Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 22

A Hindi lecture (transcript) by Jagadguru Swami Swaroopanand Saraswatiji on the Mandukya Upanishad (Chaturmas series). The speaker explains the three states of consciousness—waking (jagrat), dreaming (swapna) and deep sleep (sushupti)—and presents turiya as the witness that is non-dual (advaita). He discusses ignorance (avidya/maya), adhyasa (superimposition), the role of a compassionate guru in removing ignorance, and uses classical analogies (rope–snake, dream–king/beggar) and stories (King Parikshit) to argue that the world is mithya (apparently real) and vanishes on true realization.
Chapters
सावेर लक्षनेन। तत्त्वा प्रदुरोधुरुपनेन। वीजात्मन। अन्यथा माया लक्षनेन। अन्यथा गना लक्षनेन। चा अनाधिकालप्रवृत्तेन। माया लक्षनेन। स्वप्नेन माया यंपिता। पृत्रोयम् नप्ता। छेत्नम् पस्वो। हमेशां स्वामी सुखी दुखी ख्षहितो अहानेन वर्धितो बजितो चानेन चानेन इतेवं परकारान सपनान थानद्वेविपश्छन सुपतु यदा भेदानतार्थत्तत्वा भिक्गीन परमकर्णकेन गुरुणा नास्तेवं तम् ही तुफलात्म कहा किन्तु तत्तमसीत प्रिजबुद्धि मानू यदा तदेव प्रिजबुद्धि तेव।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। भरातमना। तत्वा प्रभोध और अन्यता ग्रहन दो हैं। तो तत्वा प्रभोध थीनों में हैं। जागरत, सापन, सुजुपति थीनों में तत्वा प्रभोध हैं। जागरित और स्वापन में तत्वा प्रभुत के सासार अन्यथा ग्रहन हुई हैं। जागरित और स्वापन में अन्यथा ग्रहन। जो वस्तु जैसी नहों हो उससे भिन रूप से उसका ग्रहन हो जाने लेंगा। अन्यथा ग्रहन। तो यह समझ दिजिए कि जो जीव है अनाजिकाल से अग्रहन अपने वास्तविक स्वरुप उग्रहन नहीं कर बारा है। कि मैं कौन हूँ। अन्यसाग्रहन और अन्यसाग्रहन कर रहा है। इसको भाष्ण में स्पर्छ किया है। तो ये कब से है वरे अनाज काल थे। यही माया है। स्वपनेन महवायम पिता पुत्र होयम। यह स्वपन हैं दोनों। जागरित भी स्वपन है। और स्वपन भी स्वपन है। अनिता ग्रान स्वपन बदात थे। और वही लागू हो जाता है यहां भी। जागरित भी स्वपन की तुल् तो इसमें क्या देखता है वो? मुमायं पिता ये मेरी पिता है। पुत्तुयं ये मेरा पुत्र है। नप्ता मेरा ये पुत्र है। ख्षेत्रं ये मेरा खेत है। पसवो ये मेरी पसु है। अहमेशाम स्वामी मैं इनका स्वामी हूँ। सुखी हूँ, दुखी हूँ। ये, सुखी, दुखी। अनिथा गरहन। अनिथा गरहन। ऐसा है कि सुख, दुख साक्षात कारा। सुख, दुख का साक्षात कार ही वो हो गया। वेदानत के बरिभर्षा के अनुसार। सुख और दुख का अनुभ तो सुक क्या है? विशय इंद्रियों के संयोग से जो अलवा होता है अन्तह करण में अहलाद होता है उसको कहते है सुक और प्रत्वूर विशय के संयोग से जो अन्तह करण में ब्यागरता होती है वो है दुख इस सुख और दुख का सुख दुख तो अन्तखर्ण में आते हैं। और जो सुध आत्मा है, साक्षी, उनको देखता है। साक्षातकार कर लेता है। देखता है। लेकिन देखकर उसके साथ अपने को जोड़ लेता है। हम सुखी और हम दुखी। यह संसार है। जो हमारा दिश है, उसको हम अपना है सुरुप मान बेटे। तो सुखित दुखित में उस संसार है। सुखी दुखी में हूँ, इसी का नाम संसार है। तो यह हो गया। सहीतो हमनेन इस दुख से मैं क्षीन हो गया। बर्जितस्चारीन इससे मेरी बृति हो गयी। एबं प्रकारह स्वपनान। इस प्रकार के स्वपनों को स्थानत दोये भी। प्रस्चन। दोनों स्थानों में। जागरित स्थानों में। और स्वपनस्थान में। पश्यन सुप्तू देखता हुए सो रहा है। ठीक हैं। यदा वेदानतार्थ तत्वा भिग्गीन परमकारुन केन। जिस समय वेदानतार्थ के तत्व को जानने वाले परमकारुनिक जो गुरु हैं वो आकर कह दें कि नास्तेवं तम। तु ऐसा नहीं है। ना तेवं तुम हितु भरात्मका हा। कितु तत्तु मसी। हितु भरात्मका हा क्या? हितु कहते हैं कर्म को। और फल कहते हैं शरीर को। कर्म ही भी हैं। तुम हितु भरात्मक नहीं हो। तुम में तत्वा अग्रहन भी नहीं हैं। और अनिथा अग्रहन भी नहीं हैं। तो तुम अज्ञान और अज्ञान से दिखने वाला यह जो प्रवश्च है। यह तुमारा स्वरूप नहीं है। किन्टु तत्वासी। तुम तत्वासी। जी प्रस्त्यो पसिभोध्यमाना इदा तदेवं पति बुद्धते।