Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Pravachan 4

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Chapters
वो हत्या धर्म सम्राट जगदगुरु शंकरा 4 भगवान की ज्योति, पीठारी स्वर, महाराज की द्वारका, शारदा पीठाधीश्वर महाराज की जगदम्बा, महारानी की बदरी, विशाल, भगवान की द्वारकाधीश, भगवान की चंद्रमोली, स्वर, भगवान की ज्योतरीश्वर, भगवान की हर हर महा दे.
ओ दरणीसतसवरणम, gunguna dana dan hira girish sadanaharnashirom sher yun the prveshmmbajmmam com, saiatकcकतधरसग nncttnatontbadi praman तदगमबनधमसरसदबा सुनाये yasal.
M m j rom जै जै रो ामहँश्रीराम जय राम जय जय राम.
राम.
राम श्री राम जय राम जय जय राम राम के राम जे जे र श्री राम ज राम जे जे राम राम राम जे जे श्री राम जै राम जै जै राम श्री राम जै राम जै जै राम राम श्री राम जय राम जै जै राम.
धर्म की अधर्म का प्राणियों में विश्व का गोमाता की गोहत्या हर हर.
महादेव.
समवस्थित सज्जनों देवियों भक्ति भगवान की भगवान के चरणों में अनुरक्ति का नाम तो वो सत्संग से मिलती गोसवामी ने कहा है अस हरि भक्ति 16 सुखदाई रुणु सतसंग न कह पाई अस विचारि जो कर सतसंगा राम भगत ते 16 बंगा भगवान की भक्ति सुनव है, सुखदाई है सुरभ इस प्रकार है कि उसमें हमें कुछ बाहर से नहीं जाना पड़ता केवल हमारे हृदय में जो प्रीति है उस प्रति को भगवान के साथ जोड़ देना है तो कोई ऐसा व्यक्ति नहीं.
है.
जिसके हृदय में प्रेम न हो सभी लोग कहीं न कहीं प्रेम करते.
है.
किसी का धन से प्रेम है, किसी का भवन से प्रेम है, किसी का पुत्र से प्रेम है, किसी का स्त्री से और किसी को अपनी प्रतिष्ठा.
से.
कहीं न कहीं हमारा प्रेम रहता है और उसके आसपास हमारे कर्म होते.
रहते है.
तो वो प्रेम हमारा संसार के प्रति है, उन वसुओं के प्रति है जो नश्वर है और जिनके प्रति प्रेम से अंतत दुख ही होता है इसलिए वहाँ से अपना प्रेम हटाकर ऐसे से प्रेम किया जाए जिससे कि कभी दुख न हो और दूसरी बात ये.
है.
कि प्रेम उससे किया जा जिससे कभी प्रेम हमारा हटेहै सदा बना रहे लेकिन हम देखते है कि जिस वस्तु से हमारा प्रेम है कर उससे हट जाता है, हम उसको छोड़ देते हैं। 1 व्यक्ति था वो हमारे गुरु जी महाराज थे, ब्रह्मानंद जी सरस्वती महाराज तो वो सोने चांदी के सिंहासन पर बैठे थे उनके सामने जो मशाल जल रही थी गांधी की मशाल जो इस बात का प्रतीक थी 1 छोटी और दूसरी स्मृति उसके प्रकाश में गुरु देखते है और छत्र लगा हुआ था तो उसने देख कर कहा महाराज हमने बहुत से साधु देखे लेकिन रागी सबको पाया बिरागी किसी को नहीं पाया उसका उन्हीं पर था महात्मा बने बैठे है.
A.
यह तो राग का लक्ष है। तो गुरु जी बोले हमने बहुत से हमने भी बहुत देखे पर बिरागी सबको पाया रागी किसी को नहीं पाया उसने आश्चर्य से पूछा कि महाराज हम लोग कहाँ बिरागी है बोले ये बताओ जिससे तुम्हारा प्रेम है उससे तुम्हारा प्रेम हटता है कि नहीं हटता तो राजी हुए कि नहीं हुए रागी तो वो है जिससे प्रेम हुआ पर हो ही गया वहाँ से न हटा तो ये तो नहीं होता कि 1 के मन में खीर से प्रेम उमड़ा कि खीर बड़ी, अच्छी चीज, हम उसको खाएंगे। उसने अपनी पत्नी से कहा आज घर में खीर बनने चाहिए। उसने कहा पति देव, दूर लाइए, शक्कर लाइए, बढ़िया सुगंधित चावल लाए और कुछ मेवा तो खीर बन जाएगा के सर भी दल जा। तो सब साइज। पत्नी ने इकत्तर कर दिया। पत्नी ने बड़े प्रेम खीर बनाई और जब वह भोजन करने बैठा तो सुगंध से नागतार हो गया। जब थाली सामने आई, बहुत प्रसन्नता से है। उसने खाना शुरू किया, खाते खाते। पेट भर गया तो पत्नी ने 1 कटोरी और लाकर रख दिया। और जबरदस्ती डाल दि, वो भी खाने आई, कटोरी और ले आई। अब वो खाते खाते इतना परेशान हुआ कि वो कटोरी देखकर नाराज होने लगा। वो आर जी मारी डालेगी क्या.
