Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 54

A Hindi-language partial transcript of a Chaturmas 2012 lecture (YouTube) commenting on the Mandukya Upanishad. The speakers (A/B/C) discuss Vedantic topics: origins of the world, the relation between jīva (individual soul) and ātman/Brahman, ritual action (karmakāṇḍ) versus knowledge (jñāna), and epistemology (perception and scripture as pramāṇas). The text is noisy and contains repeated/duplicated lines, but centers on Advaita-style arguments about non-duality, manifestation, and spiritual purification via mental discipline and proper knowledge.
Chapters
अत्रेवा पावर देनाल खन्जेंते अस्मा भी परिक्षका खन्जेंते अत्रेवा पावर देनाल खन्जेंते अस्मा भी परिक्षका खन्जेंते अत्रेवा पावर देनाल खन्जेंते अस्मा भी परिक्षका खन्जेंते अत्रेवा पावर देनाल खन्जेंते अस्मा भी परि पामरस्त पुर्थक जनहा पुर्थक.
विश्वणित्रक्षा सर्विष्याम् पीर्चल्पराश्रेदोशा.
निबंधनेन जो भेडः परा होता है। अलियोगित्र सिद्धी पुर्जेवित्र सिद्धी, अलियोगित्र सिद्धी पुर्जेवित्र सिद्धी, अलियोगित्र सिद्धी पुर्जेवित्र सिद्धी, अलियोगित्र सिद्धी पुर्जेवित्र सिद्धी, अलियोगित्र सिद्धी पुर्जेवित्र ये सिद्धी, अलि तालता अन्धोन्या भावरेवा असिद्धाइते रोते हैं। पारमार्थी उस्चात अन्धोन्या भावर असिद्धे।.
अन्धोन्या.
जन्दा तुम्हेवारो मेवारेवा नुम्हेवा तुम्हेवा तुम्हेवा तुम्हेवा तुम्हेवा तुम्हेवा तुम्हेवा त� मुख्षत विठ्या गोनंतन मुख्षत तम्ही अजर्गेते। ननू सुत्यातु जीव वर्मातरो प्रसत्तम् यत प्रालुपते रत्पत्यसो उम्णश्यत वाक्यव्या। फूरो प्रकृत्तम् पर्मकार्ण्डे। जीवात्मानोप्रसत्मम्यत् प्रावुत्पत्ते प्रतृतितम् उडपर्ती के पहले जीवात्मानोप्रसत्मम्यत् प्रावुत्पत्ते प्रतृतितम् उडपर्ती के पहले जीवात्मानोप्रसत्मम्यत्.
प्रावुत्पत्ते.
प्रतृतितम् उडपर्ती के पहले जीवात्मान शुक्षा की जीवार मात्मणों के लिए येस म्रावुत करते उतपर तार्टों जनबाग के लिए पूरों प्रग्रिष्ण कर्म कर डे। अच्छा मां इती आत करेंगे भी ओर देवा भी करेंगे कर्म काम नहीं है तकि वर्त मुच्चा इते। यह उम्रिजल बाग के ही उम्रिजल बागचों के नारा प्रावत पत्ते उत्पर सर्फों उम्रिजल बाग के विया सदेनो तोम मेरे मांग्रा आती। एस तोम पहले छत्री था। उसके तब जगत की उत्पत्ती हुई। तो जगत की उत्पत्ती हुई। माये भेश की उत्पत्ती हुई। उम्रतार भी बताते हैं। सत से संसार की उत्पत्ती हुई। एक तो ये भी उम्रत होते हैं। और पूर कर्मकाण। कर्मकाण। कर्मकाण।.
कर्मकाण।.
कर्मकाण। कर्मकाण। कर्मकाण। कर्मकाण। कर्मकाण।.
कर्मकाण। कर्मकाण। कर्मकाण। कर्मकाण। कर्मकाण। कर्मकाण। कर्मकाण। कर्मकाण। कर्मकाण।.
कर्म काम.
निहां अन्निहां काम ना बारा निहां।.
जो पशु की इच्छा कर रहे हैं तो चित्रा याद करें तो चित्रा याद के दारा पशु की इच्छा बारा याद करें तो पशु काम जो है वो यह बेटी है और जिसकी इच्छा कर रहा है वो भी है विश्टी के चावारा तारीवी यग रहे है तो विश्टी अराज है उसकी कामणा करने बारा रहे है तो भेध का वर्णन करकाण्ड उतर रहा है। यह वर्णन पत्ती के पूर्भु का है.
