को अब वो कहता है, जितना मेरा कमार जितना में कमा मनो, राज्य का खसेशदूषबीजतपातशतिर भगवते रिता। वो सारा जो कह रहा था कि हमारा मुख्य तो अब निश्चित हो गया, हम जीवन मुक्त का अभ्यास क्यों करें? जीव कृत जो संसार है, जीव की सृष्टि का नाश क्यों करें। यही बात चल रही है। तो ये बोले कि ठीक है, आप कहते हो तो हम काम ग्रुप को छोड़ देता है। मनो राजजीत का खेती मने, मन अगर चिंतन करें। और क्या क्या खेीमनोरजइसकोकहते हैं, मन के लड्डू खाते हैं। लोगो ने बचपन में पढ़ा है कि सिख चि ली। था सेकसी माथे में, घड़े में किसी का भी लेके जा रहा था तो रास्ते में सोचा कि अभी वह घी ले जा रहे हैं। इससे हमारे पास पैसा आ जाएगा, पैसा लेंगे, हम उसको व्यापार में लगा देंगे तो कुछ और पैसा हो जाएगा। पैसा जब बढ़ जाएगा तो हम मकान बनवा लेंगे, मकान बनवाने के बाद हमारे पास मकान पैसा जब हो जाएगा तो हम शादी कर लेंगे। शादी होने के बाद हमारे घर में बीवी आ जाएगी, बीवी आ जाएगी तो हमारा गस्ती का सुख हम को मिल रहा है। 1 बार कभी हमारी भी भी नाराज होगी, जहाँ जोर से लात मारेगी तो लात मारेगी ददमरिराफूडगया। तो जो मजदूरी मिलने वाली थी, सभी वंचित हो गया। तो ये शेख शिल्ली होते हैं। बैठे बैठे चिंतन करते करते यंमनथाजायतीतदवचा बन थी। यद भाषा अधिकतर कर्मना करो जो मनुष्य मनुष्य ध्यान करता है वो वाणी से निकल पड़ता है। जो वाणी से निकलता है वो कभी भी कर्म से निकलता है। 1 माता थी अपने लड़के को गोद में लेते हुए कुए के पास ले हार से उछाले उछाले। कुआ भेग लू, कुआ भेग लू। कहते कहते 1 दिन फेक दिया उसने कि जो बात मन में बार बार आती है वो क्रियान्वित हो जाती है। और क्रियान्वित हो जाने के बाद अर्थ जाता। इसलिए मनो राज्य भी नहीं करना चाहिए। और गीताकार भगवान ने कहा है जाए तो बिश्यान संग संग संजय कामा क्रोधित क्रोधों भी जाए तेल। जब पुरुष विषयों का ध्यान करता है तो विषयों का ध्यान करते करते उन विष्यों पर आसक्ति हो जाती है, स्वाभाविक रूप से हो जाती है, निषेध विधेय करने से उनमें राग हो जाता है। इसलिए शंकररंतीगीता में लिखा है कप किन करोती इतव्यापु्िता कौन क्या कर रहा है। इसमें अपनी बुद्धि को नहीं लगाना चाहिए क्योंकि कई गरमा कर रहा है। आप सोचिए। आज आपके भारत में रोज लाखों आदमी पैदा हो रहे है। ये कैसे पैदा हो रहे हैं, बिना विषय भूख के पैदा हो जाए। क्या आप करो चिंतन है उनका। तो अब जब उनका आप चिंतन करोगे तो चिंतन करते करते आपके अन्दर भी वासना उत्पन्न हो जाएगी। इसलिए उनकी तरफ से ध्यान हटा लेना चाहिए। मनु राज्य का त्याग कर रहा है। जाए तो विषयान संगत शुबजाएतेऔरविशों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति हो जाने संग समझाए थे, कम है फिर प्राप्त करने की इच्छा हो जाती है। होता है किसी भी विषय का चिंतन करते करते उसकी इच्छा हो जाती है। हम लोग उत्तर काशी में हम कुंदन रहे तो रोटी लेने के लिए, भिक्षा लेने के लिए क्षेत्र में जाते थे और सब साधु जाते, उनके साथ बी जाते। अब क्षेत्र में पहले पहुँच जाते थे, अब रोटी बढ़ने का समय थोड़ा बाद में आता