Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad-5.mp4

A Hindi lecture (with Sanskrit mantras) by Swami Swaroopananda Saraswatī on the Mandukya Upanishad themes: the true nature of the self (ātman) as eternal, pure, and ever-free; the role of ignorance (avidyā) as a disease masking that true nature; how jñāna (knowledge) — not ritualistic or devotional practices alone — removes that ignorance to reveal innate liberation. The talk contrasts empirical/temporary results of action (karma) and devotional practices with the permanent release produced by knowledge, uses multiple analogies (sick person regaining health, snake/rope illusion, shepherd/lion story) and discusses prārabdha (ripe past karma) that even a jñānī must exhaust.
Chapters
ये तुष्ट्रवागुम् सत्तनुभिर् बशेम देवेतं यदायुः। सत्तिन इंद्रुविद्धस्त्रवाः। सत्तिन पूखाविष्वविदाः। सत्तिन तारक्षुवरिष्टनेमिं। सत्तिनुभिष्पतिद्धरातु। ओम् शान्ति शान्ति शान्ति।.
रोगार्तः.
सिवं यतो दिख्विर्ष्यान्तान् रोगात् आत्मनान् सत्थः समुत्खातनिकि दुख्खस्य किमनस्तत्प्रविणमित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्तित्ति सच्चता स्वरुपान प्रच्चति उपा स्वरुप भूतैव प्रागपी सति रोगप्रतिबन्धा असतियो स्थिता चिकिस्था सास्तियो प्रयोगवशात प्रतिबन्ध भूत रोगाप घमे सति अरिव्यज्यते यो गया तो बोलें जैसे कोई देवदत है जो रादी के रोग से उसकी स्वस्थता अभिभूत हो गई है अत्तव स्वरूप से अप्प्रच्चित रूपा उसकी स्वस्थता है स्वरूप से अप्प्रच्चित रूपा जो स्वस्थता है स्वस्थता और स्वरूप भूता ही है पहले स तो वो थी तो पहली से, लेकर असतीव स्थिता न होने के मरामर हो गई। तो चीकिस्ता साथ के द्वारा बताए गई उपायों के प्रियोग से, जब परिजबंद भूता जो अवस्था है, वो नूर हो गई, वो अपगम हो गया उसका, तो अभिव्यज़त हैं। स्वस्यता उसकी अभिव्यक्त हो जाते हैं। नहीं तत्तो पाय वयाई अर्थ्यम् प्रदिबन्द विद्धोन्सा सत्त्वात् यहां यह बता रहे हैं। शंका यह थी कि आत्मा जगी सुद्ध है नित्य सुद्ध बुद्ध मुक्तर सुभाव है तो यह जो आप सास्त्र का व्याक्यान करने जा रहे हैं इसलिए कर रहे हैं ज्यान के लिए कर रहे हैं इस से ज्यान होगा ज्यान से मोक्ष होगा तो प्रश्न यह आता है कि ज्यान से जो मोक्ष होगा वो मोक्ष जन्य होगा ज्यान से उत्पण हुआ तो अगर वो जन है तो उसका विनाश भी हो जाएगा। जोभी वस्तु जन होती हैं, वो इस्थाई नहीं होती, आनित होती है। तो जैसे कोई व्यक्ति परलोक में सुख प्राप्त करने के लिए स्वर्क की प्राप्ति के लिए याग करता है, तो याग करने से उसको स्वर्क क तो स्वर्ग याग जन है तो याग जन होने के कारण वो अनित्य होगा इसलिए जब तक आपका पुण रहेगा तब तक आप स्वर्ग में रहेंगे और पुण की समाप्ति होने पर वहाँ से तकल दिये जाएंगे तो ऐसे ही अगर कोई मुक्ष होगा तो वो मुक्ष जन होने क कुष काल तक रहेगा