अगर.
आप खेल से प्रेम दीवानी तो अब देश को हो गया। ऐसे हर वस्तु से कुछ दिन किसी से प्रेम होता है। और उसके बाद mari hma.
हम मेरा.
1 दूसरे से मेरे प्राण दे देंगे। जहर खा भी लेते है। लेकिन जब उनका विवाह हो जाता है, कुछ दिन जीवन बिता देते हैं। फिर जाते बोले आप के साथ नहीं रहेंगे। क्यों भाई जिसके लिए तुम सब को छोड़ चुके मां छोडी, बाप छोड़ा गुरु छोडी, धर्म छोड़ा जाती छोडी। अब क्यों छोड़ रहे हो? काम हमको सुख नहीं मिल रहा है। इसे तो कहने का मतलब ये है कि संसार की हर चीज किसी समय हमको पूरी लगती है। उसके बाद वो पूरी हो जाती है। आप देखिए आप इस से मिलने के लिए बहुत आतुर है। बार बार आप को डेली फ़ोन करते हैं, बुलाते हैं और वो आ जाता है। तो दोनो का जैसे sनतaहotesnbadकहि कैसे है।
आप?
हाँ जी, बहुत अच्छा है, बहुत अच्छा है। उसके बाद वहाँ से मन हटता है। आजकल मौसम का क्या हालचाल? आप जहाँ रहते हैं, वहाँ का क्या हालचाल है? चलिए मन फैला। उस आदमी से मन हट के रूसी जगह गया। अगर उससे प्रेम था तो देखते ही रहते हो। उससे तुम ने दूसरी बात क्यों पूछा। इसका मतलब है कि वो सुछणिकथाप्रेमचणिक था। उसके बाद प्रेम, वहाँ से पहला पर कहीं पर कहीं कहीं? और उसके बाद तो आप चाहेंगे कि पढ़ाने.
जाए।
अगर वो आपकी खोपड़ी में सवार हो जाए, रहने लगे तो आप सोचेंगे कब जाएगा। तो अवस्था यह है कि संसार की हर चीज से हमारी अरूचि हो जाती और उसको हम छोड़ बैठते हैं। तो हमें ऐसा प्रेम पकड़ना है जिससे प्रेम करने के बाद उससे हमारा प्रेम न हटे। तो ये हम देखते हैं कि प्रेम किससे हमारा होता है, प्रेम होता है, जो हमारे सुख का साधन है, जिससे हमको सुख मिलता है, उससे प्रेम होता है। लोग कहते हैं भाई सुख क्या है? लोक में कहावत है? पहला सुख रोगी काया और दूसरा सुख जो घर में हमारा और तीसरा sugoputragakari और चौथा sukpvrtanaiयही suk। लेकिन यही तो नहीं बनता। शरीर में रोग आते है। पुतञगारीनहस्त्री का भी माँ होना, गुजाने कब तक प्रेम रहेगा नहीं रहेगा। माया भी आई, न आई, आंखें चली गई। तो जो प्रेम के साधन, सुख के साधन हैं, उनमें स्थिरता नहीं है। लेकिन जिसके लिए ये साधन है, उससे प्रेम स्थिर है। वो पर प्रेमास्पद, जिससे हमारा प्रेम, सबसे, हमारा प्रेम अपने लिए है, अपने से प्रेम, किसी के लिए नहीं। तो वो जो अपना है, उसे आप से प्रेम। यदि होता है तो वो प्रेम हमारा स्थाई रहेगा।
इसलिए.
मीरा ने कृष्ण को चुना कि कृष्ण भगवान हमारी आत्मा है, परम प्रमास्पद.
है.
