Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 46

This chunk is a Hindi lecture by Swami Swaroopananda on the Mandukya Upanishad focusing on the third prakarana: defending scriptural (agama) claims about Atman/Brahman against purely logical (tarka) objections. The speaker discusses types of upasana (worship/meditation), critiques the view that Brahman was born into the world and can be attained by worshipping manifest deities or photos, cites Bhagavad Gita and Mahabharata examples, and argues that Brahman is unborn, immutable, and the sole seer (drshta).
Chapters
ओम, शांति, शांति, शांति, बहत्त प्रकरण पूर्ण हुआ। 4 प्रकरण है परी आगम प्रकरण दूसरा, वह आगम सिद्धांत की बात कहेगी। उसकी पुष्टि के लिए जो अध्य विरुद्ध आपत्तियाँ हैं, उनका निराकरण भगरणमेंकहलिए। अजित सिद्धि के लिए, अधित को स्पष्ट करने के लिए। यह परगंडशुरूहोताओम जा। ते ragit, आत्मा ऐसी प्चिजञामातीण, पहले आगम प्रगण की बात कहीं। आगमपरणमें ओंकार का निर्णय किया, क्या? कहकर, atma, प्रतिज्ञा मा से कह, gate और गाते ओंकार के विदित हो जाने पर दहितनहींरहतायेभी कह दिया। देवता भाव तो बईतच्छप्रकड़ने बत्प्रडनेदईताभाव, स्वप्न माया, गंधर्व नगर, आज, दिस्टांदईदिष्टां से बेट का अभाव, प्रकरण के द्वारा दिष्टांकौनसा, स्वप्न, माया और गंधर्मनगर इतयालीtantoकेदवra इस तरह कहते हैं केवल आगरा अगर मात्र से, तर्क से भी तर्क से जाए तो ठीक है, क्यों करते हैं, बात से उपलब्ध हो जाती है। और दोनों को कर दिया आपने। आगम का प्रण भी हो गया और बैठक प्रकरण भी हो गया। प्र प्रारंभ किया जा रहा सर्व परमार्थ चुत अतिथि ये बताया कि उपास रूप, उपासपसासरवमितम, उपास, जिसकी उपासना की जाती है वो उपास है। और जो किया है वो पास ना ही सब भेद है। हम उपासना कर रहे है तो जिसकी उपासना कर रहे हैं वो हमसे मिलने। a, a, e, a, a, e, a kevlasaatmankevr, der, esुधारनबल, i तो केवल जहातmaहै व अजय परमार्थ है। कम, a, a, sa, a, a, obs, उपा, सुना, शीता, उबा, सुना, उपा, सुनो, नो, मुख, सारण तथा उपासना के आशिक उपासना करें। उपासना उपासना से 2 धर्मों, जाते ब्रह्मणी, बरतते 3 गता कहते हैं उपासना है आत्मा के मुख्य साधन के रूप में प्राप्त था। यही हो a, o जाती ब्रह्मणी, दानी वर्तमान, वर्तमान जमधमअजमिधमसमहंचा। तो कहते हैं कि उपासना करके जाते ब्रह्मणी, कितव जाते ब्रह्मणी, दानी, वर्तमान, अजम ब्रह्म जात ब्रह्म में इस समय मैं वर्तमान हूँ और शरीर पात से शरीर पात के बाद उनको प्राप्त करूँगा। jati ke तर्क वस्टर मेन दे बैतररूपनापबलसमाप्त, तर्क के बल पर बैठ के बैतरा समाप्त करके अधतमआरकमअभतर्कत संभावित अधिक है, वो आर्थिक है। वो तर्कता संभावित प्रगराम तुम आर्थिक, आर्थिक है। पर आर्थिक, आर्थिक तो बन जाएगा। जब लेट नहीं है तो स्वभाव से बीच है का खंडन कर दिया तो अपने आप ले जाएगा आर्थिक। लेकिन ये मैं हर जगर नहीं रहा है। तर्कता, आर्थिक, मी जाएगा rti तो पहले आर्थिक हो गया, युक्ति से