Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 51

Transcript of a Hindi-language lecture by Jagadguru Swami Swaroopananda Saraswatiji (Chaturmas 2012), a commentary on the Mandukya Upanishad. The speaker argues for Advaita positions: the jīva (individual self) is not truly different from Brahman; apparent multiplicity arises from upādhis (limiting adjuncts), ignorance (avidyā) and kāleśa. He critiques Viśiṣṭādvaita and Dvaita views that treat jīva/jagat as real modifications or body/parts of Brahman, uses analogies (mahākāśa–ghaṭākāśa, gold–ornament, bubbles from water, tree–fruit) and discusses kleśas (avidyā, aṣmitā, rāga–dveṣa), ahaṅkāra and karmic consequences with references to the Bhagavad Gītā. Multiple interlocutors interject; the talk alternates exposition, polemic, and illustrative anecdotes.
Chapters
चुखने जत्ता त्रहिरंगरित तुष्टवाग्योंत तनुवेर। विशेमदेव हितां जदाय। सत्रिन हिंद्रो विद्धच्छवाः। सत्रपूषाविश्वेदा। सत्रिन खतारक्षोरिष्ठवेमिः। सस्तिनोऽव्रियस्पतिर्णदातु ओम् शान्ति शान्ति शान्ति नाकासस्त्यवटाकासो विकर्यावेवुयता देवात्मनस्तदाजीवो विकारावयो तथा ननू तत्य परमार्थ कृतेव घटाकासादि रूप कार्यारी भेदों बेवारा हैं।.
पिती हैं।.
चार। चार हो ना। वस्तु शुरू को प्रयुक्ता हैं। तो अभी पहले भाष्यकार ने पूरकार ने भी बताया की जैसे आकाश में धूली, धूम और मरिंता प्रतीत होती है फटाकास आजे में तो वो जो धूली, धूम और मरिंता है वो उपाजगत उपाजगत है आकाश गत नहीं है ये भास्चकार बोले है और पूर का भी यही अविप्रा तो पूर पक्षी सामने कड़ा हो गया वो भिरने लगा कि नहीं कि परमार्थ बस्पगृत आकास में ही है यह तो रूप कार्याज भेवधम भेवारा, गटा कासाधि शो। परमार्थ किते गटा कासाधि नहीं रूप कार्याज भेवधम भेवारा है। नहीं तो जस्ती। तो सिद्धानती में कहा कि ये नहीं है। ऐसा नहीं। यस्मात परमार्था कासध गटा कासो न विकारा यथा सुपर्णस सुवर्णस।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� परमार्थतो महाकासानियत कड़ा कायत्सानियो जीवा सदा सरदायतुदिष्टान्दमन नविकारो नाप्रवेबा अता आत्मवेर्कतो गमहारो बृचैवो ये जो पूर्पक्षिय है वो जीव को ब्रह्म से भिन मानता। जीव जो है ब्रह्म से भिन। तो इस पर द्रिख्तान दिया कि भिन नहीं है। जैसे महाकास से घटाकास भिन नहीं है, भेड पोपादी के कारण दिखाई पड़ता है। बातों में आत्मा वो आका से कही है इसी परकार जो ब्रह्म है ब्रह्म और जीव का कोई भेद नहीं है केवल छेत्र रूपी विकार छेत्र रूपी उप अधी के कारण वो ब्रह्म से भेन परतीत होता है जीव कह रहा था तो उन्होंने कहा कि नहीं ब्रह्म ही जीव हो गया जी बन गया माने उसमें विकार आ गया। वो परिणाम है उसका। तो.
ये जो...
कारी कारण रूपं भी सुध्धं ब्रह्मनमायिकं। ये.
जो हैं... बर्णभाचारिय.
इनका कहना है कि ब्रह्म ही जगत जीव की रूप में परिणत हो गया। बदल गया। परिणाम.
बात है। तो.