स्वयं उन्हीं को पति बनाए। वो कहती हैं। ऐसे बरको क्या बरू जो जन्मे और मर जाए। अविनाशी वर्ग को बनूँ तो रोरो अमर हो जाए। ऐसे वर्गों में क्या करूँ जो जननेता मर जाता है। मैं तो अविनाशी को बनूँगी। जैसे चूड़ी न पोलने पड़े। तो वो संकेत हैं। संकेत इस बात का है कि हम अपना जो प्रेमास्पद है, जिस जिस प्रेमास्पद से हमारा प्रेम कभी हटेगा, जो हमारे सुख के साधन से, कभी दुःख का भी साधन हो जायेगा, उससे अपना मन हटाकर, उसके उसके साथ जुड़ा जोड़ दे, जिससे कभी प्रेम नहीं हटता है। तो वो है भगवान। भगवान से आप प्रेम करेंगे तो वो स्थाई। और दूसरी बात ये भी है कि हम यदि प्रतीक्षा कर लें कि जिसे हम प्रेम कर रहे, उसको हम नहीं छोड़ेंगे, चाहे कुछ हो जाए.
तो तुम.
नहीं छोड़ोगे तो वो छोड़ देगा। अब उसका क्या करोगे? तो वो बड़ा मुश्किल है। संसार को छोड़ भी दे तो संसार तो छोड़ देगा।
आपको.
उसका क्या? इलाज। वही कहावत है कि नदी में बाढ़ आई थी, उस बाढ़ में 1 रिज वहीं जा रही थी। तो रीच के बाल को देख के गुरु ने चेले से कहा कि बेटा कम्बल पहना है, पकड़ ले। तो चेला तैर कर गया और रस को पकड़ना चाहा। गंबल समझ के वो था जिंदा उसने चेन्नई को पकड़ लिया। अब दोनों बहने लगे। गुरु ने कहा कि बेटा अगर कंबल नहीं आ रहा है तो कम्बल छोड दे। चला। तो चेहरा बोला गुरुजी, अब कम्बल ही नहीं छोड़ रहा। हम तो खूब कम्बल छोड़ना चाहते है, वो ही नहीं छोड़ रहा है। तो कहने का मतलब यह है कि संसार के लोग.
आपको.
सुख समझ के जिन को आपने पकड़ा था, वो ही दुख देने लगे, वो ही छोड़ देते.
है.
वो ही हट जाते हैं, उनका प्रेम आप से हट जाता है। तो ऐसी स्थिति में उत्कृष्ट होता है। पर हम देखते हैं कि भगवान सबसे प्रेम करते हैं, उनका प्रेम किसी से नहीं हटता। जीव किसी भी अवस्था में हो, भगवान उसके प्रति कृपा करते ही है, नियम है। जो भी जीव है, जहाँ भी है, उसके प्रति उनका अनुग्रह रहता है और उसकी सलाह रक्षा करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि वो उनके सामने रक्षा के लिए हाथ बढ़ा दे कि प्रभु हमको बचाओ। तो भगवान को भी 1 निमित चाहिए। कोई आधार जाइए आप लोगों ने सुना होगा। सुदामा नाम का 1 ब्राह्मण था, बहुत निर्धन था। ऐसा कि उसका चित्रण किसी कवि ने कहा किया है। आज भी उसको सुनकर आँखों में आँसू आ जाते हैं। धोती पटीसीलटीदुपटi नहीं जाने को गावा चकित।
रामा.
पूछा तो दीन दान को धाम बता। और यही नहीं.
न।
उसके पैर में जूते हैं। पगड़ी भी फटी है, कपड़ा भी तार, तार कटा है, पेट पीठ में सड़ रहा है। आँखें धसी हैं। ऐसा गरीब ब्राह्मण आपको यहाँ आया है और उसका नाम सुदामा है। भगवान पहचान जाते है। यह सुदामा मेरा बाल सखा है। गुरगुर में मेरे साथ पढ़ता था तो दौड़कर आता। सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण सुदामा को गले से लगाकर अपने महल में ले आते हैं। और जिस सर रुकमणि साथ भगवान बैठते.
है.
