Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Pravachan 12

This is a Hindi pravachan by Jagadguru Swami Swaroopanand discussing the rise of adharm in Dwapara-yuga and the consequent avatara of the Lord (Krishna) to restore dharma. The chunk contains devotional chants, reflections on societal decay, the suffering of Prithvi (earth) and cows, and extended narrative of Devaki-Vasudeva, Kamsa, and the protection and birth-transfer of Krishna to Nanda (Yadava context). It blends scriptural quotations, moral instruction, and bhajans.
Chapters
करणिशत सवर्णम करणवूर्णत् जुरेवा वालिकरित कपुरोर्धानदामाविरामम् जुरिष्य जुरिष्यताव्याम् रालिताउनित्यमंके सजनवरणशिरम् श्रीरे विगनराजम् योन्तप्रविष्यमं वाचमिमां प्रसुप्तां संजीवयत्यकिरशक्ति धरस्थालाम्ना अन्याच्यहत्त चर्णच्यमनत्तदानी प्राणान्नो भगवते गुरुराहि दुभ्यम् तद्गन वे अन्धान सारस लुबासमे यक प्रसादार परियंत मोहां तुम सच्चटा।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma śrī rām jai rām jai jai rām śrī rāma jay rāma jay jay rāma धर्म की अधर्म का प्राणियों में विश्व का गो माता की गो हत्या हर हरमान।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। द्वापर्युग में जब असुरों का प्रभाव बढ़ देया लोग धर्म की विरुद्ध आचरन करने लगे और विषीष करके उस समय के जो राजाथ थे वे सब अधर्म के अनुसार अपना राज्य करने लगे थे उनकी अधर्मिक्ता के कारण प्रजा में भी अधर्मिक्ता बन गये राजा कालस्य कारणम् कालोवा कारणम् राज्यन् राजावा कालकारणम् इत्ते संसयो माभूर् राजा कालस्य कारणम् ये स्री महानुभाव का वचन है कि काल राजा का कारण है कि राजा काल का कारण है तो तुम्हें इसमें संशे नहीं करना चाहिए राजा कालस्त कारण हो राजा ही काल का कारण होता है जब राजा अन्याय करने लग जाता है धर्म का उल्लंगन करके अपनी मनो मानी इथ्शाओं को कूर्ण करने की चेष्टा करने लग जाता है तो उसका अनुसरन उसकी प्रजा भी करने लगती है तो एसी प्रजा एसा राज और राजा पृत्वि के लिए भहार बन जाते हैं पृछवी का कहना है कि मेरे ऊपर गीरी सर सिंदु परवर, सर्ववर और समुद्र मुझ में ही हैं गीरी सर सिंदु भार नहीं मोही जसमुही करूये के परद्रोही। पृठुमी कहती है परवत का मुझे उतना भार नहीं है सरोबर का नहीं है समुदर का भी नहीं है जो परद्रोही होता है कहते हैं ऐसे खर जो पामर कहलाते हैं परद्रोही दूसरों से द्रोह करने लगे परदार रत परस्ति गामी हो जाते हैं परधन दूसरों के धन अडपने लगते हैं और परअपमात दूसरों की निनदावी जिनका ब्यसन बन जाता है। कहते हैं ते नर पामर पाप मैं दे धरे मुन जाद। ऐसे पामर लोग पाप मैं होते हैं और दे धरे मुन जाद। हम लोग राक्षिसों के संबंध में ये धारना रखते हैं कि उनके खड़े बाल होते हैं किसी किसी के सींग होते हैं दाद बड़े भैंकर होते हैं वो काले काले होते हैं ऐसे लोग राक्षस केलाते हैं लेकिन बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं देखने में बड़े सुन्दर हैं। आंक सुन्दर, नाग सुन्दर, दान्च भी सुन्दर, गोरवर्ण, सब कुछ है। लेकिन आचन बोले, मर्मलीन तन सुन्दर कैसे, विशरस भरा कनक घट जैसे। ऐसे लोग होते हैं जो दूसरों से बिना कारण द्रोह करते हैं दूसरों की पत्ती का सचीत भरन करने में जिनको सुक मिलता हैं दूसरों का धन छीन लेते हैं सिधान तो यह है की चाय घर में रखा हो चाहे रास्ते में पड़ा हो जो उसका स्वामी है जब तक वो न दे दे तब तक उसका ग्रहन करना नहीं चाहिए बहुत से लोग कोई रास्ते में चीज पड़ी रहती हैं कहते हमें तो मिल गई अरे तुम्हारी कैसे मिल गई वो किसी व्यक्ति की गल्ती से प्रमाद से भूय से घिर गया है तुम्हारा कर्तब यह है या तो उसको वही पड़ी रहने के वो ढूड लेगा और या फिर आप उसका स्वामी खोच के उसको पहुचा दो यह सिध्धान्त है आपको कोई विवर्ष्ट किसी की पड़ी हुई � आपने अधर अधर देखा कोई देखता तो नहीं है और जट अपने पाकेट में डाल लिया क्या हमें तो मिल गई यह चोरी है एसी जो आदत है एसी जो मनुष्य की चेष्टा है वो चोरी की कोटी में आती है तो एसे लोग पर द्रोही, पर दार, रत, पर धन, पर अपवाद कुछ लोगों को दूसरों की निन्दा करने में ही आनंद आता है वो दोरुगन उसमें हो या ना हो आरोपित कर देते हैं और खिल्ली उडाते हैं तो बात क्या है आपको क्या पड़ी है कौन क्या कर रहा है? रामचरितमानस में कहा गया है सबकी निन्दा जे जनकर ही और ते चमगादर हुई अवतर ही जो सबकी निन्दा करते हैं वो चमगादर