Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 20

This is a Hindi transcript of a spoken commentary (YouTube lecture) on the Mandukya Upanishad by Jagadguru Swami Swaroopananda Saraswati. The speaker explains technical terms (visheshana vs upalakshana), analyzes the three empirical states — waking (jagrat), dream (swapna), deep sleep (sushupti) — and elucidates the fourth state (turiya) as the witness/Atman beyond those states. The lecture uses common analogies (rope mistaken for snake, crow on a pole, blacksmith and iron) to illustrate ignorance (ajnana), the persistence of the Self, and how knowledge of turiya removes the appearance of duality and suffering.
Chapters
Hi, uc, ten, trepn, bs विशेषण से। ये अंतर था धर्म, यहाँ विशेषणांतरजोहै उनमें युक्ति है। यह आशंका आ जाती है। प्रज्ञा, इत्यादि। जो शिक्षण जी हैं, उनमें to ruk, va, a अथवा शब्द है अथवा बच्चा, सरम्भ परमाणु में, सरम्भ, सचाबागमनसाचीता परमात्मा। हां, ये जो है न, शांत, अदतियममूल्यनामतो, प्रज्ञ, प्रगम, रोम, प्रग्य, प्रगमन, हार, अग्रिम, आरक्षण, अंतम, अबबलेश्यम, रम, प्रभंतूपसमम, शांतम, शिवम, चतुर्थ, मंडल, स, आत्मा सभी। 1 आत्मा तक व्याख्यान हो गया। अब उसके आगे चल रहे हैं। तो बोले। तो बुलकी कह चुके है? उसी को आप कह रहे हैं। तो उसके उत्तर में उन्होंने कहा कि जो विशेषत दिए जा रहे हैं वो पुनरुक्ति, परिवार, परिवार उसका अर्थ भेद कर रहे हैं। अपवाद था धर्म, प्रबंतूसमूम्ति, जागलालिथानधरमा, भावा, उच्च देव। ये समझ लीजिये स्थानी और स्थान, जागृत स्वप्न सुशुपकी, ये होगा स्थान और विश्व। तैजस प्राग है। ये। स्थानीय हो गया। तो नाता प्रज्ञ वहि प्रज्ञ। इन विशेषणों से स्थानीयों का निशेल हो गया। अब स्थान का भी करते हैं। क्योंकि उसी बात को बार बार कहना रुकी मानी जाती है। तो उसके लिए बोले दूसरे विशेषण है। वो स्थान के प्रसिद्ध के लिए स्थान। धर्म से सन, धर्म परमात्मा शांत है। संत, राग, रहित, अविक्रिय, कूर्म रागत, विशाल से रहित अविक्रिय है, कूटस्थ है, कूवत सितम, कूटस सम का रथ है। जैसे लोहार की निहाई होती है, लोहार की निहाई कूट होती है, लोहे का कूड़ा सा होता है, उसी में दूसरे लोहे रख के कूटे जाते हैं। बजाते हैं। तो वो जो बजाने वाले लोग हैं, वो तो खाते रहते है, लेकिन बोझों का रहता है। तो उसको कूट कहते हैं? एवं हाँ, ऐसा है कि वो तो कच्चा है, जो उसको कूटते हैं, जिसको बजाते हैं। वो लोहा गर्म होता है। तो उसका तो परिवर्तन हो जाता है, लेकिन नीचे वाले का कोई परिवर्तन नहीं होता। इसी तरह से जो आत्मा है, उसके सामने से राग द्वेष, आज मनोविकार आते जाते रहते हैं। लेकिन वो जो कटा रहता है, इसलिए वो शांत है। कूटस्थ के समान कुतस है? वो। तो शांत का अर्थ हो गया शिवम, परिशुद्ध सुमन, परिशुद्ध, परमानंद बुध रूपम परमानंद बोध रूप