भी उसका प्रादन करते हैं। पहले तो आर्थिक संकेत सी से जुड़ा, अब तर्क से भी स्कूल हो गया। तो पहले भेज की दृष्टि को सुधारना धर्मों देह का, धारण करने का, धर्म का मतलब है जीव, उपासक, उपासना 2 धर्मों धर्म का मतलब जीव किया है। जिस सुधारना धर्मों जीवों भूत संघ का कारण भूत संघात के आकार से जाते हो गया। और गमकते नोट क्यों है, पूछा जा दी, दी जाती, गुम्मनीकीउपाजकी, जाते, बहमनी, जाते। ब्रह्मणी का जो ब्रह्म जगत के रूप में परिणत हो गया है, वो जात उपासना। 2 धर्मों धर्म का अर्थ है यहां पर जीव वो जीव जो है उपासना जातीय ब्रह्मणि, वर्त थे जात ब्रह्म में उपासना क्या हो गया है। जात माने जगत के रूप में परिणित। तो वो ये समझ कर कि जब हम जगत में ब्रह्म दृष्टि करेंगे तो मरने के पश्चात हम ब्रह्म को प्राप्त हो जाएंगे। ऐसा कुडी? अगर समझता है। तो भूत संघाता कारण जाते ब्रह्मण थे, जे के कृपण ब्रह्म। तो यहाँ यह क्या कर रहा है? धर्म की राग, जगत पी के पहले सब कुछ अजन्मा अजन्म था। ये इसका मतलब ये है कि वो ये मान रहा है की जगत की उत्पत्ति के पहले तो सब बरी था, अब ये जगत उत्पन हो गई। तो हम अब उसकी पास करेंगे। तो मरने के पश्चात हमको ब्रम प्राप्ति हो जाए। तो कहते हैं यह इसकी जो दृष्टि है। इस दृष्टि में ब्रह्म को काला बच्चन मान रहा है, काला बच्चन मान रहा है कि पहले था, जात हो गया, जनम अजनमा था, अब जन्म दे दिया। अभी जगह जिसकी उपासना हम कर रहे हैं, वो पहले अजनमा था, अब जन्मा हो गया। तो अब हम उसकी उपासना करेंगे। तो मरने के बाद हम जन्म रहित हो जाएंगे। यही तो जो अपने लोग और भी उपासना करते हैं, राम की, कृष्ण की, शिव की, ये जो ओपासना करते हैं तो हम ये सोचते हैं कि पहले ये निराकार भ्रम थे, अब साकार हो गए है। और इनकी ओपासनाहमकरेंगे तो निराकार भ्रम को प्राप्त हो जाएगा, ऐसा सोचते हैं। पहले निराकार थे, पहले से, अब जन्म ले लिया। तो अब जन्म दे दे दिया। इनके पास न करेंगे तो हम अजन्मा हो जाएंगे। यह दृष्टि है, ठीक नहीं है। क्योंकि आप यह मान रहे हैं कि पहले वो अजन्मा थे, अब जन्म बनने वाले हो गए। वस्तुत भगवत गीता की दृष्टि से देखा जाए तो भगवान अपने अवतार का वर्णन करते हैं। अजूपसननब्बेआत्मा भूता नाम सवरुपिशनसवमझय संभवा आत्म मायया by sarayu हूँ। अब आत्मा अविनाशी हूँ और बूता नाम ईश्वर समस्त। जगत का स्वामी। तो जो है, अव्य है, और जगत का ईश्वर है, उसका जन्म नहीं हो सकता। क्योंकि अजन्मा और जन्म दोनों पड़ोस पर विरुद्ध है। जन्मा का जन्म कैसे होगा? अगर ये कहा जाए कि पहले मर गया था, अब इस भी उसका जन्म होगा। तो अब वे आत्मा कभी नहीं। क्योंकि जाता मृत्यु में जो उत्पन्न होगा, उसकी मृत्यु होगी, और की मृत्यु होगी, उसका जन्म होगा। तो अगर पहले न रहा हो तो ये उत्पन्न हो सकता है। अव्यय है। तो इसलिए दोनो स्थाओं में जन्म संभव नहीं है। और यदि ये जीव हो, मैं जीव हूँ तो जीव को ईश्वर के परतंत्र होकर कर्म। फल भोगने के लिए जन्म लेना पड़ता है। तो भूताना समस्त जगत का मैं स्वामी हूँ। मुझे जन्म लेने के लिए कौन बात कर सकता है? तब