होके अवतार लेते हैं चमगादर होके नमलेते हैं चम्गाधर उसको कहते हैं कि उसी मोद से खाती हैं और उसी मोद से मलत्यात करती हैं तो ऐसे लोग पृछवी के भार हैं तो आप समझ लिए कन्स मतुरा का राजा बन लिया इधर शिशु पाल धन्त वत वक्त विदूरत बानासुर जरासंद जो जरासंद सो राजाओं को केथ करके उनकी नरवली चरहने वाला था वो जरासंद और एक था भोमासुर भोमासुर इतना प्रवल बल्वान था इतना प्रवल था कि किसी भी सुद्धरी कन्या का हरण कर लेता था और ये चाहेता था कि हम उनके साथ विवाय कर ले 16,000 राज कन्याओं का हरण उसने कर लिया आप सोचिये हाँ हाँ कार मच गया होगा उस समय लोगों में किसी वीक की कण्यां बिवाह के योग गई और भोमासुर आ गया लिकि चला गया तो ये कथा आती है कि उसके पास नारद जी पहुँँच गया भोमासुर के पास और हमने कहा भोमासुर एक कण्याई को तुम हरन कर रहे हो बोले महाराज हम उनके साथ विवाय करना चाहेते हैं। बोले कितनी कण्जाओं से विवाय करेंगे। बोला हम बीस अजार कण्जाओं से विवाय करेंगे। तो नाराज जी बोले कि ऐसा है फुटकर फुटकर मत करो। एक साथ थोक में करो। जब बीस अजार हो जाये तब कर लेना तो बीस अजार हो नहीं पाई और सुलैय अजार हो पाई थे तो ऐसे लोग दुर्योधन ऐसा राजा हो गया जोस्को इसी में आनन्द आता था कि किसी तरह पांड़ो दुखी हो युदिश्ठिर जैसे रोग जो अजात सत्यु थे उनको भी वो कश्ट देता था अपनी भाई की मेहन को सभी भरी सभा में नग्र करना चाहेता था एसे ही रोग बढ़ गए पहले चेता योग में भी एसे ही रोग बढ़ गए थे बाड़े भुखल चोर जुआरा जेलं पटपरधन परदारा मा नहीं मातो पिता नहीं देवा उसाधुन सन करवा वैं सेवा जिनके असाचरन भवानी ते जहान अउनीशी चरसम प्राणी और इसी तरह से जब भी पृत्वी में अधर्म च्छा जाता है तो भगवान अवतार लेते हैं। तो भगवान के अवतार का प्रयोजन क्या है? भगवान कहते हैं कि मनुष्य का करियाण चाहे वो व्यक्ति हो, चाहे समाज हो धर्म से ही हो सकता है धर्म का पालन के बिना कोई भी प्राणी सुखी नहीं हो सकता समाज तभी सुखी और शांत रह सकता है जब वो अपने-अपने कर्तव का अपने-अपने धर्म का निष्ठा पूर्वक पालें करें। धर्म विरुद्ध आचरन करने से समाज में कश्ट बढ़ जाता है। इसलिए जब भी कभी समाज में इस प्रकार की अवर्ष्था आती है तो भगवान धर्म की इत्थापना कर द धर्म की इस्थापना से समाज अपनी अपनी कर्तब का धर्म का पारण करके सुखी हो जाता है तो द्वापर युग में जब ऐसी अवस्था आ गई और प्रस्वी बहुत कश्ट पाने लगी हैं हम लोग यह मानते हैं कि प्रतेग वस्तु की कोई अधिदेवता होती है तो धर्ती की भी अधिदेवता हैं जिसको हम लोग धर्ती माता कहते हैं पृछबी माता जिसका नाम ख्षमा है हम लोग धरती को पुवित्त मानते हैं रहते उसी में उसी में पेर रखते हैं लेकिन सबेरे जब उठते हैं तो प्रार्थना करते हैं समोद्र बसने देवी पर्वतस्तन मंदले विश्णुपत्नि नमस्तु भ्यम् पादस्पर्शं क्यमस्तुने हे माता धरती माता तेरे समुद्र ही बस रहे हैं। और पर्वत तेरे इस्तन है। तु विश्णो की पत्नी हैं। हम तेरे उपर पयर रख रहे हैं। यह एक शमस है। हमें चमा कर। पृत्वी का नामिक शमस है। सब कुछ पृत्वी में होता है, वो पृत्वी सहती जरी जाती है। लेकिन जब अधर्म बढ़ जाता है, पाप होने लग जाता है, तो वो पृत्वी माता, जो पृत्वी की अधिर्षात्री जेवता है, वो कष्ट पाता है। हम लोग ये मानते हैं कि कोई भोतिक पदात तभी तक रहता है जब तक कि उसका अधिर्षात्री जेवता उसम पर्वत भी पर्वत तब तक रहेगा जब पर्वत का 38 देवता रहेगा हमारा आपका शरीक कब तक है जब तक इसमें जीव है अगर इसमें से जीव निकल जाए तो इसके पाण तत्व बिखरने लगते हैं पाणी निकलने लगता है पृत्वी अलग होने लगती है वाई� तो ये पृत्वी की भी देवता है, जिसको हम लोग धरती माता कहते हैं, धरनी कहते हैं, धरा कहते हैं, तो वो दुखी हो गई, और उसने सोचा, कि अब क्या करें? गऊर्भूत्वा सुमकी किन्ना क्रन्दन्ती करुणम् भिवो उपर्थिकांत के तस्मयी ब्रसनम् तमभोचत हो। गौ बन गई गाय बन के आँखों में आँसु भर लिये खिनन हो गई और रमाने लगे क्रण्दन्ती करुणम् भरो और वो पहले देवताओं के पास गई देवता उसको लेके ब्रह्मा जी के पास गई ब्रह्मा जी के पास क्यों गई बेटा जब गड़बण हो जाता है तो अलेना बाप को दिया जाता है क्या तेरा बाप ऐसा ही था बाप से कहते हैं क्या ऐसा ही बेटे पेदा किये हैं तुमने और बेटी जब गडबड हो जाती हैं तो लोग कहते हैं कि तेरी माने क्या यही सिखाया था? तो बेटी का उलेना मा को मिलता है और बेटे का उलेना बाब को मिलता है और एक एक बाब को न ढून के सब के बाब बाबा प्रमह जी को पकड़ा उसमें और जाके