है। माने, परमानंद बोध। ऐसा ज्ञान जो आनंद रूप है। परमानंद रूप परमानंद, यसमाजताभवषिततसमा चतुर्थ। हा, कहते हैं अंत स्थान, धर्म, प्रबंतूपसम्मी, धर्माभाव, शांत, व, तु, अध्यतन रहित चतुरथमतुरियमननते। तो यहाँ यह बतलाया, यसमांजइताभावो पर लक्षित, तस्मा, चतुर्थ। इत्यर्थ जईताभावपरलक्षितम जइता भाव। परमात्मा में दलित का अभाव है। तो इसका अर्थ यह हुआ कि परमात्मा और दलित भाव। फिर वहां 2 वस्तु हो गई। विशिष्ट आप कहेंगे। तो बोले उपलक्षित, उपलक्षण कहलाता है? जो वस्तु के स्वरूप में बिना प्रविष्ट हुए ही उसके स्वरूप का बहुत अन्यों से उसको प्रथक करके दिखा दे। वस्तु के स्वरूप में बिना प्रविष्ट हुए ही उससे अन्यों से उसका पार्क दिखला दिया। जैसे काक वंतो, देवदत्त ग्रह। किसी ने पूछा कि देवदत्त का घर कौन सा है? तो बोले काक वंत, जिसके घर में कौआ बैठा? तो कौआ जो है, हमेशा 2 ही बैठा रहेगा। उसमें तो केवल दिखाने के लिए हुआ, उड़ भी जा। लेकिन जिस के ऊपर कोई खम्बा है। कुछ भी है। उदगउर्गतरणतम, जिसमें वो हुआ, बैठा था, वो उसका चिर बन जाएगा। तो उपलक्षण उसको कहते हैं जो कि वस्तु के स्वरूप को जन्म देता है। लेकिन वस्तु के स्वरूप में प्रविष्ट नहीं होता। और विशेषण उसको कहते हैं जो वस्तु के स्वरूप में प्रविष्ट रहता है। जैसे नील उत्पादन, उत्पल, नील, नीला कमल। तो नील को कवर से अलग नहीं कर सकता। वो रहेगा। उसमें। तो यहाँ पर देता भाव विशेषण नहीं है, उपलक्षण है the clitoria का। अधिकतम भेरी थी संख्या, विशेष, भावी कथन, चतुर्थ इच्छा संख्या हो। चतुर्थ। मन से कहा कि वो चतुर्थ है, चतुर्थ कौन 3 होगा जागृत। और वो है चतुर्थ। तो कहते हैं चतुर्थ क्यों कहा? उसको संख्या विशेष का विषय है। तो वो है। नहीं। तो उसमें चतुर्थ तो कहाँ से आ गया। तो उसके उत्तर में कहा प्रति है? प्रतिमान या प्रतिमान लुपपादत्तयहै का है? जागृत स्वप्न, इनसे विलक्षण होने के कारण। उसको चतुर्थ कह दिया। स, आत्मा, विजय, चतुर, व्यकित, विशेष, सातवाँ कहते है चतुर, तुरी इनका, व्याखान, तरिम, सातवा कहा? तुरी आपने कह दिया, आपने चतुर्थ कर दिया। उससे हमको पता नहीं लगता कि तू क्या है? तो बता तो आत्मा है। सातवा सभी वो आत्मा है। और उसको जानना चाहिए। चौथा आत्मा है। आत्मा बोले आत्मा में जो विशेष नही हो रहे है। 2 है। 7 में कहाँ पर है? आते शांत है। अत शांत, रही, चतुर्त, चतुर, अच्छा शाम। वो जो कह रहे थे कि दोबारा जान रहे, यहाँ पर, व्याख्यान हो गया। ये जो चौथा बताया। तो चौथा जो है, संख्या बाजा है और जिसको कहना है वो संख्य है, के है। इसलिए चतुर्थ दोनों का होता है। लेकिन इन तीनों की तो है। क्या हो गया। बोले, वो आत्मा है। विजया, मान, मान, सर, beta तथा आत्मा, दिष्ट, न। यह सब जियां भूत, पूर्व, गच्चा, दुरिता, बाबा, ऐसा है। यहाँ पर बताया कि आत्मा को जानना चाहिए, बिजिया क्यों जानना चाहिए? यदि आपको आत्मा का वो स्वरूप विदित हो रहा है तो तू जानने की आवश्यकता ही नहीं है। तो