chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Pravachan-1.mp4

This chunk continues the Chaturmas 2012 pravachan and focuses on the theological and practical importance of the guru. Speakers recount encounters with self-styled gurus, define the term "guru" (as remover of ignorance, bringer of knowledge), describe Vyas as the principal ancient guru who organized the Vedas, Mahabharata, Gita and Puranas, and explain why Vyas-Purnima (Guru Purnima) and guru-puja are observed. The speaker emphasizes devotional discipline, the value of satsang (good company), rules for Chaturmas residence for sannyasis (four months/quarters), and ritual practices (guru mandal, use of lemon in puja, window for darshan). Tone remains devotional, didactic, and corrective toward improper devotional behavior.
Questions this video answers
₹71,000
Thakur Harbant Singh (Deputy Speaker, Madhya Pradesh Assembly)
Three months (previously two months)
Chapters
भगवान की सभी लोगों से निवेदन है कि आप सब लोग अपने स्थान से ही हाथ जोड़ कर महाराज श्री को प्रणाम करेंगे। कोई भी व्यक्ति मंच पर आने का कष्ट न करें। पूंजी महाराजश्री का पदार्पण हो गया है धर्म की अधर्म का, प्राणियों में विश्व कार गो, माता की गो, हत्या धर्म सम्राट जगत गुरु शंकरा 4 भगवान की ज्योतिश पीठा री स्वर, महाराज की जह का शारदा पीठा री स्वर महाराज की जय हो जगदमबा महारानी की हो हर.
हर.
धरम समरा.
जगत गुरु शंकराचार्य, भगवान की राह सादा रह समराट चौतीस दरी का सारा पीटा देश्वर भगवान पता है आस्ते पधारी कृपाण दा.
सभी लोग अपना स्थान ग्रहण कर लें। पूरी मरासी का परातन हो गया है।
बोलिए जगत गुरु शंकराचार् भगवान की जय, बोले मातरपुरसदरीमैया की जय.
गुरुदेव भगवान के चरणों में गुरु बंधना है।
आज बड़े स्वभाग की बात है कि इस गुरु पूर्णमा के अवसर पर हमारे बीच में मंचासीन भगवान शिव स्वयं विराजमान है।
उन्हीं के चरणों में नमन करते हुए.
हम सभी, उनका.
आप सभी जो शिष्यगण.
मंच के ऊपर आ गए हैं, आप सभी से प्रार्थना है। हमारे गुरुजी के शिष्यगण निचे फर्शियों पर भी बैठे है। ये मंच की व्यवस्था इस हिसाब से जमाई है। ताकि हमारे निचे बैठे हुए शिष्यों को.
भी गुरुदेव आसानी से देखे।
कृपापूर्वक जो मंच पर आ गए हैं वो अपना अपना स्थान ग्रहण कर ले। यहाँ वहाँ न खड़े रहे और अभी कृपा पूर्वक नारियल माला, न चढ़ाए मेहरवानी होगी कृपया हमको व्यवस्था बनाने दे। यह हमारा आप सभी से प्रार्थना है।
जगत गुरु स्वामी जी अवतार हमारे जगत गुरु सामी जी अवतार बड़े भाग है, हमारे, यही है ब्रमुहयहीहैविशनु, यही है ब्रा, यही है विशनु, यही है विशनुहहीहैविशनु, यही है विशनु, यही है, यही है प्रभा, यही है, विश्नू, यही है ब्रहा, यही है विश, यही है शंकर प्यारे, यही है शंकर प्यारे। हो बड़े भाग, यही है शंकर प्यारे। हो बड़े भाग में हमार जगत गुरु स्वामी जी थारे हो बड़े भाग हमारे त्रेता में, राम रूप श्रेता में, बैरम राम रूप, राम रूप, राम रुप श्रेता में, राम रुप श्रेता मे.
द्वापर में.
मोहन प्यारे जवाब पर में मोहन जे ओ बड़े भाग हमारे सामीजिबारेओबड़े भाग है, हमारे कलयुग में है आदि शंकर, कलयुग में है आदि शंकर, आदि शंकर शंकर आदि शंकर कल युग में आदि शंकर, कलयुग में आदि शंकर, सनातन सहारे भाग, हमारे सनातन सहारे हो बड़े भाग, हमारे जगत गुरु स्वामी रविता हो बड़े भाग हमारे आई धरम पे जब, जब मेरा, आई धरमे रा जब, जब मेरा जब, जब मेरा जब, जब रा रा आई धरम मे, जब, जब मेरा धरम रासंक्रचारजीने संकट सबतारेसंक्राचार जी ने संकट सबकाे.
जगत गुरु.
स्वामी जी का हमारे, यही है.
ब्रो.
बोलिए जगल गुरु शंकर 4। भगवान की, हम उन सभी श्रद्धालु भक्तों से विनम्र अनुरोध कर रहे हैं कि अभी आप लोग मंच पर न पढ़ा रहे हैं तो बड़ा अच्छा होगा। यहां की व्यवस्था में व्यवधान हो रहा है। पहले दीप प्रज्वलन गणेश जी का, पूजन पाद का भोजन हो जाने दे। आप सभी भक्तों को वह अवसर प्रदान किया जाएगा कि आप सब लोग श्रद्धा भक्ति पादुका में अर्पण कर सके। हम दीप प्रज्वलन के लिए मध्य प्रदेश विधानसभा के माननीय उपाध्यक्ष ठाकुर हरबंत सिंह सिंह जी को साझा मंत्रित करते हैं। आबे दीपप्रजलन करे साथ में कर्मचारी बुद्धन.
जी.
एन पी प्रजापति जी, सुनील जैसवाल जी भी साथ रहेंगे। भाई धनश्याम कनोरीजी.
बोलो आप लोग बोलो.
ल om sjatisindurbadno devoyotpadpngj smarnwasrmditmzam asiasat gnana srmlmasraसादिके सरणत्रबिगौरि नारायणी मोस्ट दे दीपक जोतिस नमहा.
ओम गरजोदरजोतिरगन स्वाहा सूर जो जो.
द्रजोतिहीश्वाह अगनरबरचोजोद्रवर चाहा स्वाहा सूर जो जो.
जो दिरवरचाहास्वा ज्योति सुर्जया सुरजोजोतिश्वाहा बो दीप.
देव उपस्वन अंधकार निवारक इमामयाक्रतामपूजम गृणस्तेजप्रबधयोदिप जुदिस नमो नम हा.
लंबोदरं परम सुंदर मे ग दंतम रक्तामबरमत्रिणय नं परमं पवित्रम उद्यदिवाकरनिभोज्वल कांति कांतम विग्ने स्वरम सकल विगन हरम नमामी.
अभी टी प्रज्वलन का कार्यक्रम हुआ गणपति आराधना संपन्न हुई महाराज श्री की पाज का पूजन प्रारंभ हो रही है कलकत्ता से पधारे सज्जन शराब जी, ठाकुर हरबन सिंह जी, अजय गुप्ता जी, मंगत राय अग्रवाल जी, tamरकारजी चौधरी sessnजीlknsnजi कम श्याम कनूजी हरिओम जी चौधरी बाज का पूजन के लिए पधारे एनपी प्रजापति जी, सुनील जयसवाल जी, शेखर चौधरी जी चौहान जबलपुर से आये हैं फिर भी बाज का पूजन में सम्मिलित है। धोरेलिया जी पी पादका पूजन के लिए पधारे हिंदू भूषण सिंह जी.