उसके पच्चात मूक्ष समाफत हो जाएगा इसलिए ये स्वामी देयानन्दने जो आज समाजी है उन्होंने जीव का मूक्ष जन्य माना है और जन्य माने कर उन्होंने कहा कुष काल तक उसकी मूक्षवस्ता रहेगी उसके बच्चात उसका मोक्ष अवस्था समाप्त होके पुनर जन्म हो जाएगा ये वो लोग मानते हैं क्योंकि स्वाभामिक रूप से वो बद्ध है बद्ध होने बद्ध है माने बंधन उसमें है तो बंधन की निर्वित्ति होगी उसके धर्म से सत्कर्म से या इश्वर की उपासणा से होती हैं। वो मानते हैं कि इश्वर की उपासणा जड़ाकार रूप से होती हैं। तो वो करते करते उसके फलस्वरुप वो मुक्त हो जाएगा। तो मुक्ति उसकी कुछ दुनों तक रहेंगी उसके बाद, फिर वो वही कम ही हो जाएगा। यहा उसमें ये माना जाता है कि जीव सवभाविक रूम से मुक्त है। नित्त, सुद्ध, बुद्ध, मुक्त सभाव है। नित्त मानें निरंतर सुद्ध है, बुद्ध है, मुक्त है। उसमें बंधन नाम की कोई वस्तु नहीं है। तो एसी इस्तिति में जब वो नित्त, सुद्� तो स्रीमान जी आप साधन क्यों कर रहे हैं? घ्यान की उत्पत्ती भी तो साधन है तो साधन से आप अगर उसमें कोई विशेष्टा नहीं ला रहे हैं तो साधन बेरत है और अगर विशेष्टा आती है तो उसका फल जो है अनित्त हो जाएगा तो इसके उत्तर में उन्होंने कि जैसे कोई व्यक्ति स्वस्थ है उस स्वस्थ व्यक्ति को अपने स्वरुप में स्थित आनन्द से रहना है एक आएकोई रोग आ गया रोग के आजाने से उसकी स्वस्थता प्रसिबध हो गए तो आुशदों का उपचार करने से रोग का जब अपगम हो जाएगा तो उसकी वो अभिव्यक्त हो जाएगी इसी प्रकार ये रोग आ गया है अज्ञान तो इस अज्ञान की ज्ञान के द्वारे जब निवर्ति होगी तो उसकी जो स्वरुभूत अप्रच्छुती है नित्र सुद्धता है वो नोकीतों अभिव्यक्त हो जाएगी बस इतने ही अंतर है को�.
विद्या.
उपने सिदों में भी आती है। एक विद्या है उपास्म, और दूसरी है ज्ञान। तो उपास्मात्मक जो विद्या है, उस विध्या का प्रल अनित्य होगा। कृतकत्वाल। और जो बोध है, बोध से जो मुक्ति है, वो नित्य है क्योंकि वो कृतक नहीं होगा।.
हाँ बढ़िया।.
निश्कर्मसिद्धी में कहा है उन्होंने आत्मा कर्तरादि रूपस्थेद मा कांक्षी तरहि मुक्तताम निश्तभावो भावानाम व्यावर्तेद ओउश्नवद रवेख आत्मा यदि करता होगा तो मुक्ति की इच्छा मत करो क्योंकि किसी वस्तु का सभाव जदी उसका ह� तो वो रहेगी नहीं। जैसे सूरी की साभाविक्ता है। उश्णता। यदि उश्णता नहीं रहे तो सूरी कहां रह जाएगा। इसलिए आत्मा जो है वो अकरता होता है। बहुत से लोग यह मानते हैं कि जीव पापी है। वो पापी जीव ईश्वर की शरण में जाकर पाप मुक्तु होगा। यह लोग मानते हैं। अपने विदान सिध्धानत को छोड़कर दूसरे लोगों का यही मत है कि ईश्वर की शरण से जाने से पाप से मुक्ष हो जाएगा। और पाप से जब तक मोक्षि नहीं होगा, तब तक बोत-बगन से छुटकारा नहीं मिलेगा।.
हैं?
हाँ, होगी बात। तो कहने का विपराई है, कि वो मानते हैं कि पाप जीव का स्वाभाविक है। सभी जीव स्वभावों से पापी हैं। तो अपने पाप को मिटाने के लि� उनको ईश्वर की सरण में जाना चाहिए है।.
अब.
