Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Pravachan 9

Transcript of a Hindi/Sanskrit pravachan (spiritual discourse) focusing on the nature of creation, the role of God as creator/preserver, the soul’s entanglement in samsāra, suffering across life stages, the importance of remembering God (Rāma-nāma) at death, and illustrative stories from the Rāmāyaṇa (Jatayu; Bāli–Sugrīva). The speaker contrasts sentient creation with inert matter, explains why God manifests the world as a leela, and exhorts attachment to God to break the cycle of birth and death.
Chapters
तराणिषत स्वर्णं कार्णगूर्णदिरेवा वलिकरित कपोलो दान दानाभिराम। घिरिष घिरि सुताव्या रालितं वित्यमं के सजनवरणशीरम् सीरये विग्नलायम् कल्याणानाम् नुवानं करिमलम्तनं पावणं पावणानाम् पाथेयं यन्मोक्षो सपति परपदः प्राप्तये प्रस्तितस्य विष्रामत्तानमेकं कविवरवचसां जीवनं सज्ञानां बीजं धर्मज्ञस्यप्रवतुवतां भूतेरामणां।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।.
Śrī Rāma Jaya Rāma Jaya Jaya Rāma.
Śrī.
Rāma Jaya Rāma Jaya Jaya Rāma śrī rāma jay rāma jay jay rāma śrī rāma jay rāma jay jay rāma.
धर्म की अधर्म का प्राणियों में विश्व का गो माता की गो हत्या हरहर महाद समुबस्तित सजनों देवियों अभी आप सुन रहे थे इस सिष्टी के उत्पादक, पालक, सम्भारक भगवान है। जड़ वस्तु संसार का उत्पादक नहीं हो सकती। क्योंकि.
हम जब इस संसार को देखते.
हैं तो इसमें सर्वत नियम दिखाई पड़ता है और प्रतेग वस्तु की उप्योगिता प्रतीथ होती है हमारे इस शरीर को ही हम ले गए तो शरीर के प्रतेक अंग की उप्योगिता है। ये रचना किसी जड़ प्रकृति के दोरा नहीं हो सकती। किसी चेतन के दोरा ही यह हो सकती है। और वह चेतन परमात्मा है। उस पर्मात्मा से ही इस जगत की उत्पत्ती होती है। संसान की उत्पत्ती पर्मात्मा क्यों करते हैं?
उनका क्या प्रियोजन है?
तो उनके दिये तो अपने दिये कोई आवश्यक नहीं है। लोकवत लीला कैवल्यम। योबर लीला ही उनका उद्धेश हो सकता है। और लीला भी बालकों की होती हैं। परमात्मा को क्या आबश्चता है। पर ये जो जीव प्रले काल में निधरा में पड़े हुए थे। परमात से बंचित थे। उनको परमात्त दर्शन कराने के दिये सिष्टी की आवाद है। जैसे कोई माता जिसका बच्चा भोजन मांगते मांगते सो गया हो माता ने कहा थोड़ी देर के बाद दूगी दूगी और रोरो कर वो निद्रित हो गया। अब माता के सामने उसका जो कुमलाया चेहरा है उसको देखकर दया आ जाती है। और जैसे ही उसके सामने कोई मधर वस्तु आती है चाहे पेडा आ जायें.
गुलाब जामन आ जायें, रभुद्धा आ जायें.
तो वो चाहेती है कि मैं इसको किला हूँ। उसको अपने लिए ज़रूरी नहीं है। वो उसको उठाती है। और वो बालक पेर फटकता है, फटकता है, कहते हैं हमें मत उठाओं। हम सो रहे हैं। तो भी माम उसको उठाती हैं। और जब उसके मुँं में मीटी वर्तु.
डाल.
और उसके स्वाद से जो बेटे की आग शमकने लगती है तो माँ को संतोष होता है। इसी तरह से ये जीव माया में आविश्टित होकर पढ़ा हुआ है प्रले काल में सो रहा है भगवान इसको उठाते हैं। उठा कर इसको मानो शरीर दे देते हैं। वैसे 84 लाक योनिया हैं। अगर उसके ऐसे कर्म हैं कि जिनके.