अपना दुख सु ब्रह्मा जी ने जब पृत्वी का दुख सुना तो सोचा कि हमारे हात में नहीं हैं हमारा काम को है उत्पण करना जन्म दे देना पालन करना जिनका काम है रक्षा जिनका काम है उन भगवान के पास चलो तो पृछ्वी को आगे करके देवतां ब्रह्मा के पास गये और ब्रह्मा पृछ्वी को से गये कर जगाम सत्यलनेनत तीरं ख्षीर पयोड दे ख्षीर समद्र के किनारे जहां भगवान श्रिवन नारायन सेश नाक की सैया पर योग निद्रा में लेटे हुए। बड़ा संदर दिश्य है। आपने समुद्र देखा होगा ये खारी जर का समुद्र है। एक ऐसा समुद्र है जो दूद का समुद्र है। जिधर दिश्टी जाना होगा दूद, दूद, दूद और उसके ऊपर एक साप कुणली मार के बेटा है वो भी सफेद है वो काला नहीं है सफेद है और उसके सो फन है और प्रतेक फन में एक मनी है मनिधर है और उसके ऊपर बग्वान लेते हैं श्यामन मूर्ती निराम् वुजस्यामर्कोम्रांगो सान्ताकारं वुजल्सेनं पद्मनाभं सुलेशं जिलके लक्ष्मी चन्न दबा रही हैं तो उनके बाद तो समुद पार करके कैसे पहुँस थे जगाम सत्य नेन तीरं खीर पयो लिखे और वहाँ जाकर उन्होंने तत्रते गत्राजिगन्नातम् देवदेवं बृशा कपिम् पुर्षम् पुरुष्यूक्तेन परस्ते समाहिताः। समाहितु का चित्त को एकागर करके देव देव जो भगवान धर्ममूर्ती हैं धर्म के पालक रक्षक हैं उनकी आराधिना कीजी भगवान अब आप हमारी रख्षा कीजिये। इस पृत्वी को बचाईये। इसका धुक्य दूर की। गौ रूरू धरन किया पृत्वी ने। गौ से अधिक जैनी प्राणी कोई नहीं हो सकता। कहते हैं बाद्शाय अकबर एक बार कहीं जा रहा था। और उसके पास नरहरी नाम के कव वो कभी बैठे थी और खेत में गाय उसकी ओर देख के रमा रही थी अक्बर ने नरहरी से पूछा कि नरहरी ये क्या कह रही है तो नरहरी बड़े पुद्धिमान थे वोनों ने कहा कि महराज अरिवु धन्त तिन धरें ताही नहीं मारी सकत कोई हम संतत्तिन चरें बचन उच्छरें धीन हुई शत्तु भी अगर मुह में तिन का दवाजे और शत्तु के सामने कहे की भीया मैं तुम्हारी गाएं मुह में तिन का मुह में धरता हूँ तो लोग उसको नहीं मारते हैं हम तो एक बार नहीं हैं। राज दिन चरके ही चरती रहते हैं। हम संतत्त्र चरहें। बचन उच्छरहें दीन हुई। और हम कोई कठोर बचन भी नहीं बोलती हैं। दीन बचन बोलती हैं। रमाती हैं। और हम में भेद भाव भी नहीं हैं। कि हम हिंदु को मीथा दूद प और तुरोग को खारा पिलाये हैं सबको मीथा दुद पिलाते हैं और खेत में काम करने के लिए सबको बैल अपने बच्चे देते हैं कि तुम जाके इनके हल चलाओ जिससे की अनाज पेदा हो जिनका पेड़ भरे तो एक में हमारा अपराद क्या है जो हमको मारा जा रहा है तो बाद्शाय अक्बर ने कहा, आज से हमारे राज में गो कुषी बंद है। वो अच्छा बंद कर दी उसने। तो प्रस्वी भी दैवी रूप धारण करके गई भवान स्रिमन नारायन के सामने और देवता और ब्रह्मा और भवान शंकर वहाँ पहुंच रहे हैं। रामचेरितमानस में भी इसी तरह की बात है। सुर्मुझ्गन्धर्वा मिलिकरसर्वा गेविरंचिके लोका संगभूमि विचारी गोतनुधारी परमविकरवैशोका ब्रह्मा असजाना मने अनुमाना मेरो कशु न बसाई जा करितने गासी सो अविनाशी हमरे उतोर सहाई तो अब सब देवतार सोचने लगे कि अप क्योंना जाएं किस से प्रार्चना करें तो कोई कहने लगा कि भगवान शिमन नारायन की सर्ण में जाओ। वो बैकुन्थ में रहते हैं, वहाँ चलो। किसी ने कहा कि शीर समुद के किनारे रहती हैं, जोद में रहते हैं, वहाँ चलो। वहाँ भगवान संकर ने कहा, त्री समाजी की लिजा मैं रहे हूँ, अवसर पाई बचन एक कैउ अवसर पाकर मैंने एक बात कही, हरे कहाँ जाते हो। हरी व्यापक सरवत्य समाना, प्रेमत्य प्रकटन हुई मैं जाना, अग्य जग मैं सब रहित विरागी, और प्रेमत्य प्रहुः प्रकटनाई जिमी आगी, तो भगवान शंकर बोले कि अरे भगवान सर्वत समान लूप से व्यापक हैं सर्वत समाना ऐसा नहीं कहीं मोटे कहीं पतले हों सब के भीतर एक से चराचर में भ्यापत हैं और वो दिखायी नहीं बड़ते व्यापक होने पर भी दर्शन का नहीं होता है इसलिए नहीं होता कि आँखों में वो ताकत नहीं है कि उनको देख सके वो रहते हुए भी आँखों से नहीं दिखाई पड़ते दिखाई तब पड़ते हैं जब वो प्रकथ होते हैं जैसे लकडी में आग रहती है ब्रामणरोग अरणि मन्थल करके आज प्रकत कर लेते हैं इदर अपने हाँ जंगर में खरसारु नाम की एक लकडी होती है पारियात उसको अगर मथा जाये तो उससे भी आज प्रकत हो जाती है तो प्रतेक लकडी में आज रहती है जब उसको मथा जाता है तो वो प्रक इसी तरह से पर्मात्मा सर्वत व्यापक है। जैसे काथ में आग्नी रहती हैं। दिक्ते नहीं हैं। पर अगर मन्थन किया जाएं, तो वो प्रकट हो जाते हैं। तो मन्थन क्या है? प्रेम। जहां प्रेम हुआ, वहां भवान प्रेम, तो