समस्या खडी हो गई कि अगर पाप जीव में स्वाभामिक है तो फिर ईश्वर की सरण में जाने से भी कैसे दूर होगा? क्योंकि अगर वो साभाविक रूप से पापी है तो पाप को हटा देने पर वो खुदे ही खतम हो जाएगा क्योंकि पाप उसका समाव है सूरी का समाव है उश्णता जदि जीव का समाव पाप है तो उस हालत में पाप को अगर उस से अलग कर देंगे तो वो ही नहीं रहेगा तो कहना होगा कि वो निषपाप है। पाप उसमें आरूपित है। तो आरूपित की निवर्ति क्रिया से नहीं हो सकती। कर्म से जो बस्तु है उसकी निवर्ति हो सकती।.
पाप का आणा करती हैं।.
क्या चीज़?
पाप का आणा करती हैं।.
पाप का आणा करती हैं।.
पाप का आणा करती हैं। पाप का आणा करती हैं। पाप का आणा करती हैं। पाप का आणा करती हैं।.
एसा है कि पाप, आप जो अपने में मान रहे हैं, वो भ्रव हैं, आरुपित है इसलिए उसकी निवर्ति हो सकती और आरोपिद जो वस्तु होती है उसकी कर्म से निवर्ति नहीं हो सकती ठीक है आप ये देखिए रस्ची में अगर आपको सर्प का भ्रंग है तो कितनी राठी से आप पीते हैं उसको हम लोग एक दुस्तान देते हैं कि एक पंडिजी थे वो कहीं जाने वाले थे तो उन्होंने सोचा कि सबेरे सबेरे चलें तो थडड़े थड़े में अपने गंतव में तक पहुँँ जाएं तो उन्होंने अपना लोटा, ढोर और सामागरीजी पचल पड़े अधेरे में चलते चलते एक ठून्ट के सामने देखा उन्होंने ठून्ट सामने आ गया उन्होंने को लगा कि ये कोई प्रेथ है अन्धरकार में ठून्ट में पेड़ ठून्ट था उसकी शाकाएं बग़ायें कटी भी थी खड़ा था तो उन्होंने को लगा कि ये तो प्र तो उन्होंने सोचे कि अब क्या करें? तो हन्माँचारीशा का पाठ चुरू किया बूत पशाच नगर नहीं आवे महावीर जरु नाम सनावे नाते रोख सरे सभी पूरा हन्माँचारीशा पाठ कर दिया लेकिन प्रेत नहीं भगा फिर उसके बाद उन्होंने सोचा नहीं ल हाथ में जल दिया और गायती मन पड़के उसके उपर फेका तब भी नहीं हटा जब उस हालत में भी नहीं हटा और सवेरा होने लगा दुर्च जाता ही नहीं है तो पंडिजी ने कहा कि अब निपट ले तो वोनों ने अपना सब सामान एक तरप रखे और कुबडी उठाई ज सर्वेरा हो गया था, आरे कारी तो ठून थे। तो उनके भ्रम की निवर्ति हो गई। ना हन्वान चरीशा से हुई, और ना गायत्री मन से हुई। गायत्री मन तो रह्मान चरीशा से निवर्ति हो जाती। अगर भुवास्ताव में प्रेथ हो था। प्रेथ था नहीं। तो ग्यान से होगी इसी तरह से जीव में जो बंधन है उसकी लिवर्ति ग्यान से होगी और किसी उपाय से नहीं हो सकती इसलिए चाहे बामी आप पीटो कुछ भी करो सर्प नहीं मरेगा दूटा सर्प नहीं मर सकता आरोपित बस्तू की निवृत्ति ज्ञान से होती है। और इसलिए श्रीमत भागवत में भी बताया अज्ञान संग्यू भवबंद मुक्षू दो नाम नान्यू तरितोग्वावात अजस्थ जित्यात्मन केवले परे बिचारी माने तरणाविवाहनी बंद और मुक्ष जो है ये अज्ञान के गारण है। बसतुता केवर नाम मात है, है नहीं। चितक्यभावात। रित् माने सत्य और ज्ञान स्वरूप जो आत्मा है। उससे