सुधीर जी वी shrimanmahagnadipt namah jagdambika namahabaddhanjali sंklpankuriadओमध्य subpurntitonananam gotra wimagtanamsrvesam janana pratinidmvhntwim सनातन धरम विजल श्रद्धा भक्ति विश्वास प्रतिठा अरब देश मिन smaggrothisitme caturmashprange srigrornugrbadua pugnnkrisamheध्यान कुषपाणिग्रहित्वा om guru brama gurur vishnu gurudev maheswara guru sakat prmbrammdsmai sregुrenamhsudi muतiपuराणanamalयn kरuणalयmनमामi भगवत पाद शंकरम लोग शंकरम vasudev sutndevankscanramar namdevknmanand kunvndejrumjodr srmsrsvatiogtam surupanndabjean uspanismmrpami te mukesh maniram snaniyanjalam samrpamisoismrpami pnjndhasrstimabin tisotsrstitupnjda sodesebatsrito अत अभिषेक नियं जलम समर्पयामि srematjagdgurvenma shrimad gurucrnpadugaban namaha गnधaduicaran smarpaयami नाना विधान सुगंधीन पुष्पाणि समर्पयामि माल्या दीनी सुगंधीन मारत्यादिनिवईप्रभो मयाहृदानिपुष्पाणि पूजा र्धम प्रदिगरिहदाम समस्त पूजन पादुका में करने की कृपा करें ओम श्री mजगगुरवenमोnmaha pुsamalanधarami धूप मा गरबयामिपर्यक्ष दीपम प्रदशयामीधूपंते दीप ते ag manianjlmsamrpami bgvtesrimjggure namah jotispidadisrnamha durga sarda pitadisrinamaha dupmagrapami dem ami धoपनदेदीपंदेच आज मनियंजलमसमर्पयामी gate srimdgorvenamnmhe were nana vidmruplnidmdami krतयapूजाhsद्र दक्षिणाम समर्पयामि हरड गर्भगरवस्तहेमबीजम विभावसो अनंत purnpldmthsanti prयc्cमebagvate srimdjgdgorvenmo namaha karpur nirajan kris ओम िरगगुंहविहिप्रजननं में अस्तु दशविरग्गुं सरवगणग sustaymsniprjasani psusaniokasna snigiजamबहुलam krotnnampयoreto smast करपुरगौर करुणावतार संसार सार भुजगेनद्रहारम सदा वसंतम रु दयार विंदे भवम भवानी सहितं नमामि मंदारमाला कुलितालकायई कपाल मालां किदुषेखरायो दिव्यां बनाई जदिगं बनायो नमश्वायजनमश्शवायो जलिनसिदलिकरणम आत्म देव बंधन सुमनांजलि समर पयामी जो जहां बैठे हैं, वहाँ से वे अपना सुन्दर मन अर्पित करें। आप सबके भावनाओं की प्रतीक पुष्प माला यहाँ अर्पित की जा रही है। ओम माल्या दिन सुगंदिनिमलत्यदिनि वह प्रभो myarदanibuspani puja prtigrhitam शवमनsारथम प्रतिग्रहित श्रीमद जगतगुरवे नमो नम मंत्र ीनंगियहिनंभक्तहनम परात्पर यत पूजनम मया देव परिपूर्ण तदस्तु मे अन्य पूजा baganjotispitadisrhe petadisrhepretanam ma puspanjlsmrpami.
Ke.
आज से इस पहले 2 महीने का होता था, इस बार 3 महीने का होगा और इसी में ही सभी भाद्रपत का मास जो भगवान कृष्ण का मास है, वो पुरुषोत्तम मास के रूप में बीच में आ रहा है। आध्यात्म मानसिक शांति के लिए वैसे तो संसार में हमेशा ताप ही मिलता है, चाहे कहीं हो और उसकी 1 प्रति है जो उमस बढ़ी हुई है। सब भोग रहे। ऐसी स्थिति में ये तो होंगे, परंतु भगवत चर्चा होगी, गुरुजी के दर्शन होंगे तो शांति प्राप्त होगी। इसके लिए इन वाक्यों को खुल के बोलिएगा धर्म की अधर्म का प्राणियों में विश्व का गो, माता की गो, हत्या, धर्म सम्राट जगत, गुरु शंकर 4, भगवान की धर्म, सम्राट, ज्योतिश, पीठाधीश्वर महाराज की धर्म सम्राट, द्वारिका, शारदा, पीठाधीश्वर महाराज की जगदंबा, महारानी की सिद्धेश्वर, भगवान की ज्योतिरीश्वर, भगवान की चंद्र, मौलेश्वर भगवान की जगन्नाथ, स्वामी की नित्य, नि, गुंजेश्वर भगवान की लक्ष्मी, नारायण भगवान की नित्या, भगवती की चौसठ, जोगनी माता की बोलो, राजा रामचंद्र, भगवान की पवन, सुत, हनुमान की परमं, सी गंगा क्षेत्र की हर हर महादेव.
गोटेगांव मुन्ना ट्रस्ट की तरफ से आदरणीय चौधरी सुरेश चं जी जैन 1 चेक लाये हैं, उसी चरणों में भेंट चढ़ाने.
के लिए.
सदस्यगण भी साथ आयेंगे। 71 हजार रुपए की राशि इस टेस्ट के द्वारा सी चरणों में भेंट की जा रही है।
आदरणीय गुरु भाइयों महाराज जी का यह तिरसठवां चातुरमास वता नुसान है। महाराज जी के अतिरिक्त पूरे भारत वर्ष में अभी तक इतने चातुर्मास करने वाले कोई महात्मा खोजने पर भी नहीं मिले। जो अपने महाराज जी हैं और महाराज अपने हो गए है। अपने कहना भी ऐसा लगता है, उन्हें हम दूर समझ रहे हैं। इतने हमलोग उनसे घुलमिल गए हैं। उनकी युवावस्था के आरंभ से ही हमारे यहाँ के स्यानी बूढे देखते आ रहे हैं। उन श्यानीबूढोकीतपस्या के परिणाम में स्वरूप महाराज जी हम लोगों को मिले हैं। और सबसे बड़ी रोचक बात यह है। इस बार सभी ने अपने अपने ढंग से निवेदन किया था। हमारे कलकत्ता के बंदूक है, वो भी बोले। हमारे आदरणीय। स्वामी जी भी बोले सब जगह से प्रार्थनाएं थीं। परन्तु महाराज जी ने जहाँ ये बात कही वो बड़ा दिव्य क्षेत्र था, माँ तारा का क्षेत्र था। वर्तमान क्षेत्र में महाराज जी ने सबके सामने कहा भाई, इस बार हमारी इच्छा पर हंसी में ही शात्रमसकरनेकी है। तो ये जो चातुर्माश हो रहा है, ये महाराज जी का तो है ही। परन्तु ऐसा है जैसे पिता की सम्पत्ति में पुत्र, उत्तराधिकारी शास्त्र से, कानून से सब तरह से होता है, वैसे हम लोग की ओर से भी हो रहा है। अभी श्रीनगर में महाराज ने बड़ी रोचक बात कही है। अभी तक के चातुरमास में हम 1 दस्यु को भगवान जगननाथ जी को उनके मंदिर में पहुंचा कर के फिर कहते थे। अब हम चातुर मार्श के लिए जा रहे हैं। इस बार महाराज जी बोले भगवान जगननाथ जी को अपने स्थान में बैठा कर के कि हम चातुरमास के लिए अब यहाँ आये हैं।
देख लो.