कारण उसको छोटी योनियों में दूती योनियों.
में जाना हो तो भी वो उनको.
क्रमसा उन योनियों का भोग कराते हुए.
अंत में मानो बनाते हैं।.
बुद्धी इन्दी मन प्रानान भूतानाम आशेजत प्रभू।.
दिखाये बुद्धी इन्दी, बुद्धी इन्दी माने गानें दिया, मन, प्रान.
सब प्राणियों का परमात्माने सर्जन किया, मात्रार्थन च भवार्थन चार, आत्मने कर्पनायेगा। जिस्से कि ये देख सके, सुन सके.
संसार में आ सके, विवहार कर सके अपने सुक के साधनों को खूच सके, खूच संकर संग्रे कर सके और सबसे मुख्यमात ये है अकलपनायचा, मूक्च के लिए तो भगवान इसको आख, कान, नाग, जीव, पत इसलिए देते हैं कि इनके द्वारा ये परमात्मा का साक्षातकार कर लेगा। परमात्मा के साक्षातकार से ही इसके दुखों.
की निवित्ती हो सकता है। क्यूंकि इसके सामने जो दुख हाया है जनमरण के चक्र में जो ही पड़ा.
है प्रलेकाजम भी उसके बीज बने रहते हैं सर्वता उससे मुक्त होने के लिए यही आवचक है कि वो परमात्मा का साथ्यात्कार करें संसार में जनमरणा मरणा.
इसके.
साथ अनेकों दुख जुड़े हुए। जन्ममिल्क्त जराव्याजि दुख दोशानु दर्शनों। जन्म लेने के पहले माता के पेट में नो मेना रहना पढ़ता है। सिर नीचे पैर उपर पढ़े हैं। मातायजी खटा मीठा या करवा चिरपरा खा लेती है तो उसको जलन होती है कहे नहीं सकता कि मा मत खा पड़े हैं पर कोई ठिकाना नहीं निकल ही पाते हैं कि नहीं और निकल भी गए वड़ी मुश्किल से तो बाल्यावत्था आ जाती है। चोटा सबालक करवट भी नहीं ले सकता। मच्छड काटते हैं। माते में दर्द होता है तो माँ पेर सहलाती है। पेर में दर्द होता है तो माते सहलाती है। बता नहीं सकता कि हमें कौन सा कश्ठ है। यही बाल्यावत था। फिर उसके बाद यह जब बड़ा हो जाता है, तो उसमें कईयों कोईने कों.
परकार के रोग हो जाते हैं.
और रोगों से गर्ष हो कर कर्ष पाता है।.
किसी को ज़्वर हो गया, किसी को.
स्वास का रोग हो गया, किसी का.
हार्ट का गर्वण हो गया.
कितने रोग हैं कोई ठकाना नहीं माता पिता इराज करते करते ठक जाते हैं रोगों का आंत नहीं तो उन रोगों का सामना और जैसे जैसे समझ वर्ती है वैसे वैसे वो अपना संसार बनाता है.
अपना.
संसार स्वें वरे से लेता है। जीव की सिथ्ती। एक होती है इश्वर की सिथ्ती और दूसरी होती है जीव की स्वें की सिथ्ती। इश्वर की सिथ्ती तो हम लोग देखा ही रहे हैं।.
अब जीव की अपनी सिथ्ती है।.
हमने अपने संबन्द मना के रखे हैं। यह हमारा अमुक है। यह हमारा अमुक है। यह हमारी इत्ति है।.
यह हमारा बेटा है।.
यह हमारा मित्र है। यह शत्र है। सब मना के रखे हैं। जियू सिष्ठी में और ईसिष्ठी में क्या अंतर हैं। इसके लिए एक दिश्टान् कि दो आदमी परदेश गए व्यापार के लिए और उन्होंने व्यापार किया व्यापार में एक ने बहुत होगया कमाया और दूसरा जो था उसको.
घाटा लग गया और विमार हो गया.