जिसमें बलदेवजी भी नहीं बैठ सकते, उसमें भी उसी में ब्रह्मण को बिठाकर उसका चरण होते है। सोने का तार आता है, गंगाजल की हारी आती है, भरी हुई, पर उसकी आवश्यकता नहीं पड़ती। पानी परात को हाथ छू नहीं, नैनन के जल सों पग धोय हाय महादुख उपायों का तुम आये। इतै न कितने दिन खोए बहुत दुखी हो गया भगवान। अब उनके मन में यह आया कि इसकी दरिदरता दूर कर, दू कैसे करूँ। इसकी गरीबी को दूर करना बहुत आवश्यक है। दया से हृदय परिपूरित है, लेकिन बहाना पहले भोजन कराया, विश्राम कराया। विश्राम के बाद जब सदामाजी उठे तो उनके पास बैठ गए। पुरानी बात करते रहे, करते करते पूछा कि मित्र गुरुगुल से लौटने के पश्चात आपने विवाह किया कि नहीं किया? भरिoासजीनवाआपने अपने योग्य पत्नी का परिग्रह किया कि नहीं किया? सुदामाजी आखें तो पधारे हमारी भावज ने कुछ तो सौगात। भेजी होगी तो उनकी पत्नी ने 4 मुट्टी चोडा, 4 घर से मांगकर अपनी साड़ी फाड़कर उसकी पोर्टरी बनाकर पतिदेव को दे दी थी की तुम अपने मित्र के पास जा रहे हो। राजा है रिक्त पाने, न पचे तो राजान ईश्वर गुरु राजा के पास, ईश्वर के पास, गुरु के पास खाली हाथ नहीं जाना चाहिए, कुछ हाथ में लेके जाना चाहिए। रिक्त पाद, न लोग, फूल फल कुछ लेते है, है गुरु के पास, राजा के पास तो भगवान भी राजा है और का दे और कुछ था नहीं.
दे.
तो वो अपनी कांख में सुदामा जी अभी भी दबाए हुए। वो इस सब को की मैली कुचेली कपड़े में बनी महाराजा राज द्वारकाधीश को कैसे दूं। भगवान उसे छोड़ देख रहे है। तो भगवान ने याद दिलाई। मित्र जब हम लोग लकड़ी लाने गुरु की आज्ञा से जंगल गए थे तो गुरु माता ने कुछ चने तुम्हारे पास रख दिए थे कि भूख लगे तो तुम दोनों मिल कर खाना ना लकड़ी। चुनते चुनते शाम हो गई, बादल आ गए, पानी बरसने लगा, पेड़ के नीचे खड़े खड़े। हम लोगों ने रात बिताई और तुमने चने खाने शुरू कर दिए और हमने पूछा कि मित्र क्या खा रहे हो, तुम बोले ठंड से दांत कटकटा रहे.
हैं.
तो मित्र जैसे तुमने पहले चोरी करी, वो आदत कभी नहीं छूट रही। जब तुम्हारी पत्नी ने हमारे लिए भेजा है तो हमको देने में संकोच क्यों करते?
हो.
की रिपोर्ट ली। यहाँ भगवान के पपोटीखींचने का भी प्राय है कि इनको देने के लिए कुछ लेना चाहिए। नियम यह है परमात्मा का जो दूसरे का हड़पता है वो दरे दिल होता.
है.
और जो देता है वो धनी होता है तो इससे दान करवाओ तो दान 7 होना चाहिए। देश के काले चपाती का तददानमसाथुकम देश, काल और पात्र में जो दान दिया जाता है वह दान साक्षर होता है। आप समझ लीजिए देश काल, आप बजरी न जाएं और बजरी न में जाके ठंडा सर्वत पिलाएं लोगों को तो क्या मतलब है ठंड तो वैसे ही और राजस्थान में गर्मी गुदनों में जाए कम्बल का दान करें बेसिक गर्मी है।
वहाँ.
तो जहां जैसी आवश्यकता हो, जैसा देश हो, जैसा काल हो और जैसा पात्रकुपातकुपातगुदान करने से लाभ नहीं होता। कहते समुद्र किनारे जहाज के 2 बेड़े खड़े थे, दोनों भेड़ों के सामने 2 मांगने वाले गए और दोनों को 11 टका मिला तो 1 ने जिसको का मिला था उसने मछली मारने की कांटी खरीदी और मछली मारना शुरू किया.
और.
दूसरे ने उसे टके से री खरीद के फूल बत्ती बनाई और भगवान की आरती उतार तो जिसने भगवान की आरती उतारी थी उसका बेडा पार हो गया और जिसने जिसके पैसे से काट दिए थे उसका बेटा गर पर रुको पा.
Pat.
आप सोचिए गाय के ठंड में बछड़ा अपना मुँह लगाता है वह पात्र.
है.