भी प्रकृति साम, साम, सच्चिदा, स्वरुप भूत मेरी जो सच्चिदा स्वरुप sc में, शचितसवरूपहूसमभभाव में आत्मा माया, अपनी माया से अवतार लेता, किसी को जन्म माने, किसी को जन्म माना। तो जो वस्तु की नहीं मिलती तो आपने उसी को जन्म मान ले। ऐसा है कि ये आप बताइए कि आप परिणाम बात मान रहे हैं, कि विपत बात मान रहे हैं। तो वित का मतलब है, अविकृत परिणाम है, उसका नाम विवर्त होता है। वस्तु बिना विकृत हु हुए ही दूसरे रूपों में प्रतीत हो जाए। तो कहाँ जन्म है? तो बताओ देवकी के उदर से, बिना उत्पन्न किए हुए ही आप भागवत की कथा सुना रहे हैं। देवकी को उधर, पीडा हुई, क्या, पुष्कर जैसे प्राची दिशा से पूर्ण चंद्रमा का उदय होता है। इस तरह भगवान आबिराखीआविरभूत हो गए, चतुरभुज चतुरभरूपमेृतान सुना के। फिर देवकी के अनुरोध से बालक बन जाते। तो अगर वो उत्पन्न हो गए होते तो फिर बालक कैसे बन सकते थे? उस पर रूप में रहते। तो कहना होगा? कि बिना कुछ हुए उन्होंने अपनी माया, अपने को हुआ दिखा तो माँ। आगे भगवान ने कहा है कि जो मूल है मानसी, वजन मेरी अवज्ञा करते हैं। परम भाव जान मेरे। परम भाव को नहीं जानते कि मैं अव्य हूँ। अनुत्तम और दूसरी जगह आप देखिये, योग का वर्णन करते है। तो वो कहते हैं बृष्लीनामलासुदेव, bad, i, o, nam, s विष्व में उत्पन्न हुए है। बुआ के लड़के है। तो क्यूँ कह रहा है? जो जो विष्णु में बासदेव के रूप में दिखाई पड़ रहा है, वो कोई और है? और जा के रूप में दिखाई पड़ता है, वो कोई और है। वो नाम बिशु बिशनु में वासुदेव वास्तव में नहीं है। विष्णु वासुदेव उसकी विभूति है। जिसकी ये विभूति है, वो जन्मा है। लेकिन जो सामान्य लोग हैं, भगवान को जन्मा मान लेते हैं, जन्म लेने वाला मान लेते हैं। यहाँ पर ये सगुण उपासना का प्रसंग नहीं है। तथा यह बता रहे हैं कि पहले जन्मा था प्रावि, अब इस समय जन्म ले लिया है। तो जगत के रूप में परिणत हो गया है। तो हम उपासना करके फिर जन्म को प्राप्त कर ले। देना। इसलिए ये कृमणकहलाह कृपण क्या है। परमात्मा के स्वरूप को जानना यही कृपण है रही कि स कृपणा ये गार्गी स अक्षर को बिना जाने मर जाता है? वो कृपण है? तो यहाँ पर भगवान के स्वरूप को यथावत न जानना ही कृपाण है? ठीक है तो यहाँ भी इजाद नहीं जाना। तुमने उसको मिलने वाला मान रहे हो, जगत के रूप में परिणत हो रहे हो ना। अब इसी से भगवत गीता के कारपरनिदोषकाअर्थ लग जाएगा करपरनिधोषअथात। परमात्मा के स्वरूप को, आत्मा के स्वरूप को न जानने के कारण मैं ये मान बैठा हूँ कि ये सामने वाले मरेंगे या मैं मरुँगा। ये है कार्बन लो उपासना। पुरुष उपासना को पुरुष के साधन रूप से आशित होकर तदेव ब्रह्मा। परपद जो पहले था, उसको हम प्राप्त कर लेंगे। शरीर mitयाgञnवaneमitया जञानवान लेना कार है। ब्रह्म विधताओं में अल्पक माना जाएगा। प्रकरांतर अवतार अनुजतीअबप्रकंतर बनाने के लिए पहली वृत का अनुवाद करते हैं। अनुजाजअनुवादहोना कार थी अनुदान। in a ओंकार के निर्णय में प्रथम प्रखंड में ब्रह्म को प्रो से औद्योगित इन विशेषणों से आत्मा का प्रतिज्ञा मात्र से आत्मा की