और विमारी के कारण मर भी गया तो जो जीवित था और जिसने खूद पैसा कमाया था दोनों एक गाउं के लेने वाले थे उस गाउं में कोई.
जा रहा था तो उसने ख़बर भेजी.
कि भाई तुम्हारे घर का अहुक आदमी.
जो है ब्यापार में घर्डा लगे था.
और मर भी गया है ये कह देना और हमारे घर में हमारी कुछल का समचार दे देना तो वो जो.
था वो � जिसके घर का व्यक्ति मर गया था उसके घर जाके कह.
जया कि तुम्हारे घर का व्यक्ति इस समय करोड़ पती हो चुका है और.
कुछ दुनों में लोटने बादा है उसके.
हाँ बाज़े बजने लगे हो और जिसके हाँ का मर गया था उसके हाँ तो यह कह लिया और जिसका जिंदा इसर की सिख्ति में वो जिन्दा है। तो लोग अपनी सिख्ति बनाते हैं। बना रहे हैं। आप समझे जब तक मन से चोटा रहता है.
साधी नहीं हुई हैं तब.
तक दो पाउं रहते हैं उसके और.
साधी हो जाने के बाद चार पाउं.
हो जाते हैं दो पाउं उसके और दो पाउं उसकी उरत के और उसके.
बाद एक लड़का हो जाये तो छे.
पाउं छे पाउं महुरा के होते हैं सट पद और उसके बाद एक और हो गया तो अश्ट पद मकडी हो गयें और उसके बाद और पढ़ा हो गयें तो निजाई। आप लोग जानते हैं निजाई किसको। निजाई के लोग मुझे गाई बलन कहलाती है। तो ये हालत है। एक खुण बनाया और अपने बनाके रो रहा है। जैसे कोशा का कीड़ा अपनी लार से घर बनाता है और उसमें घर जाता है ऐसे यह संसार में घरा है और पर्मात्मा को भूल गया पर्मात्मा ने.
भेजा था कि जाओ संसार की अगर देखने की इच्छा है तो देख लो.
रेकिन यह वहाँ से जो चला तो यहाँ इतना हो रच गया कि उसको अपने मिट्र का ज्ञानी नहीं जाना। तो इत तभी सुखी हो सकता है जब फिर भगवान की वो अभिमुक हो जाये। उनको देखे उनसे सम्मंद जोडे। जो अपना सच्चा मिट्र है उनसे सम्मंद जोडे।.
कि जो जीवने यहाँ संसार बनाया है.
कि संसार कब तक रहेगा जब तक ये सरीर जीवित है और जैसे जीवन का अंत होगा साब यहीं की यहीं रहे जाएंगे ना माता है, ना पिता है, ना भाई है, ना बंदु है ना इस्ति है, ना पुत्र है साब की साब यहीं चूड़ जा अकीला होने जाएगा। और अकीला जाने के बाद फिर कहीं जन्म लेके दुन्या बनाएगा। वो तो भगवान भुला दीते। पहले जन्म की आद भुला दीते। एक वेक्ति हमको मिला द्वार्का में।.
उसने कहा माराज हमको पूरु जन्म का.
इस मन होता है। जर्म हमारा राजकोट में हुआ है और यहां पहले जर्म में हम त्रिकार का हूँ। तो हमको अपने पहले जर्म की आदा आती हैं।.
तो यहां की मा दिखती हैं और.
वहां की मा दिखती हैं।.
यहां की भी इस्ती दिखती हैं और.
वहां की भी दिखती हैं।.
यहां की भी बेटे दि अब परिशान.
हैं कि इनकी तरफ देखें अब कर्पना कीजे अगर दस जन्म की आद आजाए उसको तो वो तो विख्षिप्त हो जाएगा किसका किसका दुग देखेगा परिशान हो जाएगा तो ये भवान एक परदा ढाल देते.
हैं कि पहले जन्म की बाद इसको.