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। संसार समुदर से पार कराने वाली नवका बन जाती है। तो अभी समस्या आती है। छनमात। एक छनमात की सत्संग थी। पहुसागर से पार कैसे करा देगी। तो नियम तो यही है कि जब कशुकाल कर ये सत्संगा विरुप्रियास महीं ब्रह्मभंगा। मिरुगर्नु मारग्मा मुही। कवण भाती संजाओं तो ही। जब कुछ कार मनिष्य सत्संग करता है तो सत्संग से उसको ज्ञान होता है, ब्रह्म जूर होता है। यहाँ छरमत। छरमत भी कह रही थे भगवान शंक्रेचा जूर। क तो हम सोचते हैं कि संस्संग का यह अर्थवाद है, कि वो एक प्रसंचा है, लेकिन उन्होंने जो कहा है वो यथार्थ है, यथार्थ कैसे है? कि यह भवार्णो है, संसार समुद्र है, यह संसार समुद्र आनद समुद्र में कल्पित है, आनन्द सिन्दु मद्धितो मासा विनुजाने कतमारिस प्यासा। अरे जीव। आनन्द समुद्र में तेरे निवास है। तु आनन्द समुद्र ही है। तुझ में भावसिन्दु की कलपना हो रही है। तो जैसे रस्ती में सर्प की कलपना हो जाती है। सुक्तिका में रजत क उसी तरह से आननद, सिंदु, आत्मा में ये सब अनात्मा की करपना हो गई। कि मैं सुखी हूँ, दुखी हूँ, संसारी हूँ। मैं अमोक हूँ, मैं उसका बेटा हूँ, वो मेरा बेटा है। मेरा ये छेत है, मेरा ये है। ये सब अपने को समझ रहा है। तो ये जो समझ र तो स्वपने हुई भेकारी निप्र। रंक नाक पत्य हुए। जागे लाव नहाने कचु। तिमि प्रभन्च जोगे। लक्षमर घीता में लक्षमर जी कहते हैं, इसादराज को, कि कोई राजा स्वपन में अपने को भेकारी समझ रहा है। वो समझ रहा है कि हम, हमारा राज्य हमसे चिन गया, हम बेखारी हो गयें। और रंक, जो सडक में भीक मांगने वाला है, वो सवपन देख रहा है कि हम तो राजा हो गयें। सिंगासन पर बैठे हैं। तो ये दोनों प्रकार के जो सवपन हैं। एक में क्षे, और दूसरे में � किसी नहीं आकर हुट्स। क्या लेकर रहा है? बर्ररा। तो जो उठे तक आकर नहीं है। तो जो हम देख रहे थे यह कुछ भी नहीं है। इसी तरह से संसार स्वापन जो है। उससे गुरु। तत्तवसी कह रहते हैं। एक छण। उस से यह जाग जाता है। जाग जाता है तो उसको अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हो जाता है, एकशर मात्र में। तो यह है। गुरु कौन है जो तत्वाभिग्य हैं। तत्व को जानने वाला और परमकारुनिक। अन्यथा वो सोचे कहमें क्या मतलब है किसी क्यों हम किसी से उपदेश करे तो करुणा उसके मन में हो कि लोग भहमित हो रहे हैं इनको बचाना चाहिए वही हम लोग कत्रा में कहा करते हैं कि जब राजा परिक्षित को मुनी का शाप हो गया कि आज से साथ वरे दिन तुमको तक्षक नाग काटन तो काटेगा और तुम्हारी मृति हो जाएगा। तो सब रिशी-मुणी एकात्र हो गए क्योंकि भोत धर्मात्मा राजा था। ब्रामन के साफ से मरने पर निच्छे नरक होता है। इसलिए सब छिंतित थे। तो नारज जी सोचने लगे कि इसका करियान हो रहे जा गया। तो जंगलों में गूमते थे। तो अपने आपको बिना किसी से बताए। बढ़ा वर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नित्तर नि और जितनी देर में गाय दो ली जाएं उतनी देर तक विक्षा के लिए गर्था समयों के हाँ तैते थे। तो ऐसे अंतरमुक्त शुक्रेव जी के पास नारे जी पहुँचे और उन्होंने कहा कि आप चलिए राजा परिक्षित को ब्राह्मन का शाप हो गया है उसका उद्धा राजा से हम क्यों जाएं? हम नहीं जाएंगे। तो नारज जी ने कहा कि दिखे एक आंक वाला बेटा है और सामने एक अंधा चला जा रहा है और रास्तिक से भटक कर एक खाई की तरब जा रहा है। खाई में गिरने से उसकी मित्ति हो जाएगी। अब उसके कदम खाई के वहर बढ़ी रहे हैं। अगर आंक वाला ये सुचे कि हमें क्या लिन देन। तो विचारा गिर के मर जाएगा। तो उसको दुश लगेगा के नहीं लगेगा। पर नहीं लगेगा, तो उसका चलो। तो उनके मन में करना आ गई। राजा परिक्षि गुरु के रदावे अगर करुणा आ जाती है, तो वो सिश्चों को बोत करा देते हैं। और उनका कोई प्रवोजन नहीं होता। घ्यान जो है, ये बेचा नहीं जाता। घ्यान का दान होता है। बहुत से लोगों ने आजकर घ्यान बेचना फुलू कर दिया। पहले फीस ल� और उसके बाद फिर उनको उपदेश करते हैं। तो यह सब खरीदना है। कल हम लोगों ने देखा टेलिविजन में। एक कोई राजे मा है। उसको जुना अखारेन महा मंदलेशार के बाद भी दे दी। बीच रहे हैं। मंडलेशर पर पैसा लिखे। पैसा लिखे। पैसा लिखे। पैसा लिखे। पैसा लिखे। पैसा लिखे। पैसा लिखे। लिखे। पैसा लिखे। लिखे। पैसा लिखे। पैसा तो यह घ्यान लिख को बेचना है। यह संतों का काम ले गई नहीं है। संत जो हैं वो यह देखते हैं कि बक्ती का कल्याण हो। तो ऐसे लोगों को महत्व देते हैं जो जनता को घ्यान का उपधेज दे कर सनमार्क के ओर ले जाएं। तो जब बेवसाईयों को अब हम इसके लिए अजकित बनाएंगे, तो वो बेवसाई करेंगे। जंता कर्याण कैसे करेंगे। इसमें करुणा नहीं है। करुणा वो है जिसमें मिना किसी स्वार्थ के। हम दूसरों की करुणा। और ये महात्माओं का स्वभाव होता है। व तो वो जाके तत्त का उपदेश कर देते हैं। और जैसे ही तत्त का उपदेश होता है, वैसे ही उसके अज्ञान का नास हो जाता है। तो ये भगवान तो वो जाग जाता है। कथम नास्मिन भाईयं आप्भ्यान तरवंवा जन्मादि भाविकारो अस्ति अतो कथम नास्मिन किन्तुरत्मसीत परिजमादमानो इश्दा। तदा एवं परिजबदुते। एवं माने उपर जो कहा। एवं माने... तदा इवं। एवं माने... इस लगाग। अच्छा माने दिर्मस्वांपिरित्य। हाँ, ये बात। मक्षमानम। हाँ, मक्षमानम। कतं नासमन भाह्यम आ� कथम यह लगया। नास्मन्वाहियं आप्भेंतरंबा जन्मादि भावविकारो अत्ति। अत्तु अजब। मुझ में वाहि और आप्भेंतर जन्मादि भावविकार नास्ति। ना है ना पहले। नास्मन्वाहियं आप्भेंतरंबा जन्मादि भावविकारा। अस्ति अतो अजम इसलिए मैं अजम सबाया व्यन्तो