यह कहते हैं परिणाम नहीं है। सुद्ध जीव सुद्ध बसुता दिखा जाये तो वो ब्रह्म ही है। आज भी ब्रह्म है। ऐसा नहीं है कि पहले ब्रह्म रहा हो आवा के जीव हो गया है। जिस समय में वो जीव रूप में दिखाई पड़ता है उस समय में भी ब्रह्म है। तो दो तरह के विकार और अवयों मतलब यह है कि जो दैती है वो जीव को ब्रह्म का विकार मानता है। यह जीव का अव्यव मानता है। जीव का अंग मानता है। कि जो है विशिर्था दोईती। जीव को ब्रह्म का अंग मानते हैं। विशिर्था दोईत का आत क्या है। सरीर सरीरी भाव। शरीर और शरीरी जैसे शरीर शरीरी कहने में एक है लेकिन बसतुता दिखा जाये तो आत्मा शरीरी है शरीर आत्मा से वरने है परतु अभीत का उपचार अभीत उपचार होता है बासता में भी नहीं है। तो वो यह कहते हैं कि जी और जगत ब्रह्म के सरीर हैं। ब्रह्म उनका सरीरी है। यह उनका कहना है। यह समझ दिजिए कि ब्रह्म मानें उनके हाँ है नारायड। निर्वण नराकार ब्रह्म यहां नहीं। नारायन ही ब्रह्म है। तो नारायन शरीरी है। और जितने जीव हैं, उनके शरीर है। जगज़.
में उनका शरीर है। जितने.
जीव हैं, उनके शरीर है।.
इसलिए वो कहते हैं कि नारायन सरीदी है और शिव भी, शिव उनका सरीद जाएगा, सरीद बनेगा, जीव कोटी में जाएगा, लक्षमे भी जीव कोटी में जाएगा, सरीदी नारायन.
तो इसमें देव सरीदी नारायन जीव कोटी में जाएगा? जीव.
और जगत शरीर है और नारायन शरीरी है। आप वहाँ विशिष्टा दोईत का मतलब क्या हुआ? अदोईत का रहा है। जब दोईत हैं हैं तो अदोईत क्या है? अच्छा शुरृति में भेज की निदा है। तुति आजवाई भहम भहम भवाती।.
तो.
अद्वैत तो इनको मानना पड़ेगा सुति बावार द्वैत के निन्दा कर रही है तो वो यह कहते हैं कि जीव जगत के दो भेज हैं एक तो है कारातमक और दूसरा है कारिआतमक प्रले काल में जीव जगत सुक्षम रूप से रहते हैं सिष्टी काल में सूरूप में रहते हैं तो सरीर जो है सरीरी का विशीशन है टीके तो सूक्ष्वच्च विशित प्रलेकार में रहता है प्रलेकार में भी नारायन विशित रहेगा उस समय जो उनके विशिषन जीव जगत है वो सूक्ष में और सुर्ष्टिक आज में सूर है तो विशिषन के भेज से विशित का भी भेद होता है तो सूक्ष में चिल-चिल विशित है अरग है और इस्तूर चिल-चिल विशित अरग है। दही ना? तो अब दोनों में जो भेड है ये भेड तो प्रचक्स हैं सुती इसको बात करती है कि दोनों एक है जो सूक्सम चिल-चिल विशित है वही इस्तूर चिल-चिल विशित है विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा विशिष्टेंचा इसका ना विशिष्टा जोईती है। विशिष्टेंचे.
विशिष्टेंचे विशिष्टेंचे जिन्तम। भोयोरपी विशिष्टा वुपत्तिये भेलक्या। भोयोरपी विशिष्टा वुपत्तिये भेलक्या। भोयोरपी विशिष्टा वुपत्तिये भेलक्या। भोयोर�.
और ठीक है। यह माना जाता है। हाँ, विशेशन जो है। विशेशन में भेद हो गया। तो विशेशन के भेद से विशेश्ट में भी भेद माना जाता है। तो जो सूक्स में है वो इस्तूर नहीं है। जो सूरे वो सुफर हैं। दोनों.
में भेद हैं। विशीशन.
जैसे काला भोडा है। हाँ.
हाँ? काला.
भोडा है। हाँजु. तो.
यहाँ क्या लेते हैं विशीशन? विशीशन? जहाँ जो विशीशन हैं, यह व्यावर्तक हैं। व्यावर्तक को विशीशन कहते हैं। काला जो है श्रीत का व्यावरता करें। लेकिन वो अश्व का सरूप नहीं है। अश्व का सरूप होता है तो श्रीत अश्व नहीं होता है। इसलिए वो उससे भिर नहीं है। भिर नहीं है इसलिए कारा घोरा और श्रीत घोरा दोनों भेद होगे। तो गोडा-गोडा तो है कही है। लेकिन विशेशन दो हो गए। काला और सबेद। इसी तरह से सूक्ष में लिए थूर में भेड़ हो गया। सूक्ष में लिए थूर में भेड़ हो गया। तो सूक्ष में चित अचित। चित अचित में भेड़ हो गया। सूक्ष में। औ की विशीशन में भेद होने पर विशीष्ट में भी भेद हो जाता है जैसे गाए है तो सिंग उसके रहते हैं क्या कहेंगे इसको संत्रित में नहीं जहांपर ये माना कि अगर गाए का सिंग नट हो जाए तो वो कहते हैं कि अगर गाय का सिंगनेट हो जाये तो जो मुंड गव है वो सिंग माली गव से में जाये क्योंकि सिंग जो उसका विश्विशार था वो नहीं रहा.