कि बादु का है?
विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु विश्वत्तु त्यारी विश्वत्तु विश्वत्तु वि मन्दवर नहीं तो पिश्मी और ज्याम जू पुधान करने वारा तो पिश्मी मेरे जू मेरे उसका धान करने वारा भी है यह आपका मन्दवर थेरा सत्व कसंग कर्मकार्ण ज्याम कार्ण बात वरोगे इसलिए कर्मकार्ण और ज्याम कार्ण दोनों के बात्त का भुरूद होने पर ज्यान कार्ण वाक्यार तक्तियों इकत्तों से सामन ज्यत्तों में वालाये थे। तो कहते हैं कर्वकार्ण ज्यान कार्ण का भुरूद होने पर आप ये पक्ष बात कों करते हैं कि ज्यान कार्ण ज्याव होई थी थे इकत्तु और कर्व.
कि.
समझत नहीं है कि कैसे लेते हैं अच्छी समझत नहीं है कि तो आया वाणी मूतांती आया अंते जिससे मूत उत्पन्ड होते हैं इत्था अग्रेविस अस्तुद्रविश्वणिंगा कैसे अग्रीविस उत्पन्ड होते हैं तस्माद भाईत अत्माना आगारत्तमूतावा उ आकास उत्पण हुआ तरीक्ष है तो उत्पण किया तत्ते जो हस्री है तो उत्पण किया कित्या जो उत्पत्ते है अच्छो प्रिशदबाक्षों के बारा खेते उत्पत्ती जुद्गार थे अच्छो प्रिशदबाक्षों के बारा प्रागप्रशक्तम तेने प्रतको और क सत्वर्वार्तम् किवतरीद मॉनम् महाकार्गटारिबेश्किर्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार्वार् उधरं पचती। उधरं तोड़ा आजाता रहा है। उधरं पचती। तन्दरं पचती।.
तन्दरं पचती।.
जब आप भाज बनाना चाहिएंगे, तो आप तंदुर लेके उनको मनाईंगे। तो तंदुरों पचलती है कहने चाहिए। बहुत भाज में ये उनन हो जाएगा। त्रिभरुष्यत विर्थी है। तो ये बहुशे बिट्टे अस्थे कहाना पुड़ी चाहते हैं।.
उद्धातों.
पाड़ी वागते हैं, मां काई घटा गर्णी भी तुर्जो, तो वेला पुछ बातते हैं। तो ये मुझे पुड़ी चाहते हैं, कारण कारण वागते हैं, उत्ता हैं। वोरें कि ये जो पच्चवाग भेध का पित्वादन हो रहा है ये मुक्ख नहीं.
है ये बोल है।.
कर्मकांड भेधों में जो कर्मकांड का पित्वादन हुआ है वो मुख्यार्थ में ही है। और पच्चवाग में ही मुख्यार्थ नहीं है। तो उसमें तो सिजी बात यह.
वो.
इसलिए है कि जिसमें अध्वाईत सिद्धोतन है। जिसमें परमाणु कारणवाद, परमाणु कारणवाद या प्रणान कारणवाद, यह यदी माने जाएंगे कि परमाणु से जगत की उत्पत्ती होई, प्रणान से जगत की उत्पत्ती होई, तो काई कारण, काई जगत तो इसका भर्योसान पर्वणून हो जाएगा। जब प्रधान सान्द बढ़ गर्वित प्रधान में हो जाएगा। ब्रह्मोय नहीं होगा। और जब हम ये मानेंगे कि जो ब्रह्म है आत्मा, उससे आकासान जिगत की उपत्ति हुई, तो तदादर्ण्यां तव कारण आरमण जो जिस से उत्पण हुआ है वो उस से अनन होता है। जैसे घट मिट्टी से उत्पण हुआ है जैसे मिट्टी से अभिन है। और मिट्टी मानें परिश्वी। परिश्वी जड़ से उत्पण हुई है। स्रिदर्ड से अभिन है। एक अगनी से उत्पण हुआ है। स्रिदर् आकाश उत्वण हुआ है आकाश ब्रह्म उत्वण हुआ है आत्मा से विन्ने इस तरह से आत्मा के अधुती सुरूप को जानने का साधन है इसलिए उत्वण हुआ.
है पत्रेव वास्तविना.
