Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad-9

Hindi transcript of a Mandukya Upanishad lecture (Chaturmas 2012) by Swami Swaroopananda Saraswatiji. The speaker teaches Advaita Vedanta: the single Atman/Brahman pervades all beings (from gods to insects), multiplicity arises due to avidyā/adhyāsa (rope–snake analogy), and realization of oneness frees one from sorrow. He explains the waking, dream, and deep-sleep states and the role of tejas (inner light/awareness) and saṃskāras/vasanās, and notes that deity-worship and Vedic practices are pedagogical means pointing toward the non-dual truth.
Chapters
किरईरंगहितुष्टुआगुमसत्तनुबर्ण। बशेम देवहितम्यदायुः। सस्तिन इंद्रोविग्धच्छवा, सस्तिन पूषाविष्वविदा, सस्तिन स्तार्क्षिवरिष्णनेमु, सस्तिन व्यस्पतिर्दधातु, ओम् शान्ति शान्ति शान्ति यदेवं लेवं तुदिये परियवसानं जित्यासो मुक्षूरिष्यते सदा तत्त्व ज्ञानप्रदिवन्दकर्स प्रात्मासिक द्वितस्तो परमें सति अद्वित परिपूर्ण बम्माहमस्मिति वाक्यार्थ साक्षात्कारा सिध्धिति परिदमाः जब इस विकार्ध कुरिये में परियोशान मुक्षू जिञ्यासू का तो तत्तु ज्ञान का जो प्रत्वरासिक दोईत है उसका उप्रम हो जाएगा उसकी उप्रम होने पर अध्वाईत परिपूर्ण ब्रह्मों में हुँ ऐसा वाक्यार सागचात कार सिद्धो जाएगा एवं चेति एवं च सति सर्वप्रवन्चो समे अद्वैत सिद्धी हैं। इस प्रगार सप्प्रवन्च के उप्सम से अद्वैत सिद्धी हो जाते हैं। उक्तर न्यायेन तत्व साक्षात कारे संग्रिहिते सर्वेश्व भूतेशु ब्रह्मादे थावरान्तेशु आत्मा एको अद्विजिता दिश्टस्चात् जो उपर उपाएं बताये गया जग तत्व साक्षातकार हो जायेगा तो सब भूतों में, सब प्राणियों में अर्थात ब्रह्मा से लेके स्थावर्तक जितने भी शरीर है उन में एक अदुथी आत्मा ही दिश्ट हो जाएगा। एको देवा सर्वभूतेशु। सब प्राणियों में एक ही देवद है। तत्य तत्य ब्रह्मचैतन्य सेवः। प्रत्यक्त्वेन अवस्ताना विभ्वमात्। वहाँ वहाँ ब्रह्मचैतन्य ही प्रत्यक रूप से अवस्थित इस रूप से स्विकार होता है अभिवुआत तानि तानि जा सर्वानि प्रात्वासिकानि भूतानि तस्मिन्यवात्मनि कर्पितानि उहमा सवी प्रात्वासिक भूत उसी आत्मा में कर्पित है ये समझ में आ जाया तसा जा पुर्णत्मात्मनो भूतान्तरानाम् चतदिरिकेन सत्तास्पूर्तिवरहित्तम् सिध्यति तसा जा पुर्णत्मात्मनो भूतान्तरानाम् चतदिरिकेन सत्तास्पूर्तिवरहित्तम् सिध्यति सत्ता सुर्वेहतित्मः सिध्यति यहां यह बताया की जो ब्रह्म तत्व है वो सब प्राणियों में ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यंत सब के भीतर प्रत्यक रूप से प्रत्यक माने जे इन्दी मन बुद्धी से विपरीत आम रूप से सब में शुरित हो रहा है कोई भी प्राणी मैं अपने आपको समझता है मैं हूँ तो वो जो मैं है चेतन है चोटी से चोटी कीड़ी में भी चेतना है। वो चेतना से ही उसका शरीर संचारित होता है। आप देखिए चीटी डे लिजिये, चीटी से भी चोटी डे लिजिये, कीड़ी डे लिजिये, वो चलते हैं, फिरते हैं, अपना आहार खोजते हैं, तो उनके भीता चेतना है, वो जो चेतना है वो उनका प्रत्यगात्मा है तो सबके भीतर एक ही प्रत्यगात्मा है उस प्रत्यगात्मा के रूप से सब में ब्रह्म है ब्रह्म कोई अलग रूप में नहीं है सब कोई प्रत्यगात्मा