बगिया कह रहा है? तो यह बताया कि जैसे रज्जु में सर्प का भ्रम हो जाता है, तो रज्जो में 1 सर्प नहीं होता। रज्जु में सर्प का। यहां दटानसियाहैकोई, किसी को सर्प का भ्रम हुआ, किसी को भूषिद्रका की धरती में दर आ ही है किसी को दंड का। इस तरह से ये जो अनेक विकल्प दिखाई पड़ते हैं, रस्सी में, भ्रम से, इनके कारण रस्सी नहीं दिखाई पड़ रही है। जब ये नहीं रहेंगे, इनका निश्चित हो जाएगा तो दंड का दर्शन होगा। उसी तरह से ततमस्याजीबाककरथम, ततमस्याजीबाकरथम, ततमस्याजबततम्यी, तमस्या है। उनका जो अर्थ है, आत्मा जिसको सूची की, अदृष्ट वो दृष्टा है। लेकिन वो किसी का दृश्य नहीं है। नई दृष्टि दृष्टि देती है, दृष्टि दृष्टा की स्वरूप दृष्टि है, उसका कभी परिरूप नहीं होता। इत्यादि सूचियों से कहा गया जो आत्मा है, सभी गया। हा, वो जानना चाहिए। क्यों? जब आत्मा ऐसा है जो कि जस्ट टू का, दृष्टा, दृष्टा का स्वरुपभूत दृष्टि है, उसका रूप नहीं होता है। वो सब का उसका कोई दृष्टा नहीं है। यह जब आत्मा का स्वरुप आप बता रहे हैं तो और क्या जानना है? बोले भूतपूर्व गत्या। पहले आपको इस तरह का पता नहीं था। ततमसजवाकशणानंतरम यह आपको विदित होगा। इसलिए आपको जानना चाहिए। भूतपूर्व गति से जाते यदि आत्मा का बोध हो जाए तो द्वय तो रह ही नहीं जायेगा। ये हो गया। तो अब यह बोल रहे है। मैंने थोड़े थोड़े प्रतीक बता रहे हैं। नहीं दे टूरथीआत्मव्वहारकोतो बिगया आत्मा जब व्यवहार का विषय नहीं है तो बिग कैसे होगा? तो बोले कि भूतपूर्व अव्यवस्था जो विधावस्था पहले की, उस व्यवस्था में नियत गति तैयार भूतपुर गति से यहाँ पर विकी, वस्था विभाग, वस्था गाता जान, विभाग क्यों नहीं होता। बोले। तो ज्ञानी तत्काल ज्ञान से अपनी तत्व जो बोध होता है तो उसे अज्ञान की निवृत्ति हो जाती। अज्ञान की निवृति हो गई। तो ज्ञाता ज्ञान दें कि चिपटी भी नहीं रहती। मैं आत्मा मेरा दिन है, मैं उसका जाता हूँ और उसको मुझे जानना है। ज्ञान वृत्ति से, उसको जानना है। ये पहले रहता है कि आत्मा को जानना है। लेकिन जब आत्मा का ज्ञान हो जाएगा तो अज्ञान की निवृति हो गई। ज्ञान की निवृति हो जाने पर जो ज्ञाता है, ज्ञाता उसमें ज्ञाति नहीं ले जाता। क्योंकि गें उससे भिन्न नहीं है। जाता से भिंड नहीं है, अपने स्वरुप उसका स्वरूप ही है। इसलिए जाता और गे का भेद नहीं रहा। तो ज्ञान भी नहीं रहा। ज्ञान हो के वो भी नष्ट हो गया। इस गाते, ये में रहता है। श्लोका ममंतीशुरहोगनिमृति सर्व दुःख का नाम san, सर का नाम साना आत्मा इसान ना प्रबरित दुख निवृति तदविजञाननमितत्व दुख न स्वरूप न कुता सर्व भाव मृदु सर पवन a के लिए कारक हैं, उसी का ब्यान कर रहे हैं। इसका सीधा अर्थ है। तो जो तुरीय है, कहते हैं वो समस्त। दुखों की निवृति हो जाने पर निवृति सर नाम। इसानमइसानपरहुरम जो सान है, प्रभु है। समस्त भावों का। ऐसा तुरी तुरी है, वो बिभू माना जाता है। कार्य कारण बंधु। तो इसे विश्व विश्व कार्य कारण से आबद्ध है और