शिखी दोस्ता विशीशना.
भाव प्रिक्त विशीश्ता भाव विशीश्या भाव प्रिक्त विशीश्ता भाव विशीश्ना भाव प्रिक्त विशीश्ता भाव विशीश्ना भाव प्रिक्त विशीश्ता.
भाव विशीश्या प्रिक्त विशीश्ता भाव विशीश्ना प्रिक्त.
� अभाव होगा पर अभाव माने हन्युन्या भाव दिया जाये गया हूँ तो ये विशेषना भाव प्रेक्त विशेष्टा भाव माने होगा माने जो सूक्ष्मचित चित है वो सूक्ष्मचित चित से भेद है दोनों में भेद हो गया विशेष्टे बन गया जीवचन हो गया � तो अब ये जो हैं जो बर्वाचारियां वो परिणाम मानते हैं वो विशित्ता दैती हैं अंग मानते हैं वो सुद्धा दैती है कारिय कानरूपमि सुद्धां ब्रह्मनमाईकम् ब्रह्म जो माईक नहीं है चुद्ध हैं ब्रह्म ही जगत्व जीव के रूप में परिणत हो जाता है तो उदारण के लिए वो कहते हैं जैसे कर्वव्रिक्ष से विविन पदार्थों की उप्रवदी होती तो कर्वव्रिक्ष जो प्राप्त होता है वो कर्वव्रिक्ष संसंताक होता है विच्चा तोड़ी होता है। जो कर्व विच्च हैं उसके ही समान उसमें से फर निकलता है। समसत्तात निकलेगा। सत्य निकलेगा पता लिया। जैसे कर्व विच्च सत्य है उससे मिलने वाली फर भी सत्य है। ऐसे जगत से जगत तो है सत्य है। मिच्चा.
नहीं है। आप.
अद्वेती कहता है कि ये बताईए कि कर्ववर्क्ष से जो फल मिला वो कर्ववर्क्ष में जो फलोत पादर शक्ती है वो कर्वव्रिक्ष से अभिन है कि विन है?
कर्वव्रिक्ष.
से कर्वव्रिक्ष में फरूत पादन सकती है? अगर वो अभिन है तो कर्वव्रिक्ष कैसे उत्पण करेगा? और व्रिक्ष में क्या विश्वीत है? और विश्वों से कर्वव्रिक्ष में क्या विश्वीत है?
तो.
यह कहना होगा कि कर्व व्रिक्ष में अन्य व्रिक्षों से भिशिस्ता यह है कि अन्य व्रिक्षों में फरोत पादन की शक्ती विभिन फरोत पादन की शक्ती नहीं एक ही प्रकार का फरोत पादन कर सकता है कर्व व्रिक्ष में इस थे ज़्यादा शक्ती तो शक्ती आपन करव व्रिक्ष से भिरने ना भिरने है ना भिरना भिरने है तो अन्यरवर्शनी है तो अन्यरवर्शनी ही इसने ही आपको उत्पत्ति मानना पड़ेगी नहीं तो आप कैसे कह सकते हैं तो और व्रिक्षों से क्यों नहीं होता उतिस क्यों होता तो ये जो सत्ती है इसी का नाम म यह हम लोगों का सिद्धात है। लेकिन वो लोग तो यह मातते हैं कि नहीं। ब्रह्म ही विगत के लूप में प्रिणत हो गया। दोशा.
हा कधन गन्यें ते ते शाम गन्णाने दोशा एवा नविश्चें ते सरसद्धन नत्वं निथ्यापों तुत्तम। नानी वेदिय वि� तुछे तो यावत नाए। असाद गन्दपा अनुपादाने किन भवेत। तुछे ते अतिवी आपते भवेत। अतिवी आपते नाओ धर्महां। अतिवी आपते नाओ कश्चान धर्महां। अतिवी आपतो भवेत। तुछे आतिवी आपतो भवेत। अतिवी आपता धर्म तो अब.
इसका खंडन यहाँ पर भवान गोरवादाचारी कर रहे हैं कि भाई जीव जो है घटाकास के समान है। और ब्रह्म जो है महाकास के समान है। तो घटाकास नहीं तो महाकास का परिणाम है और नहीं महाकास का आंग है। अभ्याव है। देख.