के रूप में है और उस से भिन जो उनका शरीर है थावर जंगम वो प्रतिभास मातते हैं और उसमें भी जो सत्ता और स्पूर्थी पतीत हो रही है ये उस आत्मा की ही हैं चेतन्य की ही हैं उनकी संसार की अपनी नहीं हैं क्योंकि ज्यान, बोध बोध भी उसमें जो बोध है वो आत्मा का ही बोध है जो वहाँ टकरा रहा है शरीद शरीद शरीद वो अलग से नहीं है किसी भी वस्तु को हम लोग जो जानते हैं जैसे हम घर जानते हैं तो जो हमारा आत्मचेतन है वही तो घट में प्रजबिम्बित हो रहा है घटा कार बृत्ति में प्रजबिम्बित हो रहा है तो जो घट आयम घटा इस परकार जो घ्यान है ये घ्यान उस घट का नहीं है उसमें जो आयम घटा इस परकार का ग्यान है हमको वो घट का नहों के हमने असमें आरुफित कर रखा है कि ग्यान है। तो इस तरह से घ्यान का भी गिने में प्रशिमे में पड़ता है। तो वही उसकी सूर्थी है। सत्ता सूर्थी जो है वो प्रत्यक चेतन से ही सब पदार्थों में मिलती है। इसलिए उस से भिन कोई वस्तू नहीं है। इसे दाल। इसी को बताया सर्वभूतस्तमात्मानम् सर्वभूतानिचात्मनि संपश्यनात्मयाजीवही स्वाराज्यमनिगच्छति समस्त प्राणियों में आत्मा को और सब प्राणियों में सब प्राणियों में आत्मा को और सब प्राणियों में सब प्राणियों में आत्मा में संपर्शन आत्मयाजी भी इस प्रकार जो जानता है वो आत्मयाजी है आत्मा की पूजा करने बाला है वो स्वाराज्य मधिक अच्छति स्वाराज्य को प्राप्त करने का है। तो तीर स्रीमत भागवत गीता में बगवान स्री कृष्णे ने समझाया है मया तत्मिलं सर्वं जगदव्यक्तमूर्थिन मस्थानि सरभूतानि नचाहं तेश्वबस्तिता मया तत्मिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्थिन मैं जो अव्यक्तमूर्थि हूं मेरी द्वारा ये समस्त जगद ततम आने ब्याप्यर सावर्जंगं जोभी जगत हैं उसमें आत्मचेतन व्याप्त हैं तो ये हुआ की जगत में ब्रह्म है मत्थानी सरभूतानी हाँ फिर हो गया मयातत्मिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना मत्थानी सरभूतानी तो इससे तो ये सिद्दु है कि मैं उन में रहता हूं लेकिन उसका अर्थ वो बताते हैं कि वही मुझे में रहते हैं नचाहं तेश्रवस्तिता मैं उन में सिद्द नहीं हूं और सच पुछा जाये तो नत्यमस्थानि उतानि पश्चमे योगमेई शरम बसुता मुझे में कोई भूत है भी नहीं कि मेरे आईशर योग को देख भूत भिन्नत भूत अस्तो हमात्मा भूत भावना यहां पर भवान नहीं बता तो यह अर्थ यह है इसका दिश्टान्स से समझिए कि रज्जू का जो हमको घ्यान होता है रज्जू मनने रस्थी हम मंद अंधकार में चले जा रहे हैं और सामने रस्थी देखते हैं तो रस्थी अभ्यक्त है जगे ठीक-ठीक घ्यान हो जाएं कि ये रस्थी है तो सर्व का ब्रह्म नहीं होगा। जब वो अव्यक्त रहेगी, तो उसमें ब्रह्म होगा। तो पर्मात्मा जब अविदित होता है, पर्मात्मा का जब घ्यान नहीं होता, तो पर्मात्मा के अघ्यान से इस जगर्त की प्रतिति होती है। जैसे रज्यू के अग्यान से सर्प की प्रतीति होती है लेकिन जो सर्प है जिसका हमको रज्यू में भ्रम हो रहा है उसमें जो इदनता है आयम सर्पा यह जो हम आयम कह रहे हैं आयम शब्द जो है इदम का पुर्लिंग है। इदम सम्दो नकुन सक्रिंग है। उसी को पुर्लिंग में आयम कहते हैं। वो इसतीरिंग में ईयम कहते हैं। तो उसका जो इदमन्स है, सर्प का इदमन्स सर्प, सर्प का नहीं है। वो रज्जु का है। इसी तरह से मुझ अव्यक्त मूर्ति आत्मा में ब्रह्म में ये समस्त