और गाय के थन में जोक मुह लगा कुपाtबचबदूध पीता है और जो खून पीता है तो कुपातकोनसतपात को दान देना चाहिए और सतपातमेंससेबड़ा पात भगवान है भगवान से बढ़कर कोई पात्र ने इसलिए अपने पास यदि भगवान ने लक्ष्मी जी हो तो वो नारायण को समर्पित होना चाहिए पति पत्नी में यदि मतभेद हो जाए तो यह माना जाता है कि पति पत्नी का जो जोडा है परस्पर प्रेम के लिए है और प्रेम से ही बेचारे सुखी रहते है कोई बीच में चोगलकोरगुजाए और गल कोर उनके बीच में भेड डाल दे तो भीड़ डालने में क्या देर लगती तो उनका मन मनमुटा मनमुटाव हो जाएगा। तो वो इसलिए कहते हैं पति पत्नी के बीच से नहीं निकलना चाहिए.
गुरु.
शिक्ष के बीच से निकलना चाहिए, पिता पुत्र के बीच से करना चाहिए अर्थात भेद नहीं डालना चाहिए। और अगर कोई भेद डाल चुका हो या किसी कारण से उनका मन मारे हो गया हो और दोनों को मिला दे तो बड़ा भारी पूर्ण आत्मा होता है.
तो.
यह मिलाना पूर्ण है। तो लक्ष्मी जो है भगवान की पत्नी.
है.
उसको भगवान से मिला देना यह पूर्ण, यही बात हम लोग कहते हैं अनजान इन लोगों की समझ में आती है कि नहीं आती की नदी जो है वो समुद्र की पत्नी है, गंगा 1 नदी है समुन्द्र उसका पति है, वो अपने पति से मिलने जा रही और तुम उसको बांध कर रोक रहे तो पापी हुए कि नहीं हुए.
मत.
रोको उसको जाने 2 बहने 2 तो भगवान ने सोचा कि सुदामा से दान करा 2 और उसका पाते मैं बन जाऊँ तो उन्होंने सुदामा के बगल से पोटली खींची और खींच कर खोला ये कहते हुए कि तुम्हारी पुरानी चोरी की आदत आज तक नहीं गई अब पोरी खाना शुरू कर दिया 1 मुट्ठी चूड़ा खा लिया, 1 लोक की संपदा, 1 मुट्ठी चावल के बदले सुदामा को दे डाली, दूसरी मुट्ठी चावल की खाई 2 लोग की संपदा दे दी। अब कुरषाध्यक्षलक्ष्मी जी थी, देने वाली। तो वही थे। उन्होंने सोचा कि अब हमारी हालत सुनामा की होने वाली है, सुदामा की, स्त्री की होने वाली है। तो उन्होंने हाथ पकड़ लिया कि महाराज कुछ प्रसाद हमारे लिए भी जोड़ो। तो भगवान कहने लगे। बहुत मधुर थे ये चावल। तो सुदामा के चावल जो भगवान के सामने आये, उसकी 2 लोक की संपदा देखकर भी भगवान को छिपती नहीं हुई। इसलिए आज भी लोग जब भोग लगाते.
हैं.
तो ये कहते हैं कि प्रभु जैसे आपने सबरी के बेर रोगे, सुदामा के चावल खाए, वैसे ये मेरा भोग स्वीकार है। तो हमारे कहने का भी प्राय यह है कि भगवान को देने के लिए 1 बहाना बनाना आवश्यक था। इसी प्रकार भगवान रक्षा के लिए तत्पर है, प्राणी के साथ उनका प्रेम है। लेकिन वो ढूंढते हैं कि कोई तो आए। तो उन्होंने अपने प्रेमियों के 4 विभाग कर दिए जो हमसे प्रेम करते हैं। वो 4 प्रकार के cतुरviधabजनteवa, जनासुखषनोटजनों, आरतूजिजयासुरज, ज्ञानी, चभर, सर, सबो, हे, अर्जुन.
Suki.
पुण्यात्मा, पुण्यात्मा मेरा भजन करते हैं, पuणयaतmaकhuजगमह नहीं दuजa मन क्रम बचन, विप्रपद पूजा। सबसे बड़ा पूण्य यह है मन वचन कर्म से ब्राह्मणों के चरणों का प्रयोग करे। ब्राह्मणों के चरणों का प्रयोग का र् य है कि संत पुरुषों के चरणों में जाए उनके पास बैठे। संतों के चरणों से प्रेम होने पर उसको पूर्ण लाभ हो जाए। सत्संग से बड़ा पुण्य होता है.