यजायति स्वते सर्वभावविकार वरितमित्यर्थां तो भावविकार निहें छे जायते अस्ति बर्दते विपरिणमते अपक्षियते नर्छति ये छे विकार हैं, भाव विकार हैं। जैसे देवदत का पुत्र, किसी भी बेकती का पुत्र, तो देवदत का पुत्र है या नहीं है, ये पहले है ऐसा नहीं कहा जा सकता, जब वो जन्म ले लेगा, तो कहेंगे देवतास्तस्य पुत्रा अस्ति। पहले जायते हैं। जब जन्म लेगा, तब कहेंगे अस्ति। तो जन्म एक विकार, फिर अस्ति दूसरा विकार, फिर बर्धति, वो धीरधीर बढ़ता है, और पिर उसके बारे में परिणामते हैं, उसमें परिणाम होता है, परिवर्तन होता है। और एक सीमा के बारे में जाके अपक्षय चुरू हो जाता है। तो अपक्षय होते होते अंध में नश्ट हो जाता है। कोई भी पोधा के उनको आया चनाय का हो, आपने लगाया खेत में तो पहले वो उत्पन होता है। तो तो मैंने फसल है। फर दीड़ी दीड़ी बढ़ गयी। फर परिनत होती जा रही हैं। परिनत होते होते उसमें से बाल लग गयी, बीज लग गया, फर लग गया। उसके बाद उसमें अपक्षय शुरुब जा जात प्रत्ति वेक्ति का शरीर पहले उसका जन्म होता है। जन्म लेने के पस्चात अस्तित्व में आता है। लोग कहते हैं यह भी है। देवरत का पतु हो गया है। पर बोड़ी जीरे जीरे अब छोटा सा बच्चा पेदा होता है। फिर उसके बाद बारतते बड़ा हो जाता हैं। फिर पर्नामत्ते उसमें परिणाम आता हैं। फिर बाल्यावस्ता आती हैं। फिर जुवावस्ता आती हैं। फिर बृद्नावस्ता आती हैं। फिर आप अक्षिये दियें। जिससे रस रक्त बनता था। उसे अन्य से बर्ग शरीर से प्राणी निकल जाता है। तो अनाधि माया से सुत्त प्राणी को जब जगा दिया जाता है परमकारणिक गुरू के द्वारा तो वो ये समझ लेता है कि ना तो मेरा जनम हुआ, ना मैं अस्तित में आया, ना मैं बढ़ा, ना मुझे में परिज्ञाम, और ना मेरा अपक्ष है। और ना मेरी मृत्य। आजम। मुझमें जन्म नहीं है। जन्म के साथ सर्विकार उपलक्षन है। अजम। तुन सबाया अभ्यन्तरोः खेज़ा। ये सुति कहती है। बाय क्या है और अभ्यन्तर क्या है। तो वह कारी और अब्भींतर कारण, वो कारी कारण से रही थे। आज हैं। सरभाविकारबलिकमित्यर्था यस्मा जर्मादि कारण भूतम। नास्मन विद्या तमो भीजम। जर्मादि के कारण जो है अविद्या तमो भीज। अविद्या रुभित तम। जो की भीज है। अविद्या तमो भीज निद्रा। निद्रा भीज थे। यही निद्रा है। तमो बीज उन्दकार का बीज निद्रा है। यह अविद्या है। यह इसमें नहीं है। अविद्या इसमें है नहीं। अनिद्रमि तत्तुरियम। तुरि जो है अनिद्र है। वो नहीं सोता है। वो बराबर देखता रहता है। इसलिए अस्वपनम। तन्निमित्तत्माद अन्यताग्रहनस्य।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� निर्दा रहित और स्वप्र रहित हो गया। तस्माद आजम अध्वैतम और अध्वैतम। अध्वैतम क्यों हुआ? स्वप्र में हम देखते थे हमें हमारे माता हैं, पिता हैं, भाई हैं, पुत्र हैं, खेथ हैं। यह सब दिखाई बढ़ रहा हैं। तो यह द्वैत हैं और जब हम जागते हैं तो अखेरे रहते हैं। यह कोई है ही नहीं। इसी तरह से, इस माया रूपी अविध्या से, निध्रा से, अविध्या रूपी निध्रा से, जब यह नारी जीव जागता है, तो फिर अध्वित रह जाता है, अखेरा रह जाता है। जागरत में जो माता अभी तो आपको इसलिए दिखा ही बढ़ रहा है कि अभी आपकी अभिज्या दूर नहीं हुई हैं। अभिज्या जब दूर हो जाएगी और आप अपने स्वरुप को जान लेंगे तो कौन आपकी माता है, कौन आपका पिता है। जब आप अपने को सरीर मान लोगे तो भी न तो कोई किसी सम्बन्त नहीं है। जब आहम शरीर के साथ जुड़ जाएगा, तो मम आ जाएगा। मैं और मेरा। यही माया है। मैं अरुमूर तोरत माया जो बस कीने जीव निकाया। मैं मेरा और तू तेरा। यही माया है। तो जब हम शरीर को मैं मान लेते हैं, तो शरीर के संवंधियों के साथ हमारा संव्योग हो जाता है, वो जुर जाते हैं, कि ये हमारी माता है, ये हमारा पिता है, ये हमारा बंदु है, ये इस्ती है, ये पुत है, ये सब जुर गया, जब हम शरीर ही नहीं हैं, तो इनसे हमारा क्या नाता है? जागरत में ही स्वभन नस्ट हो जाएगा। लोही तो है। प्रतिभोत तो जागरत में ही होगा। तो गुरु जब बताएंगे कि तु सरीर नहीं है। तु सरीर नहीं है, तु इंद्री नहीं है, तु प्राण नहीं है, मन नहीं है, बु तो वो जाग गया, जाग गया तो बस। नहने में वाद द्वयं। ये जो है ना वो दक्षिना मुर्थी। विश्वं धर्मनमर्स। तो ये हो गया, अब हो गया भाष्व, अब स्कृति को हो जाया। पहले साधन ही किया जाता है कि जागरित और स्वपन को मिलाये जाता है। जैसे स्वपन है वैसे ही जागरित है। जागरित और स्वपन में कोई अंतर नहीं है। वो भी दिखता है, ये भी दिखता है। तो उसमें भी सुगदुख का अन्भव होता है। इसमें भी सुगदुख का अन्भव होता है। उसमें भी माता-पिता दिखते हैं, वाही दिखते हैं। बंदु-बांदव दिखते हैं, छेत दिखते हैं। यहाँ भी दिखते हैं। � तो स्वप्र जो दोनों हैं, तो पिर जागरित कौन हैं? तो ऐसे इत्तिते में ये कहना होगा कि जो इसको देखने वाला है, ये ही जागरित हैं। अब इससे जाग रहे हैं, हम जाग रहे हैं। इसका क्या लक्षन