जगत पतीत हो रहा है माने इसमें मैं ब्याप्त हूँ सद रूप से चिद रूप से इसमें ब्याप्त हूँ न चाहं तेश वस्तिता हूँ और सच पूछा जाये तो मुझ से भिरन अगर ये कुछ हूँ तब में इनमें आवस्तित होता है मुझे से अतित्रीन की कोई सत्ता है नहीं और सच पुछा जाये तो नहीं समत्थानि भूतानि मुझे में हम कह सकते हैं कि रज्जू में सर्प है नहीं उसी तारे से ब्रह्म में जगत है नहीं पस्च में योग में इश्चरम यही यहाँ पर उसको तत्व साक्षातकार से समझ में आ जाएगा सामान रूप से विज्ञात वो विशेश रूप से अज्ञात ये अभ्यक्त अभ्यक्त मानें हमको अजेश्थान का सामान रूप से ज्ञान होता है वो विशेश रूप से अज्ञान होता है तब उसमें अध्यास होता है तो � तो किसमे है ये? मानिया ब्रह्म जो होता है वो निरधिर्ष्टार नहीं होता है कोई भी वस्तु अगर हमको ब्रह्म से दिखती है तो कहीं दिखती है कहीं दिखती है सूर्ण में नहीं दिखती है हमको जो ब्रह्म होगा वो कहीं होगा सर्प का ब्रहम किचित कौचित दृशिते कौचित कौचित दृशिते कोई भी वस्तु कहीं दिखाई पड़ती हैं तो हमकों जो धूटा सर्प दिखाई पढ़ा है वो अपने आप सून्द में नहीं दिखाई पढ़ता है रस्ति में दिखाई पढ़ता है हम तो ये चान्जी का जो ब्रह्म है वो शुक्तिका में होगा चाहे जहां नहीं होगा तो ये जगत हमारा, हमको जो ब्रह्म दिखाई पर रहा है ये किस में है ये ब्रह्म में है ब्रह्म में ये दिखाई पर रहा है और वो इसका अजिष्ठान है तो अध्यस्त में अजिष्ठा व्याप्त होता है जैसे रज्जू में दिखाई पड़ने वाली सर्प में इदमंश ये पना ये तत है व्याप्त है और वस्तुता दिखा जाए तो सर्प में यदमंश है लेकिन सच पूछा जाए तो इदमंश सर्प में नहीं है उल्टे सर्प ही इर्मण्श में प्रतीत हो रहा है। और सच पुछा जाये तो जो सरज्जु है इर्मण्श उसमें सर्प है ही नहीं। जगत, नाम, रुप, आत्म, जगत जो प्रतीत हो रहा है वो बास्तव में नहीं है। यह यहां पर समझ में आ जायेगा।.
तो.
सर्वभूतस्त्मात्मानम् सर्वभूतानिषात्मनि संपश्यनात्मयाजिवै स्वाराज्यमदिकच्छति।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। सरभुतस्थेति नचेदं मानवं बचनं अमानवित जंगनियं। ये मनस्मुति का बचन है। बोले ये प्रमाण नहीं है। अच्छी जंगनियं करना चाहिए। क्योंकि सुति कहती है यद्वैकिंचन्मनुरवदत् तद्भेशनमिति। सुतेह। शुती कहती है कि जो कुछ मनुना कहा है वो भेशाज है माना है दवा है तो इस शुती को लेकर माना जाता है कि इसमुति मूरु रूत है शुती है इसमुति जो है इसका मूरु रूत शुती है तो शुती का जैसे प्रामान है तर्मूनक इसमुति का भी प्रामान है योही पाड़त्यम् प्रावुक्तिया। अच्छा हाँ। मुहचम। भाष्चम। एमं च सती सर्वप्रवंचाउप्समे अद्वेत सिद्धी। सर्भूतस्चात्मै के एको दिश्चस्चात। समस्त भूतों में सिद्धु आत्मा है। एक आत्माभुत। उसका दर्शन हो ज सर भूतान्य शात्मानि और सब भूत आत्मा में दिखाई पड़ेगा। यस्तु सर्वानि भूतान्य त्यारी सुत्य था। यह सुत्य भी है। यस्तु सर्वानि भूतान्य आत्मानि वा वहुद भिजानता। तस्को मोह कस्चोका। इकत्तो वनुपच्छता। जिसने यह सम वो शोक मौन से मुक्त हो जाता है। एक तरीश भुत्या था, भुत्या था तेवोन स्यात्म। अन्य था ही स्वधे परिच्छिन्नेव प्रतिकात्मः सांख्याजी भिर्वदिष्टस्यात्म। तसाथ सति अद्वैत मिति चुति कितो विशेषो नस्यात्म। सांख्याजी र तो ये अगर आप नहीं समझेंगे कि सब भूतों में