ना आये तब लिकिन यह जो सिट्टी बनाई है इसने यह सिट्टी यहीं रह जाएगी और फिर दूसरी सिट्टी बनाएगा फिर उसको छोड़ेगा छोड़ते समय बहुत दुख होगा कि हम इसको छोड़ के जा रहे हैं क्या होगा तो ऐसी स्थिति में जो लोग बुद्धिमान हैं वो ऐसे भगवान से हमन्जोडते हैं जिनका कवी बियोग न हो और सब छोडडेंगे सुत्वत नारी जानी स्वारत रत न करुलेह इन हीते अन्तहुं तोई तजेंगे पामर तुन तजो अवहीते मन पश्चते है अवसर भी थे।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� उसकी इस्ती बड़ी करह करने वाली थी। वो.
हमेशा धंकी देती थी कि हम कुछ.
को छोड़ के चली जाएगे। तो.
वो विचारा सोचता था कि हमारी इस्ती.
हमें छोड़ के चली जाएगी तो गाऊं में हमारी बददामी हो जाएगी कि एसा नालाय कि इसकी उरद उसको छोड़.
कुछ.
तक्रीप नहीं तो दूर करते हूंगा पर.
थोड़ी दिल के लिए बानने के बाद.
फिल वही फिल कहें हम तुमको छोड़ के चले जाएंगे एक दिन उसने पुरूप.
से कह दिया कि चाहे तु कुछ.
भी कर मैं तुछको छोड़ के कल चली ही जाओंगी तो वो अपने मकान.
क.
संलो ये ये औरत बहुत खराब.
है हमने इसको चोड़ दिया चोड़ के तो उसको जा नहीं दिया तो इसने.
पहले चोड़ दिया तो इसकी इज्जट रहे.
तो कहने का अभिप्राई ये है कि जनम के साथ जर्वावस्ता जनम के पहले.
आई उसके बाद वाल्यावस्ता आई फ.
और.
तुरे दिनों के बाद विर्धावस्ता आ गई.
विर्धावस्ता आने पर सरीर में नाना प्रकार.
के रोग हो गए शोक हो गए.
और अंत में बड़ने के पहले रोग हो जाता है तो रोग की दिवर्ष्टी के लिए दाक्टरों के पार जाओं बैज्जों के पार जाओं बड़ी कर्वी दवाई पिलाते हैं ये पीलो, ये खालो, इंजेक्शन फोसते हैं सलीद में तो थूब बचाने की कोईसिस करते हैं लेकिन करते करते एक दिन मरना ही पड़ता है और मरने.
के माद यदी पाप करके गए तो.
वहाँ पर यमराज का डन्दा है। यह नहीं है कि आप वहाँ चले गए तो सुरक्षित हो गए। वहाँ एक एक कर्म कर जानने वाला वो जिसको कहते हैं चित्र गुप्त चित्र गुप्त बैठा है कि क्या क्या कर के आये हो यहां की अदालत में अगर आप फ़स जाओ किसी केस में तो जूटी गवाई से छूट जाओगे वहां जूटी गवाई नहीं चलेगी वहां तो चित गुप्त पूरा दिखा जगा ये है दिखो और ये आप भी सोच सकते होगी कि.
दूसरा कोई जाने चाहे नजाने.
आप तो जानते हैं कि आपने क्या क्या किया है। तो वही पढ़ लिया जाएगा कि आपने क्या क्या किया है और क्या करके यहां आया। तो वहाँ फिर नरक का भोग भोगना पढ़ेगा। यही कश्ठ है वहाँ मरने के बाद जर्म.
वृत्य, जरा, व्यादी.
और कुछ लोग ऐसे हैं जो फुण्ड करते हैं.
मनुश्चरीर प्राप्त.
करके अच्छे काम करते हैं, दान करते.
हैं, ग्याग करते हैं, दान करते हैं.
तप करते हैं, तो सतकर्म करने से.
यद्यवी उनको इस जन्म में सन्तोष होता है जैसा कि हमने पिछली प्रोचन में.
बताया था और मरने के बाद उसको उत्तम लोग की प्राप्ती होती है उसको नरक में नहीं जाना पड़ता है उसको उत्तम लोग की प्राप्ती होती है जो.
धर्वात्मा होता है उसके लिए विमान आता.