है, कैसे हम समझेंगे हम जाग रहे हैं। तो ये सब स्वपन है, ये जान लेना ही जाग जाना है। ये सब स्वपन है, इस बात का भोध हो जाना, कि हम जी स्वपन देख रहे थे, हम यह है नहीं। जाँना ही जाँना है। जाँना है। उन्हें तो इसे में भस जाएंगे आप। उलजी ही रहेंगे। फिर यह है कि हमने एक बार एक महत्मा थे अखंडानन्दी, पीरी कूठी वाले, जो शिवों हम सिवों कब देते थे। उनकी पास हम पहुँँचे। इतने पुराने महत्मां सब से हमने सतन्ग किया। जिसका सना उसी के आगे। हमने कहा, महराज, हमको जागरत और स्वपनेक से लिखा ही पढ़ते हैं जागरित भी स्वपन है। आप बताईए जागरित क्या है। तो वो विदान्त का बुब्देश कहने लगे। हमने कहा यह भी तो स्वपन है। तुम भी स्वपन हो। जागरित बताओ। अब उनकी जो चेले थे वो कहने लगे हम बताते हैं। हमने कहा हम इन ही से पू बहुत देर तक चर्चा होती नहीं। कोई निलनाई नहीं हुगा। तो तत्त यही है कि यह जब समझ जाया मनस्य की यह स्वपन है। वो ही जागरन हो गया। सुपनो यविति निष्चेया। हम सौपन हम। तो जब तक हम इसको जागरित समझते रहेंगे, तो सौपन समझती में तभी मिठ्चात हो गया। सच्चा नहीं है यह हम। जब तक हम इसको जागरित समझते रहेंगे, तो इसमें सच्चत बुद्धी रहेंगी। सच्चत बुद्धी रहेंगी, तो जब सत्यत बुद्धी इसे हड जाएगी, तो इसका दुख रहना बंद हो जाएगा। ये है। सब हरी भाई ने जाएगी सर्वसार। हाँ? टीका में। टीका में। टीका में चलिए। कदा तत्व प्रति बुद्धों में परियासक्षै तुर्भवति इत वेक्षाया विपर्यास और क्षेक का हीतु। विपर्यास के क्षेक का हीतु कैसे होता है। वोने अनाजी। अनाजी माया सुप्तु यदा जीव प्रभुदिते। प्रति बुद्धमानम् तत्रमेव विशिनस्टी। प्रति बुद्धमान तत्र क्या है। अजम् अजम् अनिद्जम् अस अध्वितम् बुद्धिते ददा।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। संसरती है परमात्मा, लेकिन जीवभाव को प्राप्त होके संसरत होता है। तस कतब जीवभावा पत्ति रिच्चा संक्य। कहते हैं, जीवभावा पत्ति उसकी क्यों है? वो एक कारिकारन बद्धत्मात। कारिकारन के साथ बना हुआ हमने कारिकारन साथ। कारिकारन बद्ध पर्मात्मों उभै लक्षनेन स्वापेन सुप्तु जीवो भवती। पर्मात्मां उभै लक्षन तत्त्वा प्रतिभूध और अनिताग्रहन। रूप से सुया हुआ है तिर्णिव जीव केलाता है। स्वापस्य उभै लक्षनत्तु मेव प्रकडियती। उभै लक्षनत्तु तत्वे ताल है। माया लक्षनेन उबयत्त संबध्यते। माया दोनों हैं। माना अग्यान, अपरुभूत और अनिसग्रहन। सुप्तर्विवेनक्ति ममेति। सुप्तर्विवेनक्ति ममेति। सुप्तर्विवेनक्ति ममेति। सुप्तर्विवेनक्ति ममेति। सुप्तर् पवाती। कहते हैं जो सौप में परिगरीत है उससे ही उसका प्रिजबोध होता है यदेती। यदा सुप्तत्ना बुद्धते। जो सोता है वो ही जाएगा। प्रिजबोध कम बिर्शिनस्ति। प्रिजबोध क कौन है तो वेडांतात विग्ग है। कथां प्रदिभूधिनम् अनुमुवि मानत्तुमेव इत्युच्यसे। यते नासित्तम् अनुमुवि मानत्तुमेव अनुमुवि मानत्तुमेव अनुमुवि मानत्तुमेवं इत्युच्यसे। इस तरह जानता है। यतोग्दवशेषनेन गुरुणा प्रदिभूध्यमाना जो कारणक गुरु हैं उसके दारे परिजमोद्ध मान वे शिष्चे। तदा असववेवं बख्षमानप्रकारेन प्रिजबध्धो भवती। इस प्रकार प्रिजबध्धोता है। तमेव प्रकारं प्रेशन पुर्वं दुती अर्थम ब्याक्यानेन। मैंते उसी प्रकार को कैसे जाता हैं? अस्मिन्नी की सप्तम्या बुर्ध्यात्मस्तुरूपं प्रामरिष्यते ये कहते हैं अस्मिन। नास्मिन। नास्मिन बाया बिंतरंबा जन्मान भाविकारा अस्ति। अस्मिन बोला है। माने बोध्यात्म सूर्पम और अमरिष्ठ दें। बाहियम क्या कारियम। आभ्यन्तरम क्या कारणम। तच ओभेमिव नास्ति। कारिकारणमुझ में नहीं है। ततो जन्मादिर भावविकार स्तिर्णाचा और काशा। इसी जन्मादिर भावविकार का उसमें अवका सबायाभ्यम्तरा सुति अजत्वादेव अनिद्रं अज होने कारण अनिद्र है कारिया भावे कारणस प्रमाणा भावेन जब कारिय नहीं है तो कारण कभी कोई प्रमाण नहीं हो सकता इसलिए कारी कारण दोनों नहीं कहे जाकते यस्मात अनिद्रत्महितुकृत्वा विशेरनातम् दर्शति अतियवित्तु। अग्रहान ता ग्रहन सम्मन्द वैधुरि हितुं कृत्वा। अग्रहन ता ग्रहन सम्मन्द का वैधुरि को हितु वना कर। विशेशन द्वयम् यस्माच्चा। यस्माच्चा जर्मादिकारन भूतम् नास्मुन विद्ध्यातमो अनिध्यमि तत्तुरियं। तु तत्तुमेवं लक्षनोस्तु। आत्मन क्यों आयातम। कहने तत्तु ऐसा हो जाए, आत्मा का क्या हुआ। इस आशंकर से कहा, तुरिय मिठी। तदा विशिष्टेन आचारेन विशिष्टम्। विशिष्टम् प्रति प्रसिभूर्णे ना� प्रपंचो यदि विद्धेतो निवर्तेतन असंशया माया मात्रमिनम् दहितम् अध्वितम् बरमार्थतः प्रपंच निवृत्या प्रेत पुछिबुद्धते अनुवृत्ते प्रपंचे कसम अध्वितम् कहते हैं प्रपंच की निवृत्ती अगर प्रवंच निवृत्र नहों। तो अद्वेत कैसे हो सकता है। उच्छतेव। सत्तमेवं शात् प्रवंचो यदि विद्जेत। यह बात सही होती यदा प्रवंच होता। रज्जुवं सर्पेव कर्पितत्वान नतु समिद्जतेव। रज्जुव में सर्प के समान यह प्रवज्ज है ही नहीं। विद्धमानस्ते निवर्तते