उत्पत्ति में शास्त्रों का ताक पड़ी नहीं। यह में उत्पत्ति ज़्वास्ते के लिए स्थिवास्ते के लिए स्थिवास्ते के लिए स्थिवास्ते के.
स्थिवास्ते के लिए स्थिवास्ते के लिए स्थिवास्ते के लिए स्थिवास्ते के लिए स्थिवास्ते आत्मा.
की अद्वच्चियता क में इनका तात पड़ी है। सिद्धी मात है। जो यतपरस्वद समझा था। और इसी तरह से सदाधार जीन जाउं के लिए पर्मात्मा ने पच्वे को और जेवो को धारन किया। परमात्मा ने घर्सी को रहन किया है तमारी कोपड़ी में हम पत्था रख रहे हैं रहन कर रहे हैं तम जाने हैं जब कुछ कहें तो ये कहना होगा कि भाई ये जो ग्रेद है ये बातसमिक नहीं है ये घर्टा कास मुर्णा कास है तो पाजिकल में जीशर जो ये समझती है जी तो जो समश्तिक अदमानी है, वो समश्तिको धरन करता है। जो बेश्टिक अदमानी है, वो बेश्टिको धरन करेगा। वो पोक्ड़ी में जादा थोड़ी धरन करता है। थोड़ा धरनेगा। इसके लिए है। तो घटा आकास्मा आकास्तिक धरन करता है। और दूसरी थी � कर्मकार्ण के द्वारा पहले तो सबसे बड़ी बात यह है कि जब हम सात्रवृत कर्म करने करेंगे तो सात्रवृत रिशिद्ध कर्म छोडेंगे जो सात्र रिशिद्ध कर्म है उनका हमने चाक करती है आजदत अंसार तो हमारा ऐसे कतब.
हुआ.
क्योंकि यही सब प्रपंच हैं जो मनुष्य कोरे काम करता है सब दिश्वर्श्रूप लगन्ग के लोग से संसार में आसक्त हो जाता है और उनकी कामणा से निशिद्ध करम कर बेटता है जो नहीं करना चाहिए वो कर बेटता है तो पहले तो धर्मा चरण करने से धर्मा चरण चून गया अब पछा धर्मा चरण धर्मा चरण जो आप कामणावों को लेके करेंगे पहले कामणावों से धर्म का चरण करने से शास्थ में आश्था वड़ेगी शास्थ में आश्था वड़ने पर आपके चितकी शुद्धी होगी फिर जिरी जिरी विचार का उदेव होगा विचार का उदेव होने पर जिग्ञासा हो जाएगी चितकी शुद्धी होगी उससे बेहराज हो जाएगी बेहराज हो जाने प जिव्यासा होगा जिव्यासा के बाद वो बिल्ट लोग का शमनाजी करें तो अभेत पर ज्यान करें। तो कर्मकार्ण की भी जनर्थत्ता नहीं है वो चित्तशुद्धी के जनर्थ होने के कारण पहले आवस्य है और पहले जब कर लिया तो उसके बाद पर चित्तशुद्�.
चित्र.
सुद्ध भुजाने के बाद उसको भी छोड़ से नहीं। क्रम तमुच्चे। सम तमुच्चे नहीं।.
क्रम तमुच्चे।.
अंतरंग धारेत जे वहिरंगन को समुच्चे। तो अंतरंग सादा ने उनको प्रकल के वहिरंग का चाक करता जड़ा जाया। तो वेरंग कच्चा करते करते अंतरंग में आ गए, अंतरंग में सबसे मुख जो अपना उम्रिशल है, उम्रिशल में भी बोलते बचेन हैं, उन में से मुख जो सात्र है, वो चार महावाक्य है, चार महावाक्य ये मुख सात्र है, उनके साथ परिकुर में है, तो जितना भी � धटाकास नाकास के समान है। वो बाजिकर भेद है। बास्तुरू भेद नहीं है। पशु में और पशु के इच्छा बाले में जो भेद है, तो पशु के विदार जो आत्मा है, वो और रुह पशु और मनुष्य दू अपाज़ी हैं। एक अकाश्मा अपाज़ी हैं।.
ननु.
भेद वाक्षा ना गळाजियों मुक्त भेदातमु मां भेदातमु तो पद्धते नहीं। यह निश्य है कि भेदवाक्य में कभी मुक्क भेदार्शन होने नहीं है। स्वाभाविका विज्जावत प्राण भेदविष्ट अनुवादी प्राण आत्मभेदवाक्या नाम। कहते हैं स्वाभाविक अविज्जावान जो प्राणी हैं उनकी भेदविष्टी प अल्वादक हो गया। अल्वादक का मतलब नहीं होता है कि.