भिरने बंद मुक्ष है ही नहीं। वो ये आत्मा के आत्मा में न बंद है नहीं न मुक्ष है। बंद मुक्षीति वियाक्य तो कहते हैं जैसे सूर्य है सूर्य में ना तो दिन है ना राती है क्योंकि राती होती तो दिन होता तो राती तो इसलिए होती कि सूर्य अब छिब जाता है हमरों के तामने से तो सूर्य को सूर्य कैसे चिपाएगा कौन चिपाएगा तो ना तो उसको राती है ना दिन है इसी तरह से ना बंधन है ना मूक्ष है तो बंधन की निवर्ति क्या है जो अपने आप में बंध का आरोप कर रखा था वो बिटा दिया तो यहां उद्धिष्टान दे रहे हैं रोगार्थ बेक्ति वो स्वस्त है और रोग के उसको भ्रम हो गया तो उसकी निवर्ति हो गया अगर आप इसको दूसरे ढंग से सुनना चाहें, समझना चाहें तो ये समझ सकते हैं कि एक सेट था वो अपने पलंग पर सोया और सवेले उसको बोर में सो जाने का अभ्यास था तो घर में जपाई पताई चल रही था तो लोगों ने जो कारीगर हैं उन्होंने एक लोटे में गीरू गोर के उसके पलंग के नीचे रख दिया तो सबेरे वो उठा और भूल से उसी लोटे को ले दिया और सोच के लिए मैदान में चला गया अब वहाँ आने के बाद सोच करिया जब वो करने लगा तो एला हो गया था तो घीरू रंग दिखा उसका तो लगा कि मेरे सोच से इतना कून निकल गया तो उसको घवरहाट हो गयी और बड़ा लटपटाता हुआ वो अपने घर में आए विस्तर में लेड़ गया आज हमारी पेट से इतना कून निकल � पैड़ डाक्टार आने लगे देखने लगे कुछ पतिया चले लेकिन उसकी कमजोरी भी दूर न हो कितने में मुक कारी करने वाले आए डिबाई पताई वाले जीरो बले सांथ थाई तो नहोंने कहाया लोटे में गेरू भर के रखा था वो कहा गया कहा है कहा वो गेरू था.
हा.
उसमें आरोप दिखता है।.
यहां जो लोगाट का उदाहान हमारे दिया तो जत्ति दरे स्वास्थ था।.
अगर लोग आया तो लोग उसकी स्वास्थ.
में पुतिदन नहीं बड़ा। तो उसने जबादी समुत का लोग चला गया। तो तो वो स्वास्थ हो गया। तो आपने लि.
ऐसा है कि बवासीर जो निकली है इसका उपचार है इसका उपचार होने पर बवासीर लोग खतम हो गया तो स्वावाविक रूप में से आ गया वो उसका जो पहला रूप था वहीं पहुंच गया कोई नई शीज नहीं मिली उसको और एक दिर्ष्टान दोहर है एक व्यक्ति था उसका एक मित्र था तो वो मित्र बिनोधी था तो वो एक पेड़ के ऊपर चर गया जिस पेड़ के संबन में लोगों की भ्रांती थी कि इसमें प्रेत है उसमें वो चर गया और उसका दोस्त खेद से साम के समय उसी रास्ते से लोट रहा था जहां वो पेड़ था तो जैसे ही वो उस पेड़ के नीचे आया उसने डाली हिलाई और हू हू किया हू चड़ाता है तो वो भागा कि नाम नाम भी तो ब्रेत है और हू जो किया तो वो वहाँ से भाग के अपने घर में आया और लटपटा की गिर पड़ा अब वहाँ पर लोगों ने सुचा की क्या हो गया, क्या हो गया जहाणने फूकने वालों बुलाया तो जहाणने फूकने वाले आये किसीने कहा, मैं वो ब्रह्मराक्षस हूँ उसने कहा, मैं अमुक हूँ मैं ऐसा को मुझे त मुर्गा नहीं दोगे, शराब नहीं दोगे सुर के बच्चे नहीं