था। तो उनकी चर्चा हम सुनते अमुक से आएगा, वो कम्बल मारेगा, वो भंडारा करेगा तो माल पूरा बनेगा। अब जब हम उसका चिंतन कर रहे हैं, जब वो सेठ आएगा कम्बल मारेगा तो स्वाभाव चा मालपुरा बनेगा तो हम सोचने, हमको भी मिल जाए। तो चिंतन करते करते उस वस्तु की इच्छा मन में जागरित हो जाती। तो काम हो गया ये इच्छा वाले काम। अब किसी ने बाधा डाल दिया तो क्रोध उतना उत्पन्न हो जाएगा। बाधा नहीं डाला तो आदमी सोचता 1 मलेरिया और मिल जाए तो लोग हो जाता है काम। यदि पूरा न हो तो क्रोध और पूरा हो जाए तो लोग काम क्रोध। हो भी जाए तो क्रोध हो गया। क्रोध बबल सम्भव है, क्रोध हो जाने के बाद संभव हो जाता है। संभव क्या है? मनुष्य को शास्त्रों की विस्मृति हो जाती है। ज्ञान उस समय छूट जाता है और समिति में ब्रह्मा, गुरु और शासक जो हमको उद्देश हैं, उनकी याद नहीं रहती। गुरु शांत की याद रहती तो हम उस रास्ते पर न जाते। तो स्मृति का विवश हो गया। तो हम उसी रास्ते पर चले गए। सर्दी होने के कारण सास और गुरु की याद रही नहीं, उन्होंने हमको यहाँ से रूका था। रास्ता अच्छा नहीं है। तो काम ग्रोथ की तरफ हम पहुँच गए और उसी से हमारा सर्वनाश हो जाता। सर्वनाश क्या है? जो ज्ञान प्राप्त करने के लिए हम चले थे, उस गैर की प्राप्ति तो हुई नहीं, उल्टे चले पड़े। इसलिए मनो राज्य नहीं करना चाहिए। अब बताते हैं कि मनो राज्य को कैसे छोड़े? शक्कमझेतु मनो राज्य, निर्विकल्प समाधित, संपादक करमा, सभी सविकल्प समाधि ना। तो का मनो राज्य को हम कैसे दूर करें? मन तो यहाँ वहां बटकते ही है। तो बोले निर्विकल्प समाज, न निर्विकल्प समाधी का अभ्यास करने से ये मनोराज्य भी जीता जा सकता है। हमारा निर्विकल्प समाधी, हम कैसे लगाए? बोले तो बाद का निर्विकल्प समाज पहले पहल। यदि नहीं होती है तो सर विकल्प समाज का, सविकल्प समाधि के द्वारा निर्विकल्प समाधी। अब ये समस्या आ गई कि सविकल्प समाधि क्या है? और निर्विकल्प समाधि क्या है? और यहाँ किस समाधि की चर्चा हो रही है, जो योग की समाधि है। यह नियम आसन प्रणय, त्यहार, धारणा या समाधि समाधि के भी 2 कल्प सविता सविता निर्मित। और ये ई मे है। लेकिन इधर जो हमारे वेदांती समाजी है, इसमें सविकल्प समाधि समाजी, विचारात्मक, समाज, विचार। 1 शब्दान विद्ध समाजी होती और दूसरी दिशान विद्ध समाधी, दूसरी शब्दान विध समाजी, विद्ध समाधी। जो शब्दान विद समाधी क्या है, जो अभेदवाचकशब्द हैं, उनका निरंतर चिंतन होता। जायालानंदरuबजाति। प्रत्यानंतरित सजातिय प्रत्य प्रवाहीकरण निध्यान, jati rmsmisomsricnda सो हम, हमारी जो श्वास है, ये हमेशा जल रही है। hकारेनबहिरिाती सकारेनषिपुन हंस हंस हैकि मंद्रोयमjजथरमना जब हमारी श्वांस निकलती है तो हाँ बोलती है हम multi और जब हम खींचते हैं तो सा हंसा हंसा हंस परमात्मा बना। तो हंस हंस नमयजीवसदाजपरहा है। 