है कोई दोहाईक आया है तो जाएगा राजा, रंक, फकीर कचु विमान चडचले कचु बदेजन जी जो आया है वो जाएगा चैराजा हो, रंक हो, फकीर हो जाना पड़ेगा। लटो लगे चाहे नोनोजू। वो भजन है। लटो.
लगे चाहे नोनोजू। एक.
दिन गो नोनोजू। लटो लगे चाहे नोनोजू। एक दिन गो नोनोजू। यह बुंदेल खंडी बोली है। नर्सिंग पुरियाल। आयेल.
बवुहा लोटत नहीं हा चाहे तोलदो सोनो.
जू नटो लगे चाहे नोनो जू होता.
यह है पहली जमाने में छुटी अवस्ता.
में विवाय हो जाता था गोना बाद में होता था.
तो सुस्राण वाले आके बोलते थे कि भाई हम बहुफ़ को.
ले जाएगे तो कहते थे माय के वाले कि देखिए अभी मच्ची है कुछ देदबा के लोटा देते थे तो बोले.
ये रिवगुआ जमराज है आयें बहुआ लोटत.
नहीं हाँ चाहे तोल दो सोनोजू लटो लगे चाहे नोनोजू भीतर गोली मांग समारे बाहर मेरायो रोनोजू लटो लगे चाहे नोनोजू जीव लिकलने की कोशिश में हैं शरीर छोड़के ये बहु अपने सस्राल जाने वाली हैं। तो वो अपनी माम समार रही है कि किसी तरह अपनी मृत्तू के समय अच्छी भावना से मरें। मरने से नहीं दरना चाहिए। मरना सीखना चाहिए।.
ये.
महत्माव का कहना है मरना तो पड़ेगा ही लेकिन यदी मृत्यू के समय आप भगवान का इस्वर्ण करती भी मरेंगे तो आपको उत्तम गची प्राप्प होगी अन्त कारे.
या मतिस्ता गचिर भवे अन्तकार में जैसी.
मती होती है लैसी गती होती है आपने श्रीमन्द भागवत में सुनना होगा पुरंजन अपनी इस्ती का चंतन करता हुआ मरा तो दूसरे जन्न में पुरंजनी हो गया इस्ती बन गया है और भरत राजा.
भरत हरण का ध्यान करते करते मरा.
तो दूसरे जनम में वो हरण अयोडि में पहुँजाया। घीता में भगवान शीकरन कहते हैं यम यम.
वापिस मरन भावं चजग चन्ते कले वरं.
तम तमे वैति कौंते सदा तद्भाव भावितः। इसका.
आर्थ है जिरजिल भाव का इस मुर्ण करता हुआ प्राणी अपने शरीर का च्याग.
करता है उसी उसी को प्राप्त हो जाता है तद्भाव बाविता है इसलिए हमारे भारत के लोग मृत्तू से डरते नहीं हैं मृत्तू को समझ लेते हैं और कैसे मरना चाहिए ये आप देखें हमारे.
भारत के पसु पक्षी भी बता देती.
हैं जटायू जब रावन सीता जी को हर के ले जा रहा था तो.
सीता जी करन विलाब कर रही थी.
जटायूर भगवान राम को अपना पुत्तर मानता था। तो.
सीता जी को विलाब करते वे देखकर.
उसने रावन को ललकारा और कहा सीते.
पुत्ति करसी नेनु त्रासा हा करिहो जात.
उदहान कर लाथा। बेटी सीते त्रास मत कर इस राक्षस का मैं नास कर दूँगा। और.
चमुतों से, पंकों से और अपने पंजों.
से रावन का सिल विदीन कर दी था। काला काला रावन का सरील खुना खुन हो गया। जैसे कजल गिरू से गिरू के पनारे निकरते। तुछी राज जी नोपमा दी है। ऐसे खुना खुन हो गया रावन अन्त में उस दुष्ट ने खड़ग लेकर जटायू के पंख काड़ जी तो बिना पंख के जटायू अवश हो गया तरपता रह गया और रावन चला गया फिर भी भगवान स्री राम को संदेश देने की उत्कर्ष भावना से उसने मरांत कट को सहते हुए भी जीवन को रखा और जब भगवान श्रीराम खोजते खोजते वहाँ पहुँचे तो.