अत्तिका का व्याखान किया। दतिया प्रणाम दितीय प्रार को संक्षेप में बताते हैं। ज्ञात ज्ञांती में ज्ञात होने पर जीत नहीं रहता है। यह प्रतिज्ञा बात से भाव कहा था? सर। हेतु दूसरे। उसका पृपादनकरदियापाद बोले जब भूल गया तो फिर और पृत्पादनकरने के लिए कुछ रहा, नहीं तो तिया प्रगणक आकांक्षा पूर्वक, तो यहाँ आकांक्षा पूर्वक तृतीय प्रगण की क्या आवश्यकता है? ये बता रहे हैं कि स्वतंत्र तरका, आगमिक तरकस, सरकार संभावना हिदुत्व तरेरा व्यवहार। तो a प्रारंभ कर रहे है। केवल केवल चात् य हो गया। स्वतंत्र तरके ना। तो कहते हैं परमात्मा को प्राप्त करने के लिए स्वतंत्र तर्क से काम नी बनाई। नशा तरकेणमतिराबनेया जो आत्म विषयामtiहैतर्केण नापना तर्क से प्राप्त नहीं की जा। 1 अर्थ तो यह है। और दूसरा है इशा मति जो सूची के द्वारा मति इसको तर्क से नहीं करना चाहिए, इसका अपनयन नहीं करना चाहते। तो पहला अर्थ है तर्क, ऐशामतिनाबनेया तर्क से परमात्मा को नहीं जान सकते। तर्क प्रतिष्ठा, ना तर्क की कोई प्रतिष्ठा नहीं है। यतने नाम में तो पर था कुशल अभियुक्त तरह अन्यथा प्रयत्न करने पर भी किसी तार्किक ने अनुमान किया यह वस्तु ऐसी पर, उससे भी बड़ा तार्किक कोई मिल जाए। तो वो उसको भी खंडित कर देता। तो ये है करके ना पी था। अभियुक्त तरह अन्यथा उदनाचारी कहते हैं मैं किसी भी पक्ष का पथ के रास्ते जरूर जाअपथकेनईतररुधी। पराधीन वृत्ति कहते हैं जो सूर्य है, दिशा के बड़ा धन नहीं होता है, जिधर से सूरज निकलता है, वो पूरे देश वनीजातीमैंअजिधर खड़ा हो जाऊंगा, वो पक्ष से ही बह जाएगा। भगवान तक को ललकार दिया। उदारणजारीके बारे में, कहते हैं कि वो भगवान जगनाथ के दर्शन करने के लिए पुरी गए। तो जब पहले क्रम क्रम सुझाते थे लोग, तो जब समीप आ गया, पूरी पूरी का समीप आ गया, संकल्प कर लिया कि अब हम दर्शन करके ही पानी पिएंगे। अब जब चलते चलते विलंब हो गया, 12 बज गए, 12 बजने के बाद पट बंद हो जाते है। पहुंचे तो पटबंददर्शनीहोगा। तो भगवान क्यों पर नाराज हो गए। ईश्वरीय ईश्वर के मन में हो रहे हो, मेरी अवज्ञा कर के किवाड़ बंद कर दिया। और ईश्वर नहीं है। तो मैं कहता है किवाड खुल गया। तो ये तर्क की कोई तर्क पूर्व तर्कवतकेअनुमार लग जाएगा। 1 लेख हमको किसी ने बताया। 1 बहुत अच्छे लेखक हो गए हैं। उनका लेख था राधा का विकास। पहले राधा के बारे में क्या धारणा थी, क्या धारणा थी और क्या आधारना हुई समय में क्या धारणा हुई? और कृष्ण के सम्बन्ध में भी। इसी तरह तो वो लेख है। पढ़ाया जाता था। तो वे प्रोफेसर थे। वो लेख हमको दिखाने आये। हमने उसको देखा तो उस लेख में हमने देखा कि उसके पहले आने को मत थे। और उन्होंने लिखा था कि यह मत ठीक नहीं है। 