नसंसेया। अगर होता तो निवृत्थ होता। नई रज्जौं भ्रांत्य वुद्ज्या करपितस् सर्पु विद्धमानः। सन। विवेक तो निवृत्थ है। कहते हैं, रज्जू में जो सर्प दिखाई होता तो निवृत होता है ही नहीं। नयु माया मायाविना प्रलुक्ता त्रद्रशिनां चक्षुर्वंदा उगमें विद्धमानासति निवृत्ता। कहते हैं ये जो मायावी हैं, इनगजाली, ये मनुष्यों के नेत्र बान देते हैं। दिखने वालों के लिए। वो कहते हैं, देखिए, आप अपनी-अपनी घरी देख लिए। सबको घरी में जो बजा नहीं है, वो दिखाई पड़ जाएगा। अगर दो बजा है, तो उनको बारा बजा दिखाई पड़ने लगेगा। वो ऐसा नेत्र मांद देते हैं, वही उनको दिखाई पड़ने लगता है। तो नेत को बान देते हैं यह लोग। तो नेत को बानने से जो कुछ दिखाई पड़ रहा है जूठा। वस्तुता वो है थोड़ी। बारा थोड़ी हो जायें। बारा दो ही है। लेकिन उसने आँग बान दी तो बारा दिखने ल तो नेत्र का बंधन अगर शूर जाये तो दो का दो बजाये, बजाये दिखाई पड़ेगा। इसी तरह से आंग बांध कर अनेकों तमासे दिखाते हैं, नेंद्र जारेक। तो नेत्र बंधन जैसी दूर होता है, वो खतम हो जाता है। अब यह जो जादुबर है, यह हाथ की सफाई, नित बान दिया। नित बान दिया तो कुछ का कुछ दिखने लगा। आप कहते हैं, एक महात्मा उपर से गरा देते हैं, आम गरा देते हैं, इमडी गरा देते हैं, अगूठी गरा देते हैं, तो एक बेक्ती, उनके ही सिछ मिला हमको, सत्साइं बाबा का, वो भी यही करता था। तो हमने उससे कुछा कि तुम यहसा कैसे करते हो, कैसे दिखा लेते हो कि चीज आ गई। बोले वो चीज टेबल में रखी रहती हैं। हम हाथ उपर करते ह जब तक वो आंत उपर करे, उपर से नीचे लाए, अम थट से उठा करें। यह दिखा दिया। यह आकास से आ गई। अब आप देखिए सिवलिंग दिखा देते हैं। मुह से सिवलिंग निकार रहे हैं। तो मुह से सिवलिंग अगर निकार देते हैं, तो अगर पहल उतना बड़ा सूलिंग कैसे निकलेगा। तो लोगों का नेत बांद देते हैं। नेत बांद देने से वो ऐसा रिकता है कि ये मुहसे निकारना है। तो ये चक्षुर बंद केवल नेतों को बांद देने की अथिकत और कुछ नहीं है। खित नेतों को बांद देने के बाद क� विद्धमानस्ते निमृतेत नहीं रज्ञाम भ्रांति बुध्या करपित सर्पु विद्धमानस्तन विवेक्तो निमृतत निवमत्माया मायाविना प्रयुक्ता तद्धर्शिनां चक्षुर्वन्धापगमे।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। तथेदं प्रवंचाक्यं मायामात्तं दैतं। प्रवंच रूप जो मायामात्त दैत है। रज्जुवन मायावि वच्चाद दैतं परमार्षत्त।। रज्जुवन मायावि वच्चाद दैतं। परमार्थतत तस्तस्मान न कश्चित प्रवंचा न पुरृत्तो न मित्तो वास्थिति। कहते हैं कि रज्जू कौन है। जैसे मायावी है। मायावी की आंक नहीं बंदी है। जो देखने वाले हैं उनकी आंक बंदी है। तो आत्मा जो है रज्जू के समान है। जैसे प्रवंच नहीं है। होता तो निर्विरित होता है। इसका बाद होता है। बाद में और नास में अंतर हैं। संसार का नास, लोग कहते हैं नास हो जायें। तो नास को जो वस्तु होती है, उसका नास होता है। जो वस्तव नहो और नमको प्रतीत हो रही हो, उसका नास नहो के बाद होता है। ना प्रतीत तयोर बाधा हैं। किन्तु मिठ्याप्त निष्चे हैं। अब प्रतीती का नाम बाध नहीं है। मिठ्याप्त निष्चे हैं। आगर अप्रतीती ही संसार का बाद होता तो गाड़ी नीन में जाने पर या मुर्छा हो जाने पर संसार के निवर्ति हो जानी चाहिए क्योंकि प्रतीती नहीं हो रहे है लेकिन उस समय इसका बाद नहीं हुआ है इसमें मिठ्यात तो बुद्धी नहीं हुई है। सो गया है। देखना बंद हो गया है। जैसे देखना शुरू होगा, फिर समझ में आने लगेगा। फिर लगेगा जी है। तो मिठ्यात तो निष्चे ही बात है। तो यहां मिठ्यात तो निष्चे हो जाता है। तुरियं अध्वैतं इत्युक्तं तत्युक्तं प्रपंचास्थ दितियस्थ सत्वात् इत्याशंक्यार।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। जब दुती प्रभन्ज बिद्दिमान है, तो वो अद्वित कैसे होगा? तुरियं अद्वितं, यहां कहना होगा, तुरिय जो है, चतुत्, तो यहां तुरिय को उद्देश करके अद्वित का भेहान किया गया, कि जो तुरिय है, जागरित स्वापन सुषुपति, तीनों का साक्षी वो तुरी है। तो ये तुरी जो है अद्वैत है। आपने अद्वैत कैसे है इसको? तो द्वैत तो है। तो तुरी कैसे है? इसलिए ये आपका कहना कि तुरी अद्वैत है। पूर पक्षी बोलता है। इसलिए बोलते हैं प्रवंचा। प्रवंच निवृत्या तुरिय प्रज़बोधात। तद्धुति यत्तुम अविरुद्धमिति सिर्धान्तिकि महसांकाम पूरवाजी अनुभधति। तो सिर्धान्ति ने ये कहा था कि प्रवंच की निवृत्य तब अधुती हो जाएगा उसमें। तो ये दोना अभुरुद्ध हैं। तो ये सहधान्त की आशंका को पूर्वादी अनुवात करता है। तो कितर ही, पूर्वों प्रवंधिन वृत्तेर अनुवृतत्स। प्रवंधिन वृत्तेर अनुवृतत्स। तस सत्वान नाद्वित पूर्वादी जी कहता है की प्रवंच जब है प्रवंच की निर्वित्ती प्रवंच निर्वित्ते अनिर्वित्तस् तस्त्सत्वात् प्रवंच की निर्वित्ती जब हो जाएगी तभी अद्वाइत होगा। लेकिन अभी वो निमृत तो ही हुई नहीं। इसलिए अद्वाइतम ना अद्वाइतम