एक ही आत्मा है तो फिर सांख दर्शन जो है उस सांख मत में ये माना जाता है कि आत्मा और अनात्मा दो है तो आत्मा शरीर के बीतर है और शरीर उस से अलग है ये शरीर उस आत्मा को सुगदुग प्रदान करने के लिए प्रक्षिती ने मना कर दिया है तो एसी स्थिती में वह केवर शरीर तक सिमत रह जाएगा स्वाराज सब प्राणियों में एक ही आत्मा है ये अद्वैत की भावना है अद्वैत का सिद्धानत है वो ऐसे समझ में नहीं आएगा जब तक कि सर्वत उसको आप नहीं देखेंगे तो सब जगे अहम अहम के रूप में वही आत्मा श्पुरित हो रहा है घीता के तरयो दश्मे अध्याय में भगवान श्रीकिन भूले इदम सरीरम कौनते ये शेत्र मित्यविद्धियेते एका द्योवेति तम्प्राहुक शेत्रा गमिति तद्विदान।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। आप आदतर मस्तक। चर्ण से रेके मस्तक परियद। जो इस सरील को जानने वाला है वो खेतक। तो खेत तो यही है और इसको जानने वाला खेतक इसी में है। तो परिछन हो गया। फिर भगवान कहते हैं ऐसा नहीं है। छेतरग्यम चापिमामिद्धी सर्वक्षेत्रिश्वारत् सब खेतरों का जो खेतरग्यम वो मैं हूँ वो आत्मा से अभेन है तो जो इस छेतर में आमरूप से इसप्रित हो रहा है वही उस छेतर में आमरूप के रूप में इसप्रित हो रहा है उस से छेतर में आमरूप के लेकिन सुरित होने वाला जो आत्मा है छितग जो है वो ही कही है ये समझने की बात.
है इस.
छिते का सरवोपनिश्लाम सरवात्मई का प्रिजपात कत्म अस्मत उप्शिनत् जो हैं सर्वात्माइक अत् सर्वात्माइक परिपात पदक हैं जी हम लोग चाहिक बानते हैं अतो युक्तमेव अस्यां आध्यात्मुकस्य पिर्णात्मनो जुरुका जंगत्तेन विरारात्मना आधिदेवकेन एकत्तोमः प्रित्त सत्मांगत्तो वश् मुर्धाते विवितिष्यत इत्याजी लिंगरश्नाच्चा।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। पिर्ण और ब्रह्मान में अंतर न रहें तो विश्व के अंतर का सब कुछ हो जाये। यह बताया। तो यहां अध्यात्म और अजदेव दोनों को एक करके बताया। यह समझेजिए कि हमारी जो इंद्रिया है आख, आख, नाग, जीव, पक। यह पंच गानींद्रिया हैं, हाथ, पेरा, जीव हैं। यह सब समस्ती में देवता हैं। वो देवता ब्यस्ती में हमारी इंद्रियों के रूप में आ गया है। सूर्य जो है नित के रूप में आ गया है। दिशा चोत्र के रूप में आ गया ह ऐसे पच्चे के देवता हमारे शरीर में आ गए हैं तो हमारे शरीर के भीता जो हैं वो अध्यात्म हैं यानि अध्यात्म हो गए हैं और जो इंद्रियों जो इंद्रियां देवता हैं देवता इंद्रियां बनी हैं सूर्णियें तो वो भी वो अध्यात्म हैं जिससा अध्या दोनों को मिलाकर एक विश्व बताया एसा है देखो जो प्रक्रिया है विश्वदों की की पहले माता पिता का रजवीर एक अठ्टा होके माता के गर्वस थर में आया अब वो पिंड गीरी गीरी बढ़ा समझे नहीं और फिर उसमें से जैसे कलम में अंकूर निकलता है न ऐसे आग का नाग की गूलक निकल गए आग बन गई नाग बन गई काण बन गए, जीब बन गए, हाथ बन गए, पेर बन गए। इन सब के बनने के बाद इन में आके देवता बैठ गए। समझे नहीं। हाँ, हुआजी देगा। इंजी एद्वार जहरोखा नाना जहां तहँ बैठे सुर करिताना। पसिदारशी कहते हैं। इंजीयों के द्व वहाँ पर देवता आके बेट गए हैं। इन्दिय द्वार जहरोखा नाना जहता बेट थे सुरकरि थाना आवत देखें विशे बेहारी ते हटि देखें कपार लोगारी। तो ये देवता बेटे हैं। तो उनका संबन्द है। सूरी नहों तो आँग नहीं देख सकता। दि� तो