प्रकट होने जाता है। अपने आ प्रकट इसलिए कर लेते हैं कि इसकी जो संसार में आशक्ती है और जिस कारण ये भटक रहा है इसकी आशक्ती समाप्त हो जाये बगवान का जिसने दर्शन कर लिया जो उनका ध्यान कर लेता है उसी के मलकी संसाल की बासणाएं दूर हो जाती हूँ। तो प्रेमत्य प्रकर्थ हो ही में जाना। तो सब लोगों ने भगवाईन से प्राद्ध करें। तो यहाँ द्वापरयोग की कथा है। गिरम् समादवु गगने समीरी तां। निशम्म बेलाः। सिधर्शान हुआ तह गाम पौरुशी में सुरुता मरा पुनर। विदीयता मासु थाईवमेशरमेचराम। तो आकास वानी हुई। भगवान ने आकास वानी में जो कुछ कहा, उसको ब्रह्मा जीने सुना। बात यह है, आज करी की जो आकास वानी है ना दिली से चरने वारी उसको तो कोई भी बटन दवाय सुन लेता है लेकिन भगवान की जो आकास वानी है वो जिसका हर्दे पवित्र होता है वो ही सुनता है जब कोई बर्णुष्य पाप करने चलता है तो भगवान उसके दिल में बैठे हुए एक मार उसके दिल को धक्कर रखता है कि भाई मत कर पर वो पर जबर्दस्ति करता है और करते करते उसका जब अभ्यास हो जाता है तो मोटी नाग हो जाती है तो मोटी नाग से दुर्गन पता नहीं रहता है तो जिनका हर्दे काम, क्रोद, लोग, सिप अशुद्ध हो चुका है। वे लोग भगवान की बानी नहीं सुन पाते। अन्यथा जब भी कोई पाप करने चलता है तो एक बार भगवान उसको रोकते हैं। कि ऐसा मत करो। तो भगवान की बानी, अंतरयामी की बानी सुनने के लिए मन की सुद्धता अपेख्षित होती है तो ब्रह्मा जी ने उस वानी को सुना तो और देवताओं से और परिष्वी से कहा गिरम समादो गगने समीरिताम निषाम वेदा तुषाण हुआ चहा एव देवताओं मैंने जो पौर्षी वानी सुनी है उसको सुनो और बिनंब के वैसा ही करो। पुराइव पुर्णसाव धितो धराज्वरो भवद्विरंशयि रेद्सूप जन्यतां। भवान ने पहले से ही प्रस्मी के दुख को देख लिया है। इसलिए वे अपके संकल्प हैं। पित्वी का भार उतारने के लिए प्रकथ होना चाहेते हैं। तो आप भी उनके काम में साहेता देने के लिए यदु कुल में जन्म लीजिये। भगवान उसी यदु कुल में जन्म लेंगे। और फिर वो ब्रज में निवास करेंगे। तो उनके मनो विरोत के लिए जेवां� चरीर वहां धरन करें। ऐसा ब्रह्मा जी ने कहा और वहां से ठले गए। इधर पित्वी को समझाया ब्रह्मा जी ने, धरनि धर्हु मन जील। कहे विरन्ति हरि पद सुमिर। जान ही जन की पीर। प्रभुभन्जी हिन्दानुन अभिपति।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� पर आवश्यक्ता यही है कि भगवान की सरण में प्राणी पहुंच जाये तो फिर भगवान उसके दुख का नवारण करते हैं सामोईक रूप से सबके दुख को नवारण करने के लिए फिर भगवान का ओतार हो जाता है तो वहाँ यदुवन्श में भगवान ने ओतार किया यदु जो थे वड़े धर्मात्मा राजा थे जिनके कुल में भगवान का उतार हो वो धर्मित होते हैं चाहे जहां भगवान का उतार नहीं होता तो यदु कुल में प्रभु का उतार हुआ बसदेव यदु कुल में अंतुम करी थे जिनके हाँ भगवान ने उतार लिया है यदू के राजा उकरिशेन थे। उकरिशेन मत्सुरा को अपनी राजधानी बना कर प्रजा का पालन करते थे। उनके बेटे का नाम कन्स था। कन्स बहुत वड़ा क्रूर था। तो हुआ ये कि वहाँ उगरसेन के भाई थे देवक देवक की कण्या का नाम था देवकी तो वो उगरसेन की चचेरी महिल लगती थी तो विमार के लिए जब विमार के लिए जब विमार के लिए जब विमार विमार के ल तो बसदेव जी के साथ उसके बिवाय का निश्य हुआ बसदेव जी बरात दे कर आये और बिदिवत देवकी के साथ उनकी भावर पड़ी जब बिदा होने लगी तो कंस का देवकी से स्नेथा वो आगया अपना सोने का रत लेकर स्वेम रत को चलाता हुआ आया गोडों की रास पहात में पकड़े हुए और बोला कि आप लोग हमारे रत में बैठिये आपके घर तक हम रत में आपको बैठाल के पहुंचाएगा इतना बड़ा आदर कर रहा था देव की बस देव का चलने लगा तो देवतों को लगा कि जब इतना प्रेम है तो ये दुश्ट मारे नहीं जाएगा। देवकी के साथ इतना प्रेम है, बस देव से प्रेम है। इनकी घर्में भगवान अवतार लेंगे, तो ये मरेगा कैसे? तो आकाजमानी हुई अस्यात्वां अश्टमों गर्भो हम तयाम बहसे बुदो अरे मूर्ग जिसको तु प्रेम से ले जा रहा है इसका आठमा गर्ब तेरा मारने वाला होगा ये आकास बानी ने कह दिया अभी वो कह रहे से बक्ता जी के कही बड़ा बुद्धिमती थी उसने राम को सूच समच के बर्वात दिलाया। एक कथा है इस सम्मन्द में कि कैकैइ से भगवान स्री राम ने बर्दान माँगा। एसे बर्दान माँगा कि कैकैइ अपने आगन में थी वो भगवान महल की छट में थे। और कैकई ने भगवान राम की परीक्षा लेने के लिए गोध में लेने के लिए हाथ बढ़ाया। तो भगवान राम कूद पढ़े और कैकई की गोध में आ गया। असलिए कैकई कहती है मौपर