सिद्धु मराति। प्रपंच की निमृति अगर नहीं होगी। तो फिर अद्वाइत की सिद्धु नहीं हो जाकती। पूर्वाक्षि ये संका करता है। अनिवृत्ते। बाशे में। प्रभन्यनिवृत्ता चेत्प्रभुदृते अनिवृत्ते प्रवंचे। कथमाद्धुईतमिते। उच्छते। अनिवृत्ते। सर्दान्ति स्रोकेन उत्तरं आहा। उच्छते। तो सर्दान्ति कथमाद्धुईतमिते। किम प्रपञ्चस्य वस्तुत्तम् उप्रेत्य अध्वीतानुपत्ति वित्यदे किम वा असित्तुमिति। क्या आप प्रपञ्च को वस्तु मान कर अध्वीत के अनुपत्ति बदला रहे हो या उसको अवस्तु मान कर अध्वीत के अनुपत्ति बना रहे हो। आज अध्व तो अद्वित नहीं हो सकता है, हम मानते हैं। सच्चा में। अद्वितम् तरी कथमु पद्देता इत्यासंक्यम्। कहते हैं, अद्वित भर कैसे उपन होगा? वो जो प्रपंचा से अवस्यत बख्षे, तो उपत्ति। प्रपंच जो बस्तु नहीं है, तभी अद्व यथा सर्पोरज्ञों कर्पितो। जैसे सर्परज्ञों में कर्पित हैं वस्तुतों नास्ति, तथा प्रवज्ञों भी कर्पितत्वात्। प्रवज्ञों भी कर्पित हैं, नहीं वो वस्तुतों भी दिते, बासतों में नहीं है। तथा तात्रकमार्द्वेतमाविरुद्ध उक्तमर्तम् विद्रेकमुखेना विद्रस्चाद्नेति विद्रमानस्चेत। विद्रेकमुख से कहते हैं। अगर द्वैत विद्रमान होता तो निवर्च होता। विद्रमानस्चेत। यदि आत्मानी कार्णाधीन सर्प्रवंचो विद्देत। तदा कितकस्न अनुच्यत् निमात्त निवृत्ति वश्यम् भावणी। निवृत्ति वश्यम् भावणी। यह तो वश्यम् हो गया ना। निवृत्ति वश्यम् भावणी। यह जिपनी में कहा, कार्णा धीनी, परमानु प्रधानाजी कार्णाधी नित्यत्तान। ननु कार्णाधीन एव अभिवगम्यतान। कार्यत्तु नित्यत्तेन। तन्निवत्तु अध्वेतम्भी शिष्यति। बाधान तरह लापे पी। ना करनिया। ना करनिया। अच्छा आई है। तो आप ठीका भी देखने हैं। ना होना चाहिए। तर निवर्ति। इसमें भी सर्व चाहिए। अर्रा हो जाएं हडी, अर्रा हो जाएं। अर्रा से काम नहीं जाएगा। निवृत्ति वश्णमा हो जाएं। कारियस्त चा निवृत्तिर नाम कारण संसर्गां। कारी की निवृत्ति जो एं कारण का संसर्गां। पल्मानों प्रणानाजी कारणाधीन इत्यर्था। अंतरव गटस्यन वृत्यन नावाः। कपाव समुशक्या। और क्या? कारिकात्मतर के कारण में। आ, इसा है कि जब गट की निवर्ति होती है, गट परमाणू से बना है। इनकी द्वारा वरतनियाइक लोगों के सिद्धान्त के अंतार। और जो सांख हैं, उनकी द्वारा प्रक्षिती से बना है। तो कारी जब कारण में बिलीन हो जाएगा, तभी उसकी जबुर्ति होगी। सत्त जो कारी है, उसकी निवर्ती तब होती है जब वो कारण में बिलीन हो जाता है। और क्या? मतलब यह है कि घट का पर्माणवन्त भंग हो जाता है। पर्माणवन्त भंग होने पर घट की निवर्ती हो गई। पर्माणव रह गए। गट नहीं रहा। जिन परमाणों से गट बना था, वो परमाणों अब रह गए, गट नहीं रह गया। कारी का नास हो गया। निपृति हो गया। तो जो सत्त वस्तु होती है, उसका नास तब होता है जब कारात्मा कारारूप में चला जाता है। और आत्मा कारी कारण से रही था, वो ना कारी है ना कारण है। तो ऐसे उस तरह से उसकी निवर्ति तो होगी नहीं। इसलिए, अगर आप मानते हैं कि प्रभज भिद्दमान है, तो उसकी निवर्ति नहीं होगी, अद्वैत नहीं होगा। जब वो अभिद्दमान होगा, भ्रम से प्रतीत हो रहा है, त तो इसी को बता रहा है। चिपनी कारने यही कहा, करना धीन, और इसमें भी बता रहा है, कि इतकी कारण। प्रहस्तानित भगस्तुत्तमुकेत अद्वाइतानुपद्रस्थिते किम्बा। हो गया, अद्वाइतं तजी, कदमतपद्रस्थिते संक्यो प्रवंचस्यविष्यत् यथा सर्पोर अज्ञाम कर्पितो वस्तो नास्ति। यथा प्रवंचो भी कर्पितत्वा नेवं वस्तो भिदेते। तुथा था तात्रिकम अध्वितम अधुरुध्यम। उत्मक्दम बिद्रोग मुखेन साधेते। बिद्यमानस्तेति। जगी आत्मानी कार्णाधिना सर्� किसी कारण से उत्पन हुआ होता। तदा कृतकश्ण अनितरत्वात्म। नियमात् तर्णवृत्यवश्यम् भाविनी। जो कृतक है, जो कभी किया जाता है, कृतक, वो अनितर होता है। यत कृतकम् तर्णवृत्यम्। इसलिए वहाँ आता है। नास्त्य कृतक कृतेन। कर्मचितान। नास्त्य कृतक कृतेन। अगर तो मोक्षः है। कृतेन कर्मणानास्ति। तो कृत जो है, कृतक, जो भी वस्तु कर्म से उत्पन होती है, कृतक होती है। उसका नास हो जाता है। कृतकस्यारिच्यत्तम। तो जब मिट्टी से कुमार ने गड़ा बनाया, तो वो कृतक हो गया। तो बनी हुई चीज बिगडेगी। तो उसका बिगडना तभी संभाव है। जब भुक्रितक हो। बनाई गई हो। कारणा धीन हो। मिट्टी नहीं विगर्दी है। मिट्टी परमाणु से बनी है। परमाणु नहीं जाएगी। तो कारणा तो बना हुआ है। तो कारिका कारण में ले होना यही नास है। कारिका कारण में ले होना नास है। अपना के नियाईकों का। उनका नियाईकों का। मानें जो सत्त कारी होता है उसका नास तब होगा जब वो कारण में लीन हो जाएगा। ठीक है। तो यह कहते हैं कि वित्रेव मुखेन बता रहे हैं। निषेद मुखसे बता रहे हैं। निषेद मुखसे बता रहे हैं। निषेद मुखसे बता रहे हैं। निषेद मुखसे बता रहे हैं। निषेद मुखसे बता रहे हैं। निषेद मुखसे बता रहे हैं। निषे जब उसका कारण में उसका बिले हो जाएगा, तो इसकी निमृति होगी। तो कारणाधीन होने के कारण कृतक है ये। कृतक होने कारण अनित है। अनित होने कारण इसका नास हो जाएगा। तो मांने देते हैं कि इसका नास होगा, लेकिन नास इसका बासतविक होगा� तो जगत को हमें नास करना पड़ेगा। तो अब आप समझ जिये कि आपको जो घड़ा दिखाई पड़ रहा है। वो कैसे बना है? मिट्टी से। तो मिट्टी से बने हुए घड़े को अगर आपको ये जानना है कि केवर मिट्टी है, घड़ा नहीं है, तो घड़ा पोड़न केवल यह समझ लेना है कि मिट्टी से अतुक घड़ा नाम की कोई चीज नहीं है। बाचारमनों विकारों नाम देयं। मृत्कित्तेओ सत्यं। बाचारमन मात्रस हैं विकार। मृत्का ही केवल सत्य है। तो यहाँ नगटम् मर्देन दिष्टो गटतत्त स्विन्त।