इन सब को मिला कर अध्यात्म और अज्जाइव दोनों को मिला कर ये बताजिये। अब उसी में अद्भूत हो गया। अद्भूत क्या है? ये सरीज है आपका। ये गूलक हैं। इन्द्रिया जो है अध्यात्म हैं। और जो यहां कान नाग जो आखरती दिखाई पढ़ र इंद्रियां जो हैं अतींद्रियां हैं उनको आप देख नहीं सकते जब प्राणी मरता है तो उसकी सगल तो यही रहती है आँख भी रहेंगे, काण भी रहेंगे, नाग भी रहेंगे पिशक तोड़ी जाएगा बैसे ही दिखेगा लेकिन उसमें से इंद्रियां निकल जाए� स्रोत्तम् चक्षुस्पर्शनंचा रसनम् ग्रानमेवचा अधित्तायमरस्थायम विश्यानुप सेवते ये जो आत्मा है स्रोत्तम् चक्षुस्पर्शनंचा रसनम् ग्रानमेवचा अधित्तायमरस्थायम विश्यानुप सेवते ये जो आत्मा है स्रोत्तम् चक्षुस्पर चक्षू से रूप देख रहा है। रूप को अन्भो कर रहा है। कान से सब्द का कर रहा है। नाग से गन्द सूम रहा है। जीव से स्वाद दे रहा है। त्वक से इस्पर्ष कर रहा है। और नाग से गन्द दे रहा है। तो विश्यों का सेवन इन इंद्रियों से कर रहा ह तीदिया को दे भी नहीं सकते। कान के साथ अगर मन न जुले, तो आपको सुनाई नहीं पड़ेगा। आग के साथ अगर मन न जुले, तो नहीं सुनाई पड़ेगा। तो इन पाठ घ्यानियनिय और मन, इन के द्वारे विश्यों के सिवन करता है। और सरीनम्यल्वाप जब इश्वर माने हैं चरिज, आत्मा हैं जब इससे छोड़ के जाता है चरिज को इनको लेके जाता है कृत्व इतानि संयाति वायुर गंधानि वास्यात जैसे वायु बगीचे से गंध को लेके चला जाता है उसी तरह से ये आत्मा इसकी पान ज्यानिनी और मन को साथ में ले जाते हैं। तो ये जो उसके बाद बच रहा पिंड अजिभूत है, जो चले गए वो अध्यात्म थे। और जो सब व्यापक हैं, वो अजिज़ेव हैं। इस तरह से अध्यात्म, अजिज़ेव समझना चाहिए। इस सुर्ष्टी के तो ही हो गया मूर्दात ब्यापतिश्यत चित्यादि निंगधर्शनाच्छव।.
अब.
की काम आ जाया है? ननु भेद बादे भी ना देज़ा शुति बृद्धचे। ऐसा है कि महा यागवर्ग के साथ एक शाकल है न? शाकल है न? वर्त शाकल है वर्त शाकल है वर्त शाकल है वो कौन किस्म उतप्रोत है? कौन किस्में उतप्रोत है? मुल्णग में वो हाँ वो प्रश्ण कर रहा था तो उस प्रश्ण में वो अंतिम अतिम प्रश्ण कर रहा था तो उस पर याग बड़ने कहा अतिम प्रश्ण मत करो तो तुम्हारा मुर्धा गिर जाएगा यहाँ मुर्धा सब्द का जो है ये सिर नहीं है वो जो मुर्धा है जूलोग, उससे तुम्हारे सम्मन विच्चेत हो जाये। यह उसका आध्यात्मा अर्था।.
प्रस्ण किया था। प्रस्ण किया था।.
ननु वेदवादेपि नाद्वैशुति विरुद्धते ज्ञानार्थम अन्नं ब्रह्मेतिवत अद्वेतं तत्वं इत्यवुदेश सिद्धे इत्यशंक्याः इश्टेति कहते हैं वेदवाद में भी अद्वैशुति है कहते हैं अन्नम्ब्रह्म शुती है अन्नम्ब्रह्म अन्नी ब्रह्म है तो यहाँ अन्नब्रह्म नहीं है ध्यान के लिए है तो इस तरह से जो अद्भी शुती है वो ध्यान के लिए है तो कहते हैं ईश्चतेची ईश्चते इस स्थिते हो गया। इस स्थिते जा सर्वात्माई क्या प्रित्पाद कत्तम। उपक्रमों सम्हारेक रूप्यात् दिना सर्वासामुमनिष्लाम् सर्वेशु देवेशु आत्माई क्या प्रित्पादन वरत्तम। इश्टम अतो न ध्यानान्थत्तम अद्वाईत सुते इश्टम सक्यम।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। अद्वाहित में ही शुत्यों का तात्परी सिद्ध हो रहा है। इसलिए ये जो अद्वाहित हैं उपचारित नहीं है। गोण नहीं है। ये ध्यान के लिए बता गिया। बास्तविक।.