दोगे तब तक मैं इसको नहीं छोड़ूँगा लिकिन उसका भूद भागी ना अंतमें वो भीमार पड़ गया और एसी हालत हो गई कि वो मर जाएगा तो ये जो उसका मित्र था उसने सोचा कि अब क्या कर और वो भी कांपने लगा। मैं उस पेड में रहने वाला ब्रह्मराक्षा सुन। जिसके नीचे से निकलता था। तो ये वार-वार हमको बादा नालता है, इसलिए हम इसको नहीं चोड़ेंगे। तो लोगों ने हाँ जोड के पुछा की, महाराज, कैसे चोड़ोगे? बोले म सुर के बच्चे लुगा, सराप के बोतल लुगा। तो कहा हम सब देंगे, आप अपने को छोड़ देजें। अच्छा तो मैं छोड़ देता हूँ, लेकिन मेरी चीज जल्दी से जल्दी हमको मिल जाना चाहिए। रीके आपको पहुचा दिजाएगे। छोड़ दिया वो अ� कहा भाईया कुछ नहीं था मैं नहीं पेड़ में चली पेड़ हला दिया था इससे तुमको ब्रह्म हो गया था और अगर हम ऐसा न करते तो तुमारा ब्रह्म दूर न होता तो हमने इसलिए नाटक किया था हमको कुछ नहीं चाहिए हमसे भूल हो गयी थी हमको उसके लिए चमा हां वो भी हैं चलो आगे चलो तो ये कहते हैं यथा यथोदि द्रिष्टान तानु रुदात आत्मन सदस सुमुत खात निखिल दुक्कस उसमें कोई दुक्क नहीं है वो निरद्शानन्दिक तान है फिर भी अपनी अविज्ञा से उठपन जो अहंकारादी दहित प्रपंच का सम्बन्द है उससे आत्मा में दुख का आरूप करके मैं दुखी हूँ मुझे सुक प्राप्त करना चाहिए ऐसा सोचकर परमकारुनिक आचारी के पार जाता है और उनके दोरा उपदिश्ट जो व वो वाकि क्या है? अद्वैत विद्या उससे उसके द्वैत की निमृत्ति हो जाती है द्वैत ही प्रतिबंद है उसके प्रद्धन्स हो जाने पर सुभाव भूद्व परमानन्दता है जिसमें समस अनर्षता निरस्त है वो स्वारस्तेन साभाविक रूप से अभिवक्त हो जा स्वाजः स्वज्ठता परिपूर्ण वस्तु सुभावान ना तरिच्यते परिपूर्ण वस्तु के सुभावासे अलग नहीं है स्वज्ठता तदन तजिदन्सा तजिदन्सास्त्रम् सास्त्रियम् प्रिवरिरम् यही सास्त का प्रिवरिरम् इसलिए स्वज्ठता क्या है कहि उनका भी प्राये की अपने स्वरूप में इस्थित हैं की नहीं है? सच्चा स्वास्त यही है अपने वास्तविक स्वरूप में इस्थित हो जाना यही स्वस्तिता है अब आप जब अनात्मा के साथ जुड़ जाएंगे तो अस्वस्त हो जाएंगे तो जब आप शरीर के साथ तो शरीर के जरा मरण आपकी हो जाएंगे प्रान के साथ जोड़ जाएंगे तो जब एवासा आपकी हो जाएंगे मन के साथ जोड़ जाएंगे तो सोक मुह आपकी हो जाएंगे तो इनके साथ जोड़ जाने से आपमें दुखा गया जब गुरु आचारी के पास आप जा कीतू, सरीर, इंद्री, प्रान, मन, बुद्धी इन सब से प्रथक इनका साक्षी है अजर, अमर, अनंत, अखंड, सब प्रकाश, ब्रह्म है तो उसके स्वाभाविक रूप से वो वैसा थाई अपने आपको उनके साथ मान बैठा था तो उसके कारण वो दुखी हो गया था तो दुखी नहीं था दुख अपने में आरुपत कर लिया था तो इसका एक दिस्तान था है एक शेर का बच्चा था तो वो भेडो के साथ पला था भेडो के साथ वो बन में चरने जाता था और फिर लोट की आता था तो भेडो के साथ रहते रहते वह भी अपने