ये दिव्य मूर्ति, इस मूर्ति का दर्शन कर लिया तो हमने गोविंद को पा लिया। इस मूर्ति को यदि हमने अपने चरणों, उनके चरणों का आश्रय ले लिया तो सब कुछ साधन सफल हो गई। इसलिए भरपूर अवसर भगवान ने दिया है, गुरु जी ने दिया है। इसका भरपूर हम लोग लाभ लें। और ये परमहंस की ही तपस्या है जो आज हम लोग इस दिव्य मंडप में बैठे हैं। आज गुरु पूजन जो महाराज ने किया है। वैसा पूजन आज तक किसी ने करते हुए नहीं देखा है और न होता है। इस तरह से वो हमें शिक्षा देते हैं। आचार्य देवो भव हमारे देवता यही है सब कुछ, यही है, शास्त्र हैं, व्यवहार है, दुनिया है, आयु है, कुशलता है सब कुछ, ये है इनमें हम समर्पित होने की चेरा करें अस्तु.
Om.
Mata markatashयama matangi mdshaliniktaet klयanikdmbrhvasini बाला करुण तेज संतरिणरामरकतमबरोल ला सिनी nana langtiraजmanvpusm balodurathekram hstyrsudnusriणim sumsrmpasammuda bibrtims्ीचकस्थित सुंदर इंद्र जग ताम आधार भूतां बजे sremadisaranndnata yo yogini prmatmanerktsugl prbamisrotesse gurvenamaha gururbrahmagurur visणugurdevomेs्वरह गुरु साक्षात परम ब्रहम तस्मई श्रीगुरवे नमह बोलिए जगतगुरु शंकरा जारि भगवान की ज.
पUdयOचौहानसाहब जबलपुर से पधारे हैं भैंट आर्पित कर रहे है पूज्य महाराज श्री का आशीर्वचन प्रारंभ हो उसके पूर्व जोतिश पीट पंडित आधरनीश्रीरविशंकर जी शास्त्री विदा बली का पाठ करेंगे.
ओम नमा सम भवा यचम भवा यच नम शंकरा या च मयस्कराय च नमह शिवाय च शिवतराय च इदमविषणबिजक्रमे.
त्रिधा निदधे.
पदम समूढमस्यपां सुरे स्वाहा नारायण समारम भाम शंकराचार्य मध्यमा अस्मदाचार्य प्रियंता वन्दे गुरु परम बर sremtपरमhंसपरि राज का 4 बरिहा पदवाक्यप्रमाण पारा वार परिणाम यमनियmaशणप्रणायामa प्रत्याहार धारणा ध्यान समाध्यशटांगयोगानुष्ठा नुनिष्ठाहातबशर चरण चक्रवर्ति नहा अनादि गुरु परंपरा प्राप्त वैदिक धर्म प्रचारण परायण सकल दरशन समनविदवेदवेदांत सिद्धांत प्रतिपाद का 4 यहाँ nigmagmsarrudयaha सर्वतंत्र स्वतंत्र वर्णाश्रम सदाचार शिक्षका विश्व कल्याण मान.
साहा.
Akndumandalacarahu ananta shri viभusitjgdgुरु srीmadadsankracarय.
भगवत.
पाद स्थापित मरियादा पोषण परायण prapr vidya vidयodidatahkrnha lgnndaatiravasinah उttramnayjodir maठaधीश्वराह गोमती तिरवासनहा pstimamnayatdarka sharda pitadiश्वराहा नरमदा गंगा यमुनादि देव नदी सं प्रापित प्रदूषण निवारण परायणा आध्नतानवरताबिरल निर्मल गंगा धारा प्रभा रुप शिव संकल्प shremadramjnbhumismud darartahanisalok jagarnttparaha nicel narijansmarart श्री राम भद्र द्वारा निरमित satubndarameswr vidwansrupduscuta nivarkahatisasitm caturmashavrtanadi अनुष्ठान samaधyahaanntashri vibositjagdguru snkracaryoushri sरuपानnद sरsवtीस्वाmibraha विजयंति तराम धर्म की अधर्म का ऐसा देखा है बाजे को तपाते हैं तो अच्छी आवाज़ करता है यूमर्स बढ़ रहे तो आप भी तब गए होगे आवाज़ जरा अच्छी निकालो धर्म की अधर्म का प्राणियों में विश्व का गोमाता की गोहत्या धर्म सम्राट जगत गुरु शंकर ाजरे भगवान की धर्म सम्राट ज्योतिष पीठाधीश्वर महाराज की जगदम्बा महारानी के सिद्धेश्वर भगवान की ज्योतिरीश्वर भगवान की चंद्र मोरेश्वर भगवान की जगन नाथ स्वामी की नितनिकुंजेश्वर भगवान की लक्ष्मी नारायण भगवान की लोदरेश्वर महादेव की नित्या भगवती की 64 योगिनी माता की बोलो राजा रामचन्द्र भगवान की पवन सुत हनुमान की परमंसीगंगा क्षेत्र की हर हर महा दे ओ.
करनी शत सरनाम करण गुण जिले हवाले कलिका का बोरोदानदमह जिरिशजरिसुतालराम रालिकमनेचमंके सजन भरण श्रिडमशिरविगनराजम ब्रह्मानंदम परम सुख दम केवरमग्ानमूतिम धनवातीतम भगन सरिशम तब रक्षम एकम नित्यम बमरमचरम सर्वधिसािबूतम भaबाकिकंचणरहितं सदगरुमकनमतजमबनधम sar सर स म यत प्रसाद परियंसे मोहन तम श्री राम जै राम जै जै राम श्री राम जय राम जय जय राम राम जै राम ज ज र श्री राम जै राम ज ज र राम गेरा के रा श्री राम जय राम जै जै राम राम रे राम के जेरा श्रीराम जय राम जय जय राम राम जै राम जै जै राम श्री राम जै राम ज ग रा.
राम से दे.
रे रा श्री राम दे राम रे राम राम के राम से रा धर्म.
की.
अधर्म का प्राणियों में विश्व का गो माता की गो हत्या अठारे समर्थित विदविद देवियों सज्जनों। हमारे शास्त्रों में गुरु को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। भगवान आदि शंकरा चारी ने गुरु के संबंध में कहा कि गुरु का कोई डिस्टांट नहीं किससे गुरु की उपमा दी जाए। जिस्टा तो, नई, जस्ट, तुवन, जटिले, सद्गुरु, ज्ञान, रात, ज्ञान के प्रदाता, सद्गुरु का तीनों लोकों में कोई दृष्टांत नहीं है। गुरु कैसा होता है, इसकी उपमा किसी से नहीं दी जा सकती। किसी ने कहा हमारे पास 1 उपमा.
है.