देख। अरे शद्ध से लोग के तुम्हा से लोग है। हाँ? जित्ता.
द्वेत शद्ध से लो� वो तो जिये नहीं। विशिर्षितन्च विशिर्षितन्च विशिर्षिते तो रद्वैतों विशिर्षिताद्वैतों। जैसे बैशनों का विशिर्षिताद्वैत हैं, बैसे सैवों का भी हैं। विश्णानामुतेपी.
हैं। प्रामानजियामानमेत प्रामानजियानामेत।.
जो रामाननदी हैं वो राम को सरीरी मानते हैं और विश्णु को सरीर मानेंगे वो पज़नी जासु अनसते नाना सम्भुवरेंचि विश्णु भगवाना विकुटि विलास जासु रे होई लामवाम निशी सीतास होई हाँ वजहीं जास वानस गुन खानी अगनितर कुमा लच्चि ब्रह्मानी तो यहाँ पर सभीरी कोन हो गए किल्टी दाधी तो हैं बिश्चिता दोईती नहीं है इसलिए नहीं है कि वो सीता और राम को अभिन मानते हैं ये लोग तो लक्षमी को शरीर मन जाएंगे। शरीर से शरीर मन जाएंगे। लेकिन तुर्थिनार जी सीता और राम को घरा, अर्थ, जल, भी चिस्न मन जाएंगे। कहिया तो भिनन न भिनन। बंदों सीता, राम बन। जिनाई परंप्रेकाद। तो सीता, राम को भिनन तो यहां तो विशिक्षाद्वैतन का नहीं बनता लेकिन फिर भी सरीरी की दिश्टे से देखा जाये तो वो राम को सरीरी मानेंगे नारायन को सरीर को टीम ला रहेंगे और सरीर जो है ये सिव को सरीरी मानेंगे बिश्णू को सरीर मानेंगे और पारवती जी को भी सरीर माने श्यो और पारवती में भेड नहीं मानते हैं। दोनों एक है यह है। यह अंतर है। अधवी सिधानत ही ही अंत में माना जाएगा। यह भेड बादी जो हैं। यह भेड बन करते हैं। तो यह कह रहे हैं। इसमें दिस्थान दे दिया। कि यथा सुवर्णस्त रुचकादी ही यथा बापां फेन भुदभुदादी वुदभुद हमाजी ही। जैसी.
रुचक।.
रुचक तो है दीवा वर्णव। दर्णे मुझे पहने जाता बुल्चक।.
हाँ.
गले की माला तो जैसे स्वर्णों से जो चिकादी माला जी बनती है ये उसके स्वर्णों के विकार है जो भी बने ये विकार होगा اب ایسے تو یہ ہے کہ کئی آدمی مہر کی بھی مالا پہنچتے ہیں مہر کو تھیتے ہیں اور چادی کی بھی ہمیل سونے کی بھی مہر مہر جڑ لیا پہنچ رہے ہیں یہ بات ہے کئی لوگ اپنا पुर्ता के ऊपर पहन के चलते हैं कि जिस से लोग समझें कि.
हैं कुछ हैं।.
एक आजमे को कोई लड़की नहीं दे रहा था तो वो अपने महोल फ्रेंट की भूमता था। بڑا مشکل ہے کبھی کبھی لیتا ہوتا ہے ایک کے گھر میں سب لڑکے ہی لڑکے تھے بہو نہیں ملتی تھی بہو کوئی لڑکی دیتے ہی نہیں تھا بہو تو ماں تھی گھر میں اور بہو میں کوئی نہیں تھی تیک بار اناج بڑا تھا آنگن میں تو چڑیہ آئی تو لوگ بھگانے لگے اس کو.
तो.
महां कहती है अरे कम भगाते हो कम किडिया ही सजी इसती तो आई.
तो.
ये भी होता है कहनी तो अलग बात है तो जैसे जल से बुद-बुद होते हैं बुद-बुद करते हैं जैसे वो भोका से निकलते हैं न बुलबुला वो जल की विकार है पर हिमादी बर्व बन जाता है ऐसे ऐसा नहीं है की जीव ब्रह्म का विकार हो और दूसरे नाप्तवेवाह जैसे व्यक्षरत साका दी तो जैसे आकास का गटाकार विकार और अव्याव नहीं है उसी परकार जो पर्मात्मा है पर्मार्च सत उसका जीव न तो विकार है और न अव्याव है.
इसकी.