बस्तु.
बरत्र रिंग मुरुदार। बस्तु बरत्र रिंग का मुरुदार। अध्यात्मादि देवेयो एकर्तमुपेच्य। अध्यात्मादि देवेयो एकर्तमुपेच्य। अध्यात्मादि देवेयो एकर्तमुपेच्य। अध्यात्मादि देवेयो एकर्तमुपेच्य। अध्यात्मादि देवेयो एकर्तमुपेच्य। अध्यात्मादि देवेयो ए उनके एकत को रेकर अध्याइत्म परियोसान शुद्ध हो जाता है। इसलिए जो अध्यात्मिक है वो ब्रश्ची है, ब्रश्ची आत्मा है। और विष्ण जो है वो त्रेलोक है, ब्रश्ची आत्मा विष्ण है, और जो बिराथ है, वो त्रेलोक आत्मा है, वो आज्ञाइ� तो विराद और विश्व की एकता को रिकर उसकी सप्तांगत्व, सप्तांगत्व का गया है। नो बिरुद्ध नहीं है। अध्यात्मा जी देवियो अईके खित्वर विर्थुन्दर महा मुल देती। जवादित्याजिकम् वैश्वानराव्यवं। वैश्वानर बुज्जि ḍiḍnāsīyā puraḍa ḍaḍḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍaḍa� जिष्यते नकद्दुरोकादि विपरीद वुध्या। वीतवतास्वकीर्भूणादि परिवतनमुष्यतम्। निजि अध्यात्मादि देवियो एकत्तुम् नभवेत। तस्मात्तयोर् एकत्तुम् अत्तु विवक्षितुप।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� बहिश्वानर बुद्जिया जावतो। दिन में आजित आजित आजित आजित आजित आजित.
आजित आजित आजित आजित आजित आजित आजित.
आजित आजित आजित आजित आजित आजित आजित आज पक्ष को नान लेता है।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� अजि आज्जात्मिका द्रिवितो एकत्तम् तम्वेत तस्मात् तयोर एकत्तमात्र विवक्षितम् तो यहाँ पर यह बताया की वैश्वानरबुद्धी से आदित की उपासना की जाती है और इसी तरह से फिर अखार्ण बग्श को समझ लेता है जी दो सूर्यों और वर्षानार है। वो ये कही है। मुर्दाते दो वर्षात। नर्मां नामिष्य।.
नामिष्य। नामिष्य।.
नहीं जानोगी।.
नामिष्य। नामिष्य। इतनो.
नामिष्य। जगी तुम मुझको नहीं जानोगे, नंदियों में जाओगे। तो यहाँ पर ये बताया कि आदित्यों और वैशानर, वैशानर हो गया विश्व, उसमें आदित्यों बुद्धी तरख है, उसकी उपासना का विधान है। तो उपने शुदों में अनेकों प्रकार की उपासनाये बताई गई हैं। तो उपासना में अन्य में अन्य का आरूप किया जाता है। उपासना जो होती है वो अन्य का आरूप करके होती है। जैसे सारे ग्राम में विश्णू का आरोप किया जाता है तो ये वहिश्वानर बुद्धी से आनित की आपासना है इसलिए की जाती है कि अन्ततो गत्वा वहिश्वानर और सूर्य एक ही है ये समझाने के लिए अगर तू इनको अपने से अलग समच्च विवातना करेगा तो अन्धा हो जाएगा ये उनका कहना है कि अगर तू समच्ची से अलग होगा तो तुम वेश्टी तो रहे कहा जाएगा इसी तरह से मुर्दाइव सुतेजा वो मुर्दा तेरा नहीं रह जाएगा अगर तू उनक हाँ? क्या हुआ?
क्या हुआ? वो मद्दा.