24 घंटे में 21 हजार साल चलती है, 600 साल, 21 हजार, 600 साल चलती है, 21 हजार, 600 बार जीव। जबरा जब गुरु इसको मिल गए, सदगुरु विदान तत्व का उदेश्य मिल गया, गुरु इसको उलट देते हैं, शाह को पहले कर देते हैं, हमको पीछे कर देते हैं। हंसा की जगह सुहमहोजाता है। तो ये सोहम दासो, दासोमियाबुद्धi पुर्वा सीन मसूद दाकाररतेनगोपी। किसी महापुरुष ने कहा है कि हमारी भगवान मसूदन में बुद्धि थी, दास हम उनके दास हैं, दास हम दासू, हम कह रहे थे। ये जो गोपियों के वतावरण करने वाला चंचल कृष्ण है, उसने दकार का हवन कर लिया, द निकाल दिया, द निकाल दिया, कहा सो सो हम मैं, वही हूँ। तो सोहम सोहम हमारी श्वास श्वास पर श्वास में बैठ के इसी का समाधि या निरंजन ब्रह्मानंद भोजन वाला आता है। नरंजन वाला घटमें ऊपर जाए, निचे जाए। नरंतर हो रही है, हमें कुछ करना नहीं है, केवल ध्यान देना, केवल ध्यान दे दिया जाए। तो मन शांत हो जाता है। तो पहले हाँ, यह हम कह रहे थे। शब्दान विद समाधि शब्द को साथ साथ उसके अर्थ पर विचार करते जाएँ। ये शब्दान विद समाधि हो गई, फिर शब्द की विस्मृति हो जाए। इसी तरह से दृश्य वृद्ध सवाल दिश्यानवृद्धसमाधी क्या है कि दृश्य का विवेक विवेक कर ले। 1 ही बाद के अनुसार आत्मा द्रष्टा में दरs्राहoँ और सारा संसार दिश तो दृश्य और दृष्टा 1 नहीं होते हैं। दृश्य जन है दृष्टा क्षेतर, दृश्य हम से भिन्न है और दृष्टा हम से, तो दृश्य को अपने स्वरूप से अलग कर। 2 तो ये आप समझ लीजिये कि पहले आप सुन चुके हैं में कोष, मनों में को विज्ञान, प्राण में कोस मनों में कुश, विज्ञान में कोस कु सब दृश्य है और हम उसके दृष्ट है। तो ये तो बेस्ट में हमने सोचा। अगर हम ये सोचें कि जैसे स्वप्न में केवल हम अकेले ही रहते हैं, अकेले हम वहाँ स्वप्न देख रहे हैं और जितने वहाँ पर दिश है वो सब हमारा कल्पना है। तो स्वप्न में हमको बाजार से भी दिखते हैं और प्राणी भी दिखते हैं, बहुत से जीव दिखते हैं। तो वो स्वप्न पुरुष के जाते, स्वप्न पुरुष हमसे मिली है। वो हमारी कल्पना है। तो सारे संसार को दृश्य कोटि में ले आओ और दृष्ट कोटि में ले कर दृश्य को देखो। सबको देश है और दृश्य को देखते देखते। दिश्य क्या चीज है। उसको संक्षेप में समझना है तो देश काल और वस्तु। यह दृश्य है, है न? देश काल वस्तु, देश काल वस्तु को छोड़कर और देश को। यही नहीं अपने आप स्वप्न में हम क्या देखते हैं, स्वप्न में देख देखते हैं, काल देखते हैं और वस्तु देखते हैं। इसी तरह से संसार में भी, जागृत में भी हम देश काल वस्तु को छोड़ के और क्या देख रहे हैं। तो देश काल वस्तु किस्म है ये हमको विचार करना है। देश काल वस्तु का जो दृष्टा है, उसमें तो है नहीं। अब बाहर कोई देश का है, देश का, देश री, जनता। इसलिए उसका कोई आधार नहीं है। जनाधार में जो दिखाई पड़ रहा है वो है नहीं। इस तरह से श्याम, विद, समाज पहले दृश्य बना लो, सबको और दृश्य बना के, उसके विख्यात को समझ लो तो केवल अपना स्वरूप रह जाएगा। ये है निगल समाज, इस निरगल्समाजपेतो दृश्य, इसमें ध्याता, ध्यान तिरपुरी रहेगी और उसके बाद ये भी समाप्त हो जाए। इसी प्रकार यहाँ समझ लीजिये, ये भी सभी समाज है। तो इसमें भी हमारा पर जाता। हम ध्यान कर रहे, ध्यान से मारी, अंत में जिसका हम ध्यान कर रहे हैं, प्रत् केवल वो ले जाए और हमारा अपना, हमारी अपनी, हमारी विस्मृति हो जाए और ध्यान नाम की कोई क्रिया न रह जाए, केवल वही रह जाए। तो वो भी समाधि है। इस तरह से संकल्प समाज द्वारा निर्बल समाधि में पहुंचा जा सकता है। ये यहाँ पर बताया गया, बुधरतेनधीदूशछूने नहीं, कान से दी र म। 