पूर्ण।
और यही भगवान की कृपा है। संत विशुद्ध मिलहिं पुनितेहचितवहिराम कृपा करि? गे जिसके ऊपर भगवान कृपा करके देख देते हैं, विशुद्ध संत उसी को मिलता है। संत के साथ साथ विशुद्ध विशेषण लगा दिया। वे धारी तो बहुत है। वेद धारण करके बहुत से लोग आ जाते है। किन्तु वो विशुद्ध है, सचमुच सच है। इसका क्या पता? पहचान कैसे हो? तो पहचान होना सामान्य लोगों के लिए बड़ा कठिन होता है। बात क्या है कि हमारा हृदय, यदि शुद्ध नहीं है तो पहचान भी हमें नहीं रहे। जिसके पास खोटा पैसा होता है उसको दाद देने के लिए 7 मिलते नहीं है। क्योंकि सब पार सकी उसको पहचाने नहीं होती। वो जाने किस को फल कहा जाता है। 1 राजा था वह गुरु खोजने चला कोई अच्छा महात्मा मिले तो हम उसको गुरु गुरु करें। सबको फेल करता गया तो गाँव में nt, nt, a, bad के के कई कर रहा था। राजा बोला ये अपनी आत्मा को कैसे तोड़े हुए है? न इधर गिरता है, न उधर गिरता है। उसी को साथ टांग 2 कर दिया। तो ऐसा भी होता है। कभी कभी संत के वेश में कालनेमी मिल जाते हैं। हनुमान जी को मिल गये थे, कल नहीं मिल गई? तो गोस्वामी जी कहते हैं संत विशुद्ध मनहितेपुनितेही चितवहिं, राम कृपा करि है? जिसके ऊपर भगवान कृपा करके देखते हैं, देख देते हैं। विशुद्ध संत उसको मिलते है। और विशुद्ध संत की यह पहचान है कि वे जीवों को भगवान से जोड़ते हैं। जो संत है, वो दूसरों को अपने से जोड़ते हैं, भगवान से नहीं। जोड़ते बह हमारी कृपा, हम कृपा करेंगे? अरे तुम क्या कृपा करोगे, अपने ऊपर तो कर लो, यह मुश्किल है। 1 सज्जन थे वो बहुत लोगो को तंज बदलाते थे, तो लोग उनके पास पहुंचते थे। हमारी ये समस्या, हमारी ये समस्या है। हमारी ये समस्या सबकी समस्या का समाधान करते थे। तो 1 बार भीड़ उनके सामने इकट्ठी थी। सबकी समस्या पूछते गए और सबको अपना उपाय तंत मंत बताते गए। अंत में सब चलेगा। 1 आदमी बचा उससे पूछा आपकी क्या समस्या है? बोले अब आपकी समस्या है। हम रेड लेके आये कि आपके पास कितना नाजायज पैसा है। ये बात है। तो निर्मल बाबा सबके ऊपर कृपा करते रहे और उनके ऊपर कृपा होने लगी। अब उनके ऊपर रेड आने लगी है। तो यह कौन सी कृपा है। अगर कृपा होती तो ऐसा कभी न होता। अब अपनी गड़बड़ी यह है कि कोई व्यक्ति कहता है कि महाराज हमें 1 साधु ने ठग लिया, कैसे खलकियाबोलेहमारे पास आया, बोला कि तुम 10 रुपए का नोट लाओ, हम उसका उसको सौ का बना देंगे। सारे 10 किलो नोट ले गए और वो गायब हो गया। हम तो ठग थे। तुम 10 को सोना ने चले। तो कहने का भी प्राय है कि जो व्यक्ति सद्भाव से सत पुरुषों के चरणों में जायेगा तो वो उसको भगवान के साथ जोड़ा। तो भगवान के साथ जब जुड़ेगा तो कई समस्याएं रहती है। समस्याओं से भी मनुष्य को छुटकारा दे। जीवन में बड़े बड़े कष्ट आते हैं हमारी, कुछ आवश्यकताएं होती है, कुछ ज्ञासा होती है। तो हम इधर उधर जाते। दुख आने पर हम डॉक्टरों के पास जाएंगे, बेटो के पास जाएंगे और कहीं कोई मुकदमा चल गया हो तो अदालत में रिश्वत देने जाएंगे, वकीलों के पास जायेंगे, कुछ न कुछ उपाय हम करे। लेकिन कभी कभी ऐसा भी होता है जब कोई उपाय काम नहीं करता.
तो.
उस समय पर भगवान की शरण में लेना पड़ता है। जब सब ओर से प्राणी हार जाता.
है.