जटायो को देखा कुण से लगपत है.
और जटायो ने कहा नात दसानन यहगत कीनी तही खर जनक सुता हरी डिनी विनाद। मेरी.
ये दशा दशानन ने किये और उद्धुर.
तुनने जनक सुता का हरन कर लिया है। तो भगवान श्रीराम महोत ही जरवित हो गये और जटायू को अपनी गोड में ले लिया। कवियों.
ने तो यहां तक कहा है कि जटायू का शरी दूषित हो गया था.
तो भगवान श्री राम ने जटायू की दूर जटान सो जारी अपनी जटाओं से उसके सरीर की दूरी को जारा गोज में ले लिया और कहने लगे तात कुछ दिन जीवन धारन करें तात काम.
है.
अब आप सोचिए भगवान.
सिराम ने.
यहां तक कहा कि मैं अभागा पित्ती सुख से बंचित हूँ मेरे पिता चले गए मैं उनसे बंचित हो गया हूँ.
तुम अगर जीवित रहोगे तो तुमारी सेवा.
करके मैं पित्ती सुख कर लूगा तो जीवित रहो। तो जटायू बोला महाराज, अब मैं जीवित नहीं रहना चाहेता। क्यों नहीं रहना चाहेते? कुले समर मरन अलु सुरसरी तीरा, राम काल खन भंग सरीरा। समर मरन मनुष्य की सद्गती के लिए यह परियाप्त है समर मरन समर मैं मर रहूं रावन के साथ जिद्ध किया है और सुरसरी तीरा ये दो दन कारण है सुरसरी तो नहीं है लेकिन जिन चर्णों से सुरसरी निकलिये उसके तीर तो हूँ राम काज राम के काज मैं.
मर रहूं चलबंग दली रहा इसलिए राखु.
नात दे की खांगे? किसके लिए मैं सरी धारण करूँ? तो.
उन्होंने पितित का त्याग कर दिया मर्तु.
को तुधार लिया कि ऐसा मौका फिर नहीं आएगा कि बगवान की गोध में बैट कर जश्रत इनके पिता थे जिनोंने.
इनको जर्म दिया वो पिता.
इनके बिना तलब तलब के मर गए मरते समय राम का दर्शन नहीं हुआ और मैं उनका पिता बेड़े नहीं रहूं लेकिन आज.
मृत्तु के समय उनका दर्शन कर रहा.
हूं इसलिए मैं अब इस जीवर को.
धारन नहीं करना चाहेता मैं मरना ही.
चाहेता ऐसी कथा बाली की है बाली.
के संबन में भी यह बात आती.
है बाली और सुगरीव दो भाई थे दोनों भाई परत पर बड़े प्रेम से रहते थे तो एक मायावी मैसुल जैत आया और उसने बाली को लड़ने के.
लिए लड़ा रहा बाली उसको लड़ने के.
लिए आया तो वो भागा एक गुफ़ा में जाके थिप गया तो बाली ने.
सुगरियू से दोनों भाई गायेचे वहाँ लड़ने.
सुगरियू से कहा कि एक मेने तक देखना अगर मैं लोटके ना हूँ तो समझ रो कि मर गया तो माँ.
दिवस्तक सुगरि कुफा के बीतर ही दोनों.
का युद्ध मल युद्ध होता रहा और.
तो मैं रुधिर की धारा बैग के.
चली गुफा के बाहर आयी तो सुगरी को डर लगा कि कहीं बारी ही न मर गया वो तो ये डरपोंग भागा वहाँ सो इसको चाहिये था कि बैठा रहता और इतनी भागा ही नह.
जबकि दानों मर चुका था और बाली.
जिन्दा था बड़ी कड़िनाई से वो लोट के आए इधर क्या हुआ कि सुगरीव.
के आने पर मंत्री उनने न उसको.