है। मुर्दी सुते जा। सुते जा मुर्दा है। तो इसका वही अर्थ है कि वो जो बैश्वानर सुते जा आडित्य हैं वो भी मूदा है तो अगर तू अपने से उसको अलग समझेगा अभेद बुद्धी से नहीं करेगा तो तू अंधा हो जाएगा या वो तेरा मूदा तुस से अलग हो जाएगा तो वो भी विपतिस्थत हो जाएगा तो जहाँपर अभेद का समर्थन किया गया है यह विप्राय है इसका। ठीज़े? अगर आगे बढ़ते हैं। स्वप्नस्तानो अन्तप्रभ्याः सप्तांग एकूनविन्शतिमुखाः पविवित्तभुक्तयेसो वितीयप्मादः विराज एक अत्म उपलक्षनार्थम। हिरण गर्वाँ व्याग्रितम क्रात्मनो। उक्तम चीतन मलुः ब्रामणे। यस्चाय मस्यां पथिव्याम। तेजु मयो अमृतमया पुर्षो। यस्चाय मज्यात्ममित्याज। सुषुक्तव अव्याग्रितयो एक अत्म सिद्ध इवं चसति इतस् सिद्धं भगति सर्वदद्वितो शमे चारदद्वितमिति तो यहाँ पर विराज के साथ विराजा इकत्तुम वरक्षनार्थम हिरान्यागर्भा व्याकृतानो व्याकृतारत्मनो हिरान्यागर्भा अभ्याकृत जो है वो बिराट के साथ उपलक्षन के लिए हैं। उक्तम् जगिदर्मजुं ब्रामनों ब्रामनें। जो ये पुछुबी में हैं। तेरियो में अमिर्टमें पुरुष। और जो ये अध्यात्म हैं। ये दोनों एक ही हैं। तो इस तरह से हिरान नगर होर अभ्यागरत के साथ ब तहीजस और हिरान्दगर्व के एकता बताके फिर सुशुक्ति में प्राग के साथ एकता बताएंगे तो बोलें कि वो सहस सिद्ध हो जाएगी क्योंकि दोनों में कोई भेड नहीं है निविशेशत्वात इस तरह से सरवध्वितोऽप समे अध्वित सिद्ध हो जाएगा अब ननु विराजो विश्वेन एकत्वेव मूरा ग्रंथे दिश्वते। केते हैं विराज का विश्व के साथ एकत्वेव मूरा ग्रंथ में दिखाई बड़ता है। तत्कतं अविशेशेन अध्यात्मादी दैवयो एकत्तं विविक्षित्वा अद्वैत परियोऽसानं भा� कहते हैं विराद का विश्व से इकत मूर ग्रंथ में निखाई पड़ता हैं फिर यहाँ पर अविशेशेन सामान रूप से अध्यात्मन अद्देव के इकत को विविक्षित करते हैं अध्वैत में उनका परियोसान होता है ये भाष्चकार ने कैसे कहा मुझे विराजेती यन मुखो विराजो विष्ट्रेन एकत्तं दर्चितं तत्वेरन गर्वस्त तययसेन अन्ता जाविना अन्तारमनत् सा अव्याक्रतो भीतास्त प्राज्ञेन सा एकत्तस् उपलक्षनार्थम अतो मुला ग्रंते पी अविशेशेन अध्यात्मिन अद्देवियो एकत्तम् विवक्षितम् इति अद्वित पजोसान सिद्धी रित्य था।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। तब अद्वेत की सिद्धी हो गया।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� अज्द्यात्म और अज्देव का जो एकत यहां कहा गया है मधु ब्रामन में भी ये दिखाया गया है उक्तन चेती आज्देवं अज्द्यात्मं चा एक रूपं निर्देशं कृत्ता परियायं आयमेयोसा कि तवेद वचनाज एकत बर्तम् विवक्षितम् अज्देव और अ का एक रूप करके पित्वपज्या यही वो है। ऐसा वचन दिया है। ननु विरिष्व विराजो सूला अभिमानित्वात् तैजे से रण्डगर्वियो चा सूक्ष्ण अभिमानित्वात् इकत्तम् युक्तम् प्राज्यां व्याकरते वो सुक्ष्ण साधर्मेन इकत्तम् त दोनों सूल आविमानी हैं शिद्धोनों की एकता बन जाएगी और तही जासर रणगर्भ की जो है सुक्षमाविमानी है इसलिए इनका एकता बन जाएगा प्राग्यों और अभ्याकृत की एकता किस साधारम से होगी तो सुचुपते ही जीद मनस्युत्ता अभ्याकृत वो ए प्राग्य जो है समस्त विशेश का उपसंगार करके निर्विशेश हो जाएगा तो चुपते वर्तते और प्रणायदसायम अभ्याक्रितन्चा निश्चेश विशेशन्ग और अभ्याक्रितमी प्रणायदसा में निश्चेश विशेश हो जाता है स्वात्मान उपसंगरित अ अध्यात्मानिदेवियो एकत्ते प्रागुक्तन्याये न्यायेन प्रसिद्धे तति उपसंगारप्रक्रियाया सिद्धमाद्वितमिति भज्धम।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। कहते हैं जो अद्वाइत है प्रदिबंध धन्समात्य से सूर्च नहीं होता कि तु बाक्या देव आचाजि उपदिष्ठात आचाजी के दारा उपदिष्ठात जो बाक्या है महावाक्य उससे ही अद्वाइत का एक फुर्ण.