तो भगवान कहते हैं मेरी ओर हाथ बढ़ाओ तो मैं तुम्हारा दुख दूर करूँ। तो यही होता है। अभी स्वामी अमृता नंदी बता रहे थे कि माता कुंती ने भगवान श्रीकृष्ण से अनुरोध किया विवसंतुमेदततजगतगुरु भवतो अपुन भवदशन, हे जगत गुरु मुझे सदा विपत्ति। यहाँ मिलती रहे। का विपत्ति क्यों चाहती। का विपत्ति के साथ 1 संपत्ति जुड़ी हुई है। जब विपत्ति आती है तो उसको दूर करने के लिए आप। आजाते तो सारी विपत्ति है, उससे बड़ी सम्पति क्या है? जब मिल गए उसी की कथा महाभारत में कि दुर्योधन पांडवों से अत्यंत देश रखता था, जुए में छल करके हरा दिया था और उनको 13 वर्ष का वनवास दे दिया था, तो बेचारे मन में कष्ट पा रहे थे। लेकिन धर्मात्मा थे। उन्होंने सूर्यनारायण की आराधना की तो सूर्यनारायण ने उनको 1 बटोही दे दी.
कि.
ये जरूरी को वो आप दे दीजिये। इसमें जो भी वस्तु सब प्रकार का भोजन आ जाएगा और आप कभी इसको देते जरोबदिकितपडोसी जाए, कभी अन्न कंपनी होगा। लेकिन जरोबजिकेखाने के बाद फिर नहीं मिलेगा। तो बडेबड़ेमहात्मा, ब्राह्मण, अतिथि सबकी पाण्डव लोग सेवा करते थे, हजारों लोग उनके साथ चलते थे। तो ये सुन सुन के दुर्योधन के मन में ईरशा हो गई। पांडव अभी भी सुखी है, इनको हम कैसे दुख पहुंचाए। तो 1 दुर्वासा नाम के rishi थे, जो बहुत क्रोधी थे और जरा सी गलती में साफ दे दिया। तो उन्होंने सोचा कि दुर्योधन। दुर्धर ने सोचा कि दुर्वासा जी के कोप भाजन बनाए जाए।
पा.
तो उनको चातuरमsकरऔरइतनी सेवा की खड़ी रहता। ये लोग तपस्या भी करते, लोग समझ कौन तपस्या करेगा। रावण ने कैसा तब किया था। लेकिन इनका इरादा खराब था, बुरे इरादे से, तपस्या भी गड़होतीतोदुर्वासा की भक्ति से उसने सेवा नहीं की। सेवा इसलिए की कि हमारी जो इच्छा है, वो पूरी करने में यह सहयोगी बन जाएगा। तो 4 मार्च में खूब सेवा की। दुर्वासा जी प्रसन्न हो गए। बोले दुर्योधन वरदान मांग। बोले महाराज ही वरदान है कि आप 10 हजार शिक्षों के साथ बन में, जहाँ पांडव इस समय रह रहे हैं, उस समय उनके अतिषीमनकेजाइए जब द्रोपदी ने भोजन कर लिया। समझ में था कि द्रोपदी के भोजन के बाद और दरबार भोजन नहीं कर पाएंगे, तो साफ दे देंगे, मजा भस्म हो जायेंगे। तो दुर्वासा जी ने कहा ठीक है.
मस्त.