करें सनेविशे की मैं करु प्रेम परीक्षा देखी। मुझसे बड़ा प्रेम करते हैं। करते हैं राम। लेकिन... हां। तो कुछ विद्वानों का, कुछ भक्तों का ये भी कतन है कि वहीं कैकरी ने भवान राम से कहा कि मैया तु मुझपर अगर प्रसन है तो मुझे एक बर्दान दे दे। मैंने अस्रों को, राक्षसों को मारने क जब पक मैं बनवें नहीं जाऊँगा, लाख्षस कैसे मारे जाएं? तो तु मुझे पिताजी, मुझे प्रेम के कारण छोड़ेंगे नहीं, तो बर्दान मांग के मुझे बनवें जाएं। तो केकेई ने अपयस रहकर भी ये बर्दान तूरा किया, ऐसा भी कुछ लोगों कह लेकिन अप्यास तो हो गया। अप्यास ऐसा हुआ। लोगों में ये बात फैल गई। रहीन राणी के कई अमर भई ये बात अपने सुत के कारण बन पठयो जगतात मन पढ़यो जगतात भई यह अमर कहानी जस अपजस रह गयो रही नहीं केकाई राणी कहते हैं केकाई राणी चली गईं लेकिन यह बात अमर हो गई कि इसने अपने बेटे को राज दिलाने के लिए जगत के पिता परमात्मा तक को बनवासी बना जिया था तो केकेई चली गई लेकिन ये अपयस रह गया इसलिए आप कुछ भी कहिए केकेई नाम की कोई लड़की नहीं मिलेगी है कितनी मिलाये बैठी हैं केकेई की नाम की हो तो कोई हाथ अठाओ? तो ये बात... तो ये व्याक्षा तो हम लोग कर सकते हैं लेकिन ये अपयस तो लग गया ये उसका उदारता है कि उसने अपयस सहकर भी अपना बचन पूरा किया अगर उस बात को मां दिया जाया अस्तु देवकी को बस देव जी को रत में ले जा रहा था कंस और आकास वानी जब सुनी जिसको तू ले जा रहा है प्रेम से इसी का आठमा गर्व तेरा मारने वाला होगा अच्छा तो न रहेगा मास न बजेगी मास नहीं तो जब हम उद्योकी काई सर काड देंगे तो कहां से आठमा वर्ष लड़का हो जाएगा तो गोड़ों की राज छोड़ी और एक हाथ से तलवार निका लिया और एक हाथ से जूडा पगडा देवगी का और दूसरे हाथ से तलवार उठा लिया और मारने को तयार हो गया तो आप सोचिये अगर बस देवजी ललकार थे युद्ध करने के लिए जब तक ललकार थे तब तक तो उसरे ही काट जेता स्लागनिय गुणस्साक्चार। स्लागनिय गुणस्साक्चार। ये कहा बद्देव जी ने, भवान भोज यशेश करा, सकतं बगिनी महन्यात, त्रिमद्वाः परवणी, बृत्तुर जन्म वतां वीर, देहे न सह जायते, अध्यवाः भिषताः देवा, वित्तर वै प्राणि नाम धुर्वम्। वित्तर वै प्राणि नाम धुर्वम्। वित्तर वै प्राणि नाम धुर्वम्। वित्तर वै प्राणि नाम धुर्वम्। वित्तर वै प्राणि नाम धुर्वम्। वित्तर वै प्राणि नाम धुर्वम्। वित्तर वै प्राणि न आप जैसे भीर को इस्त्री मारने में कोई सोभा नहीं है। इस्त्री को मारने में कौन सी भीरता है? और वो इस्त्री भी कौन सी? अपनी बेहन हो और बेहन भी चोटी और वो भी विवाय के पर्व में। तो ऐसा नहीं करना चाहिए आपको। कंस ने कहा, महराज ये बेहन नही यह हमारी मोत है। हम इसको मारेंगे। तो बद्देव जी बोले की, हे वीर, जिसने भी जन्म लिया है, उसके जन्म के साथ-साथ मिठ्तू भी जन्म ले लेती हैं। आप ये समझे, लोग जन्म दिवस मनाते हैं, सोचते हमारा ये जन्म हो गया, इतने दिन हमारे हो गये, इतने बर्ष के हम हो गये पर ये समझते हैं, ये नहीं समझते कि इतने हमारी आयू के बर्ष कम हो गये माता पिता कहते हैं मेरा बेटा बढ़ गया लिकिन सजबात है कि उतना घट गया तो जन्म लेते ही मनुष के साथ जन्मदिवस इसलिए मनाना चाहिए कि इतने जन हमारे जन्म के हो गये अभी तक हमने क्या किया वो आत्मसमीक्षा करें और जो नहीं किया है उसको करने का प्रेद्न करें जो अपना कर्दव है उसको पूरा करें तो कहने का भी प्राय है कि जन्म लेने के साथ साथ मिठ्यू का चाई आज चाई सो भर्ष के बाद मृत्यू तो धुरुब है, निर्चित है। तो कहा महराज, अगर मर गये, अभी मर गये, कुछ दिन तो जीने दो, कोईल मर जाने के बाद भी तुम्हें सरीर मिल जाएगा। जैसे स्वप्न में आप जब सो जाते हैं, तो दूसरा शरीर मिल जाता है इसी तरह से मरने के बाद भी दूसरा जन्म हो जाता है इसलिए शरीर की चिंता मत करो अच्छे कर्म करो जिससे की अच्छा शरीर मिले एसे पाप मत करो जिससे की बुरी योनियों में जाना पड़े कुकर शुकर योनियों में जाना पड़े तो आत्मा जो अजर अमर है ये मरता जीता नहीं है शरीर का जनमरन तो अपने आप स्वावाविक रूप से होता है इस तरह से घ्यान दिया बस्देव जी ने लेकिन कहां उसके समझ में आएगा है पानी में पाखान भीजत है भेदत नहीं एसे ही नर्का घ्यान जानत है मानत नहीं पानी में पाकान पानी में बत्थार डाल दो चाहे सो वर्ष डाले रो जब फूडोंगे तो सूखे ही निकलेगा एसे ही मनष को कुछ भी उपदेश करो वो सब जानता है लेकिन वो मानता कहा और बहुत से लोग तो ऐसे हैं कि दूसरों को समझाने के लिए सब घ्यानी हो जाते हैं लेकिन अपने आचन करने के लिए किसी को