प्रत्तक्षानान.
मानेन विद्धेस इन्हों विद्धेस वेड़ता है। माने प्रत्यक्षवरन्मान के जो विजित न हो उसी का सास्त परिपादन करते हैं प्रत्यक्षवरन्मान के पीछे यदी सास्त चले हैं तो सास्त्रों में और दूसरी पुत्कों में क्या अंतर हैं बड़ी बड़ी पुत्कों हैं संसार.
में.
किसी अन्य प्रमाण से वस्तू को जान कर फिर लिखे गया हैं। प्रमाणां तर से वस्तू को जान कर फिर उन्होंने उसका उदेश किया है। इसलिए वो पोलते हैं। वेज जो है वो बात कहता है जो तुम प्रमाण से अन किसी प्रमार से वहीरत नहीं होता है जैसे अगने हिमस्त वेश जग वेध में एक बचन है अगनी हिमका वेश जग आपको जाड़ा रखता है तो आग ताप रोगा है ठज की दावा आग है ये आपको प्रतक्ष मालू होता है इसलिए इसके लिए शास की ज़रूरत नहीं है भेज जो है ये प्रतक्ष है तो भेज प्रतक्ष होने के कारण हमें इसके लिए शास की आउसक्ता नहीं है तो जो सर्वप्राणी साधारन हैं सब लोग भेज को देख रहे हैं उसी भेज का शास बचबादन.
करें.
तो वो अर्वादक हो जाएगा। इसलिए उसमें साथ पुरुवाण नहीं है।.
यहाँ.
अर्वाद है।.
अर्वाद नहीं है, पूर्वाव योगिष्चिदा हाँ। अगर प्रमान लक्षन हैं, अगानलक्षिने एगंधर्च को मुझे जीते हैं यह अभो ही तो मुझे जीते हैं।.
ठीज़ी, बोल बड़ी है। यह चाया भी है। अनाधिगत और अबादित आर्छ को जो कहें वो प्रमार्ण हो। जो अनाधिगत हो मारे जिसका हमको घ्यान नहों। और जो जिसका बाद न प्रमान प्रमान होता है तो शास प्रमान है तो शास यदि उसी का वर्ण करेंगे जो अजगत है माने प्रत्यक्ष प्रमान से जो अजगत है उसी का यदि शास वर्ण करेंगा तो प्रमान नहीं रहेगा तो अनुबात हो जाएगा अब इसमें क्या है कि आप रूप के सम्मान में आग प्रमाण हैं। क्योंकि आग के सम्मान और किसी इंदियों चाहिए। रूप का अलिगम नहीं होता है। जो हम आग से लेते हैं वो अवाजित होता है। तो नेत में रूप के सम्मान में प्रमाण है। सब्द के सम्मान में सुर्थ प्रमाण है। तो सात्र भी उन्हें के लिए प्रमाण हो तो इंदीयों से और उन्हें से बचेता जा रहे हो अन्वादाः पजाएगा तो इसलिए वो पीछे आगे पो हो गए प्रमाण प्रतक्षा जी ये उसके पीछे हुआ इसलिए अन्वादाः पजाएगा अन्वादाः बिला नज़ प्रस्तु ही प्रमाण होती है तो सब्ण भी प्रमाण है। चुती सब्ण भी प्रमाण इसलिए हैं क्योंकि वो नदिगत अवाधित तर्फु कहने वाले है। तो यह अर्वालत्ता आजाएगी अर्वालत्ता है।.
अधिक तक तो की जीते हैं बाहुत.
तक तो की जीते हैं।.
सब.
नाई जानी बाड़ा।.
सुच्चा में एक चीज़ करना बहले तो भी है।.
बहले भी है। कुछ ही हो गया। ये बोले स्वाभावित अभिज्जावत प्राणि भेद जिक्चन वालित्वास आत्मभेद बात का नाम।.
अत्मभेद बात के लिए जो चीज़ करना प्राणि भेद.