प्राग करण बद्ध है। लेकिन तुरी तीनों ही तीनों में अलग कार्य है। न कारण। यह मूल कारिकाओं का अच्छा, अब उसी का व्याखान करेंगे का भास है। पराग नाम सर्व दुःख का नाम साना। आत्मा पर जो दुख है, उनकी निवृत्ति का ईसान, उनकी प्रवृत्ति का म समर्थ उतरी है। आत्मा इसान बदस व्याख्या प्रभु रति ईसान क्यो प्रभु है। दुख निवतपरतिप्रभवति दुख निवृति के प्रति समर्थ है। तब विज्ञान न दुख निवृत्ति तुरी के विज्ञान से ही दुख की नियति होती है। अब 90 स्वरुप कुदा यसमाद्वतासर्वभावानम अद्रिता सर्व बाबा नम समस्त भावों का अद् था। वह रजु सर्वत मसावात समस्त भाव जो है। हाँ इधर लगेगा सर्वभवन रजू सर्वत मसावात। जितने भी भाव है। राज्यों में सर्व के समान मृषा हैं। इसलिए वह देव है। जूतनाथजूतनाजूतनाथ तुरिया जितना देव। प्रकाश रूप होने कारण वो देव है। वो तुरी चतुर्थ है, विभु है, व्याप भी है। अब का नाता प्रगम विवरण नाता प्रज्ञा सूची में कहा गया है। उनके व्यवरण रूप सुरोका उनका उचारण करते हैं। विविध थान एवं समान भवति कहते हैं, विविध से होता है, इससे होता है। इसलिए यह तूरी विभु कहलाता है। नहीं पूरी। लेकिन स्थान आत्मा धारयति, अगर पूरी न रहे। तो ये तीनों स्थान है, वो रही, रहेंगे। सर्व का नाम, आध्यात्म का भेद, भिनना नाम, सम, दुख, आध्यात्मक, आध्यात्मक भेज भिन्न। हराम की सम् सम् कला है। जाने की अनुभव स्मिता मिली। यहाँ यह बताया पर कार्यका कि विश्व? तैजस तो 3 हो गए, थान, इतानी और जागृत स्वप्न सूट, ये होगा स्थान, इन स्थानीय और स्थानों से विलक्षण। इनका जो दशा है, वो पूरी है। स्थान स्थानीय में रहता है, स्थानीय में रहता। हाँ जी, ये तीनों अवस्थाओं के विश्व है। हाँ, ठीक है। तीनों अवस्था स्थान है। तो स्थान जागृत में विश्व रहता है, स्वप्न में तेज रहता है और सुसुप्ति प्राग रहता है। तो ये 3 अवस्था है। यह स्थान और इनमें रहने वाला हुआ विश्ुतयस्प्राग। स्थानीय हो गा। तो ये दोनों जो है, तुरी इनसे विलक्षण है, रहते है, तू माने चौथा। ये 3 हैं, इनकी अपेक्षा चौथा, वो चौथा क्यों कहा गया? इनसे विलक्षण होने के कारण? वो विश्व नहीं है, तेजस नहीं है, प्राग नहीं है। वरना वो जागरत है, न स्वप्न है, न सुशी। इन सबका वो जानने वाला है। इन सब का साक्षी है। और कूट है। अगर, ये न रहे। जानने वाला आत्मा यदि न रहे तो न। तो 3 अवस्था रहेगी और 3 अवस्था ही रहेंगे। ये 3 स्थानीय रहेंगे। क्योंकि जिसकी सिद्धि दृष्टा से होती है, जो देखने वाला नित चैतन्यात्मा है, वो अगर न रहेगा। तो ये कहाँ रहेंगे? तो ये दिखाई पड़ता है। और उसमें ये नहीं है, वो इनसे विलक्षण है। इसलिए ये जो जागरत और स्वप्न के दुख है, ये भी उसमें नहीं है। जागरित में आध्यात्मिक आध्यात्म का दुख है। आजी शब्द से। तो जब हम जागरित अवस्था में आते हैं, तो हमें आध्यात्मिक दुखों का सामना करना पड़ता है। आध्यात्मिक रुख क्या है? शरीर की ब्याजी और मन की चिंताएं आज आज ही हो गई। और आज भौतिक परस्पर