सिंगातन दे दिया तो ये अपने डट के सिंगातन बैट गए राजा बन गए बाली लोट के आए अच्छा पत्तर र� पत्तर रख के सहराजा बने बहते हो। सुगरिव कहते हैं कि रिबु तब मुझे मारे सियति भारी अरली निष सर्वस्वरु नारी। तो दोनों में भ्रम हो गया। सुगरिव को भ्रम था और बाजी को भ्रम था। बाजी.
बल्वान था।.
तो.
सुग्रियों को मारने के लिए बाली दोडा.
तो बाली जहां जाये वहीं सुग्रियों पहुँँ जाये तो वहाँ एक परवत था उस परवत में रिश्यमू परवत वहाँ पर एक.
रिशी रहते थे उनके यहां आके अजगर ने उसको पदलो किया तो नहीं साब.
दे जा था कि यहाँ यदी कोई आएगा तो माराज आएगा तो बाली वहाँ नहीं आता था सुगरी वहाँ च्छिप के रहता था बगवान से बैठ हुई अन्वान.
जी ने दोनों की मिठता करा दी.
लंभी कता है पर हम नहीं जाएगे मूल बात बग्वान के साथ सुगरीव की मिच्चता हो गई अगनी साथ के लिए के। अब उसके बाद समान शीर व्यसने सक्यम्। जिनका.
समान शीर हो, समान व्यसन हो, उनमें.
सक्यम् हो जाता है। तो.
जो कश्ट बग्वान राम को था पत्नी.
वियोग का, वही कट सुगरियू को अपनी पत्नी के बेहुक्का था। तो दोनों की विच्चता हो गई। अब.
भगवान ने कहा ठीक है, अब मारी.
को मार देंगे। मार देंगे। हमारा कट मिटा देंगे, तुमारी उक्षि मिल जाएगे। कहा महराज, मारी मावर अधिर नदीरा, वो � और एक ही हम तो उसको मार देगा और एक वो बाली को वो मार सकेगा जो दुन्दुभी अजगर की अक्थी के वितर से जो ताल निकले हैं साथ, ताल, ब्रिक्षि एक बाण से जो सातों को गिरा देगा वो बाली को मार सकता है भगवान ने गिरा दिया। तो.
जब भगवान ने वो तालों को गिरा.
दिया तो सुगरीव के मन में पेराग हो गया। कहने गए महराज। बाली परमहित जास प्रसादा। मिलू राम तुम समझ मिशादा। बाली हमारा परमहित है। अगर.
बाली हमकु कर्च न देता तो आप कै ये जो लड़ाई है ये तो.
स्वपन के समान हैं अब हम किसी सुबह नहीं करेगा। बगवान.
ने सोचे कि हम से प्रतिग्या करा.
डी और अपने बिरक्थ हो गिया। ये मरकड बेराग कह रहा था। मरकड बेराग उसको कहते हैं। लोग जाते हैं मृतक के साथ मिशान में.
तो जब तक वो जलता है तब.
तक बैठे बैठे कहते हैं बईया जीवन का कोई चिकाना नहीं है कल देखो वाच्चीत कर रहा था कोई विश्वास नहीं.
होता है कि वो मर गया होगा.
लेकिन आज चला गया कुछ नहीं है संसार बनाम नाम फत्त फिर वही सादी.
बैआय की चर्चा ह वही संसार के.
विवहार होने लगते हैं कि मरकड वेरागन है मार पड़ती है तो थोड़े जिन के लिए विरक्त हो जाते हैं और उसके बाद फिर वही जाते हैं तो.
इसको भी ऐसी मरकड वेरागन हो गया.
भगवान ने कहा भाई देखो हमने जो प्रतिग्या की है कोई जुट्टी नहीं हो सकती। तुमको लड़ना पड़ेगा। तो सुगरियू ने वाली को ललकारा। और वाली ने कहा, नहीं, यह सुगरियू। जो.
मुझसे दर के भागा फिरता था, इसे.
लड़ा रहा है। अभी देखता हूँ। तो.
तारा को पत्ता लग गया था गुफ.
और राम जो हैं अतुरिद वर्धामम हैं। तो.
उनके बल पर ये एक अरज रहा है। दोनों.