को भेड समझने लगा था तो एक दिन वहाँ सेर आ गया और सेर ने जैसे करदिना की तो सब भेडने भागने लगी तो ये भी भागने लगा तो सेर ने उससे कहा कि भाई तू क्यों भागता है तू तो मेरा सरूप है उसने कहा नहीं तुम हमको कहा जाओगे वोले नहीं तुम मत भागो तुम में हम में कोई अंतर नहीं है तुम भेड नहीं हो वोले क्या परमान है वोले तुम इस कुए के सामे आओ और अपना जाग के देखो और हम भी जाग के देखते हैं तो तुम्हारा चेहरा भेड से मिलता है कि हम से मिलता है तो उसने जाग के द हम तो भेड नहीं हैं। इसी तरह से जो दैतवादी लोग हैं, वो आपको जो जीव कह रहे हैं, आप जब सद्गुरु के पार जाते हैं, तो वो कहते हैं, नहीं, तुम जीव नहीं हों। तुम तो ब्रह्म हों। वो कहे, नहीं, इसा नहीं हैं। पड़े-बड़े आचारी है मेरे ऐसा नहीं है, तुम देखो। मोले क्या परमाण है? मेरे भाई, जैसे कुए में परशाई देख ली असे शात्स में परशाई देख लो। उम्रिश्रत में चलो। उम्रिश्रत कहता है कि जी उब्रह्म दोनों एक हैं। तत्तमसी महावाक है। तो तुम में, हम में कोई अ अब उन्होंने कहा अच्छा तुम भेड नहीं हो तुम गर्जणा करो तो गर्जणा करने में उसको भै हो रहा था तो कहा देखो हम कर रहे हैं हमारे साथ करो तो जो उसने गर्जणा किये उसके मुझसे भी गर्जणा निकली तो भेड कुदेशोर के उसको बाग गई वो अप शास्त्र के दारा विदान्त शिवन से उसके अंदार जो ब्रांती थी वो ब्रांती निकले.
साचः.
स्वस्तता परिपुर्णवतु स्वभावान नातिरिचिते तरिदं शास्त्रियं प्रिवृधिनम् तस्चा सुरुपत्वेन असाध्यत्त्वात् नानित्यत्तम् तो वो स्वरूप होने के कारण साध्य नहीं है साध्य नहीं है इसलिए अनित्य भी नहीं है एसी चंका जो आपके मन में थी उसको दूर कर दो तो क्या अगर वो अनित्य नहीं है साध्य नहीं है तो साधन क्यों है तो साधन भी अर्� कि दार्शार्थिक महा साधन की व्यक्तिता इसलिए नहीं है कि उसका उद्देशे प्रजिवन्द की निवित्ति। तो ये मैं हम बदल गिया तथा तथा दुख्खात्मकस्या आत्मनों दैतप्रवज्ञोग समेश्थतता ये बताया ननु दैतस्यां काराज्ञात्मनों वस्तुत्तात् वस्तुरस्त विज्जावनोध्यत् विज्जानपोध्यत्तात् नित्रेमित्यकर्मयत्यत्त्त्वात् नित्रेमित्यर्मविज्जार्थेन प्रगर्णमारंमर्ण इत्यत्यह।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� क्यों नहीं है? बोले कि कर्म से आप मुक्ष प्राप्त कर सकते हैं एक तो यह है कि द्वैत सत्य हैं जो सत्वस्तु होती है उसकी निवृत्ति ज्ञान से नहीं होती उसकी निवृत्ति कर्म से होती आप को कोई रस्ति से मां दे तो उसकी निर्विर्ति ज्ञान से नहीं होगी। उसकी निर्विर्ति रस्ती छोड़ने से होगी। इसी तरह से कर्म से ही आपको मंधन से मुक्षि मिलेगी। तो कर्म से कैसे मिलेगी। हम कर्म करेंगे तो जन्म होगा। सुभाशुब कर्मों का फलस्त वरूपी जन्म होता ह और जन्म लेके हम फिर सुभा सुभ कर्म करते हैं तो फिर जन्म होता है तो जन्म से कर्म और कर्म से जन्म यह फरंपरा चर