4 मनो राज्य बिजी कहते हैं, ये बुध तत्व हैं, बुधतत्तमाने बुद्धम, तुम सा बुध। 3 जिसने तर्थ को परभारत को जान लिया, तत् तो है परमार्थ उसको झेलने और जान लेने के बाद बुद्धि में भी दोष आ रहे हैं। ये मनोराज वगैरह है, यही है। तो उनके लिए। 1 तय वनवास विविक्त, देश से वित्त, अरतिर जन संसदी एकांत स्थान पर बैठकर जनसमूह से अलग होकर आत्मचिंतन करना चाहेगा। क्योंकि भीड़ भार में रहने से वो कुछ न कुछ बताते रहते हैं। चर्चा करते रहेंगे। श्री संन्यासी के लिए लिखा है बा से बहु नाम कल हो? बबेलवारकाबयोरभी चरे कुमारिया आयोग कंकणम कहते हैं? बहुत से रहेंगे तो आपस में झगड़े होंगे और 2 रहेंगे। 1 दूसरे की बातचीत भी होती रहेंगी। और कुछ इसलिए 1 कुमारिया आयोग कंकणम ये दत्ता तेजी के जो 24 गुरु हुए हैं, उनमें से कुमारी 1 गुरु हुई है। कुमारी गुरु कैसे हुई हैं। 1 लड़की थी उसके जो मांग मांगने वाले, ससुराल वाले आ गया। लड़की को मांगने वाले वर पक्ष के लोग आये। घर में कोई था नहीं, माता पिता, भाई बाहर थे। अब उसने सोचा कि आये हैं तो इनके लिए तो चावल दाल बनानी पड़ेगी। तो चावल तैयार करने के लिए खली में कूटना जरूरी? तो वो कूटने लगी? क्योंकि यह भी जानना जरूरी होता है कि पहले लोग मारी हालत भी देखते थे किसके यहाँ आए हैं। स्वागत सत्कार करेगा कि नी करेगा। तो कुमारी ने सोचा कि जब तक कि मां बाप आये तब तक हम चावल कूट के तैयार कर रहे। को चूडियां पहनी थीं। झंझनहोरहीथीतोउसे चूड़ियाँ उतारना शुरू कर दिया। जब 1 चूडी रेली के हाथ में तो आवाज बंद 2 उसी को गुरु बना दिया। लता त्रीजी ने की सन्यासी को अकेले रहना चाहिए। 1 कुमारिया जब 2 चुड़ी होंगी तो चंड होंगी तो क्या समझेगा? तो बोलते हैं कि जी बुध का बिना एकांत वासी होकर दीरपमुचारिए, मनोराज्य, विजिते, दीरप्रणों का उच्चारण करेगा लम्बा। उच्चारण। तो उसे अपने मन को लगाने से मन उसके साथ जुड़ जाएगा मंत्र और प्राण। और मन 31 हो गया, उच्चारण हो गया मंत्र व प्राण जो है मारा जो श्वास ही प्राण हो गया। और मन भी उसमें लगा दिया। तो मन प्राण और मन जब 1 हो गए तो हो गया। भेदभाव नहीं रहेगा। तो इस प्रकार दी, मनोराजमबिजीते, मनो राज पर विजय प्राप्त कर सकते है। जी ते वृत्ति। 0 मनो राज्य को जीत लिया तो मन मोंग हो जाता है। मन की हलचल बंद हो जाती है। इसलिए मौन क्या है। मूल वाणी का तप नहीं है। मन प्रधान सौम्यतम, मूल महात्मा बेनी, ग्रह, भाव, सुसशु्धिरितिदततपो, मन की निर्मलता सौमिता, मोन, संकल्प विकल्प रहित हो जाना। ये मोल तो मोल को जो मोन बद बोलेंगे नहीं, फ्लेट में लिखेंगे, सिर लाएंगे लो और सिर का सिर लाएंगे। लेकिन जीव नहीं लाएंगे। कहा मोहन, ये मोहन नहीं है, मौन यह भी हो सकता है। आपकी बाणी से जो हो रहा है, कहते हैं वीरक्या भाग खड़े बरियार, वीर क्षय से बाग परिवार होता है। जयादा बोलने से भी शक्ति