पारस मणि, पारस मनी। आप जानते हैं पारस 1 पत्थर होता है लोहा। अगर उस महीन से छू जाए तो लोहा सोना हो जाता है। तो उसने कहा हम ये कह सकते हैं कि गुरु पारस और शिष्ट लोहा है। तो दृष्टांत तो मिल गया, बोले नहीं। यह दृष्टांत नहीं बन सकता। क्योंकि पारस लोहे को सोना बनाता है, पारस नहीं बना सकती। और गुरु अपने शिष्य को अपना आत्मा बना देता है। इसलिए उसकी कोई घटना नहीं है। जस्टन तो नहीं, वेस्ट सदगुरु जान। रात वर्ष तक सनद, स्वर्णकाम, असम, शरम, नस्र सत्तम तथा सदगुरु सी सा भवजररुपमसेनवारौक कोपी। इसलिए गुरु के गुरु के समान कोई भी वस्तु संसार में नहीं है। तो गुरु को इतना महत्त्व क्यों दिया गया? सबसे बड़ी बात यह है कि संसार के सब प्राणी दुख से श्रद्धा के लिए छुटकारा प्राप्त कर के परम सुख प्राप्त करना चाहते हैं। प्रत्येक प्राणी की भावना रहती है कि हमें कभी दुःख न हो और सुख मिले। ऐसा सुख मिले जो सबसे श्रेष्ठ हो, जिससे बढ़कर कोई सुख न हो। शास्त्रीय भाषा में कह सकते हैं समस्त दुखों की आत्यंतिक, निवृत्ति और परमानंद की प्राप्ति प्रत्येक पुरुष का प्रयोजन है। अब उस प्रयोजन की सिद्धि कैसे हो? परमानंद की प्राप्ति कैसे हो सकती है? यदि परमानंद कोई वस्तु है, किसी देश में है, किसी काल में है, वहां जाने पर उसकी उपलब्धि होती हो तो हम वहाँ चले जाए। पर ऐसा कोई देश नहीं है, जहां सुख ही सुख हो। ऐसा कोई कार्य नहीं है, जहां सुख ही सुख है। और ऐसी कोई वस्तु नहीं है.
जो.
हमको सदा सुख देती है। आप देखिये, हम जिसको सुख का साधन मान कर प्राप्त करते हैं, प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, उसके लिए दुख भी उठाते हैं, पर वो भी सदा सुख नहीं देता। उदाहरण के लिए समझ लीजिये हमारे मन में ये भावना उठी के आज हम खीर खाए, खीर खाने की इच्छा से हमने उसका साहित जोड़ा दूध लाए, शक्कर राय, अच्छी कोटी का चावल लाए, मेवा डाले और किसर भी डाली। फिर पत्नी ने बनाया और उसकी सुगंध से नाक तर हो गई। खाली सा सामने आते ही हम प्रसन्न हो गया। आज फिर आ रही, अब वो परसती है। हम बड़े प्रेम से खाते हैं, खाते खाते हैं, जब चिपटी हो जाती है। कहते हैं अब बस वो कहती है? 1 कटोरी और ले लो। और वो जबरदस्ती दे देती है, वो 1 कटोरी भी हमने खाली, कटोरी भी आती, तो अंत में इतनी गुस्सा आती है। कहते हैं खीर देखते ही नाराज होती है। और उससे कहते हैं कि मार ही डालेगी। तो क्यों भाई? अगर खीर सुख रूप होती तो वो दुख रूप क्यों हो गई? तो कोई भी वस्तु सदा हमको सुख नहीं दे सकती। तो देश, काल और वस्तु में सदा रहने वाला सुख नहीं है। और यह भी नहीं है कि उसकी प्राप्ति में दुख न हो या बाद में दुख न हो। कोई भी सुख ऐसा नहीं है, जिसके मूल में दुःख भी न भरा हो, उसके पश्चात दुख भी होता है। तो गुरु हमें ऐसा मार्ग बताते हैं कि सुख बाहर नहीं। सुख के लिए किसी देश में, किसी काल में, किसी वस्तु को प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है। सुख तेरा स्वरूप है। तू स्वयं आनंद स्वरूप है। अपने को न जाने ने के कारण तू भटक रहा है। गोस्वामी। तुलसी जी ने मन में कहा आनंद सिंधु, मध्य, तब भाषा बन जाने कतमरसीतियाशा? अरे जीव, तू तो आनंद के समुद्र में है, नहीं जानता, इसलिए प्यासा मर रहा है। और कबीर ने कहा, पानी में मीन प्यासी मुहर आवे। हासि, पानी में, मीर प्यास मछली पानी में रहती है, लेकिन उसकी प्यास पानी के भीतर रहने पर भी नहीं बुझती। उसकी प्यास तब बुझती है, जब वो उछलती है। आपने देखा होगा, मछली एकांत में उलटती.
है.
जब वो उलटती है तो उसके मुँह में पानी जाता है। इसी तरह से जब तक हमारी बुद्धि बहिर्मुख रहती है, नदियों की तरफ बैठती है, विषयों की तरफ रहती है, तब तक हम सुख को नहीं प्राप्त कर सकते। जब बुद्धि अंतर मुख हो जाती है, तो हमको उसकी प्राप्ति होती है। तो गुरु क्या करते हैं? आपको बाहर से कुछ नहीं देते, आपके भीतर जो है, उसको जन्म देते। इसलिए किसी गुरु ने कहा, मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो। तोर तेरा तुझको सौंपते क्या लाग है? मोर। तो गुरु। हमको केवल अपने भीतर जो आनंद का समुद्र लहरा रहा है, उसका ज्ञान कराते हैं। परमात्मा सबके हृदय में विद्यमान है। ऐसा कोई प्राणी नहीं है, जिसके हृदय में भगवान न हो। गोस्वामी तुलसी राज जी कहते हैं कि व्यापक 1 ब्रह्म, अविनाशी, सत, चेतन घन, आनंद राशि, अशुप्रमुरिदयअठत अधिकारी, पिरंजीवजगतीन दुखारी। इसका अर्थ है 1 व्यापक अविनाशी, सतचित, आनंद रूप, परमात्मा सब प्राणियों के हृदय में विद्यमान है। जब हमारे हृदय में आनंद स्वरुप परमात्मा विद्यमान है, तुम दुखी क्यों है? इसलिए कि हमको उसकी पहचान पहचान हो जाए। तो हमारा दुख उसी समय दूर हो जाए। तो गुरु क्या करते हैं? पहचान कराते हैं। नई अभी तो देव भुनक्ति। परमात्मा जब तक विदित न हो जाए, तब तक रक्षा नहीं करता। विदित हो जाने पर, बोध हो जाने पर ही हमारी रक्षा करता है। तो गुरु हमको ज्ञान प्रदान करते हैं, बोध देते हैं किंतु इधर उधर, मत भटक, तेरे हृदय में परमात्मा विद्यमान व्यापक। 1 ब्रह्म अविनाशी सत चेतन घन, आनंद राशि अस प्रभु हृदय अछत अभिकारी, फिरहींगीवजलदीन दुखारी। 1 अविनाशी परमात्मा के हृदय में विद्यमान होने पर भी जीव। इसलिए दीन दुखी है कि उसको उसका पता नहीं है। इसलिए बेचारा भटक रहा है। तो ये बताते हैं। 1 कस्तूरी मृग होता है? कस्तूरी मृग की नाभि में कस्तूरी होती है? और जब वो पकती है तो उसकी सुगंध फैलती है। तो कस्तूरी मृग यह समझ कर कि यह सुगंध किसी वनस्पति से, किसी वृक्ष से आ रही है? तुम हो भटकता है, जगह जगह घूमता है। लेकिन वो नहीं समझता कि मेरी नाक भी में कस्तूरी। इसलिए आप देखिए कस्तूरी जो नकली कस्तूरी बेचते हैं न, वो भी यही करते हैं। पहले आपके हाथ में उसका सेंट लगा देते ह और फिर कहते हैं अच्छा तुम सुन हो तो जो सेंस है उसी सलज मिलेगी चाहे मिटटी सलाह तो ये है जो वस्तु है उसका ज्ञान होना चाहिए और वो ज्ञान सही, सही होना चाहिए। तो वो स्वामी जी बोलते हैं कि वो जो परमात्मा सबके हृदय में है, नाम न रूपण नाम जतनते सौ प्रकटत जिमिमोलरतनते नाम के निरूपण नाम के यत्न से वो जो व्यापक, अविनाशी, सच्चिदानंद, ब्रह्म सबके हृदय में विद्यमान हैं, अब प्रकट हैं, वो प्रकट हो जाता है, हम मूल रतंत डिस्टांट दिया, जैसे रत्न मूल्य प्रकट होता है। 1 किसान था, वह अपने खेत में फसल की रक्षा के लिए मचान बनाकर घोपने में पत्थर भरभर के चिड़िया भगाता था, 1 दिन उसके पत्थर खत्म हो.