टीका है गटा कासास नहीं है गटा कासास अधी नाम विशेख विवोक्यत्ता भावा महरसेख मुझे रहती है नहीं है गटा कासास अधी ही आकासास नहीं विकारो अभिवो भावा इत्यांगी कारात्त तत्यां विवेनस् तत्यां तुकत्तान् नविवक्षिदायति इस आगाशोस्य। गटाशादीनान.
विपक्षत्वं। अत्मनहान अन्विकारस्वुर्णपत्वे निच्चित साथ्यगं गटाशादी। निच्चित साथ्यगं विपक्षहायती। निच्चित साथ्याभावान। निच्चित साथ्यवान सर्वक्षत। अर्थावात.
विकारत्तों अवेवत्तों मिठ्य है। यह नहीं है। पर भी सत्य है। यह सकुछ मानता है। जीव में जीव ब्रह्म का विखार है या ब्रह्म का अव्याव है ये वहाँ सत्थ है और इसके लिए कोई दिश्टांत नहीं है दिश्टांत यह है कि जैसे स्वर्ण के विखार होते हैं स्वर्ण से अभिन होते हैं स्वर्ण से भिन होते हैं इसी तरह से अव्यो प्रिक्षी साकाएं होती हैं जितर जगत वो जीव हैं तो नोन कहा कि ये जगत जीव स्वर्ण की और ब्रिक्ष की समार नहीं है वसुतर जीव घटा कास के समार है तो घटा कास महाकास का ना तो विकार है और ना अव्यो तो इस दिश्टानत कल उसको पता नहीं थ पुत्तर देगी हैं।.
भेगर्स.
तात्र गत्मान नमिवक्तितायति लोगर्स्त्रेम् व्यावर्थ्यम् सोज्यम् वाजयति निर्विति आकासास्मिनिविकारत्तम् वयत्तुम् चे लोगसुद्धम् नीतों पड़ी हाते हैं भाई इतने क्या देखते हैं किर्माद परमार्था कहा जो खटा कासों ने विकार हैं स्याथ तो बड़े सूर्च कहते हैं ये थावा हैं हाँ खटा कासा अगी आकासा अख्यस्त महाकासस महाकासस अगे ओर नवावजी इत्यत् वित्यत् वित्यत् � महा कासं प्रसीद विकारत्म अजवरत्म चाय नाती।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� तद भिन्ना भिन्नत्तु जी मेरे मिठो विदस्याभी आतात्य कप्ताज़ जी भवा तद भिन्ना भिन्नत्तु तद भिन्नत्तु گھٹا کاز جو ہے تدبینا بھینات سے تدبینات نیمان تو یہ جو دستان دے رہا تھا کی دیکھیے جیسے स्वर्ण से रुचकाजी उतपण होते हैं और जल से बुलबुद और हिमाजी उतपण होते हैं उसी तरह से ब्रह्म से जी उतपण होता है ब्रह्म से भी नहीं है इसलिए आप जो घटा कास महाकास का दिखान देते हैं यह गलत है यहां देखिए سرن سے رشکاری اتپن ہوتے ہیں تو اس میں بیوچار دکھا جائے یہ نیم نہیں ہے بیکار جو ہے بیکاری سے بھین ہوتا ہے تو انہوں نے کہا تدبینا بھینا سے تدبیناتو نیمات تدبینا بھینا سے अग यहां हम लेंगे रुचक रुचक रुचक जो है गले का हार गले का हार सोने से बना है.
तो चीज़.
है जैसे बुदबुद में और अगी में अनिकता है। जीव में क्या अनिकता है? अनिकता होने पर ही विकार या अविवत मनेगा है। तो जर का जो विदवुद है, कई विदवुद हैं। तो जितने बुदबुद हैं वो बस तुतना जल से.
अभिन हैं। चीज़े? और उस.
जल से ये बुदबुद अभिन हैं। एक बुदबुद जल से अभिन हैं। चीज़े? एक बुदबुद जल से अभिन हैं। और जल से सारे बुदबुद अभिन हैं। तो सभी का अपस में एक दूसर से जल के दारा सम्मन्ध हो गया, दोनों ये एक हैं। इसी ताले से वृच्चकाजी जो बनें, आजी बता है न, आजमान अनेक, तो स्वर्णस रूप से सभी अभेजन हैं। स्वर्णाज जाय.
मानस्यों स्वर्णक्तमी विद्धते हैं। यह है.