घ्यान नहीं है और सब को घ्यान देखेंगे तो जब वो नहीं माना मारने के लिए उध्यत ही हो गया तो वस्देव जी ने सोचा कि किसी तरह से बचन देके तो वोनों ने कहा कि बस देवजी ये बताये आपको देवकी से मृत्यू का डर है कि इसके बेटों से है बोले इसके बेटों से है तो हम बचन देते हैं कि इसके बेटे हैं हम आपको देदेंगे जनम लेते हैं आप मान डार ना उनको उतरो कहते हैं दामी दमक रहत गनमाई खर की पीती जथा तेरे नाही बिजरी जैसे चमक के नष्ट हो जाती है वैसे ही खरों का प्रेम भी थोड़ी देर रहता है जहां उनके स्वार्थ में बादा पड़ी तो वो एकदम अपना प्रेम छोड़के मारने को उतारुब हो जाते हैं आप बस देवो जी घर में आये देवकी का गर्माधान हुआ पहला पुत्र हुआ जिसका नाम कीरति महान था कीरति महान पुत्र हुआ तो आप देखिये देवजी कितने धर्मात्मा थे बचंग के पक्के ही उन्होंने का भाई हम तो बचंग पूरा करेंगे देवकी के पेट से बच्चे के निकलते ही कीतमान को उन्होंने हाथ में लिया और पहुँच गए कन्स के पास लो कन्स ये देवकी का पहला पत्र है कन्स यह हमारा भाणजा है। ले जाओ, ले जाओ। आठमा पुत्त से नहीं हमको लड़ है। तो पहला है। बद्देव जी को लगा कि चला पिछा चूटा। थोड़ी दूर गए थे। इतने में बाबा नारद आ गए। बीना पहजा थे, हरी गुनगार थे। उनको तो देवकार कन्स बैठा था। मन में करुणा थी। चड़ी करुणा थी उसमें। जोष्ट तो थाई। तो नारद जी ने पुछा कन्स क्या सोच रहे हो। कन्स बोला कि महाराज संसार में सज्जन भी है। कहा कौन सज्जन है। कहा बस्देव जी। अपने बचन का पक्का। पहला पु� पहला पुत्र जब होता है कितना लोग उत्सुत होते हैं, कितना बाजा बजाते हैं, हर्षित होते हैं, नाँशते गाते हैं, वो मोत का सामने में आया? आपने क्या किया? बोले हमने तो कहा कि आठमे से हमको डर है, पहला तो यह तो पहला है, छुड़ दिया उसके लिए. हाथ में अश्ट दल कमल था नारण जी के पुछा इसमें आठमी पकड़ी की कौन है कहा से गिनोगे पीछे से गिनोगे की पहले से गिनोगे और बीना बजाते नारायन नारायन करते चलते बने कंस ने तुरंत बलाया और उस बालक को बद्देव जी के हाथ से लेके पथर में � एसे देवकी के छे पुत उसने माढा जाया। अग सात्मा पुत का मौका आया। सप्तमों वैश्नमं धाम। यमनन्तं प्रजक्षिते। गर्भो वहु वभुव देवक्याः। हर्षसोग विबर्धनह। तो जैसे कोई महापूर्ष आते हैं, महाराज आते हैं, तो उनकी सिंगहसन पहले आ जाती है। तो परब्रम बर्मात्मा स्री कृष्ण का उतार होने वाला है। स्रिवन नारायन का होने वाला है। तो उनका आसन है सेशनाग। तो सेशनाग जो आ गए पहले। बात यह है कि रामा उतार में सेशनाग के उतार लक्षमर जी थे। और � तो कभी कभी भगवान राम के खारीयों से लक्षमर जी को असंतोष होता था गुसा भी आता था लेकिन कह नहीं सकते थे तो भगवान ने कहा कि आपकी मार तुमही बड़े भाई बन जाओ तुमही पहले चले जाओ तो वो अनन पहले देवकी के गर्म में आये तो देवकी के हर्स और सुख दोनों को बढ़ाने वाला हो गया हर्स इस बात का कि अब साथमा आया तो आठमा आने वाला है आठमा आया तो कर्स मारा जाएगा मेरा दुख दूर होगा हाँ एक बात छूट गई जब एक जो कर्स था उसने ये कहा कि देवकी का आठमा वर्छ पुत्र कहा से होगा और ये भी बता दिया कि ये वस्तुतहा भगवान के अवतार का निमित बन रही हैं ये सब यदु जो हैं देवता हैं तुम्हें मारने का ये उपक्रम है तो उसने देवकी बस्देव को कैद कर लि दोनों को हतकडी बेडी डाल कर कारागार में अवरुद्ध कर दिया और रुग्र सेन ने इस पर इतराज किया कि कन्स ऐसा ना कर तो उसका भी मुकल पुतार के अपने माथे पर रख लिया और धक्का दे के उसको भी जेल में बंद कर दिया और स्वेम राज सिंगातन पर बेट देवकी के छे पुत्तों को उसे मार लाला देवकी वद्धोग कंस के कारागार में ही अवरुद थे और इसलिए बड़े कश्ट में थे और ये सोच रहे थे कि आटमा जैसे ही आएगा ये दुर्ष्ट मारा जाएगा और हमारा बंधन छुटेगा लेकिन सोक इस मात का हुआ कि तो भगवानमि विश्वात्मां भक्तानामवेहं करः। भगवानमि विश्वात्मां भक्तानामवेहं करः। भगवानमि विश्वात्मां भक्तानामवेहं करः। भगवानमि विश्वात्मां भक्तानामवेहं करः। भगवानमि विश्वात्मां भक्तानामवेहं करः। � तुम ब्रज में धरी जाओ जहां गोप गोपी रहते हैं नन्द भवन में बस देवकी एक पत्ती रोहणी छिपकर रह रही है तो तुम देवकी के साथमे गर्व को उसके पेट से निकाल कर रोहणी के पेट में डाल दो और स्वेम नंद की पत्नी यशोजा से एवतान धारन करो। तो योग माया ने ऐसे ही किया। और ऐसी माया फैलाई की लोग कहने लगे की ये दुष्ट कंस ऐसा दुष्ट है अपनी बेन को ऐसा धंकाया कि उसका गर्ब ही गिर गया। इस तरह से सात्मा गर्ब सुरक्षित हु