गए.
तो वो नदी के किनारे गया, नदी के करार में उसको 1 अंडा मिला, उस अंडे को उसने देखा लाल लाल बढ़िया बढ़िया पत्थर रखे हैं। वो उसी को ले आया और घूपनेमें भर भर के वहीं पत्थर फेंकने लगा। वो इतने जोर से घोपने से पत्थर फेंकता था, चिड़िया तोड़ी ही जाती थीं और वो पत्थर पास की नदी के गहरे जल में डूब जाते थे, डूबते, डूबते सब पत्थर डूब गए। 1 बचा तो घर से खबर आई की आज घर में नमक नहीं है, तो पास में पैसे थे, पराई नहीं थी किसान के घर में, तो उसी 1 पत्थर को लेकर नमक.
के लिए.
हो गया बाजार और जहां नमक बिकता था उस ओर जा रहा था, इतने में 1 जौहरी की नजर पड़ी जोहरी ने पूछा कहाँ जा रहे हो? बोला नमक खरीदने जा रहा हूँ, पैसे कौन से है? तुम्हारे कितने है ओरे पैसे तो नहीं है, पत्थर है। अरे कहा ये तो कोई कीमती पत्थर लगता है, चलो जोहरी इसका पता लगाया, वो जोडियों की बाजार ले गया, किसी ने कहा इसकी कीमत 10 लाख, किसी ने कहा 20 लाख, किसी ने कहा 25 लाख, किसी ने कहा करोड़ नगर सेठ बोला यह तो रूबी है, लाल है। तो उसके हृदय में जो ये दरिद्रता की गिरानी थी कि मैं इतना गरीब हूँ कि मेरे पास नमक खरीदने के लिए भी पैसा नहीं है, जब उसने सुना नगर सेठ से की इसकी कीमत मेरे पास नहीं है, मेरी सारी सम्पत्ति लेकर अगर ये लाल दे सको तो दे। 2 तो उसका तत्काल दुख रूपी शब्द सुनते ही दूर हो गया। तो गुरु क्या करते हैं? जो तुम्हारा अंतरात्मा है उसका नाम बता देता है। नाम निरुपण, नाम रतन तेहै अशो प्रकटत जिमि मोर रतन जो महावाक का, भगवान के नाम का उपदेश दिया महावा रूप नाम का। तो वो परमात्मा जो हमारे हृदय में पहले से विद्यमान हैं, वो अभिव्यक्त है, वो व्यक्त हो जाता है। जैसे रत्न से मूल्य प्रकट नाम से, रत्न के नाम से उसका मूल्य प्रकट हो जाता है। इसी प्रकार अंतरात्मा का बोध गुरु से होता है। कौन गुरु है।
ये.
अपने शास्त्रों में बताया है कि जो सोच ब्रह्मिन, वेद शास्त्रों का जाता और परमात्मा के स्वरूप का अनुभव करने वाला वो गुरू। भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण से कहा तदवििपरशेयाउपदेषं के ज्ञान ज्ञानी न। तत्वदर्शी ना अर्जुन तुझे। यदि ज्ञान प्राप्त करना है तो तू तत्वदर्शी ज्ञानी के पास जा। गुरु के 2 विशेषण तत्वदर्शी और ज्ञानी। तत्वदर्शी का अर्थ है बड़ा वरिष्ठ है। ज्ञानी सुर्ती दोनों रस्मे विशेषता हो। वह गुरु हमारे अज्ञान अंधकार को दूर कर सकता है। क्योंकि परमात्मा का ज्ञान आँख से नहीं हो सकता, कौन से नहीं हो सकता, प्रत्यक्ष से नहीं हो सकता, अनुमान से नहीं हो सकता। परमात्मा का ज्ञान श्रुति से हो सकता है, उपनिषदो से हो सकता है। तो उन उपनिशदों का अर्थ गुरु। बदाtइसलिएउपशद में कहा गया यस्देवेपराभक्ति यथा देवी। तथा गुरव दस्ीतेकचताहरथा प्रकाशन से महात्मा ना। जिसकी अपने देव में परम भक्ति है और जितनी जितनी अपनी स्टदेवता में भक्ति है, उतनी ही अपने गुरु में है, उसी को वेद के विधा के स्वरूप का अर्थ का बोध होता है। तो ऐसे गुरु के पास जाने पर प्रणिपात प्रणाम करें, फिर उन से कुछ प्रश्न करें। प्रश्न करने पर यदि वो उत्तर दे और समझ में न आए तो सेवा कुछ कार तक सेवा करें। तो आपके अंदर पात चर्चा आ जाएगी। तो आपको गुरु के उददेश्य से ज्ञान हो जाएगा। तो वेदांत में ज्ञान के मार्ग में गुरु का महत्व है। भक्ति के मार्ग में भी गुरु का महत भगवान को कौन पहचानता है, कौन पहचान सकता है? जब गुरु बरसाता है तो परमात्मा के स्वरूप पर जान होता है। इसलिए कबीर ने कहा गुरु गोबिंद। दोनों खड़े काके लागू पाये। बड़ी। हारी गुरु, आपने गोविन्द दिया। बताए गुरु ने गोविंद बताया की। ये गोविंद हैं। तो हम ने समझा कि यह गोविंद है। अन्यथा क्या जाने कि कौन परमात्मा है। तो जो गुरु है वो बताते हैं कि यह गोविंद है। इनका आराधन करो। और अपने सनातन धर्म में तो यह माना जाता है कि गुरु पिता है, धर्म पिता जो हमारे शरीर को जन्म देने वाला, पिता वो अलग है। और हमको साधन के स्वरूप सा, हमको साधन का स्वरुप देने वाला, धर्म के मार्ग में लगने वाला, जो होता है, वो गुरु होता है। तो हमारे यहाँ कन्यादान होता है? अपनी बेटी को, हम किसी योग्य वर्ग को सौंपते हैं। तो विवाह में यही होता है कि पिता कुश और कन्या अपने हाथ में लेता है, कुश कन्या अपने हाथ में ले कर बोलता है? इमाम लक्ष्मी रूप म, कन्या विष्ण रूपए वराय संप्रददेयेजो मेरी लक्ष्मी रूप कन्या है? मैं विष्ण रूप वर कुछ समर्पित करता है। तो गुरु की शरण में जब कुछ जाता है तो वो गुरु शिष्य को भगवान के चरणों में अर्पण कर देता है। महाराज आज से तुम्हारा हो गया, आप इसकी रक्षा की। इसलिए गुरु को धर्म पिता कहते हैं। और जो उस गुरु की शरण में जाने वाले हैं, वो परस्पर अपने को गुरु भाई कहते हैं। गुरु भ्राता कहते हैं। ये नाता जो है, पक्का है और नाते झूठे हैं। जो धर्म का और अध्यात्म का नाता है, वह पक्ष है। 