Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 34

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Chapters
बोधों का ये कहना है कि किसी पदार्थ में, किसी पद में, किसी शब्द का अर्थ की शक्ति नहीं। सर्वापुमानोसबसे अलग घट जो है हम घट को कैसे जानते हैं? पट से अलग होने के नाते, पट से अलग होने के नाते हम घट को जानते, घटी हुआ, पर उसके बाबत रूप से घट, घट को जानते हैं। तो घटेघटेदरहोगया उसके वार हुआ। तो हम उसको उन से भिन्न रूप से समझते हैं। तो धोरेलिया कौन? जो मिस न हो व्यापक व्यापित ये उनका सिद्धांत है। अपवाद इस अपवाद को रोग मानते हैं। वो कहते हैं किसी शब्द में किसी को जानने की शक्ति नहीं होती, र्थ नहीं होता। इसमें आपत्ति क्या है? कभी ये बता रहे थे, अन्यास होता है। घट पट से भिन्न है। तो यहाँ पर घट पट से बात है। तो पहले का ज्ञान हो जाए। तब पट से पहले का ज्ञान हो जाएगा। तब उसका ज्ञान हो ही गया। तो वो कहाँ रह गया? सरकार स्वीकार अनन्या है। जब हम घर को अनयोगरानयोगप्रयोग अप मानेंगे तो घट में पट की योगिता है, घट की व्यावृति है। तो घट पहले हम समझ लेंगे। तब उसकी व्यावृत्ति, उसमे देखेंगे की व्यावृति देखेंगे, अभाव देख रही है। वह अनुनय भाव भाव भेद, अनुनय भाव भेदक कहते हैं। तो ऐसी स्थिति में हो गया कि पहले पद को जान ले, तब हम घर से उसको समझे, पहले घट को जान लें। तब उसको पद से बिन समझे। तो पहले तो 1 को जानने से 1 को जाने में न, दूसरे का ज्ञान नहीं हो सकता, दूसरे के ज्ञान के पहले का ज्ञान नहीं होता। तो अन्य क्या कह रहा था? किसी भी पदार्थ की उत्पत्ति और जप्ती में परस्पर आश्चर्यता होनी चाहिए। का भाई कोई हिस्ट्री है है तुम किसकी स्त्री हो जो मेरा pati, तुमहरा pati कौन है? तुम किसी से हो जिस औरत है और तुम्हारा पति कौन है? इसके हम स्त्री है और स्त्री कौन है? जिसके है। तो पति को ज्ञान हो जाए। तो स्त्री का ज्ञान हो, स्त्री का ज्ञान हो। तो पति का ज्ञान ये अनन्य हो गया। बताओ तुम तुम बताओ इसको इसको बताओ मैं पत्नी हूँ। मैंने उससे पूछा तुम के परीग्रह तु तुम किस की औरत है जो मेरा पति है। तुम्हारा पति कौन है? तो गति में उत्पत्ति की उत्पत्ति में उत्पत्ति का विषय यह है कि पिता से उत्पत्ति, पिता की उत्पत्ति banega पहले अन्वय मुख से बताया अनिश्चिता यथा रज्जू रंजकारीविकल्पपिता सर्बधाराभाभिरभावीर तद्बदात्माविक्पिता कहते हैं जैसे रजू अनिश्चिता हो, रज्जु का हमें ज्ञान न हो तो उसमें हमको सर्पधर माना, बूंचीदेदिखाई पड़ते हैं, विगत होते हैं। और जब निश्चित हो जाती है, निश्चित में था vip तो रज्जू के अनिश्चय से उसमें सरदारा माला का विकल्प हुआ, न हो गया, e r नही जाता है atm atm गप मात्र परमशुद्ध जो अपना आत्मा है, उस आत्मा को भूल कर, उस को न जानकर, स्वयं को करता, भुगतान लिया। अब जब कर्ता भोक्ता बन गया तो राजा देश हो गया, भोक्ता हतुभरात्कतोहित हो गया, कर्म उसका भोग कर्म हो गया, शरीर भी हो गया, और भी लोक में जाता है कि हम जब भोक्ता बनेंगे तो भोक्ता हम केवल सुख बनेंगे, दुख भोगता बनेंगे। तो जिससे हमारा, जिससे हमको सुख मिलेगा, उससे राग हो जाएगा, राग और जिससे दुख मिलेगा, उससे देश हो जाएगा। तो राग और देश के कारण पर हम कर्म करेंगे कि जिससे हमारा राग है, जो हमारे सुख का साधन है, उसकी प्राप्ति के लिए हम प्रयत्न करेंगे। जिससे देश है, उससे बचने