का राज होता है। लेकिन यहाँ यह मुख्य मौन नहीं है। मुख्य मन मन, मन का संकल्प रहित हो जाता। संकल्प रहित हो जाना, मन को अमन हो जाना। अर्थात विषय कर्ता का त्याग कर देना। तो मन जो है, मुख हो गया। मुख बत जैसे कोई मूक भूल नहीं सकता, उसी तरह शांत हो गया। रमा बहुत हेवी। तो इसके लिए अभ्यास करना पड़ेगा। ना। शिराभ्यस्तारमसंसार साचराभ्यासयोगे कुचित हे राम। संसार की बात सुना जन्मान्तर के अभ्यास से पक्की हो गई है। बार बार संसार का चिंतन होता है तो जब तक चिरकाल तक उसका उल्टा अभ्यास नहीं किया जाएगा। बिना रखिए देख उसका अभ्यास करते करते अभ्यास क्या है तत कठन चिंतन, न्यूनयम तत प्रबोधन। 1 देख ब्यास बधा उसी का चिंतन, 1 दूसरे से उसी का कथन आपस में बैठ कर उसी को। 1 दूसरे को समझाना। ये नहीं सुनिए, उसके बाद चर्चा नहीं, उसका मरण करना है। तो ये जो है ब्रह्मा व्यास इसको कहते हैं मौन ब्रास बास का नाम है मौन और निदिध्यास का नाम है। अमून। तो मौन और अमून दोनो का क्या करो तो मुनि हो गए। मैने मन का रोकना और मन का न रुकना, दोनो का प्रयास छोडो रोकोगे तो करते रहोगे और न रुकोगे तो भी करता हो। तो दोनो का क्या ने अपने कृतित्व का त्याग कर देना। शांत अपने स्वरूप में स्थित हो जाना। ये मन का अमानी भाव जो है, यही सच्चा मौन है। this man दृश्यम रास्ते बोले दृश्य मन है। जिन वस्तुओं का चिंतन करता है। कई दृश्य मन का, मन का चिंतनीय विषय, ये मन का देश है। देश का मतलब केवल आँख से देखना नहीं है। जो कुछ हम सोच रहे हैं, वो सब का सब दृश्य है। गुगूचरजालगीमन जाई, सो सब माया जानू, भाई, गोबाने, इंदिया अगूचरमानीदिलों के विषय शब्द स्पर्श रूप रस और जहाँ लगी बन जाई, जहाँ तक बन जाता है तो सब विश्व रूप रस। गंध और सुख दुख तो दशा मन के द्वारा इन्हीं को देख रहा है। तो जब ये समझ में आ गया कि देश नाम की कोई वस्तु है, नहीं, दिशयमनास्तीजी बोले, नास्ति मिटा है, न रची। यह सच नहीं है, यह सच नहीं है, सच नहीं है। यह हमसे भिन्न नहीं है, हमसे भिन्न नहीं है, भिंड भिन्न नहीं है। किसी रूप में इसका निर्वाचन नहीं किया जा सकता। इस प्रकार जब दृश्य का बाद हो जाएगा तो परम आनंद का वास होगा। संपन्न स्तर बनना, पड़ा निर्माण वृद्धि मुख की निर्वृत्ति माने। आनंद उसकी संपन्न हो गए। विचार में 7 मुद्रा था। संतक्वसनऋतिरमपदम कहते हैं शास्त्र को खूब विचार कर लो और 1 दूसरे को समझा लो। चिरमउररायतममिा शास्त्रों को गुरु के मुख से सुनकर और आपस में 1 दूसरे को समझा समझा कर। 1 ब्रह्म विचार। और फिर जिसके विख्यात को हमने समझ लिया की दृष्टि को कर लो, तो वासना समाप्त हो गई। और वासना जब समाप्त हो जाएगी, हमने कल। 1 शोक सुनाया था, असम में बहार, बह, बह, भाव, शरीर, नाश, दर्शित, वासना, न, प्रवर्तते, असंध, व्यवहार और संसार है। इस प्रकार की संसार में जो सत्वद्सत्त्वबुद्धि है, उसका वर्जन कर। 