सुबरन सुत्पन होने कहने सुबर नहीं है। इसलिए जी आलग नहीं है। और नहीं तो विकार है ना व्याव है। स्वर नहीं है वो। इसी तरह बुलबुदा जी भी है। ना विकार है ना व्याव है। इसी तरह से जीव भी है। इसलिए तुमने जो बिन अनेकांत कत तो म.
ये.
नहीं बनता है इसलिए आकास का जो दुरिष्टानतर ने दिया वो तो दबस्त है। चिप्रिखार यही कह रहा है। अनेकान्त कत्तुन फदो विन्ना विन्नत्तु तुदा विन्नत्तु जी वेनु। मितो वेदस्ये वेदस्ये अतात्व कत्तु आर। मत्तों भी.
है इतनी जो.
एक घटाकास है वो जैसे महाकास से अभिन है वैसे जितने भी घटाकास है अनल घटाकास वो भी महाकास से अभिन है इसलिए घटाकास से सभी अभिन है तर भी ना अभिन ना सबसे अभिन है इसलिए साखा भी जैसे साका भेद है, यह नहीं बृच में था। इस तरह भेद नहीं बनेगा। यह हो गया। यतामवद्वालानाम। यह.
है.
न। गगरंमरिनमरई। यताभवत्यबुद्धानाम। आत्ममरिनमरई। तसमाद यथा घटा कासादी भेद बुद्धी निभन्दनो।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। यता भवति लोके वाला नाम विविकि नाम गनब आकासम गनजो धूमाजि मरेर मरिनम मलवन नगगनम मलवध्यत यता यतात्म विविकि नाम तता भवत्यात्म परोपी यो विग्ञाता प्रत्तक्रिष कर्म मरेर मरेनो अभुद्धानाम प्रत्तदात्मविर्गरहितानाम नात्मा अभुद्धारोभित् क्रिषाज् मरेर मरेनो भवतित्यस्ता यहां यो बताया की जो बान है नासमज अभिवेकी आकास में मलिंता देखते हैं। आकास को निला देखते हैं। आकास के स्वरूप से अन्विग होने के कारण जो बाहर हैं। इसलिए आकास में मलिंता का आरोप करते हैं। इसी परकार जो ये भी समझ दुझे की जो घटाकास हैं घटाकास में रज धूम और माले ने प्रतीत होता है वो घटगत है आकास गत नहीं है तो ये वो पाधिकरत है तो वच्चिता ये जो महाकास है उसमें भी कुछ लोग मरीनता देखते हैं तो आकास के स्वरूप को नजानेने के कारण देखते हैं इसी परकार शरीर के सम्बन्ध से शरीर और आत्मा के विवेक से जो रहे थें वो सरीर जो किलेश कर्म आधी हैं उनको आत्मा में आरूपित कर लेते हैं जो विवेकी हैं जो आत्मा के स्वरुप को जानते हैं कि आत्मा, सरीर, इंद्रिय, प्रान, मन, मुद्धी इन सब का द्रिष्टा, इन सब का साक्षी है, इन से निर्लिप्त है। जैसे आकाश निर्लिप्त होता है। पर जब इन के साथ वो उनको जोड़ रहे हैं, विवेका ग्रह है, विवेका अग्रह हो जाता है, तो ये सांके लोग विवेका ग्रह मानते हैं। और वेदानती कहते हैं अग्यार। अपने स्वलूप को नजानेने के कारण सरीन इंदिये के गुन धर्मों का आत्मा में आरूप कर लेते हैं। आत्मा की सुद्धता का जिसको ज्ञान हो जाता है वो उसी शणे जो केश कर्मादी हैं उनसे मुक्त हो जाता है। आप यहांती का कार्चा क्या कहने देखिए। जीवो ब्रह्मनो नासो। नानसो न विकारो भी। अभी तो ब्रह्माई वे। उपाधेनु प्रविष्टम जीव सब्दितम। इत्युक्तम तर युक्तम। पूरवक्षि कड़ा हो गया। आम जो कहते हैं जीव ब्रह्म का न त शब्दित हो गया है कि जो आपने कहा ये ठीक नहीं है। ब्रह्मना सुद्धत्वा जीवस्य