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। तब यह नश्ट होगा, ऐसा कुछ नहीं है। यह जैसा दिख रहा है, वैसे ही नहीं है। स्वपने जो है, उसको मिठानी की ज़रूरत नहीं है, बतुआई है। है ये, मिठा ही नहीं है। यह बात है, मिठा है। और हो गया, केते हैं यदी आत्मानी कारणाधीन सरणप्रवंजो विद्धीत। आत्मा में कारणाधीन प्रवंज रहता है। सदा कृतकस्यानित्यत्मनियमात। कृतक जो है वो अनित्य होता है। इसलिए उसकी निवृत्ति अवश्च होती है। कारियस्यचा निवृत्तिर नामो कार� यह कारे की निवृत्ति है। तथा सती कारने प्रमंज निवृत्ति है। निवृत्ति है अनात्यंतिक अत्वात। तो प्रमंज की निवृत्ति भी अनात्यंतिक है। जब कारण में रहेगा वो, फिर कारीवत पर जाएगा। आप गड़े को सून सून कर दो। वो मिट्टी बना दो। तो मिट्टी रहेगी तो कुमार के हाथ में भुडने पर फिर घरा बन जाएगा। तो आत्यान्तिक निमिट्टी नहीं होगी। इसी तरह से कार्णभावापन अगर जगत हो जाये तो फिर जगत की उत्पत्ति हो जाएगी। आत्यान्तिक उसकी अन� तो ये नच कार्णाधिनः सन्प्रवंचोस्ती। प्रवंच कार्णाधिन नहीं है। तस कर्पिदत्वेन। वो कर्पिद है। इसलिए अब अस्तु है। प्रवंचस्माया विद्धमानत्म नतु वस्तुत्तम। प्रवंचस्माया से विद्धमान है। वस्तुत्तम से नहीं उदारनाब्यां पाद्याति। नहीं। नहीं मानें। नहीं रज्जौन भ्रांति उज्जा करपित। सर्पु बिद्धि मानें। सर्पु ही रज्जौन भ्रांति करपितों। सर्प जो रज्जु में भ्रांति से करपित है। नायं सर्पु रज्जु रेशा। सर्व नहीं है ये रज्जू ही है। इस प्रकार विवेग बद्धी से निमृत्वना आने बार। वो वसुदो नहीं होगा वसुदो भी दिते है। वसुदा रहती नहीं है। बादितस्त कारत्रेव सत्वां हावात। बादित उसका कार्म सत्व। सत्तता नहीं होती है। माया माया क्या है, इन्दजार सब्दबाच्या है, माया भी ना प्रदर्शिता, माया भी माया दिखाता है, इन्दजार, पार्श स्थाना माया दर्शन बता, जो सामने, पार्श में, माया दर्शन, माया दिखने वारे हैं, वो चक्षुर्गत् इथात दर्शन प्रदिवंद कस अ� यथा दर्जन का भुज्वन्दक है। वो जब दूर हो जाता है, तो सती समुत्पन्य सम्नग दर्शनता। वास्तुर्व सम्नग देखने से जिवृत्ता सती। जिवृत्थो कर, नहीं वस्तुतो विद्धमानां भवितुम उत्सहते। वस्तुता वो विद्धमान नहीं हो सक यथेदं उदारन द्वें तथेदं भृतं प्रवंच्याक्यं।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। प्रवंजस्यकारत्रेवि सत्योभावे सात्रकमाद्वितमाविरुद्नम्।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। किनचित कचित अध्यस्थ दे, किनचित कचित मन कहीं उसका अध्यास होता है, सर्वत्र नहीं होता है, तो सर्वत्र नहोने के कारण, अगर सर्वत्र कोई उसका अध्यस्थान नहो, तो कहाँ अध्यस्थ हो रहा है, सर्व कहां से देता हूँ? तो इसलिए मानना पड़ेगा कि कोई तत्व है जिसमें ये कलपित हैं। तो तुरी तत्व है। उसमें जागरित, सौपन, सुरुपती और विश्व, तयेस, प्राग्य तीनों कलपित हैं। तो जब तुरी तत्व का अन्वाह हो जाएं कि वो तु है, तु तुरी है, तो अपने आप ये परपंच समापत हो जाता है। तुरी ये अधिष्ठान हुगा। अधिष्ठान है। जाद तुरी सुक्ती इनका बाद करना है। ये अध्यस्थ हैं। अध्यस्थ है, इनका बाद होगा, पिनास होगा। � हुआ नहीं है, लेकिन उसमें यह भ्रांत्य हो गई है कि मैं हूँ। तो जैसे सुक दुख। सुक दुख को आप देख रहे हैं, जान रहे हैं, लेकिन जानते जानते आप उसको यह सुकी, आम दुखी, मैं सुकी, मैं दुखी। तो ये जो मैं लगा लिया इसमें इसको हटा दो। तो ना मैं सुखी हूँ ना दुखी हूँ। सुख, दुख मुझे में आरूपित थे। तो आरूपित वस्तू को हटाने के लिए कर्म की आवस्थकता नहीं है। आरूपित का नास, आरूपित का अजिस्थान की ज्ञान से � जब बाद हो गया तो उसको निष्च करने के लिए कोई प्रेतने नहीं किया जाता है। अध्यास की एक है फर। ऐसा है कि अन्यता ग्रहन, अध्यास, भ्रांति, तीनों एक हैं। अग्रहन माने आपने आपको बुल जाना। ठीक है? देखो, आप सपन क� जब आप अपने आपको बिश्मित हो जाएंगे कि मैं कौन हूँ, आप सुबहे हैं। अब निध्रा में आप देख रहे हैं कि हम वहाँ गई, वहाँ गई, वहाँ किया, वहाँ किया, उससे मिले, उससे बात हुई, इस सब आप सपने में देख रह तो ये स्वापन कहां दिखेगा? तो निद्रा से ही ये स्वापन दिखा। निद्रा हो गया अग्रहन। और स्वापन जो