के लिए हम प्रयत्न करेंगे, प्रेत नहीं कर्म है। तो जब हम कर्म करेंगे तो फिर हमको उसका फल भोगना पड़ेगा, फिर फल भोगते हो। तो फिर हमारे अंदर राग में चल पड़ा। तो इस तरह से जब अपने आप को समझ कर, अपने आप को ब्रह्म से कर्ता। भोक्ता जीव समझ लिया तो अपने स्वरूप का निश्चय नहीं रहा, उसको अनिश्चय हो गया। उस अनिश्चय होने के कारण अपने में करते, मान के और रागदेश को मान लिया, पर कर्म मान लिया, पर भोग मान लिया, फिर जन्म मान लिया, पर मृत्यु मांग ली। सारा अल अपने आप को न जानने से हुआ तो इसमें दुष्टां दे दिया की रज रूप से, रस्सी के रूप से, जब हम किसी वस्तु का निश्चय नहीं कर पाते, मंद अंधकार में हम जा रहे हैं। रास्ते में सुरसी बड़ी है तो रस्सी टेडी मुड़ी पड़ी रहती है। तो वो निश्चित नहीं हो पाया। ये कुछ है, इस रूप में हमको पता लगा। लेकिन यह रस्सी है, यह निश्चय नहीं हो पाया। तो कभी हम उसको सर्फ समझते हैं, कभी माला समझते हैं, कभी धारा समझते हैं, कभी भूल समझते हैं। तो ये जो विकल्प हुए, रजू के अनिश्चय के कारण हुए। इसी तरह से यह संसार जो है। इसलिए आ गया हमारी खोपड़ी में, क्योंकि हम निश्चय नहीं कर पाये कि हम कौन हैं। अपने आप को समझ जाते। तुझे समझा रहा। तो अगर हम समझ जाएं, अपने आत्मा को, अपने आप को, आत्मा का, विनिश्चय हो जाए तो ये सारा का सारा प्रखंड बाधित हो जाएगा। इसी बात को टीका कर कहते हैं कि अविद्या निश्चय क्या है, अविद्या है। vida तज्ञा तदुत्त सरबाज रज्जु मात्र कहते हैं। बोले कि रज्जु ही है, ऐसा रज्जु में निश्चय हुआ है। यह रज्जु है जो सर्व धारा के रूप में दिखाई पड़ती थी। रजुहैइसरूपसेजब निश्चय हो गया तो उसका अज्ञान निमृत हो गया। उस अज्ञान से उत्पन जो सरपंच विकल्प है, वो निवृत हो जाता है। razuma man, nia cute, is bat, bat, bat, क्या कहा? तो होने से ही हमने जैसे द्वारा हुआ, हम ब्रह्म है। तो ये जीव भाव खत्म हो गया। जीव भाव खत्म होते ही सब कर्म नष्ट हो गए और कर्म का फल भी समाप्त हो गया। ये हो गया। इसलिए जाना गनिसर्वकर्मणकर्माणी, भस्मसात, कुल जन ज्ञान की अग्नि जो है, सब कर्मों को समसात कर देती है। ज्ञान की अग्नि क्या है कि मैं निदशुद्धबुद्धमुक्, सभा, अजर, अमर, अनंत, अखंड, प्रकाश ब्रह्म हूँ। ये ज्ञान हुआ तो कर मुझ में कर्म है ही नहीं। और जब कर्म नहीं है तो कर्म के फल भी नहीं है। इस तरह से नष्ट हो जाता। तो ये सउतनिश्चसधनिश्च होते ही जीव भाव समाप्त हो जाता है। जीव भाव के समाप्त होते ही सारी जो कल्पना अपने में कर रखी थी वो सब खत्म हो गई। कहते हैं ब्याज कुल वर्धित राजकुमार रवत। यह दृष्टांत है कि 1 रानी अपने छोटे से गोद के बच्चे को लेकर 30 यात्रा के लिए अपने झुंड के साथ निकली। पहले जमाने में लोग पैदल सवारी बाल की इसके चलते थे और समूह मचाते थे। तो रास्ते में जहाँ डेरा पढ़ा वह डाकुओं ने आक्रमण कर दिया, वो डाकू ब्याज थे और उन्होंने सबको लूट लिया और रानी का जो गोद का बच्चा था उसको ले गया। उस बच्चे को ले जाने के बाद राजा को पता लगा खूब खोज हुई लेकिन पता नहीं लगा बरसों बीत गए 1 बार वो ब्याज वो डाकू पकड़े गया पकड़ के सिपाही उनको राज दरबार में लाया राज दरबारों में उन डाकुओं के साथ वो बालक भी आया जिसको ले गए थे महारानी उन्होंने उसको पाल लिया और वो भी डाकू बन गया और वो भी अपने को डाकू समझने लगा। वो भी जैसे पुलिस से और डरते थे वैसे वो भी