लागाजी मर्वत्वात। ब्रह्म शुद्ध है और जीव लागाजी मर्वाला है। इसलिए एकत्व योगात। दोनों एक नहीं हो सकते। इत्याशंक्य। परमार्थतो जीवस्य परमासत्तहा यदी चीच विचार करके लेता जाये तो जीव में भी मरवत तो नहीं है। स्लोकस्यतात्परिवाज्यस्मात् खणाकासो महाकासा सूची पासा सूची पासा कासा कित्तु बाद जिन्मित्तों भेगा गटाकास महाकास सूची पासाकास सूची पासाकास सूची के भीता जो छेड है वो भी आकास है छोटा जिक्साई पड़ता है ये भेर कितो कासा है ये अबाजी मित्तो भेरा है तो घटाकास, मठाकास, हुचीपास, हुचीपास आकास। यह जो भेड है आकास का, यह वबाज़े निमित्ते हैं। इसी वुल्गार तरविशेया बुद्धी तत्वविक्तो रूपवेदो अथाक्रिया भेदो नाम अभेदस्थेति बेहारो। नवासी अथाल उब्रव बिते अर्थक क्रिया भी भेद हैं अर्थक क्रिया कारित को जो सत्व बाते हैं सत्व का लक्षन बहुत दिरो करते हैं अर्थक क्रिया कारित मेव सत्व अर्थक क्रिया कारित ही सत्व है لیکن یہ بات نہیں ہے سوپنک بدارتوں میں بھی اٹھک کیا کارت ہے سوپن میں ہم جو دیکھتے ہیں وہاں کچھ نہیں ہے تب ہی سگدک کا انوار تو ہوتا ہے یہاں بھی آپ دیکھئے गटा कास। इसकी अतक्रिया क्या है जला नेन। गटा कास से पानी ले आते हैं। और मठा कास में सो जाते हैं। गटा कास में सो नहीं सकते हैं। ठीक हैं। और सूर्च्या कास जो है उससे सी सकते हैं। घाला तो उसमें जा सकता है। जलालेनी असेन उसमें नहीं हो सकता है। तो आकास में भेड दिखाई पड़ता है। लेकिन ये भेड घट, मठ और सूशी के आधार पर है। बासताओं में आकास में कोई भेड नहीं है। ब्रह्म में कोई भेड नहीं है। अर्थाक्रिया अर्थाक्रिया ये जन्म मरना जिव्योहार तस्मात् तत् कित्मियों क्लीष कर्मभल मलवत्तुम् क्लीष कर्मभल वत्तुम् क्लीष अविध्या अस्मिता रागविष अविन्गविष यह कलेश कहलाते.
हैं पंच कलेश अविज्जा अनित्यासु.
की दुखा अनात्मसु नित्यसु की सुखात्मक्यातिर अविज्जा अनित्यासु की दुखा अनात्मसु नित्यसु की सुखात्मक्यातिर अविज्जा अनित्यासु दुखा अनात्मसु नित्यसु की सुखात्म और सुख परनात्मा में आत्मा ऐसी जो बुद्धी है ये विद्धा कह राती है। और इसी तरह से अस्मिता, अहं करता, अहं भोगता। दुर्द्रिश्यो एकात्मता.
एकात्मता है। दुर्द्रिश्यो एकात्मता.
एकात्मता है। दुर्द्रिश्यो एकात्मता एकात्मता है इसी का नाम अहंकार है। रूपो द्वावो रूप ततिप प्रतिष्ठा। रूपात्मकोर नेक दूतन नेक रूपा। सर्वरूपव सविजकाल काले धावत अहंकार पिशाच एशः। ये महारती रमण का श्रोप। रूपोद भवो रूपत्रत्ति प्रतिथ्था। रूपात्मको दूत बने के रूपः। रूप जो शरीरादी हैं इनी से ये उत्पन हुआ है। रूपों के समझाए में प्रतिथ्थित है। स्वेम रूपात्मक हो गया है। और अनेक रूप धारन करता है। कभी सुकी.
बनत.
کبھی جنب رہنے والا بنتا ہے کبھی مرنے والا بنتا ہے اور اگر بچار کیا جائے تو سمیمہ روپا اہنکار نام کی کچھ چیز ملتی نہیں یہ اہنکار روپ پیشاج بھاگ جاتا ہے بچار کاریاں تو یہ اہنکار اسمتہ روپ ہو.
گیا.