है आनेथ अग्रहन। ये तो हो गया अधिस्तान्त। अब दार तरब्त में जो है अविद्या हो गया अग्रहन। और आनेथ अग्रहन हो गया जागर स् आत्मा का बोध नहीं होगा। पहले जिस्य से प्रतक करके दर्ष्टा को देखना होगा। लोशनं दिश्यं मनो दिख। मनो दिश्यं बुद्ध्रि दिख। बुद्ध्रि दिख। बुद्ध्रि दिश्यं आत्मा दिख। आत्मा दिरेव नत दिश्यते। वो केवल दिश्या है। वो दिश्य नहीं होता। तो उस दिरेव दिश्य को पहले अलग किया जाया। तो संस अगर आप उसको थोड़े से शब्जों में देखें, तो देश, कान और बस्तु, तीन ही संसार हैं। देश, आप कोई भी कर्पना करो, किसी देश की कर्पना होगी, काल की कर्पना होगी, भूद, भविश, बरतमान, और किसी बस्तु की कर्पना होगी। ठीक है ना? देश, काल, बस्तु यही संसार हैं। ठीक है? स्वापन में भी आप क्या देखते हैं? स्वापन में देखते हैं कि देश हैं। गाड़ी चल रही है। स्वापन में रेल चल रही है। तो रेल की पत्री है। और आसपास की दिश हैं। वो सब दिख रहे हैं। तो ये दिश हो गया हैं। और कान। तो अब जब आप चलें, आप चलें समझ दिजिए, द्वारका से, सौपन में और यहां पहुंच गयें, तो वो کتنے سمائے میں پہنچے گے؟ वह काल की भावना हो जाएगी। इतना टाइम लग गया। और फिर वस्तु दिखाई पढ़ रहे हैं, जो भी हमको दिख रहे हैं। तो देश, काल, वस्तु ही संसार हैं। और हम इसको दिखने वाले हैं। देश, काल, वस्तु को हम जान र कि ये जो देशकार वस्तु है, ये सत्य है कि मिठ्य है? तो स्वान्कित देशकार अवस्थाईत्वं मिठ्यात्म। जो अपने से अनचित देशकार में रहे, वो मिठ्या हो जाये। यह माना जाता है कि पुरीतत नाम की नारी में जब जीव जाता है तो स्वपन देखता है। तो वो पुरीतत नाम की नारी जो है वो बहुत सूत के समान सूक्ष में है। उसमें आप रेल देख रहे हो। उसमें आप संसार देख रहे हो। तो वो सच्चा कैसे हो सकता है। तो जैसे स्वप्न सौनुशित देशकारवस्तित होने के कारण स्वप्न मिच्चा है। इसी तरह से यह जागरिद देशकारवस्तित हैं। यह प्रशन आता है कि यह किसमें हैं। देशकारवस्तु देशकारवस्तु में है कि देशकारवस्तु से रहित में हैं। तो देशकारवस्तु भी देशीकारवस्तु होंगे। कर कोई दूसरा आत्रा हैं, हम कोई नहीं हैं। तो वो भी देशकारवस्तु होंगे। तो हम तो कहेंगे जितने भी देशकारवस् तो सब देशकार वस्तु ही हैं। उसके वाहर कर्पना वाहर जाएगी नहीं आपकी। तो देशकार वस्तु जो है, जो देशकार वस्तु का द्रिष्टा है, है न? जो उसको जानता है। उसको कौन जान रहा है? हम जान रहे हैं। तो देशकार वस्तु उसका दर्टा वो सहला है। उसमें ये तीनों नहीं है। तीनों नहीं है। और अपने में वो हो नहीं सत्य है। इसलिए ये सत्य नहीं है। हिसाब का सब इठा है। तो देखने बाला है वो ही सत्य है। बस आज इतनी लेने दो। बद्यमकरने विष्णु आम देवा। बद्यम पस्थे माक्षवरि जत्रा। स्थिलेरंगरि तुर्ष्टवाग्रम सत्तनुविर्। बस्थेम देवरि तम्यदाय। एक साधु सांतिनाथ हो गया है। वो वेनात का ग्रंतों का अच्छा देता था। तो वो अग्गियाबादी हो गया था। कि जो तत्त है, ब्रह्म है, उसका ज्ञान नहीं हो सकता। क्या वस्तुता सत्य है, इसको हम नहीं जान सकते हैं। तो कुछ पासचात्य दार्शिनिक हो गये हैं, वो भी अग्गियाबा� और उन्होंने ये माना है कि संसार देशकार वस्तु रूप हैं। और ये देशकार वस्तु जो हैं, ये परसपर सापेक्ष हैं। जैसे देश है, देश की करणा काल से होती है। कितने काल में हम उस वो पार करते हैं। और काल की करणा देश से होती है, कि देश को चलने में कितना समय लेगा। उसके अधार पर हम देश की कल्बना करते हैं। और बस्तु जो है देशकाल से अलग है नहीं। तो इस तरह से संसार जो है देशकाल बस्तु रूप है। लेकिन इस से परे क्या है। यह हमको नहीं मलो रहा है। हम जो भी देखेंगे व तो उसको अग्गिये मानते थे। लेकिन वो यहां भूल जाता है कि आप भी तत्त को जानना चाहेते हैं, उसको अगर अपने से प्रसक करके जानना चाहेते हैं, तो कभी नहीं जन पाएंगे। अग्गिये ही रहेगा। अग्गिये ही रहेगा। जो अपना स्वरूप है वो कभी ना तो अग्गेह है और ना गेह है। हम उसको जानते हैं। वो ना होता तो देशकार वस्तु को कौन जानता है। देशकार वस्तु की प्रचिती कैसे होती है। तो देशकार वस्तु को जाना है, उसको आप अग्गेह कैसे कह सकते हूँ। वो तो सेम्परकास है। उसको जानने की कोशिस करना ही उसमें आवरन डारना है। अब कई लोग बैठ के ध्यान करते हैं कि वो आत्मा का दर्शन करें। आत्मा का दर्शन करने के लिए आँख मुझे देख रहे हो। तो तुम जिसको देख रहे हो। देखने की कोशिस कर रहे हो। वो तुम हो की नहीं हो? अगर तुम हो हो, तो देखने की कोईसिस क्यों कर रहे हैं? तुम तो हैं। और अगर अपने से अलग करके तुम देखना चाहो, तो अपने कंजे पर कुई कैसे चड़ सकता है? कैसे अपने आपको देखोगे? इसलिए अपने आपको देखने की कोईसि जो दीख रहा है उसका बात कर दो। सबका बात कर देने के बाद जो बच रहे हैं। उसमें इस्थित हो जाओ। विदिता विदिता व्यामन्यत् ब्रह्मणो रुपम्। बास।.
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