यह चाहो प्रिशप्सु उत्पर्त्य प्रव्याजिवाक्ये जी। जीव पर्मात्मा नोहूं एकत्वेव प्रत्मिपादिष्थम। यहां जो उप्रिशन है उत्पर्त्य प्रव्याजिवाक्ये जी। जीव पर्मात्मा नोहूं एकत्वेव प्रत्मिपादिष्थम। यहां अन्योसो अन्योहमस्मिति वो अन्य मैं अन्यू इस परकार जो जानता है नसबेद वो नहीं जानता। अतावुर्शक्तु एकत्वं सुत्या प्रिवारिःतं प्रिवारिःती किन। इसलिए उर्शक्त में एकत्व का सुत्यी के रारा प्रिवारिःति किते हो जाएगा। इ इसी कोरेकर रोके ब्रत मेरी दिश्चिन वादो गोना हाँ। मेरी दिश्चिन वादो गोना हाँ। मेरी दिश्चिन वादो गोना हाँ। मेरी दिश्चिन वादो गोना हाँ। मेरी दिश्चिन वादो गोना हाँ। मेरी दिश्चिन वादो गोना हाँ।.
स्यात्मा.
तत्त्मजेवि कत्तुम् मेरी दिश्चिन भुष्यदीति वा� तां भविष्यत्मित्ति बभेच् एक जीवात्मानों प्रसप्तों यत्रिक्षित्वाक्येगमिमानम् तत्गोणम् यतोदनम् यतोदनम् पश्चतितितत्वत्।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। इसमें कहा वह बत्ती के पहड़े एकमेवा जुक्षिया विकर्त का प्रिश्पा देख लिया। वही सत्य सात्मा तत्मती। वही सत्य सात्मा तत्मती कत्म भुष्यती। तम भुष्यत वित्त्मवित् ये जीवात्मनो प्रत्त्म। ये तपड़े गुवास्के गर्वा मार� कि एक मेवा सदेवसों मेरे जब अगरा थी एक मेवा थी थी हम वो एक ही है अदरती है सिर्टी के पहले एक अदरती था अब उसके बाद उस बर्मात्मा ने इक शण किया एक हो हम बहुत थी हम मैं एक हूं बहुत हो जाओगा और इशल के दोरा सिख्टी का वर्णन आया। तो ये सिख्टी का जो वर्णन है, वो जो सुती कर रही है.
वो.
इसलिए कर रही है कि ये भी आगे चल के वो हो जाएगा। एक अजवती ही हो जाएगा। तो उसको भविष्यत वित्ती जाएगा। ये गोन है। इसलिए ओदर का उदार दिया। यह एक ही है। जो मुख्या बेद है वो गौर है।.
बातों.
ना सुच्ची का देखने का। नवेरवाक्याना उत्विक्षा मात्रमूरत्वान।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। प्रापुरुद्ध कर्मकार्णे ने जत प्रापरियून नानास्तु लुपत्तम्। सदो नरम् पढ़की जी हुर्षेद बच्चा। उत्पत्ति का सभी उत्पत्ति। महने साथ सम्में ज्याज। उसके जी उर्द्धों की प्रुरुद्धी जी अभिक क्रमकारण के द्वारा जुप पर अपर्ख का नानात्तु बद्दाया। तगवुणम् वद्धकी रोहिषे दिख्या। तनुरेशु उदनात्तु बद्धाया। तनुर में उदन की किसमा अनुभावणी है। मुक्य वेदा चत्तम् सुद्धेर नहीं उद्धेर। वेदा च पुर्शार्चत्यो रभावात। भेद में अपूर्वत तो नहीं है और पुर्शार्चत्यों भी नहीं है। इसलिए नानिति। न केमरं अस्माभी। केमरं भी नहीं है। उसमें कित्तु सुत्या विदाशिना। बेदं भारत्या सुत्ये तार्पर्यिरिग्ञाम अभ्यासन बेच को दिखाने वाली शुती के तात्पुजीगारी का भ्यात बताते हैं वो बेच वाली अनिकसायती कर्वकार्णे तत्कामणा भेगेन कर्वकार्ण कामणा के बेच से नियोज बेच सिद्धावत भी नियोज जो अधिकारी है उसका बेच सिद्धाने पर भी कासं जीव बारे में भेडा सिद्धती। जीव बारे का भेड कैसे सिद्धोता है। परस्त तदरुक्यत्वारिश्या संक्राय परस्तेती। यह जो उदार्ण दिया था न। नहीं नहीं। जो मैं पहले बास उदार्ण दिया है। पशु काम चित्रेय जीत और विर्ष्टी काम कर्लिजय जीत यहां पर जीवों का परव का भेत थोड़ी था जीवों का परव का भेत तो है लेकिन परव के साथ अभी बेत की बात यहां पर नहीं है तो उसके लिए दूसरे विचन्दे यहां पतारणा दोते हैं वो कौछे हैं हेरे नगर वस्तमा वर्ष्टा करें कि मन्ते प्रक्तो हेरे नगर मा ये मन्ते हैं हेरे नगर सर्व नामना ख़रा प्रशिते जो सहवं पिश्वी ग्यावं अभित शिद्वावण उसेश पिश्वी को पिश्वी को भी तारण कीना अनिजा बुरुत वास्ते वर्ष्टा नायो लेती जो कैसे लेती लेती हैं हरे नगर में अधिकते प्रवीशर वर्व लेते हैं हरे नगर में अधिकते प्रवीशर वर्व लेते नहीं हैं मन्दवर्णी पर अच्छे प्रगीष्टा मन्दवर्णों के वारः पर कथन हैं कर्म कर्म कान्डार्थ कान्डेन हैं कर्वकार्णार्थ तम् कर्वकार्णार्थ तम् ज्ञानकार्णेन वाद ज्ञानार्थ ज्ञानकार्णार्थ से विकप्तों से समझे से उध्हारीता इत्यारंक्या। कैसे कर्वकार्णार्थ तू ज्ञानकार्णेन से भाज़ करके ज्ञानकार्णार्थ से विकप्तों से समझ बाद बादक बायो निर्भारने कार्णान उद्धार्णान। बाद बादक जोनों में कैसे हो जायेगा। माने क्यान कान बादक हूँ, क्यान कान बादक हूँ, हम नहीं बनेगा। वोली प्रसक्त्वत्ति मोनत्ति भावुतों जाएगा। ये प्रसक्त्वत्ति ये कौन है।.
�.
बेजास्य अपूर्वत्वा रभावान् नवाक्यानाम सत्परत्तम् सत्परत्तम् अतत्पर्यूत् सत्परत्तम् वाक्यों बरवान् बेज में अपूर्वत्वा जी नहीं है इसलिए वाक्यों में नवाक्यानाम सत्परत्तम् अपूर्म नहीं है अपूर्म माने भेद का ज्यान हमको पेड़े नहीं हो उसके बाद भेद का ज्यान अगर साथ करा था तो हम भेदों साथों का तात पर ही भेद को माने हैं अगर वो पेड़े ही थे हमको विजित है तो वो साथ का तात पर नहीं है अवेश पहने के विजिक नहीं है। अतत्पर वाक्य से तत्पर वाक्य वनीनान होता है।.
तत्पर वाक्य महावाक्यानी।.
इससे क्या जीवात है यह तत्वा नहीं है तो शर्भ गरीगों से इसका नेना हो वो तत्वा है तो यह रत्वा है तो यह हो गया नहीं मुझे बात करते हैं वो गर्जातों पद्धेता होई तो मुझे यह जाओ प्रिशब्सू उत्पत्ति प्रद्धा जीवात प अद्विज्वाक्यरं कसमाद्वीते तात्वरीवात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात अध्वहितम् तावर मानांतरा गुचरत्वार। अध्वहित किसी दूरे प्रार्ण के दोरे गुचर नहीं है। अपूरोग। एक ब्रह्मा दुतियों जी प्राग्वर्तायां ब्रह्मा दुतियों सुत्यों। और एक ही अदुतियों पहले उत्वत्तिय ब्रह्मता इस्तुत वही भर से टीक उत्पान करके उत्मा प्रविश्वु हुआ। इसी सुद्धी से अनु प्रेश्टों जीवों अभी रप्पते। कुसमा प्रेश्टों ने कर्म जीव कह रहा था। तेरे जीवस प्रमात्वतां धमावती। चिल्पत्याबिर्छुतेर अजर्चार्टों भव पर्मात्मा ने जगत की उत्पत्ती करें। हमारे आपने शरीर को उत्पत्न हो गया। शरीर उत्पत्न हो गया। शरीर की घूरग बन गया। आतपेन, आकान, तब बन गया। इनमें हिल्दियां आके बैट गयी। प्राण भी आ गया। लेकिन ही अशेतन रहा। कुछ नहीं जाता था पड़ा राइफ। तस सेष्ट्वात देवानुः प्राविशत। पर्मात्मा ने संसार की