11 बाग में पहले मत को उन्होंने काट दिया था। हमने कहा कि तुम्हारा जो मच है और कोई उसको काट दे तो क्या होगा? हमारी जो उपासना है, जो हम राधा कृष्ण को अनाज अनंत मानते हैं और उनकी आराधना करे। तो हमारी बात सुन के, तो हमारे मन में हमारी उपासना तो खत्म हो ही जाएगा। वो बोले हमारे घर में भी उपासना। हम ऐसे करते हैं, भगवान को रिती मानते हैं, राधा को भी मानते हैं। पढने पढाने में ही करते है। तो ये तर्क जो है, स्थायी नहीं है। इसलिए कहते हैं कि भई सूची के अनुगुल सुचमतरोनुसंधी जो सुचि के द्वारा सूची के अनुकूल कर। सूची जो है। वो समझ लीजिये कि सुप्रीम कोर्ट की निजी, उसके बाद खत्म आप को तर्क करना हो। तो उसी के अनुकूल कीजिये तो वो क्या जरूरत क्या है। उसकी संभावना के लिए बात संभावित होती है। तब उसमें वो हमारी बुद्धि में उतरती है। जैसे सती ने कहा, वो तुझे तब तमसीसुतरीनेकह दिया, लेकिन हमारे मन में संभावना आ गई। कहाँ? सर्वश्र कहा? जी हाँ व्यापक कहा परी जी क्या परस्पर बैश में सूची ने 1 बात तो ठीक होगी, लेकिन हम उसको समझे कैसे? तो फिर उसके अनुसार तर्क कि भाई जो निर्पाधिक वस्तु है, उसकी 1 सूची बोल रही है। पपाजी का त्याग कर के जित को समझा। तो इसको कहते हैं अनुकूल तर्क। तो उस अद्ययित को अनुकूल तर्क से भी समझा जा सकता है। शुचि के अनुकूल तरस। इसलिए इस तीसरे प्रकरण को अद्ययित सिद्धि के लिए प्रारंभ करते हैं। e, e, e स्पष्ट हो जाएगा। पास को। हम कहते हैं कि प्राप्त कहा? मारनेवाला उपासना के आर उपासना के आश्रित हो गया। उपासकों में उपासक हूँ पास ब्र सभी जाति ब्रह्माणी उसकी उपासना करके इस समय मैं जात। ब्रह्म में वर्तमान हूँ को शरीर पात के पश्चात lunga शर्म उत्पति नही है। इस समय में उत्पन हो गया हूँ। ब्रह्मण माना ही बर्थ उपासना या उपासना के द्वारा। फिर उसी को प्राप्त कर लूँगा। उपासना धर्म, साधक, उपासना धर्म। a a a in its yaoi कार व वाणी सही नहीं है, बेहतर है। भाई भी कभी रहा नहीं, कार्य करना है। अपने आत्मा को। उस तरह से जानने में असमर्थ होने के कारण अविद्या अविद्या से अपने आप को दी मान कर। यहां तो जाती ब्रह्म में उत्पन्न हू और उत्पन में रहता हूँ। कपास ना होकर ब्रह्म को प्राप्त करूँगा। ऐसा जानने वाला बुचबननाअच्छा का हो गया। a a, a a अब ठीक है। कहते हैं तर्क से को संभावित किया जा सकता है। तो उपासक की निंदा क्यों कर रहे? उक्त वक्ष मान विरोध वा, उपासक, निदा, उक्त वक्षमाणविरोधित रोधी भावा वो बोले कि। इसलिए उसकी निंदा करे हैं कि ब्रह्म को ha de ha ti उपासक उपासना प्रकृति ने, ये जो उपासक की निंदा कर रहे हैं, वो इसलिए कर रहे हैं कि यह मानता है कि ब्रह्म का जगत के रूप में परिणाम स हो गया, सत्य मान रहा है। यह परिणाम ब्रह्म उत्पन्न हो गया है, ऐसा मान रहा है। तो अगर हम परिणाम को सत्य मान लेंगे तो अद्वहसिदधनहीं होगा। इसलिए उसकी निंदा प्रकृति का उपयो t ha sarita अद्वेत की अद्वेत की प्रशंसा में आवश्यक है। अद्वेत की सिद्धि की सहयोगी है द्रेज की निंदा। तो इसमें शल्य का उदाहरण ले लिया। कहते हैं कि जब हते भीष में थे तथा कर ने बलवती पांडवा कर्मों की कर्मों के पहले सेनापति भी में भीष्म के उपरत हो जाने के बात, कर्ण बने, करण के न रहने के बात जोड़ना चाहिए। सेनापति बनाए गए, वो भी जब नहीं रहे तो सेनापति किस को बनाया जाए तो निश्चय हुआ। गोरों की तरफ से ये जो शल्य हैं, शल्य नाम के राजा हैं, वो बड़े विद्वान है। और वो लड़ सकते हैं। तो शल्य जो है ये माली के भाई थे, माली के भाई थे और न कोई सहरे मामा थे के मामा थे। तो वो चले पांडवों की ओर से युद्ध करने। दुर्योधन को पता लग गया कि पाडों से युद्ध करने के लिए वो आ रहे हैं। तो उसने जगह जगह कैंप लगा दिए और भोजन का, विश्राम का सारा प्रबंध से साहित कर दिए। जहां सलगा वहाँ उनके भोजन का प्रबंध है, ठहरने का प्रबंध, सब कुछ। व्यस्त तो समझते थे कि ये हमारी भांजी कर रहे हैं। तो उनका स्वागत रतिलजबअतिपड़ाव आया, दुर्योधन हाथ जोड़े खड़ा हो गया, मामाजी ये हमने किया, इसलिए आपको हमारी तरफ से लड़ना पड़ेगा। तो नमक खा लिया था। तो पहले की जिसका नमक खा लेते थे, उस का नमक खराब नहीं होते। आजकल के लोग तो हो जाते हैं। तो उन्होंने कहा भाई ठीक है, तुम्हारी तरफ ही लड़ेंगे। तो सर है। वो कौरवों की तरफ से युद्ध कर रहे थे, उनको सेनापति बनाने के। जब कहा गया तो उन्होंने कहा भाई हां भूल गया हूँ। तो सर है। कौरवों की तरफ से युद्ध करने लगा। तो अब हुआ कि कर्ण को सेनापति बनाया गया, यह बात कह रही है। तो करण ने कहा कि अर्जुन और हम बराबर के है, लेकिन हमारा जो सारथी है वैसा नहीं है, अर्जुन का सारथी कृष्ण है, उसके मुकाबले हमको कोई सार्थी मिल जाए। तो हम अर्जुन से अच्छी तरह से युद्ध करके उसको पराजित कर देंगे। तो लोन का सार कर्म जो है सर अच्छा जानते हैं। तो सर से अनुरोध किया गया कि आप कर्म के सारथी बन जाइए, बोले भाई हम जा और ये सुपुत हम उसके सारथी बने, बोले हमारा अनुरोध है, दुरुधननेकहाकआप बन ही जाओ। वो बोले भाई बात यह है कि हमारा जो मुह है, वो बंद नहीं होगा, हम कुछ भी कहते रहें, अगर क्षमा करे? तो हम इसके साथी बन जाएंगे। तो करण ने वचन दिया कि ठीक हम जमा करेंगे। तो अब जब अर्जुन बाण मारे तो बचा लेता था। कर्ण बोले अब मैं देखता हूँ कैसे मेरे बाण से अर्जुन बचता है। सूत तू कहीं कुंती अर्जुन की बराबरी कर सकता है तेरा प्यार। तो ऐसा कह देने से उसका तेज का हो जाता था। तो उसके बाद में आवेश आता था, वो कम हो जाता था। तो इस तरह से करता था। या। तो कहते हैं जैसे करण की निंदा की निंदा करके पांडवों का पक्ष लिया, उसी तरह से दैट की निंदा कर के हम अब त की सिद्धि कर रहे हैं। है धमतरी था। तो वो ये कहता है कि भाई सूची। तो साफ साफ कहती है कि ये tma अब नहीं ब्रागववस्थाब्रह्मा, मिर्चिया कहते हैं ये ब्रागवयवस्थामें जो है, ये ब्रागववस्था का वर्णन कर रही है। वर्तमान में। तो उजत हो गया है। कार्य स्थित वस्थाम। यदि ब्रह्म को उपासना, अगर कार्य की अवस्था में वैसे ही है, तो उपासना से क्या है? जात हो गया जाती ब्रह्मणी। वर्तमान उल्शीअवस्था में वर्तमान हूँ मैं उपासना के द्वारा, वस्था में, उपासना के द्वारा, फिर भी हो जाऊंगा। ttकtुयattctuबात है vice विषय का तो जैसा निश्चय होता है मनुष्य का, अंत तक उसके अनुसार ही उसका जन्म हो जाता है। सती गीता में भी लिखा है यमियमवापिसमरणभावम जज से कर्वर। तब तमेवैतीकौनसे सदा तद्भाव भाविता जिस जिस भाव का स्मरण करता हुआ प्राणी अपने कलेवर अर्थात शरीर का 4 करता है, उस भाव