डरने लगा, वो भी हथकड़ी बांध कर लाया गया। जब दरबार में वो खड़ा हुआ सबके साथ तो राजा ने देखा की इसकी सकल दूसरों से नहीं मिल रही है यह कार्य करे भयंकर है। और ये बड़ा सुंदर है गौर वर्ण है। और उसके मन में अनुमान हुआ कि कदाचित मेरा बेटा जो चला गया था डाकू ले गए थे वहीं न क्योंकि इतने वर्ष पहले खोया था। तो उसने पहले उसकी तरफ देखा, देखा तो बोल या सबसे पहले फांसी हमारी राजा हमको दिख रहा। उसके बाद रानी साहब को बुलाया गया। रानी ने कहा देखो बालक तुम्हारा तो नहीं है। तो उसके स्तनों से दूध आ गया तो निश्चय हो गया उसको उन्होंने बुलाया वो डरते डरते उनके पास पहुँचा तो राजा ने कहा बेटा तुम जाखू नहीं हो तुम राजकुमार हो। तो जैसे उसको सुनाई पड़ा तो वो डाकू मान के जो दुख पा रहा था हो गया तो जो है अपने ब्रह्म स्वरूप हो न जाने कारण डाकू बन गया है। जब में उसको दिखाया जाता है कि भाई तुम क्या हो? दूसरा दांत हम लोग दे देते हैं। 1 शेर का बच्चा था तो भेड़ चराने वालों ने उसको पकड़ लिया और उसको पाला तो भेड़ों के साथ रहते रहते वो भी अपने को भेड़ मानने लगा। तो हुआ ये 1 बार जंगल में भेड़ चल रहे थे और इतने में शेर आ गया और शेर को जैसे ही देखा भेड़ भागी भी भागने लगा। शेर ने कहा बेटा तू क्यों भागता है बोले तो हमको मार डालोगे खा जाओगे बोले नहीं तुम तो हमारे स्वरूप हो, तुम को हम कैसे मार सकते हो? बोले क्या प्रमाण है बोले चलो कुआ के सामने कुआ के सामने ले गए कुआ के सामने झाँक के देखा तो दोनों का चेहरा 1 सा का तुम का चेहरा, तुम क्यों भेड़ मान कर भागते हो तो डर लगा कैसे दहाड़े दहाडा हम तो भेड़ उसको देख के भागने लगे तवादी जो भेड़ हैं इनके बीच में रहने से अपने बाद सुख स्वरूप को भूल गया था। जब अदैतवादी गुरु मिला सिंह तो उसने समझा दिया कि भाई, तुम यह है, यह ताबदगजानसातरानी जम्मू का था। नगर जज महाशक्ति जावत। कहते हैं, जैसे जम्मू का ही था। ये लड़ैया जंगल में हुआ, हुआ, तब तक करते जब तक सिर न आ जाए। जहाँ सिर आया। और तो वेदांत कैसे जाता है। तो जितने भी है, सब चुप हो जाते हैं। हो गया तरवर, आत्मनि तथा सर्व आत्माविध्या। आत्मा की अविद्या से कल्पित जीवाजी, कल्प जीवाजी, व्यावृति सबकी व्यावृत्ति हो जाती है। केवल आत्म तत्व ही रह जाता है। समान आत्मा, विजया जीव, कल्पना जी की जो कल्पना है, स्वयं की, अपनी दूसरों की है, आत्मा की अविद्या से उत्पन्न होती है। तब सर्व का संसार आत्मनो, धर्मों से आत्माने आत्मा पिता, संसार रूप जो है, वो आत्मा में आरोपित है। तो सत् का आवेदक है। उससे उत्पन्न जो विज्ञान है, वही सूर्य का आलोक है। उसके द्वारा जो आत्मा का है, वही अद्वितीय रह जाता है। और वह सब का सब व्यावृत हो जाता है। आम सब कुछ आत्मा है। उसकी पूर्णता बता दिया। आत्मनिवेदन सर। यह आप समझ लीजिये कि जीव और ब्रह्म का जो सामान है, अभेद यह मुख्य सामान अधिकरण है। जीव ब्रह्म वस्तुत 1 है। न ब्रह्म का बाद होता है, न जीव का बाध होता है। जो विरुद्धं है, उसका चाक करके चेतन चेतन को 1 मार दिया जाता है। यह मुख्य और सर्वमखलविदमब्रह सब कुछ ब्रह्म है। तो अगर हम यह मानें कि ये जगत ब्रह्म हैं, तो जगत तो असर, जड और दुख है। असर जड दुख है। इस रूप में हम ब्रह्म को कैसे मान सकते? ब्रह्म तो सही आनंद है। तो यही कहेंगे कि जगत नहीं है, ब्रह्म है, बात सामान है। हाँ, इसमें दिटांसहैसणुपुरुषा आप हैं, ठूंठ दिखाई पड़ा अंधेरा है। छूट को देख कर आपके मन में ये भावना हो गई की कोई पुरुष खड़ा है। तो आप डर गए। स्थाणु पुरुष। तो स्थाणु का ज्ञान हो जाने पर ये पुरुष नहीं स्थान। ये पुरुष जो है, ये स्थान है। ये कहने से पुरुषत्व का बाध हो गया। तो नाम रूप का बात कर देने पर केवल आत्मा अवशिष्ट रह जाता है। अद्वहितहताहैआतमवेदम, सर्व ब्रह्म, वेद, सर्वम, सर्वम, खल, विदम, ब्रह्म जो कहा गया, मतलब नहीं है। ये साक्षात ब्रह्म अकेली है, दूसरा नहीं है। baba सूचियों का सूचियां ने, बताई, न नेतिनेति, सर्वसार आत्मवेद, सर्व आपूरवोअनबरोअनंतरो, अबाया समाया व्यंतर हजा। आज पूर्व भावी कारण से, कारण के 0 होने के कारण अपूर्वा माने। जिसका कारण न हो, वह अपूर्व है। पश्चात भावना कार्य, सम्बंधी, विधरो, अनंतम, षेद्रमसचपश्चात, भागिना, कार्य संबंधी विधरो। अनंतम ये वाही अंतर आप रह अनबरोअनंतरोअबआया कर रहे हैं। तो कहते हैं पश्चात भाव होने वाला कार्य है। कारण के बाद कार्य होता है, उसे उसके संबंध है, उसके संबंध से रहित है। न वो कार्य कारण हैं। न कार्य हो गया। अनंतर, अनंतर अंतर है। खेद। तो केद्र से सुन, केवल उसमें कोई दूसरी वस्तु भी में मिली हुई नहीं सहिंधाघणवत। जैसे ठोस नमक का डला होता है, नमक नमक है। उसी तरह से आत्मा में और कोई दूसरी वस्तु मिली नही है। वो प्रत्यक और वो अपना प्रत्यक है, अंतर है कर्रा तथा कार्यकरण से कल्पना का। se antr सहिया जो कहते हैं कि सर्व कारण, सर्व कारण, कार्य कारण से वह कल्पना िष्ठान होने के कारण उससे वो भिन्न है। इसलिए वो भाई है। सवाइयभंतरोयजा कूट व्यवस्था बना। कूटर्स की व्यवस्था के लिए जनमाल सम्बंध भाव कर्म। अविद्या राहत संबंधी, राहित्य, जनवादी संबंध के अभाव में कारण क्या है। अविद्या के साथ संबंध न होना, इसलिए वो है, न करू। अविद्या तत्काल संबंध मनोवती कहते हैं, वहाँ उस आत्मा में अविद्या कारण रूप से अपने संबंध का अनुभव नहीं कराती। तस् आत्मापूर्ण है। इसलिए उसको कारण की। 1 न 1 माने द्वित व्यव्ति लिए बताया कि वह पूर्ण है। अविद्या निराश पत्ते, अविद्या निराशा सत्य, बोले अविद्या है। किसमें है। तो अविद्या का कोई दूसरा तो है नहीं। अज्ञान अविद्या की चीज है तो अज्ञान, अविद्या से आत्मा में तो है तो आत्मा में प्रवेश करेंगे। तो ऐसी स्थिति में अविद्या तो रह गई। तो बोले की विद्वत दृष्टा सब सो अभिदान की दृष्टि से। vida lekin vida prnajinobvरgmasa था समूह स्वयं यद्यपि आत्मा 1 एव निश्चय निश्चय कम प्रणाली संसार यदि यदि यदि आत्मा 1 ही है, यह निश्चय है, तो प्रणाली अनंत भावों से जो संसार संसार जिनका स्वरूप है, उनसे विकल्प कैसे हो गया? उच्च माया देव आत्मा का माया है। may कहते हैं यहाँ गंधर नगर का दिन है। 1 गंध नगर होता है। आकाश में कभी कभी ऐसा दिखाई पड़ता है। इसलिए हवाई जहाज कभी कभी भटक जाते हैं। आकाश में ऐसा लगता है कि यहाँ पर बगीचा है, नगर है और यहाँ बगीचे में फूल फूल रहे हैं। ऐसा आकाश कुसुम दिखाई पड़ता है? लेकिन वहां जाओ तो कुछ नहीं है। इसी तरह से यह माया है। इससे संसार मोहित हो गए हैं। तथा यमात्मा स्वम माया सम्बंधान मोहित अतुमोहद्वराअतमाया गति आत्मा में ही माया रही। माया या भगवान ने स्वयं कहा है माया रत्देव माया दूत्या। ke bad लोक यज्ञ भोग meriti बदम यात्रा pusa om shanti anti sant।
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