अब उसके बार भगवान भगवान अभि विश्वात्मा भक्तान अभियं करहा आविवेशान्स भावेन मन आनग दुल्दुहे भक्तों को अभिया देने वाले विश्वात्मा भगवान पहले बसुदेवुजी के मन में आया और मन में जब भगवान आये तो बसुदेवुज सूर्य के समान तेजश्री हो गए। और उसके पश्चार बद्देव जी ने दीक्षा करम से देवकी के मन में भगवान को प्रविष्ट कराया। चार प्रकार की दीक्षा बतायी हैं सात्मों में। एक होती है मद्र दीक्षा। दूसरी होती है सपर्ष दीक्षा। मन्त दीक्षा तो गुरुषिष को मन्त देते हैं सपर्ष दीक्षा सिच्च के सिर्मे अपना करकमल रख जेते हैं ये भी दीक्षा है तीसरी नेत से करुणमाई द्रिष्टी से देख देते हैं और छोथी सिच्च कहीं भी हो अपने मन्त से ही उसका कल्यार कर देते हैं तो इसके दुश्टान्त है। इस पर्सिदीक्षा का दुश्टान्त है पक्षी। पक्षी अपने अन्नों को केवल सेता है, छूता है। उससे उनका बजन और आकार दोनों बढ़ जाता है। और मच्री अपने अन्नों को केवल देखती हैं। और कच्वे के अंडे वहार रहते है तो अभिवेशान स्वहागेन मन आनक दुन्दु हे। तो देवकी के मन में भगवान आ गये। यह सा गर्वादान हुआ है। प्राकृत गर्वादान नहीं हुआ। सा देवकी सर्व जगर निवास निवास भूतान नितराम न ले जे। वो जो देवकी थी वो जगर निवास भगवान के लिए निवास बन गई। जगर जिसमें निवास करे उस भगवान को जिसमें अपने उदर्में धर्ण किया इतनी सुमवाक शाहिणी देवकी। सोभा को उसी प्रकार प्राप्त नहीं हुई जैसे कोई समात्र शात्मों का विद्वान हो लेकिन किसी को शिक्षा न देता हो बैसे ही भोजे इन्द्रगे में अगनी की सिका के समान अवरुद्ध थी कोई नहीं जेख पाया कन्स एक बार आया और जेखा की कन्स का अधेव की � वो जखमगा रहे हैं तो उसने सोचा हरी इसके बीच में, इसके पेट में मेरा मारने वाला हरी आ गया पहले ऐसी नहीं थी अब क्या करूँ? अभी मार डालू का अभी मैं अगर इसको मारूंगा तो पेट में तो आई चुका है कही पेट फाड के निकल गया तो जैसे खम्मा फाड के नर्सिंग निकल गये वैसे देवकी का पेट फाड के निकला और अभी मार डाला तो हमें कलंग कोर लगेगा कि ये वेवकी अपनी बेहन को मारने चला था इसलिए मारा गया और नरक भी और हो जाएगा अपने सोनी कारण तो जनम ही हो जाने दो तो � जब भी इसका जन्म हो तरंत हमको तुचित करो। और चला गया बुरे-बुरे स्वापने दिखने लगा। मर्ण निकट आ गया था। इसलिए उसको दुस्वापने दिखने लगे। वहाँ बर्णनात्राय भागवत में कौन-कौन से दिखने लगे। इदार ब्रह्मा नारदादिक मुणी भगवान की गर्वतुति करते हैं। और गर्वतुति करने के बच्चाद भगवान का आविरभाव हुता है। इलखा है निशीथे तम उद्भूते जाये माने जनारदने देवक्याम देवरूपिन्याम विश्ण सर्वगुहा सया आविराशी द्यता प्र दिशीन दुरिव पुर्षकला कहते हैं आधी रात का समय था और बग्वान का जब जनु का समय आया तो बग्वान जैसे पूर्ण दिशा से पूर्ण चंद्रमा का उदए होता है वैसे देवकी के सामने चत्रभुज रूप से प्रकट होई आविराशि दियता प्राच्यां दिशीन्दु रिवपुष्कनः। जैसे गर्व से बालक निकलता है वैसे नहीं निकले, प्रकथ हो गए। आप सोचिए संक्य चक्र गदा पद्ध धरन की हुए। और चार भुजाय हैं। माते में क्रीत है, काणों में कुण्डल है, हाथों में अंगद है, भुजाओं में अंगद है, हाथों में कंकण है, कठी में मेखला है। ऐसे भगवान, पीतामार पहने हुए? पीतामार पहने हुए कोई बालक जर्म लेता है? ये प्रकट हुए। भवे प्रकट कृपाला। क ये भगवान का जन्म और कर्म दिव्य हैं। जन्म कर्म चमे दिव्यम् एमं यो वेति तत्तता चक्त्वा देहं पनर जन्म निति मामेति सूर जन्म। जो मेरे दिव्य जन्म कर्मों को तत्तता जानता है वो देध त्याग करके पनर जन्म को प्राप्त नहीं होता मुझ को ही प और देवकी ने प्रार्थना की कि भगवान ये जो आपका सोरूप चतुर्व हो जाये इसको आप उपसंधार कीजिये और बालक बनिये तो भगवान ने कहा अपने पूर जर्म का इस मणि दिनाया और एक प्राकृत सिशु बने और एसी माया पहलाई कि देवकी के हिर्दाय में भी बालक को छोड़ेने की भावना आ गई कि आप ले जाये इनको सरक्षित रखे। और बज्ज के वाल खुल गए, पहिरदार सो गए, तो सूपे में रखे भगवान शी किशन को, बालक रूप में भगवान शी किशन को ले कर बद्देव चले, उससे और थोड़ी थोड़ी भून वर्षा हो रही थी तो सेशनाद अपने फणों से भगवान के ऊपर च्छाया करके पीछे पीछे जा रहे थे यमना के किनारे पहुंचे यमना में माड आ रही थी लेकिन जैसे समुदर ने भगवान सी राम को रास्ता वताया था यह जो आज समु कि ये जगे उठली थी तो समुद्र ने कहा कि यहां आप मांध मांध लो इसलिए वो अभी तक चिका हुआ है जो बहुतन न वो ही है तो जैसे समुद्र ने भगवान श्रीराम को मार्ग दिया था वैसे ही यम्ना