सब ब्राह्मणों को भोजन करने के बाद द्रोपदी ने जब भोजन करके आचमन कर लिया, तब दुर्वासा जी 10 हज़ार uजिटनेपणमकिया ग्रहण करे, गे, 10 हजार राज है। तो हो गए सरोबरमेंस्नान करने के लिए। जिजेक ने द्रोपदी जी को बुलाया द्रोगवुतिज भोजन तैयार रखो, 10 हजार ब्राहमणों को भोजन कराना है। बोले महाराज, अब तो भोजन कर चुके है। अब तो पांडव बड़े दुखी हुए, जोगी दुखी हुई कि क्या करें, लोग बच नहीं सकते, तो उस अवस्था में अकारण करुण करुणा। भगवान श्री कृष्ण को ही उन्होंने स्मरण किया। वह हमारी पांडव लोग बड़े दुखी अवसाद में बैठे हुए थे कि इतने में घर, घर, घर, घर की धनी सुनाई पड़ी सामने रत आया। रत खड़ा हुआ। श्री कृष्ण चंद परमानंद रत से उतरे। उनका स्वरूप देख के प्राणों पर पर हो गए। उन्होंने आगे को भी को नमस्कार किया। अर्जुन के गले मिले नकुल सहदेव ने उनको प्रणाम किया। अंत में द्रोपदी ने प्रणाम किया तो मुस्करा कर बोले, जबदी हमको भूख लगी, भोजन राwकmहाराजआप, क्या कह रहे हो? मेरी परीक्षा लेने आये हो। आज मेरे पास कुछ नहीं है, बोले नहीं, कुछ, न कुछ तो है। मैं तो बहुत भूखा हूँ। बोले मैं तो बटरोही मान, चुकी का बटरोही माह। मिला तो दुरुभदिनेमजी बटरोही सामने की। भगवान ने देखा, साबकपत्ताउसमें लगा हुआ है। तो वो अपने हाथ में ले के मुँह में डाला और मुह में डाल के स्वयं सुप्त हो गए। रोगी को सुप्त कर दिया। परिणाम यह हुआ कि दुर्वासा जी के स्वयं पेट फूल गए, उनके शियों का पेट फुल गया। खटटीडकानआनेलगी राव राव, अब वो भोजन कराए तो क्या खाएंगे भागो यहां। और नियम यह है कि जब कोई किसी ब्राह्मण को निमंत्रित करता है, तो जब तक उसको भोजन न कराए, तब तक भोजन नहीं करता। अगर खाएगा तो दोषी होगा। और जो निमंतन स्वीकार कर ले, वो न खाए या दूसरी जगह खाए, उसको भी दोष लगता है। तो दुर्वासा भागने लगे। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा भीम सेन लाओ, उनको पकड़ भीम सेन दौड़ के गया के राज कहा जा रहे हो? भोजन करो करो भैया, हमें माफ करो नहीं कर सकते, कर चलना पड़े। अंत में दुर्वासा जी ने आ के समय चुना की, तब उनका छुटकारा मिला तो भगवान श्रीकृष्ण दुख आया, लेकिन दुख को दूर करने के लिए कौन आया पर आरती कष्ट आया कष्ट में हमने भगवान का स्मरण किया तो भगवान है। द्रोपदी का चीर हरण हो रहा था, द्रोपदी असहाय हो गए, सुनिए मैंने निर्बल की। पहले द्रोपदी समझती थी कि मेरे पति पर सभा में बैठे हैं, मेरे साथ देखकर वो दुस्सासन को दंडित करेंगे। दुस्सासन को बाल पकड़कर घसीटा जा रहा था, महल से घसीटते हुए सभा भवन में ले आया और बाल पकड के खड़ा कर दिया। दु शासन ने कहा इसका कपड़ा उतारो, नंदी करो और मेरी जांग में बैठा, यह मेरी चुकी है। पांडव लोग जुआ में हार गए, अब पतियों की ओर वो अपनी आँखें नीची करके बैठे है। 1 बार भीम सेन उठे बोलता है, लेकिन उसके बाद भी ुजिटेउसकोरगदते हैं, कहते हैं पांचों पति बैठे, मोड़ कौन गति हुई, और भी कुछ नहीं बोलते हैं। 2 कप कुछ नहीं बोलते हैं, कर्ण बैंग बोलता है। ऐसे में अकारण करुण करुणा वरुणालय भगवान श्रीकृष्ण को स्मरण करती है तो भगवान वस्त रूप धारण करके द्रोपदी जी रज्जा बचाते है। तो इस विपत्ति में भी भगवान का जो अनुग्रह होता है, भक्तों को, उसका सुख विपत्ति के दुख को बुला देता है। इसलिए माता कुंति ने कहा कि हमको भगवान अब संपत्ति नहीं चाहिए। अब पांडव राजा हो गए, हसनपुर मिल गया, विपत्ति के दिन चले गए, अब तुम भी चले तुम हीरापुर द्वारका जा रहे हो, विपत्ति के समय तुम आते थे, इसलिए हमें चाहिए ए तो अर्थ को भी अंत में भगवान की प्राप्ति होती है, इसलिए ये बोलो है। आपको बताएंगे आज यही है श्री राम.
जै राम जै, जै राम शी राम ज म ज र शी राम जय राम जय जय राम राम राम.
रबारी.
जरा तो मन में बिता रो क साथ लाये अर्रे चलोगे.
जाता सदा साथ यही पुकारो.
गो इन्द दमा दरमा द.
बेटी.
गोमन्द मो धरमा ध बेटी.
हे कृष्ण हे या दबे सकेती श्री कृष्ण.
गोविंद हरे मुरारे हे ना नारा यार वासुदेव श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे ना ना रा यण वास देव.
धर्म की अधर मकान प्राणियों में विश्व का गोमाता की उ हत्या हर हर मा देर।
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