सिट्टी करके संसार इसी में प्रवेश किया। अपने चरीर में हमारे आपके चरीर में नहीं किसें प्रवेश किया। जिसने सिट्टी की। तस सेष्ट्वात � उसको सेटन बनाकर उसमें प्रविष्ट हुआ। तो बनाने वाला ही तो प्रविष्ट हुआ। तो प्रविष्ट्या जो है समानकरतिक में आता है। जिसने किया हा वही प्रविष्ट हुआ है। तो इस सरीर के भीता प्रविष्ट होने के कारण उसका नाम जीव हो गया। तो जीव तो इस शरील के भीता रहने कर उपादी जो हुआ है है तो भी तो इसलिए है अभेज हां हमसे जब मांगे अलजा वहाँ के महात्माओं का संदाय तमने कहा यही बात है। तत्स्रिक्रत तदेवानुप प्राविशन। जिसने संसार की रेचना की भाई इसके बीटा प्रविश्ट हुआ है। तु बढ़ा कहां के आगे रहा। अनेला जिवेन आत्वना अनुप प्रविश्च है। नाम रूपे में करवाने। मैं जीव र� इसके लाम रूप को प्याकरण करूँ। इस भावना से पर्मात्मा ने इस में प्रवेश किया। तो प्रवेश की यहां पर बास्तुरत नहीं है। पहली से विजमात कहते हैं। भारवत का जो श्रूक है, चत्र श्रूक ही है। यथा महान्त बूतानी बूतेश उच्चा व प्रविष्टान न प्रविष्टानी। तुधाव तेशो न तेशाम। जैसे ये पंच महा भूत। उच्छे लीखे सब प्राण्यों में प्रविष्ट हैं। हम कह सकते हैं कि सोने के द्वारा निर्मत आभूतनों में सोना प्रविष्ट है। और ये कहां प्रविष्ट है। � प्रतेख भूत अपने कार्यों में पहले से ही प्रविष्ट हैं। अप प्रविष्ट नहीं हैं लेकिन प्रवेश का उठार होता है। इसी ताय से परमात्मा पहले अगर ना होता तो ये सरीर ही ना बनता। सरीर जो बनता है चेतन के लिए। जब माता पिता के रजविर्ये ए.
तो.
वहां जीवा जाता है। वहां चेतन जा जाता है। उस चेतन के लिए फिर वो सरीज बढ़ता है। अगर उसने से वो निकल जाये तो सरीज खड़ जाएगा। तो वो तक तक रहेगा तभी तक वो रहेगा। और उसी के लिए ये पूरा सरीज बनेगा। और बनने के बाद फिर वो लोगा। तो लोना कौन है? सुम्दुख काईन हो करने वाला। सुम्दुख काईन वाला होता तो लोना करना।.
तो.
ये आत्मा है जो सब के भीता थी का भेव है। यहाँ अलग है, यहाँ अलग है, यहाँ अलग है। मैं, मैं, मैं करके सुझे हूल बोल रहे हैं। क्राही जो मैं मैं का भ्येर है ये घटाकास महाकास के तमार है। अनीको घणों में अनीक आकास दिखाई पढ़ते हैं आकास तो यही है। इस तरह से अद्वीग शिद्द हो जाता है। सर्चारी सुद्वी नाम अद्वीग के स्थातपर्ज्यम् न सर्चालो इतने अंतरवें तात्तुकत्ता तात्तुकता न केवर वो पत्ते ही वर दोईते सुटे तात्पजुप दिद्दु नुवित्ता भ्यारता सांदूग में नुवार कहा चत्तमेशी भ्यारत से विश्चित होता है बेड़ेश्टे वाला तसुते दोईते तात्पजुप प्रिज्वाते हन्योसो एकत्तुम्यों पेद्भावेशितामित्पूर्वेण सम्मंद्धा। एकत्ते सुदेश्तात्पर्वेशिद्धे। सुदेश्तात्पर्वेशिद्धे। सुदेश्तात्पर्वेशिद्धे। सुदेश्तात्पर्वेशिद्धे। सुदेश्तात्पर्वेशिद्धे। वद्धम्बशेमा किवरियता सु� से अग्बेत शुआगोंत तनुवेर किसी वदिवे तंवेलायों शात्य शात्य शात्य.
अब.
आप सभी लोग दर्बाद लोग जाते हैं और सभी लोग दर्बाद लोग जाते हैं।.
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