संघात, बरस पर, प्राणियों के परस्पर विरोध से जो कष्ट होता है, वो आदिभोतिक दुख है। और जो ग्रह भूत की पीड़ा है, इससे आज दुख है। तो ये जागरित अवस्था में, यह दुख है। और स्वप्नावस्था में भी आ जाते हैं, स्वपनावस्था में भी चिंता हो जाती है। ऐसे दृष्य दिखाई पड़ते हैं कि हम घबरा जाते हैं, वहाँ भी बाजी दिखाई पड़ती है। लेकिन ये सब के सब देखने वालों में है, देखने वाले में नहीं है। तुरी जो है, वो उनको देखने वाला है। न वो उसमे वो न। ये स्थान है। उसमें अनमोल स्थान में क्यों नहीं है? क्योंकि ये वे विचरित होते है। विचरित यूं होते हैं कि जब हम स्वप्न में चले जाते हैं, तो जागरित अवस्था नहीं रहती। और जागृत वस्था का भान अभिमानी विश्व भी नहीं रहता। और जब स्वप्न से उड़ जाते हैं, जागरित में आ जाते हैं, तो यह तरस नहीं रहता, सपना नहीं रहता। तो दोनों अवस्थाएं जब नहीं रहती, रुप में आ जाते हैं, फिर दोनों नहीं रहती। लेकिन दस्ता जो है, वो रहता है, वो है इसलिए वो सुस्ती को दृष्टा मान ले। तो है को दृष्टा सुस्ती। अवस्था किसकी अवस्था है किसकी सुसुप्ति बोलो, वो तो आपकी सुसुप्ति है। और सुषुप्ति आई सुसुप्ति चली गई, किसकी आई सुसुप्ति, जो सोया और कौन उठा, जो सोया था। तो जो सोने की अवस्था है, सुसुप्ति, उसका तो वेविचार हो गया। जब वो उठ गया, लेकिन वो रहा। तो वो आत्मा जो है, 1 है, उसमें ये 3 प्रतीत हो रहे हैं, कैसे प्रतीत हो रहे हैं? जैसे कि मंद अंधकार में रस्सी पड़ी हो, तो लोगों को उसमें भ्रम हो जाता है। कि यह सर्प है। किसी को सर्व का भ्रम हो जाता है, किसी को माला का भ्रम हो जाता है, किसी को धरती की दरहार का भ्रम हो जाता है, किसी को लगता है, कोई चेडा मेरा डंडा पड़ा है। तो ये जो भ्रम है, इन भ्रमों के का अधिष्ठान कौन है? रस्सी, इसी तरह से उस तुरीय में ये तीनों कल्पित है। तो उसका ज्ञान होने पर ये सब समाप्त हो जाता है। तो इनका संग्रह, इसमें कहा की ये जो त्री है, ये समस्त जों की निवृति का निमित है, इसका बोध हो जाने पर न जागरुक है, न स्वप्न हैं, न शुरूपति है। और ये प्रभु है, माने समर्थ है। अब वे अव्य है। इसका अर्थ यह है कि इसका जो स्वरूप से अपरचित है, व्यय हो जाना, मान परिवर्तित हो जाना, या उसका खीर हो जाना। तो इसका जो स्वरूप है, जो रहता है। इसलिए अब वे है और अद्ययित है, इसमें अद्वित नहीं हैं। दुहिता बाबू पर लक्षित है। और सर्वभाव जो है, ये वसुताहैं नहीं। इसलिए ये मिच्छा है। और उनका जो प्रकाशक है, जुतनात्मकत्वआत्म प्रकाश रूप होने के कारण वो विभु है। बताया, अब इनको बताया कि कार्य कारण, शेते, तेजस, विश्व, तैजस कार्य कारण से बने हुए हैं, प्राग कारण से बना हुआ है। इसका अर्थ करेंगे अभी, विश्वधाम सामान्य विशेष भाव रूप थे, सूर्य यातात्मऔधारणथम विश्वादी का सामान्य विशेष भाव का निरूपण करते हैं। पुरी के यतात्मा का उदाहरण करने के लिए कार्य, कार्यम, क्रियते इकिफलाभरीहवा जो किया जाय, वह कार्य कर्णम। करोति