1 बड़ा मनोरम आख्यान है, कथा है। 1 कदम खंडी पर रहने वाले बाबा थे, उनकी बड़ी बड़ी जटाएं थी, भगवान श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में देखते थे और उनकी आराधना करते थे। तो 1 बार कदम खंडी की झाड़ी में वो घूम रहे थे। घूमते घूमते। उनकी जो डाटा है, वो झाड़ी में फंस गयी। तब उन्होंने उसको सुलझाने का बहुत प्रयत्न किया। जब नई फिल्मी तो उनको भगवान थोड़ा सा प्रेम क्रोध या ो सकता। उसी में मेरी जटा बन जाई है। अब मैं बिना खाए पिए तब तक ही उठूंगा जब तक कि वो स्वयं मेरी जटा सुलझाने के लिए न आ जाए। वो बैठ गए, कई दिनों बैठे रहे। अंत में भगवान को आना पड़ा आये, कहने लगे बाबा तेरी जाए सुलझा दी। तो उन्होंने पूछा तुम हो कौन वही है जिसने उलझा तो बोले क्या प्रमाण है? राधा रानी विस्वान। आकर कह देंगे कि ये वही है, तब तक हम तुमको छूने नहीं देंगे। अंत में राधा रानी विष्वाणनंदनी को आकर ये कहना पड़ा की ये वही है। तो उनको पहचान हुई कि ये किसने वो गुरु बनी, गुरु बनकर। उन्होंने कृष्ण की पहचान कराई। इसी तरह से सर्वत्र गुरु ही पहचान कराते। गोस्वामी तुलसीदास जी के संबंध में ये कथा आती है कि वो काशी में रहते थे, सच के लिए गंगा पार जाते थे, नाव से और कबरनुरुमेंजोशोच का जल बचता था, वो 1 पेड़ की जड़ में डाल लेते थे। उस पेड़ में 1 प्रेत रहता था। तो अमित जल को पी कर उसको संतुष्ट हो गई। उसने प्रकट होकर कहा कि गोस्वामी जी क्या चाहिए? बताओ जो तुम्हारी इच्छा हम देने को तैयार है। उन्होंने कहा हमको तो भगवान का दर्शन चाहिए, बोले हम प्रेत, हम क्या भगवान का दर्शन कराएंगे। कोई उपाय उपाय। हम बता सकते हैं कि जब तुम कथा सुनाते हो तो तुम्हारी कथा सुनने के लिए हनुमान जी मेरे कुचेले कपड़े पहने। 1 अत्यंत निर्धन के रूप में आते हैं और पहले बैठते हैं। और सबसे अंत में जाते है तो उनके चरण पकड़ लो, वो तुमको भगवान का दर्शन कर सकते है। मेरी ताकत में तो गोस्वामी जी, राज जी रोज अपने मानस की रचना करते थे और सुलाते भी थे और हनुमान जी भी सुनते थे। हनुमान जी का नियम है यत्र यत्र रगुनाथ की तत तत वाह प्रभारी परिपूर्ण रोशन मारुति न राक्षस। जहां जहां भगवान का कीर्तन होता है, कथा होती है। जितनी जगह कथा होती है, उतने ही रूप बना कर भगवान जी वहां पहुंच जाते हैं। और हाथ जोड़े सिर झुकाये, आँखों में आंसू भरे शरीर को रोमांच कंटकित कि साधारण कथा का सेवन करते हैं। तो आये तो जब अंत में वो जाने लगे और सब श्रोता तो चल ही गए थे। हनुमान जी ने अपनी गद्दी से उतर कर उनके चरण पकड़ लिए अरे कहा महाराज, क्यों पाप में डालते हो। हम गरीब आदमी कथा सुनते हैं, हम हमारे चरण क्यों छू रहे हो? बोले हम जानते हैं कि आप कौन है? वो बोले अच्छा क्या चाहता है। बोले हम भगवान का दर्शन करना चाहते। बोले जा भगवान का दर्शन। तो गोस्वामी। तुलसी राज जी कूद गए। वहां मंदाकिनी के किनारे हाथ में बैठकर भगवान की पूजा कर रहे थे। इतने में राम लक्ष्मण उनके सामने से निकले। उन्होंने समझा कि ये कोई राजकुमार है। 1 सावर थे, गोरे गोरे थे.
ये.
राजकुमार जा रहे हैं। देख कर भी न देखे। समझ लीजिये। बेचान नहीं पाये कि ये भगवान है। तो तुलसी दास जी के पास। हनुमान जी ने कहा, क्यों तुलसीदास तुमने भगवान का दर्शन किया। राम लक्षमण से निकले थे। बोले महाराज, हमने तो उनको राजकुमार समझा। तो जब तक पहचाने न तब तक दर्शन कहाँ हुआ? दर्शन तो तब माना जाए जब की पहचान पहचान ले आप। फिर से हमारा हमको दर्शन कराइए। कहा ठीक है भगवान से प्रार्थना की। हनुमान जी ने महाराज इसको दर्शन दीजिए। वो चंदन घिस के कटोरी में डालते जा रहे थे। तो भगवान आ गए और उनकी कटोरी का चंदा लेकर अपने माथे पर लगाने लगे। तो आँख मूंगे हुए थे। तुलसी राज्य ने कहा कि अब भी वंचित हो जाएगा। तो तोते का रूप बनाया। चित्रकूट के घाट में भई संतन की भीर तुलसिदास चंदन से तिलक देत रगुबीर। तब उनकी आंख पुरी। तो भगवान है। तो ये गुरु का काम है। हनुमान जी उनके गुरु बन गए और उन्होंने राम का वोट करा दिया। तो ये काम गुरु देव करते हैं, गुरु मंत्र दे देते हैं कि इसको तुम अपनाओ। अब जो न समझ है, वो कहते हैं भाई, ये तो मंच है। किताब में लिखा है, गीता प्रेस की पुस्तकों में लिखा है। तो इन्होंने क्या किया? वस्तुत बात तो यह है कि जो गुरु किताब पढ़ के मंच देता है, वो गुरु वस्तुत नहीं है। जो गुरु परंपरा से गुरु है, उसका भी कोई गुरु होना चाहिए, उसका गुरु होना चाहिए। तो जो परंपरा से शिष्य बनकर, गुरु बना है, वो गुरु का बनने का अधिकारी है। तो वो जो मंत्र बदलाता है, वो मंत्र पुस्तक का पढ़ा हुआ मंत्र नहीं.