उस भाव से भावित होकर उसी उसी को प्राप्त हो जाता है। सदा भाव भाव था इसलिए पुरंजन पुरंजनी का ध्यान करते करते करते करते मरा तो दूसरे जन्म में विदर्भकन्या हो गया और भारत मृग का ध्यान करते हुए मरा तो दूसरे जन्म में मृग हो गया। तो मरते समय जो होती है वही गति हो जाती है। अंधकार या मति सा गतिर्भवेत। अंतकाल में जैसी मति होती है वैसी गच्ची हो जाती है। जो मुर्गा मारते हैं तो मरते समय मुर्गी की याद आएगी, उनको तो मुर्गी होंगे और फिर काटे जायेंगे। शिकारी जो है शिकारी लोग शिकार का ध्यान करते हैं, मुर्गों का जिनको मारना है तो वो उनको वो याद आएगी। मरते समय तो वो उसी योनी में चले जाएं। तो वो ये सोचता है उपासक कि हम पहले आज ब्रह्म के रूप में जन्म ले लिया और हम जीव के रूप में आ गए। अब हम मुर्गी उपासना करेंगे आज रूप में का हो जायेगा। तो हम भी सिटी के पहले की अवस्था में पहुंच जाएंगे, हमारा नहीं होगा ऐसा वो ये बात है ना। तो बोले कि ये कृपण क्यों कहा गया? क्योंकि ये उपाय मान रहा है ब्रह्म को ब्रह्म जिसका इनता उपासना जिसकी होती है वो ब्रह्म नहीं है, नतया उपासना कर रहा है। इसलिए यह ब्रह्मदर्शी इधन तया हो गया, यह ब्रह्मदर्शि नहीं हो सकता, इधंतयाउपासना जो है ब्रह्म का ज्ञान इदंता होही नहीं सकता। अगर आप अपने से भिन्न रूप से ब्रह्म को जानना चाहेंगे तो ब्रह्म दृश्य हो जाएगा जिस होने के कारण जड़ हो जाएगा। दृष्टा 1 ही रहता है। द्रष्टा 2 नहीं होते। तो वो द्रष्टा कौन है? ब्रह्मा जी तुम हो, ब्रह्म देखता है तो ब्रह्म है। तुम्हे कैसे दिखेगा? तुम तो हो गए, का होगा, होगा ही नहीं। हमको यह कहना है की देश होता है, है, दर्शन का विषय है, गुजर होगा, दृष्टा मुँह है, चेतन है। तो वो अगर चेतन है। तो तुम चेतन हो गया। तुम ब्रह्म को कैसे जानोगे। इसलिए 1 प्रश्न आता है कु? दृष्टा यू मन साक्षी। हाँ कुदश्टायूमनससाक्षी पूछा गया कि दृष्टा कौन है जो मन का साक्षी है मन को जानने वाला साक्षी तो उसने मन में मेरा मन है, मेरे द्वारा देखा जाता है। तरवीबरह्मनासीइसलिए तूही ब्रह्म है, दूसरा कोई दस्ता नहीं है, सर्व मुख् ेधादष्टारसीतरम सबका दृष्टा 1 है और तू mukta यही तेरा वर्नन है कि तू दूसरे को दृष्टा मानता है। तो इस तरह से आत्मा को दशमाना। he हम पास उपासते स्वरूप का निर्धारण बहुत जरूरी है इसलिए हम लोग जो उपासना करते हैं वो जो पास है उसमें ब्रह्म बुद्धि रखते हैं। चाहे गणपति जी की करें, का, शो की करें, विष्णु की करें, सबको यही मान हैं कि वो ब्रह्म है, इतर रूप से उपासना नहीं होती। और यह नहीं है कि वो पहले से नहीं है। इस समय भी वही है, इसी रूप में उपासना होती है। पर जब ब्रह्म उपासना, कल किसी ने हमसे पूछा, वो हम सेरी साईं बाबा कहां गए थे? वहाँ बड़ा भारी महात्म है उनका, और जगह जगह उनकी फोटो लगी है। हमने का। ये बताओ सेठ जी के साईं बाबा को थे। जो मुसलमान होते हैं, वो कब्र में गाड़ दिए जाते हैं। अब वो कर कब्र में गाड़ दिए गए। अब वो कब उठेंगे? उनके धर्म के अनुसार जब कयामत का दिन आएगा पढ़ रहे, तब कब्रों में से रूहें