आंकार की करने जो सुक्य देने वाले हैं उनमें राज। दुग देने वाले हों भी। और आगर देश्य करता है कर्म। सुभा सुभ कर्म करेगा। और सुभा सुभ कर्म करने से सुभा सुभ फल। ये घीता में भगवान ने बताया अनिष्टमिष्टमिष्णचेत अनिष्टमिष्ण अनिष्टमिष्णचा तुविधं कर्मनप्फलम् भवत्य ज्ञानिनां ब्रेत्य नत् संज्ञातिनां क्वचित् तुविधं कर्मनप्फलम् कर्म कित तीर प्रकार के फल होते हैं एक तो अनिष्ट फल होता है जो मनुष् उसको अनिष्ट मिलता है। नर्खाजी की प्राप्ती होती है। और जो यग्य आगाजी कर्म करता है। उसको इश्ट फल की स्वर्गाजी की प्राप्ती होती है। और मिश्रम चाहो। जो पाप उर्पुर्ण बराबर करता है। उसको मनिष्ण लोग की प्राप्ती होती है। तो जो आत्मा को नहीं जानते, अत्यागी हैं, उनको यह फर्प प्राप्त होते हैं, तो सर्जाति रामकुछी होते हैं। जो उन्होंने सप्तम्यक त्याग कर दिया, अनात्मा का त्याग कर दिया, उनको यह नहीं होता है। तो आत्मा के स्वरुप के अज्ञान से ही यह सबक तो मुझमें ये किलेश नहीं है जो नासमझ है। वो आत्मा में किलेश का अनुभव करते हैं, मैं सुखी हूँ, मैं दुखी हूँ। मेरा जन्म हुआ है, मैं मर रहा हूँ, मैं मरने वाला हूँ। तो तुम कहां मरने वाले हैं? अभिजुवेश माने.
हैं? स्वरसवाहि.
वि हाँ वो ही बात है कि ये समझ भी देता है मनस्य कि हम इसते अलग हैं फिर भी बार बार शरीर में आतमुद्धी हो जाते हैं मरने से भी ढरता हैं मरनाद भया मरनाद भयाम अभिनुवेश है तो ये कलेश आत्मा मैं नहीं है। ये बुद्धी कृत हैं। छेत्र कृत हैं। छेत्र छेत्र के भिभाग को जो जान लेता है उसमें ये सब नहीं है। इसी ताय से अभिवेकियों को जितता है परोपियो विज्ञाता प्रत्तकिर्जिकर भल मर्णीर मर्णो बद्धानाम परोपियो पुरहा ज्ञात तत्कारिया संस्पिर्ष्टा अज्ञान तत्कारिया संस्पिर्ष्टा अज्ञान अज्ञान के कारिये से असंस्पिर्ष्ट है ये उनसे पर है तो फिर भी प्रत्तकिर प्रेश का प्रत्यक प्रत्यक कहते हैं अत्त प्रत्यंगिति युक्ता पाछा प्रत्यंगिति आगव सात्रस अनेक्षत्मात नो भावो भात आग पुर्लाया गधाविति सात्मदान विशर्णमुरित्ति विशर्णमुरित्ति सालो उदर फेने की तो कहते हैं यहां पर ही बताया तो भीड जो है रभीड नाम भीडस थे जिम्हारो नवसी था विलब्बितित था जिहाजु पाज़ भीड परिक्तो जीव बेदा तत्कतु जन्मर्न दुक्तु।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। इसी बात को दिश्चान्त कुदाना परिश्वागेशन आजव दिश्चान्त कुदाना अक्षणन विया जश्चे यथा बायाश्रांतिक भावन कतार नाम अक्षणन नाम अरत्माये तता यो ही प्रत्यात्मा विग्ञाता ये जो सुति है यो ही प्रत्यात्मा विग्ञाता स� उद्यानामित्तितर्व्यारश्टे प्रत्यगात्में थे। अभिवेकि भी अध्यारोगिचे भी। प्रत्यगात्मानो मरवत्ते मरप्रूक्तों परंकत्रभातों तर वर्जमित्यशंकान नदेत। अभिद्यासे आरूपित हुने की कारण प्रत्यगात्मा में नहीं है। प् प्रतीपता अच्छते अधिगमते जी प्रत्तक देहादी के नारा प्रतीपता माना विपरीत्या जो अनुहूत होता है वनका नाम प्रत्तक है तो देहादी के देहादी दिश्वरूप में है वो प्रतीपता माना दिश्वरूप में है इसलिए वो प्रत्तक है तो जो � पराक में जो मरिंता है जन मरन है वो प्रत्यक में आरुपित होती है उसी प्रकार जैसे आकाच में मरिंता का कोई आरुप कर लेता है बास ओम बद्रम करने मिश्रियाम देवा बद्रम बच्चे माक्षिवरिय जत्रा सुरेरंग हितुस्तवाग्ण सत्तनुमिर विशेम देवे हितम्यदायु सत्यले दूलवृद्धस्त्रमा सत्यलपूषाविष्यवेदा सत्यनत्तार्क्षोरिष्यनेमि सत्यनोऽव्रिहत्पतिर्दधातु ओम् शान्ति शान्ति शान्ति.
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