होगा क्यों गया?
स्वप्नस्थान्वस्तेजिस्थ स्वप्नस्थाना। जागरित्वज्ञानेक साधना। बरिविशेव अभवभातमाना। मनस्पण्णमाना। मात्रा। सतित्धावुतों संस्कार मनस्थारत्ते। तन्मरत तथा संकृतम् चित्तितम् चित्तितम् चित्तितेव पतो भाय साधना प्रपेक्ष अविध्या कामकरोऽविप् प्रेर्युमानम् जागिणो लावन्हाचते तथा चुक्तमस्तिरोकस्त सर्वावतो मात्यम् अपदाईति तथा परेद्वे मरत्स एकि भवति शिप्रस्तुत् अत्रेवुदेवस्तो अपने महिमानमन्मवति इत्या धर्वने इन्दिया प्रिक्षेया अन्तस्था अन्तस्था मनसा तद वासना रूपा नस्व अपने प्रग्यां यस्य अन्तप्रग्यां विशेशुन्यायां प्रग्यायां के वर्मप्रकासुरुपाया विश्वस्त सविष्यत्तेनु प्रज्ञायाहं। थूलाया भूज्यत्तम् ये पुना केवलं बासणा मात्रा प्रज्ञा भूज्या इति प्रविविक्तो भोगा इति सामानिवन्दस् इति वाजत तैसा।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� इंद्रियों के दोरा विश्यों को प्राप्त करना जानना ये जागरित अवस्था है तो जागरित अवस्था में जो इसने देखा उसके संसकार मन में पड़ जाते हैं वो संसकार वासना रूप में मन में रहते हैं तो जब ये निद्रित हो जाता है तो निद्रा में इंद्रि ये जब ये अपना काम करना बंद कर लेती हैं लेकिन मन की जो बासना है वो चलती रहती हैं तो उस समय आत्मा की जो जोती है घ्यानस्वरूप आत्मा है उसके द्वारा ये सब विशय जो मन में बासना की रूप में है वो प्रकासित होते हैं तो आत्मा के तेज से प्रकाशित होते हैं महाँ आत्मा से जोती हो जाता है इसलिए उसका नाम तैजस है कोई हमने बताया था कि जैसे लोग सिनेमा देखते हैं तो रील में अनेकों छित लगे रहते हैं रील में अनेकों छित भरे रहते हैं मशीन में रखके रील को घुमाया जाता है और उसके पिछे लाइट रहती है वो लाइट रील को पार करके जब उधर जाती है पर्दे में तो वो रील के भीता जो छोटे-छोटे छित्र हैं वो बड़े-बड़े दिखाई पड़ते हैं और जो रील रंगीन होती है वो छित्र तो वो जो छित दिखाई पढ़ रहे हैं वहाँ ना तो सूरी का प्रकास है ना चन्द का प्रकास है जैसे यहां लाइठ है केवल इसी तरह स्वपन में जो हमको संसार दिखता है वहाँ सूरी और चन्द में कुछ भी नहीं है किरन आत्म जोती से ही वो जोतित होते हैं इसलिए वहाँ आत्मा स्वेंजोति हो जाता है। और इसी तरह से आत्मा का स्वेंजोतिष्ट सिद्ध भी होता है। इसलिए वो जोतियों की जोति है। और स्वपन में तो अन्ताकरण भी रहता है। सुशुक्ति में जाके अन्ता करन का भी बिलाय हो जाता है तो उस समय केवल आत्मा रहता है और वो आत्मा घ्यानत सुरूप है इसकी सिद्धी इस तरह से होती है जब स्वापन से उठता है तो ये कहता है कि आज मैं ऐसा सुक से सोया कि मुझे कुछ पता ही न रहा तो उसको अ तो वो घ्यान सवरूप है। तो जागरित में, सपन में, सुष्रुप्ति में घ्यान सवरूप एक सा रहता है। और ये जो जोतियां हैं, ये बदलती रहती हैं। इसलिए वो जोतियों का जोति हैं। जोति शाममित जोति हैं। तम सब परमुच्चते हैं। सतत्त सूर्यो भातिन चन्दतार का। और ये है। ठीक है बस आ जाने तो। ओम बद्धम करनेम श्मियाम देवा। बद्धम बस्शेमाक्षवरियत्या। त्रेरंगे तुर्टवाग्वं सतनुविर। बस्शेम देवे तम्यदायु। सस्तिन हिन्दु विद्धच्यवा, सस्तिन पूषा विश्वेदा, सस्तिन तार्क्यो अरेष्टनेमि, सस्तिनो विध्यत् पतिर्दनातु, ओम् शान्ति शान्ति शान्ति.
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