की बीज हवा करता है। भाव तत्व ग्रहण, अन्यथा ग्रहण, भ्रम वी, फल भावाभ्यमतोतोबद्ध संग्रहित स्थित तत्वग्रहण और अन्यथा ग्रहण। इन दोनों के द्वारा बीज और फल भाव से ये दोनों बने हुए है। और प्राज्ञ तो बीज, भाव नहीं बना। तो 2 सत्व ग्रहण, अन्यथा ग्रहण, तुझे, न सुझता, न बीजितेनसंाअब इसकी टीका देख लिया है। विश्वास अंतर, विश्वाल रूप द्वारा, उदार विश्वादी में विशेष रूप के द्वारा तुरी का निर्धारण कर रहे हैं। शोक से तार विश्वासी नामी, सामान्य प्राग विशेषा cut कर। तत्कार तो यहाँ पर ये बता दिया कि ये जो जागरत और स्वप्न है, ये कार्य कारण से बचे हुए है, और प्राग है, केवल कारण से बचा हुआ है, ये बता रहा है। और यहाँ अब इसको और आगे स्पष्ट करेंगे कर्क न सम, न बिना प्राज्ञ कट, सर्वे समिति सर्वु्धकसदकहते है, जो प्राग है, वो न अपने को जानता है, दूसरों को जानता है, न सत्य को जानता है, न मिक्षा को जानता है। प्राज्ञ किचन से प्राग किसी को नहीं जानता। लेकिन टीरियम, सर्जक, सदा, तूर्य सब को जानता है। यह अंतर हो गया प्राग से दूरी का अच्छा। अब यहाँ के दयतस्यगरणमतुल्यम प्राग कहते हैं प्राग और तुरीय दोनों में जीत का अग्रहण समान है है। लेकिन समान होने पर भी प्राग है। बीज निदरायुतहैजोवहा। पर द्वित का अग्रहण हो रहा है को, उसका भी निद्रा है। निद्रा। निद्रा के कारण प्राग को दइत का भान नहीं हो रहा है। लेकिन तू जो तुरी है, उसमें निद्रा नहीं है। बीज नहीं तो। इसलिए जब जागृत हो जाते हैं तो पराग नहीं रहता। क्योंकि बीज नहीं रहा, जागृत हो गए। लेकिन पुर है, वो बना रहता है। tea tea आशंका है, कtमitiवकथमित गया। सत्ता लक्षणु, बंधू नसिधता। कहते हैं कि कारण बंध? प्राग का क्यों है। तुरिया तथा ग्रहण था। ग्रहण लक्षण, बंधू नसिधताकहते हैं कि प्राग कर्णबंध क्यों है? और तुरतुरी है तुरिया। तत्व ना रहेगा। मान परागकरण कैसे? और ग्रहण जो बंध है, उसमें क्यों नहीं है। यह समाज। आत्म विलक्षण, विद्या, बीज, प्रभूत भाइयों प्रागण चिर। क्योंकि अपने आत्म विलक्षण, अविद्या बीज है। प्रसूता, आत्मा से विलक्षण, अविद्या है। वहीं बीज है। उससे पशु जो रहित है, पराग उसको नहीं जानता था। भाई को जानते हैं तो 400 ततकागहणहैनततकागह कम है। उससे युक्त होने के कारण। अनथागणहोतेहैनबदधु थी। तो वो, तब ग्रहण कब है? अज्ञान जो कि अन्यथा ग्रहण का बीज है, उससे वो बंद रहता है। sa योजना परिपूर पर अब बेटी करण भाव तत्व ग्रहण ग्रहण। मुक्त। तो बलिया में सच हो गया। हो गया। मारना। तुरिया, तुरिया स्वभाव, सर्वदा, सर्वदा, सर्व, सर्जक, सर्वजित, तत्वत भाव बदलाया कि जो प्राग है प्राग और तूर्य का पार्क या विलक्षण, तो बता रहे हैं। तो जो प्राग है वो अग्रहण और अन्यथा ग्रहण और अन्यथा ग्रहण। 