2 और शरीर नहीं रहेगा, शरीर कल का भरोसा नहीं है। तो हम दुनिया भर की चीज पकड़ के करेंगे क्या? वह सना न प्रवर्तते। तो कहते हैं 7 को अच्छी तरह से विचारित कर लो और 1 दूसरे को अच्छी तरह से समझा लो, समझ लो और वासनाओं का त्याग करके न हमको अब किसी से कुछ कहना है, न किसी से सुनना है, न कुछ सोचना है। बस शांत होकर उन निभाव में रह। इससे बढ़कर उत्तम बंद कोई नहीं है। अब कहते हैं क्या करें? कर्मणा हो। धारा का ये है। कहते हैं कि कभी कभी अपने प्राण बचा हुआ है तो प्रारंभ के प्राबल्य से सामने यदि कोई वस्तु आ जाती है। सुख दुख सुख की सामग्री आ गई, सुख की सामग्री आ गई तो मन उसकी तरफ जाना रखता है। वषिपतिगार्सीहै उसका चिंतन करने लगता है। तो उसके लिए कहते हैं कि अभ्यास को और दृढ़ करो अभ्यास पाडवा। अब ये प्रार माने हमारे ऊपर तलवार चल पडी है। सिर काटने के लिए है कि नहीं? इससे बचने के लिए तलवार अगर किसी ने मारी है तो डर लगा। 2 तो ढल से ठा होगा, नहीं होगा तो ढाल क्या है? यही विचार तो इस तरह से मन को शांत कर देना। ये संसार है ही इस तरह से देव। इस प्रकार जो मन के मौन को संपादित कर देता है अर्थात उन मनी भाव में मन को पहुंचा देता है। मन के रहते हुए भी मन का मनन करना जब छूट गया कोई मननीय विषय ही न रहा तो मन क्या करेगा? ऐसा जो व्यक्ति है वो ब्रह्म वितता है। उसको ब्रह्म वितता कहना भी उसको कम करना है। ब्रह्म ब्रह्म वा ब्रह्म वीरता नहीं है। वह ब्रह्म ही है। ऐसा पारदर्शी बनी। कहते हैं। ब्रह्मवेता अपने आप को नहीं समझ रहा है। वो दूसरों को भी नहीं समझ रहा हो। तो ब्रह्मा है बड़ा सुन्दर श्रोक है। दर्शन दर्शन स्वयं केवल रूप स स ब्रह्मण बरमन सम दर्शन, दर्शन दर्शन दर्शन दोनो खदा कहते हैं। बच्चे टीवी ने कहा है कि दर्शन ज्ञान, ज्ञान ब्रह्म जानामी। हम जान। इत्याकारक में, भारत में तालात्मजासबाधित सर केवल थे कन्या कार्य साक्षात ब्रह्मा। तो दर्शन दर्शन में ब्रह्म को जानता हूँ और न जानता हूँ। यह भी नहीं। अगर हम से ब्रह्म भिन्न होगा तब न जानेंगे और यदि हम सेम न होंगे तो नहीं जानेंगे। आत्मा सैम प्रकाश है। तो दर्शन, दर्शन दोनों को छोड़कर केवल अपने स्वयं प्रकाश स्वरूप में हो जाना। इसी का नाम ब्रह्म ज्ञान है। ज्ञान मान जहाँ कोउ नाही देख। ब्रह्म समान सब माही। ज्ञान उसको कहते हैं जहाँ 1 ही भी नहीं कह सकते कि मैं उसको जानता हूँ। अरे तुझसे बिन होगा और नहीं जानता। ये तो हो भी नहीं सकता। तो दर्शन और दर्शन दोनों को छोड़कर। जो केवल अपने स्वरूप में स्थित है, वे सिर तो वही है। वो कहते हैं उसको ब्रह्म इतना लोक स्वरिक हैं। लेकिन वो ब्रह्मवत नहीं है। वह स्वयं ब्रह्म है। जीवन मुक्ति पर आकाश का जीवन देते भरना लंबे नासा होने पर बेटा कहते हैं ये जीवन मुक्ति की बड़ा कष्ट है। जीव के द्वारा जो दलित है उसको खत्म कर। 2 तो जीव की सृष्टि को समाप्त कर देना। यह जीवन मुक्ति का परम सुख है। ये इस प्रकरण में जो बताया गया की ईश्वर की शिष्टी और जीव की सिटी दोनों का विवेचन करके जीव की सृष्टी का निरोध कर देना। जीवन मुक्ति का सुख प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। यहाँ पर बताया और ये कार यहाँ पर पूर्ण होता है। ओम पूर्ण पूर्ण, पूर्ण, ओम शांति शांति।
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