है.
उसमें शक्ति है, उसमें ऊर्जा है। गुरु के द्वारा दिए गए मंत्र में 1 शक्ति होती है, ऊर्जा होती है, उसका जप करने का 1 विक्षण प्रभाव हमारे मन शरीर में पड़ता है और सब में नहीं पड़ता। इसलिए लिखा है भवेद, वीरवति विद्या, गुरु, वक्त समुद्भवां, अन्य था परीना सन निर्वीरा दा। जो गुरु के मुखारवन से निकली हैं, वो बरती होती है, अन्यथा निर्विरिया हो जाती है। तो इस लिए देखिये मेरा क्या बोलती.
है.
पयलीमैंनेरामरतनधन पाया बस। तो अमोल सतगुरु कipकनायपायोरi, राम धन, पाय, राम रतन, धन, गुरु ने दिया। सब पसकोंमेभलिखाहै सब कुछ है। लेकिन जब गुरु देते हैं तो वो रत्न बन जाता है, अमूल के रत्न बन जाता है, उसका कोई मूल्य नहीं होता। और उसको जो भूल जाता है, छोड़ देता है, विसर जाता है। वो बहुत बड़े पुरुष से। वंचित हो जाता है। इसलिए यह माना जाता है कि गुरु का दिया हुआ है। पुस्तकें लिखित मंजन शरीर ने 4 पुस्तक में लिखे हुए मंत्रों को पढ़ के जो जपता है वो जीवन में शानदार होता। मरने के बाद कुत्ता होता है। इसलिए गुरु के मुखार विंद से मंत्र नाचा। पर भगवान के नाम में भगवान का नाम, राम नाम, कृष्ण नाम, शिव नाम, भवानी नाम, इस नाम के लिए गुरु बनाने की आवश्यकता नहीं है। बिना गुरु के भी आप इसका करेंगे तो ये महामंत्र है। इस महामंत्र में किसी नियम की आवश्यकता नहीं है। आप शुद्ध हों, शुद्ध हों, किसी भी अवस्था में हो, भगवान का नाम ले सकते हैं। लेकिन जो भगवान गुरु का दिया हुआ मंत्र है या नाम मंत्र ही समझिए, उसको विशेष रूप से मादा से भी जपना चाहिए। 1 ने शंका कि महाराज मन को इधर उधर घूमता है, माला लेकर हम बैठते हैं। तो कहाँ भजन हुआ? मन में तू इधर उधर की बातें आ रही हैं। किसी ने कहा भी है कर में तो माला फेरे जीव, फिरे मुख माय मनु। तो यह तो सरना हाथ में माला घूम रही है और जीव में घूम रही है। हम मन चारों तरफ घूम रहा है। हमने कहा माला से जप करने पर बंधू तुम्हारा मन कितना घूमे? लेकिन सुमेरु को घुमाना पड़ेगा न। जब सुमेरू पढोगे तो भगवान का मन जाएगा तो उतना बहुत 1 व्यक्ति हमारे पास आया था, अभी करीब वर्षों देने लगे। महाराज 100 8 माला की जगह हमने 1000 8 की माला बना दी। तो ठीक है कि नहीं, हम तो बुद्धू हो तुम्हें 1000 8 जब जब कर लोगे तब सुमेरू में भगवान का नाम याद आएगा और 100 8 बार अगर तुम्हारी रहेगी तो 100 8 जब करते ही तुम्हें सुमेरू तो याद आ ही जाएगा। तो यह जो अपने साथ में बताया.
गया है.
100 8 इसलिए अपने गुरु के नाम के पीछे सी सी 100 8 लिख दें। अब कुछ लोगों ने कहा नहीं हम तो 1000 ले तो 100 8 ही पूर्ण है और वो ही अनंत है, उसे कहिए कहिए। 2 तो कहने का भी प्राय है कि गुरु इसलिए भी आवश्यक है कि वो कर्णधार है। भगवान श्री कृष्ण ने कहा है.
की.
नजह माध्यम सुरधम सुरुर भम प्रभम सुकल्पं गुरुकरण धारम मयान कुरेन नभतचेरितमपमानभवब जंग करे। 7 यह मनुष्य शरीर है। मनुष्य के कल्याण के लिए 1 बहुत बड़ा साधन है। देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। भगवान ने इसको सुलभ बना दिया है। ये संसार समुद्र से पार कराने वाला जहाज है। और जहाज में जैसे कर्णधार होता है उसी तरह गुरु कर्णधार, गुरु कर्णधार कर्णधार सतगुरु जनावा दुर्लभ साज तो आप कोई काम अनुचित करने जा रहे हैं। यदि आप के गुरु होंगे तो आपको बता देंगे कि यह काम करना बेटा ठीक नहीं है। इस रास्ते में चला तो रास्ता बताने वाला गुरु चाहिए, को मार्ग से हटाने वाला गुरु चाहिए। ऐसा गुरु नहीं चाहिए जो आपके साथ साथ खेलता, हूँ आपके साथ चौपडा हो और ये जो भी आप कहते हैं करते हैं उसका अनुमोदन करता हूँ कि हाँ बहुत अच्छा, दरिया साहब बहुत अच्छा कर रहे हो। ये गुरु है, गुरु नहीं है जो आपको कुपतहैनिवारसुबंध से चलावा, गुण प्रगटे, गुणन गुरावा कुपद, ऐसे हटाकर सुपंधमेंचलाए आपके गुणों को प्रगट करे और गुणों को दूर करें। ये गुरु का काम होता है। तो 1 तो यह है कि पानी की जान और गुरु करें जान। अब कोई ऐसे गुरु बन गए हैं। आज कल करो.
कि.