रही है तो उन्होंने कहा ऐसा है कि कर्म के चार भेद हैं नित, नैमित, काम, और प्राईशित नित कर्म कौन से हैं अहर हर संज्ञा मुपासी तो प्रशिन जो संज्ञा आजी है ये नित्य कर्म और नेमित्य कर्म जो पित्रों का स्राध्ना अजी है वो नेमित्य कर्म है तो नित्य कर्म जो है उनको न करने से प्रतिवाय होता ये नित्य कर्म हो गए निमित्य कर्म योई होई किसी निमित्य से किया जाता है न करने से प्राइशित होता है और काम कर्म वो है जो किसी कामना से किया जाता है पशु, पुत, स्वर्ग आदी की कामना से जो सास्त्र विहित कर्म किये जाते हैं यग्यादी वो काम कर्म केला है तो काम कर्म करने पर जिस कामना को लेके आप कर्म करेंगे उसकी फ़र्की प्राप्ति मुझाएगी। तो ऐसी स्थिती में ये काम कर्म हैं। तो नित्त नेमित काम हैं। वो प्राईश्चित। प्राईश्चित तो उसको कहते हैं जो आप से जाने अंजाने पाप हो गए हैं� प्रायशित से उनको दूर किया जा सकता है। तो क्या करें? कर्म जो हैं दो प्रकार के होते हैं। एक तो भीत, दूसे निशिद्ध। तो निशिद्ध कर्मों का त्याग कर दें। निशिद्ध कर्म करने से नरक होता है। निशिद्ध का त्याग कर दें। काम कर्म करें नहीं नित्य ने मित्य का कोई फ़लोता नहीं। तो उस हालत में प्राज्चित से पाप का मारजन कर लेगा। अब क्या बचा? प्रारव्य बचा। तो प्रारव्य का भोग सिख्षा हो जाएगा। क्योंकि जन में मिना ज्ञान के मुक्ति हो जाएगी। एक भविक बात कहलाता है य एक भविक बात कहते हैं इसको एक जन्म में ही बोले ऐसा नहीं है घ्यान से तो ततकाल मुक्ति होती है और तुम एक जन्म की बात करते हो बोले तुम घ्यानी हो घ्यान के मार्ग से मुक्ति बताते हो तुमको भी तो प्रारव्द का भोग भोगना पड़ता है जब तक प्रार� संसार में रहते हैं सुकी लुक्की रहते हैं बस इसी तरह है हम रोग प्रारद का भोग प्रारद दर्से तु भोगा देवक्षया गीता में जो भगवान ने कहा है घ्यानाग्नि सर्वकर्माणि भसमसाद कुर्ते तता इतही धान समझ्योगनिर्व भसमसाद कुर्ते के था घ कहते हैं जैसे प्रजुरित अगनी इनहन को जड़ा देती हैं उसी तरह से घ्यान की अगनी कर्मों को जड़ा देती हैं तो यहाँ पर मताया गया है कि कर्म में जो संचित कर्म हैं तीरी प्रकार के कर्म होते हैं संचित क्रियमान और प्रारव्य तो संचित कर्म जो है वो ग्यानाजनी से नठ हो जाएगी और जो क्रियमाण है जिनको आगामी कहते हैं वो भी कर्षित की निवर्ति से वो भी खतक हो जाएगी तद्धिगमात पूर्वाखे रयोः अस्रेश मिनासू परमात्मा के बोध से पूर्व और आगे के जो बाब हैं तो आगे के जो दोश हैं उनसे असलेश लेप नहीं होगा और पूर्व के सज्जत का भिनास हो जाएगा लेकिन प्रारब्ध से तु बोलगा देवक्षया प्रारब्ध का भोग से ही क्षय होगा इसलिए प्रारब्द के भोग तक आपको भी तुक भोगनी बढ़ता है और कर्म भी हो जाएगा कहते हैं शास्त्रेण नश्चेद परमार्थ बुद्धी कार्यक्षमं नश्चद चापरोक्षयात कार्यक्षमं नश्चद चापरोक्षयात प्रारब्द नासात प्रारब्द न.