उठली हो गई गुटनों तक आ गई आगे जब बीच में है बज्देव जी पहुँचे तो यमुना जी को होष आया अरी यमुना तू क्या कर रही है तेरी चोटी भेन गंगा उसका महतव तुस से अधिक क्यों हो गया क्योंकि इसने इनके चरणों का इसपर्ष कर दिया है तो तू इसको क्यों चूक रही है तो भगवान के चरणों का इ तो भगवान ने सूपे से अपना पेर नीचे करके यवना जी को चरन छुआ दिया इस तरह से यवना फिर उठली हो गई भगवान को लेकर बसदेव जी नंद भवन पहुंचे योगमाया ने वहां भी सब को सुला रखा था और उनोंने भी योगमाया ने जेव जी से अवतार तो वो भी साधर बालिक्या के समान जन्म लेती तो यसोदा जी सो नहीं सकती थी उनको पता ही नहीं चला और वो प्रकत हो गई और उन्हें इस बात कभी भाद न रहा निद्रा के कारण कि मैंने बालक को जन्म लिया है या बालिका को जन्म लिया इस तरह से वस्देव जी ने अपने स्याम सुन्दर भगवान स्री कृष्ण को जुर्दा जी के पार्श में लिटाया और कन्या को लेकर जैसे आये थे वैसे लोट के चले गए और वहाँ जाकर देवकी की गोद में मेठाल दिया और कन्या ने तब तक चुप रही आप देखिए भाई बहन का कितना प्रेह भाई को मोत से बचाने के लिए बेहन ने अपने को मोत के मोह में डाल दिया। यह भारत का भाई बेहन का प्यार है। तो वहाँ पहुँचने के बाद जैसी कन्जा ने रुदन प्रारम किया पेरेदारों की नीन तब खुली और किवार तो अपने आप बंद हो गए थे। तो � महराज देवकी का प्रसव हो गया वोले बालक हुआ है का बालकी हुई है का आवाज तो बालकी जैसी है वो भागा दोड़ा वहाँ से तो जट लग गई पग़ाँ में खोपडी के बल गिरा खूना खून हो गया बाल खुल गय और देवकी वद्देव के सामने अकाण्ड धन्डायमान हो गया। देवकी ने देखा, मेरी बेटी का काल आ गया। बावो वहीं सिता भराता हा। शिष्वपाव कोकमा त्यादेवनि सिष्टेन पुत्रिकई का प्रदियताम। मेरे भाईया, तुने मेरे अगनी के समान बहु अब ये पेर पोचनी कन्या हुई है ये मुझे दे दे तु मुझे बहुत सेह करता है अगर ये बचेगी तो मैं तेरे बेटे से वियाय देऊगी तोरी बहु बन जाएगी भाईया लेकिन वो कहा मानता है कन्या को ज़वर्दस्ति देवकी की गोध से चीन के उसने उठाके पत और कास में चल के अश्ट बुजा के रूप में दिखायी चाहिए। और कह दिया, अरे मूर्ण, मुझे मारने से क्या होता है? तेरा मारने वाला तो कहीं जन्म ले लिया। इस तरह से भगवान का उतार हुआ। कर्णन्द जी के भवन में दूसरे दिन उस्था हुआ। बस आ� संक्षेप में हमने मेर छोड़ दिया और कुछ स्टेशन छोड़ भी दिये और आपको भगवान की कथा सुना दिये तोड़ा सा भगवान का नाम रिजिये स्रीराम जैराम ए जैराम स्रीराम जैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जैजैराम जाता सदा सात्य यही पुकारो गोविन्द दामो धरमादवेति एकृष्णहेया दवहे सकेती। जैसे जन्मास्त्मी मनाई आती हैं, भगवान के अवतार का दिन है, बैसे हम लोग भगवती योगमाया, राजराजी शरी का भी जन्मस्वस आरी मनाते हैं, उनका भी अवतार आज के दिन हुआ था। खारे जरातो मन में विचारो क्या सात लाये अरुले चलोगे जाता सदा सात यही पकारो govinda dāmodara mādhaveti govinda dāmodara mādhaveti he kṛṣṇa he ādava he saketi śrī-kṛṣṇa-govinda-hari-murāre e nārtha-nārāyaṇa-vātu-devā śrī-kṛṣṇa-govinda-hari-murāre he nāta-nārāyaṇa-vāsudevā dharmakī adharmakā rāṇiyomena viśvakā gaumātākī gauhatyā har-haramā.
More from swami

#हैदराबाद_में_दुष्कर्म की घटना को लेकर बोले जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज

#अमृत_वचन पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने सभी भक्तों को ग्राम गुंगवार में दिया धर्म संदेश जिला सिवनी

पूज्य शंकराचार्य महाराज ने कहा कि #सरकारी_पैसे से नहीं बनेगा राम मंदिर #साधु_संतों_के_और_राम_भक्तो_क

पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा पहले राम भक्त मिलकर छोटा #स्वर्ण_मंदिर_बनाकर_भगवान_राम_को_स्थापित

७०वर्षों से ग्राम नगवार में नोका विहार का आयोजन #निषाद_राज_परिवार_के लोगों द्वारा किया जाता है जि

७०वर्षों से ग्राम नगवार में नोका विहार का आयोजन #निषाद_राज_परिवार_के लोगों द्वारा किया जाता है जि

पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने ANI से बात करतेहुए कहा #अयोध्या__में_बालक_राम का ही मंदिर बने आदर्श र

पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने कहा आदर्श राम का नहीं बालक राम का मंदिर बनना चाहिए अयोध्या में

पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने #अयोध्या_मामले को लेकर पहली प्रतिक्रिया दी #सुप्रीम_कोर्ट का आदेश सुनन