कहाँ ने फूंक दिया और कहा किसी से बताना मत और बस इसी के हो और हमें भगवान है और बड़ी मुश्किल वो बता नहीं सकता। और का बता दिया। 1 व्यक्ति आया हमारे पास, फिर ने महाराज हम गुरु बन आये है। हमने पूछा किस को गुरु बनाया का? 1 माता जी थे उनको हमने गुरु बना दिया। हमने कहा कौन सा मंत्र दिया तुमको बोले वो तो किसी को बताएंगे नहीं, हमने सोचा कि इसका कल्याण करना है, थोड़ी अपनी तारीफ कर दे। हमने कहा हम वो तो गुरु है मैं गलत गुरु हूँ मुझे तो बता तो बड़ी मुश्किल से उसने बताया होगा। 1 गुरु बना के आया उसे हमने पूछा भाई तुम को कौन सा मत मिला हो कुहू लोग भी गुरु वेद वाक्य क्या सुनना चाहिए। बोले केवल गुरु के बात करे। गुरु वेद वाक्य वेदानुकूरमगुरुवाक्म सव्य नदवेदपरजकुरम जो वेद के अनुकूल गुरु को बचाने को सुनना चाहिए, बेट के प्रतिकुल नहीं। इसलिए बहुत से लोग जो हमारे शास्रों में गुरु की महिमा बताई गई है, उसको तो पकड़ लेते हैं लेकिन जो गुरु की योग्यता बताई गई है उससे दूर रहते हैं। वैसे गुरु शब्द भगवान के नाम गुकारंधकररकारसतन निरोध का अंधकार, निरोधवानरोधवागर, गुरुर का अंधकार, अज्ञान का अंधकार, रूका, ज्ञान का प्रकाश, जो ज्ञान के प्रकाश, ज्ञान का अंधकार दूर करे। वो गुरु है। तो गुरुता नाम का 1 ग्रंथ है। उसमें तो यह बताया कि गुरु गुरु के जाप से भी मनुष्य का कल्याण होता है। गुरु शब्द का इतना महत्व है। तो हम लोग इसीलिए गुरु पूर्णमा 12 महीने में 1 दिन गुरु का कि भाई। आज गुरु को याद कर लो, उनको प्रणाम कर लो। तो ये व्यास गुर्मा भी तैनात है। अपने सनातन धर्म में सबसे बड़े गुरु ब्याज जी हुए है। ब्याज जी ने 1 वेद के 4 विभाग किए, रेलवे वेद सामवेद अथर्वेद वे था लेकिन जो पद्यात्मक था उसका नाम वर्वेद कर दिया गद्यात्मक को युर्वेद और उसी को जो उगाया गया तो सामवेद और उसी में शांति पोष्टिक जो मंत्र हैं उनको करके कर दिया उनका नाम अथर्वेद। फिर इन वेदों का अर्थ समझ में आये। इसके लिए महाभारत की रचना की, उसके साथ साथ महाभारत के बीच में भगवान श्री कृष्ण का और अर्जुन का संवाद गीता को घोषित कर दिया और 18 पुराणों की रचना कर दी। तो इस तरह से सनातन धर्म का ज्ञान ब्रह्म सूत्र की रचना की जिसमें उपलों का अर्थ बताया गया है। तो वो सबसे बड़े गुरु हुए हैं और उन्हीं के हम लोग सब सवर्ण हैं, ऋणी है। इसलिए आज के दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। और इसीलिए हम लोग जो सन्यासी लोग हैं वो व्यास पूजा करते है। आप लोगो ने मंदिर में देखा होगा कि 1 मंडल गुरु का मंडल बनाया गया, उसमें निबू रखे गए और उनमें पूजन किया गया। जितने भी गुरु हुए हैं प्राचीन उनमें भगवान श्री कृष्ण भी हैं। कृष्ण, बंदी, जगत, गुरु इन सब की पूजा करके जो अपने गुरु की पूजा करेगा वही दूसरों से पूजा लेने का अधिकारी बनेगा। जो अपने गुरु को नहीं मानता तो उसको गौनमानेगाइसलिए अपने हा गुरु की भक्ति इतनी बड़ी मानी गई है। अब ये है कि आज गुरु गुणा है। अब आप लोग यहाँ पर पधारे तो बहुत से लोगों ने पूजन कर दिया और बहुत से लोगों को पूजन का मौका ही नहीं मिला। हम गाड़ी में बैठ रहे हैं। अब को चारों तरफ से है, नहीं तो ठाकर नरीही मार दिया, गुरूजी हो कम से कम वहाँ पहुँच जाए। पूरे ही फेंक दिया। यह नहीं जहाँ बहुत भीड़ हो वहाँ मन ही मन, मन ही गुरु ही प्रणाम है, मन ही मन, ना। गुरु को मन ही मन प्रणाम किया जाता है और वो वहाँ पहुँच जाता है। लेकिन अपने यहाँ यह सब यहाँ अपना मंदिर है। राजराजेश्वरी का। तो हमने देखा कि कभी भीड़ हो जाये तो लोगों को ऊपर से दर्शन करने का मौका मिल जाए। 1 खिड़की हमने बनाई है यहां से भी लोग बैठ के दर्शन करने लेकिन वहाँ के भक्तों ने रुपया फेंकना शुरू किया। हमने सोचा कि भगवती के ऊपर न लग, ज तुम दरवाजा बंद करना.
तो.
ऐसी भक्ति ठीक नहीं है। जब मौका मिले तो आप पास में भी आकर दर्शन कर दीजिये। न मिले तो पाक भगवान, वो भी गुरु है, उनकी पूजा कर रही है और बहुत अनुशासन साथ तुरपुरा हम लोगों को मनाना चाहिए। और हम लोग जहाँ पर जैसा ने सुना यह मास वैसे चातुर्मास से 4 महीने का होता है। तो शास्त्रों में लिखा है कि संन्यासी को 4 महीने 1 जगह रहना चाहिए तो 4 महीना 2 तरह के होते है। 1 वार्षिक मास और दूसरा पाक्षिक मास पक्ष ही मासा, पक्षी ही मास है। तो 4 पक्ष, 4 मास हो गए और 42 मास और अब की 1 मास बढ़ गया। इसको प्रशोत्तम मास कहते हैं। तो वो बातों का वादों 2 हो गए। तो अब वादों का जो शुद्ध पक्ष है उसकी पूर्णमा को छात्र मास की समाप्ति हो गया। तब तक यहाँ पर सत्संग चलेगा, महात्मा लोग आएंगे, उनके प्रवचन होंगे, कलाकार लोग आएंगे अपनी अपनी कला का प्रदर्शन करेंगे और आपको सत्संग का अवसर मिलेगा। सत्संग से सबसे पहला फायदा तो यह है कि उतने समय तक संघ से बचोगे किसके पास बैठे, तुम तो यहाँ आ के बैठ गए और सत्संग में आपको चुप रहना पड़ेगा तो उतनी देर भगभककरनेऐसेबचे, यह बहुत जरूरी है जो संघ से मनुष्य बिगड़ता है। आप देखिये मनुष्य 1 अनुकरण शील प्राणी है। 2 अगर हम गाय के बचड़े को पानी में डाल दे तो वो तैर जाता है, वो डूबता नहीं है लेकिन मनुष्य के बच्चे को डाल दे तो रुक जाएगा तो उसको सिखाना पड़ता है। आसपास के लोगों से उसका व्यक्तित्व बनता है। तो ऐसी स्थिति में आप जिन लोगों के बीच में रहते हैं, जिनकी सेवा करते हैं और जिनको अपना आदर्श बना लेते हैं, आप वैसे हो जाते हैं। इसलिए आवश्यक है कि आप सत्संग में बैठे हैं। अच्छे लोगों के बीच में बैठे 1 व्यक्ति को स्वर से ढकेला गया तो उसने गिरते गिरते का सत पुरुष, सत पुरुषों के बीच में मैं गुरू अच्छे लोगों के बीच में गंगा तो मेरी बुद्धि श्रद्ध रहेगी वो मेरे कल्याण का साधन होगा तो ये आपको सब कुछ मिलेगा। तो इस समय दुपुलवा में आप सब लोग यहाँ पढ़ा रहे हैं। सबकी श्रद्धा को देखते हुए हम लोगों के लिए बताया गया है की स्टाक नमस्का समित नारायण नाम ग्रंथ प्रणाम पाप नम नारायण नाम के स्ट्राक मंत्र से इसी को नमस्कार करे और उसके उत्तर नारायण तो प्राणी के पाप पंजर का नाश कर देते हैं सो नारायण ने स्मरण करके हमारा आशीर्वाद आप लोग ग्रहण करें हीराम जेराम जज रा.
रा गेरा.
जैज राशी राम जै राम जग राम रा जे राम जरा धर्म की अधर्म का प्राणियों में विश्व क गो माता की गो हत्या हर हर मजे।
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