2 हो गया। जो जागृत अवस्था है, उसमें द्वैत का ग्रहण होता है और स्वपन वस्तु के अन्यथा ग्रहण होता है। माने। जो वस्तु जागृत नहीं है, वो वहाँ पर दिखाई पड़ती। तो ग्रहण अन्यथा ग्रहण। ये जागृत और स्वप्न में होते हैं। तो ये दोनों कार्य कारण से बंद है। सपना है विश्व तैजस और ये है असल में क्या है जो हमको संसार का ग्रहण हो रहा है। हाँ, असल में इसको ग्रहण करना होगा। अग्रहण, अन्यथा ग्रहण तथा ग्रहण। अन्तग्रहण बसुता द्वैत की जो प्रतीति हो रही है, इसलिए हो रही है कि हमने अभी अपने आप को नहीं जाना। आत्मा के अज्ञान से ही द्वैत की प्रतीति होती है। जब आत्मा विस्मित हो जाता है तो यह द्वैत दिखाई पड़ने लगता है। तो तत्वाग्रहणजागरतम भी है और स्वप्न में भी है। अन्यथा ग्रहण है। यह ग्रहण और अन्यथा ग्रहण दोनो में है। अगर ग्रहण है। माने, अग्रहण है। वो कारण है माने। द्वैत का कारण, परमात्मा के स्वरूप का अग्रहण है। है माने। अज्ञान, अज्ञान के कारण यह संसार दिखाई पड़ता है। अन्यथा ग्रहण। तो कारण हो गया। अन्यथा परमात्मा के स्वरूप का अनुभूत और अन्यथा ग्रहण हो गया। यह जागृत स्वप्न। तो कारण और कार्य दोनों से विश्व और तैजस बजे बने हुए है। क्या समझ में दोनों में जागर स्वप्न दोनों में 2 ग्रहण इनमें है। वस्तु के आत्मा के स्वरूप का बोध होने के कारण यह प्रपंच हमको दिखाई पड़ रहा है। और सुशुपतीमेंगाढ़ी नींद में चले जाते हैं तो केवल अग्रहण रह जाता है, अन्यथा नहीं रहता। तो वो कारण बंद हो गया है। वो न तो कार्य से बद्ध है और न कारण से बद्ध है। कारण से बद्ध इसलिए नहीं है कि अज्ञान भी उसमें नहीं है। ज्ञान आत्मा में नहीं हो सकता, क्यों नहीं हो सकता। ज्ञान आत्मा में अगर न हो। आत्मा में यदि ज्ञान हो तो ज्ञान का ज्ञान कैसे होगा? ब्रह्म जान, मी, मैं ब्रह्म नहीं, ब्रह्म को नहीं जानता, मैं ब्रह्म को नहीं जानता, ये कौन जान रहा है। तुम? वो तो अज्ञान को भी जानने वाला है। उसमें अज्ञान कहाँ है? जानने का ज्ञान है। हाँ, यह है। इसलिए वो ज्ञान स्वरूप है। ज्ञान स्वरूप होने के कारण उसमें अज्ञान नहीं है। तो जागरित को भी वह जानता है और स्वप्न को भी जानता है। अग्रहण उसमें है नहीं। और इधर सुषुप्ति में केवल कारण अज्ञान रहता है। प्राग ज्ञान से बना हुआ है। अज्ञान के ही कारण वह बीजावस्था हो, बीजावस्था कारणावस्था है। तो फिर वो जग आता है। अगर सुषुप्ति में अज्ञान न होता तो मुक्त हो जाता। क्योंकि पर कारण ही नहीं है। संसार में आने का तो मुख न होने के कारण यह कहना पड़ेगा कि वहां पर कारण रहता है। लेकिन ये तुर्य में नहीं है। जो चतुर्थ आत्मा है, उसमें यह नहीं है। तो बोले उसमें दिखाई क्यों पड़ते हैं? उसके वास्तविक स्वरुप को न जानने के कारण दिखाई पड़ता है। जैसे रस्सी के वास्तविक स्वरूप को न जानने के कारण सर्पमाला, भूषित और द इन ब्रह्मों की प्रतीति होती है, उसी तरह से आत्मा में जागृत हो गया, सपने में चला गया, चला गया। वो कहीं कुछ जाता आता नहीं है। उसके सामने अवस्थाएं आती है, जाती है। वो 1 रहता है। तो यह हो गया। ओ भद्रम दुष्ट। gumsum santi ओम शांति शांति शांति।
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