प्रारब्द.
नासा दोभार नासा इबं तिधा नश्चति चात्म माया सात्त से परमार्थ बुद्धी नश्चोती है और कारियक्षमं नश्चति चापरुक्षात् अपरुक्षियान से कारिय जो जनमरण है उसका नास होता है और प्रारब्द के नास से विवार का नास होता है। तो प्रारब्द का भोग से ही क्षय होता है। प्रारब्ध सिता भोगा देव क्षया। इसलिए ज्ञानी को भी भोगना परता है। देधरे को धन है। सवका हू को होई। ज्ञानी भुगते ज्ञान से। मूरग भुगत यह हैं तो प्रारब्द का भोग घ्यानी को भी करना पड़ता है तो एक जन्म तक प्रारब्द का भोग करके समाप्त कर लो आपने पाप किया नहीं काम कर्म किया नहीं तो पाप को जन्म होगा नहीं प्रारब्द से भोग कच्छै हो जाएगा तो कर्म से मुक्स हो जाएगा का तो इसमें किसी ने कहा कि भाई जो रित्रेमित कर्म है उनसे दुल्टक्षय होता है पाप का नाश होता है तो वो आप नहीं करेंगे तो पाप लग जाएगा इसलिए दुल्टक्षय उसका कार्ण दुल्टक्षय उसके न करने से होगा न करने से दुरित होगा इसलिए तो उनको करना चाहिए तो बोले न करने से माने अभाव से अभाव से भाव कैसे हो जाएगा तो उन्होंने कहा कि जैसे अभाव से भाव का ज्यान हो जाता है तो उसी तरह से जहांपर भी जो नितने वित्त कर्म हैं उनको न करने से पाप होगा आ ये अनुप्लब्दिप् प्रमानात अनुप्लब्दिक् ज्ञानमावज्ञानमावज्ञानमावज्ञानमावज्ञानमावज्ञानमावज्ञानमावज्ञानमावज्ञानमावज्ञानमावज्ञानमावज्ञानमा अन्जोन्या भाव और अत्यन्ता भाव अत्यन्ता भाव ये है घटा भावा भावत भूतरम ये प्रस्पी जो है इसमें घटा नहीं है तो कहा ये कैसे मारूंगा किस प्रमार से बला अनुप्रभ्धी प्रमार से यदि स्यानुप्रभ्धेत यदि यहां पर घट होता तो इसे लिए उसके अभाव का घ्यान हो गया। तो जैसे अभाव का घ्यान हनुग्रभ्धी से हो जाता है, उसी तरह से दुरित नित्रेमित कर्मों के अभाव से होगा, प्रत्वाय हो जाएगा। तो उसके ख्षाय के लिए नितने मितन कर्म करते जाओ काम कर्म करो मत प्राश्चित से वो नट होई जाएगा प्रारब्द का बोक से नट हो जाएगा तो इसके उत्तर में यह बतलाया गया कि यह संभाव नहीं है हाँ कर्म जो है अविद्या के प्रशिकूर नहीं है अविज्जा से बनदन है तो अविज्जा कान की निमृति कर्म से नहीं हो सकती वो ज्ञान से ही होगी और दूसरी बात ये भी है कि नित्त नेमित्त कर्मों का भी फर होता ही है ये कहना कि उसका कोई फर नहीं है ये गलत बात है तो पुर्ण फर ही सही तो उसके कारण फिर जन्मितमर्ण तो छूट नहीं सकता। तो ये एक मात्य मोक्ष की प्राप्ति ज्यान से ही हो सकती है। और ज्यान के लिए वेदान्त विचार की आवश्यक्ता है। बस यही रहने गें। ओम् भद्रम् करने विश्णु यामदेवा भद्रम् पश्रेव स्रेरंगई तुष्टवाग्वं सस्तनुविर् विशेम देवेतं विदायु स्वस्तिन इंद्रुविद्धच्छनवाः स्वस्तिन पुषाविश्वेदाः स्वस्तिन स्तार्क्षिवारिष्टनेमिं स्वस्तिनों विजःत्पतिर्दनातु ओम् शान्ति शान्ति शान्ति.
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