निकालेंगे। तो हमने ये कहा कि ये बताओ, वो तो तब निकलेंगे जब कयामत का समय आयेगा। और तुम जब भगवान के मरने के बाद यमराज के जाओगे, तुम्हे तो कब्र में सोया हुआ है। तुम्हे बचाने कब आयेगा? वो वो दिन उठेगा भैया। तुम तो मरने हो जाओगे। तो हाँ, तुम्हारी रक्षा को नहीं कर पाएगा। जो सदा जागृत है, जो कभी नहीं सोता है, वो परमात्मा तुम्हारी रक्षा करेगा, उसकी उपासना करो और उसकी फोटो अपने घर में लगाओ, फालतू आज को मत लगाओ और लगा दिया हो। तो फेंको। तो ये सिद्धांत है। या उनके सिद्धांत के अनुसार यह है कि 1 कयामत का दिन आएगा, खुदा ने सीटी जीव, जगत सब उन्होंने उत्पन्न किया। 1 दिन ऐसा आयेगा, जब कयामत आएगी तो जितने भी जीव हैं, जितने भी प्राणी है, मनुष्य हैं, उनको कब्र में दफना दिया जाएगा, वो उनकी लाश कबर में पडी रहेगी। जब कयामत का दिन आएगा तो खबरों में शुरू ही निकलेगी। इसलिए डरने से वो डरते हैं, जल जाएंगी तो रहे, कहाँ कहाँ रहेगी, शरीर गला रहेगा, तो से रूह रहेगी, पड़े हैं। जब कयामत का दिन आएगा तो कमरों में से रूह निकालेंगे, वो रूह खुदा के सामने पेश हो। और जिसकी सिफारिश मोहम्मद साफ करेंगे कि इसका ईमान मुसल्लम था, उसको जन्नत मिलेगी। और जिसने वो नहीं किया है, तो उसको हम हमेशा के लिए रोजा की आग में झोंक दिया जाएगा। मुसलमानों आगवत का ख्याल रखो, काम जाती है। चारों जाएगा। तब समझ लो यह है कि कब हमारी रूह उठेगी, वो कब हमारी रक्षा कोई करेगा? यह तो सीधी बात है कि भगवान सर्वत्र है, सर्व व्यापी है, उनका नाम है। हम मरते समय उनका नाम ही लेने। तो वो नाम हमारी रक्षा करेगा, नाम रुलीला धाम ये अपना सिद्धार्थ तो मरते। समय जिस भाव से मनुष्य भगवान का स्मरण करता है, तो ऐसे लोगो में ब्रम् भाव नहीं हो सकता। हम अपने गुरु को भी ब्रह्म मानते हैं। ये लिखा है यसदेवपरवक्तिथायथा देवी। तथा गुरु। तो गुरु को मनुष्य नहीं मानते। नंबर को नंबर नंबर सुन था, मामी। ये है तेरा। और यह लिखा है कि गुरु को मनुष्य बुद्धि रखने वाला कहते हैं। श्रीमद भागवत में 1 श्लोक है। यह साक्षात भगवती ज्ञान, दीप प्रदे गौरव मर्चयासधीसुतं मनने कुंजल शशवत। जिसकी साक्ष भगवान, ज्ञान, दीप करने देने वाले, ज्ञान दीप देने वाले, गुरु में मनुष्य बुद्धि है, उनका जितना भी शुद्ध है। मन्ने कुंजल सत। जैसे हाथी स्नान होता है, हाथी को खूब स्नान करा फिर वो उठा के धूल अपने सिर पर डाल देता है। है तो गुरु की भी उपासना मर्त्ववृद्धि से नहीं की जाती। ब्रह्मा आनंदम बरहम, सुगधमकेबरमगानमूरत धंदा, कम नित्यं बमरमचरमसर्वधीसाि, भूत भावा आतितगुणहिसदगुरुम धन्यवाद। तो हम लोग मूर्ति पूजा नहीं करते, मूर्ति को आलंबन बनाकर जो अमूर्त हैं, उसकी पूजा करते हैं तो ये सिद्धांत हैं, लेकिन जो दोइतबाजी हैं वो इस ो नहीं समझते हैं। इसलिए वो कृमणहैओमबदरमगणे satna visvedasaroenami ओम शांति शांति शांति।
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पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने #अयोध्या_मामले को लेकर पहली प्रतिक्रिया दी #सुप्रीम_कोर्ट का आदेश सुनन