रोका लेकर वो नहीं माना। मा जी कहा तुन भी रूप लिये समधर.
सी रहुनात जो कदापि मोई मा जी.
हैं तो पजो तनात। अस.
कही चला मा अभिमानी सिर समान सुग्रियो में ही जा महा अभिमानी चलार वाली.
और सुगरीव को तिलके के समान समझ.
के दोड़ा और वाली के साथ जुद्ध.
नहीं लगा अब बाली ने खुब अपनी चत्रता दिखाई जुद्ध कौसल दिखाया लेकिन ऐसा मुक्का बाली ने मारा तो सुगरीव सह.
नहीं सका भागा.
कहना है महराज बन्द नहोई मोर्या काला यह मेरा भाई नहीं है यह मेरा काल है कि आप यही सुनना चाहेते थे तुम कहते थे कि परमहित हमारा परमहित एशी है अब सुन दिया अब गले में माला डाल दी हाथ फेर दिया सुगरीव के शरीर का थारा दर्द दूर हो गया फिर.
स.
अब नाना अमिद तही होई लड़ाई बिटब ओप ओड देखाई रभुराई दोनों की.
नाना प्रकार से लड़ाई होने लगी और.
भगवाई रभुनात बृक्ष की ओड से देखने लगी कुछ लोग कहते हैं की वाली को ये बरदान था कि जो उसके.
सामने युद्ध करने के लिए जाता था.
उसका आधावर उसका हो जाता था बालिक तो बालिक आधावर और उस सामने बालिक अधावर तो वो सामने वाला निर्वर्ण हो जाता था लेकिन भवाराम के ऊपर ये लागू नहीं हो सकता क्योंकि आधावर उसका.
होगा �.
अतुरित बल अतुरित बल धामा जिनका बल अतुरित हैं जिसका गुणा भाग हो नहीं सकता ऐसा बल भवाणचराम का था लेकिन उनको ये भी था कि.
फिर कहीं इनका मिठता नहीं हो जाये.
और दूसरी बात ये थी कि अभी.
सुगरियों को अपने बल का गमण्ड था हम अपनी कला से अपने कौसल से.
बाली को हरा देगे तो जब देखा कि अब कोई चलबल रहेगा नहीं और.
बाली जब पटक के बाली बंद होता.
है पीछे पाउं हाद बांद दिये और मुक्का हाथ में उठा लिया और मुक्का.
मारते ही बाली के सुगरियो के प्राण.
निकल जाए ये हालत आ गई तो भगवान ने सोचा कि जब हम बाहर.
निकल के ललकारेंगे तब तक तो सुगरी.
बड़ी जाएगा इसलिए वही से बाड़ मार दिया तो बादी की छाथी में बाड़ लगा भगवान क्रुद्ध हो गए लाल लाल आखे किये हात में बाड़ लिये बादी.
के सम बाली कहा रदाय पीती मुख.
बच्चाने कठोरा बुला चिताई राम की होरा रदाय में भगवान राम कुछ पीती थी उनके महत को जानता था पर उपर.
से कठोर भजन होरा और कहने रहे.
है महराज मैं वेरी सुग्रीव पियारा अवमुन कवण नात मुही मारा आप तो भगवा भगवान सब के पिता होते हैं। तो आपके मन में ये विशमता कहां से आ गया। मैं.
वैरी हो गया, चुगली प्यारा हो गया। आपने.
मुझे क्यों मारा। आपके लिए तो दोनों भाई बराबर होने चाहिए न। तो भगवान ने कहा कि देखो दोनों में.
कोई अंतर यद्य� वो ये है कि.
एक तो तुमने अपनी पत्नी तारा की सलाई नहीं मानी मूण तोही अतिषाय अभिमाना नारी सिखावन सुनिचिना काना अपनी पत्नी की सिख्षा तुने नहीं मानी तुन पत्निया इसमिलासु ग्रिवा ते दुवन्दु अतुल बलशीवा उनसे वेर.
मत करो.
तो तुमको मान लेना चाहिए था पत्नी भी यदी अच्छी शिक्षा दे तो पती को उसकी बात माननी चाहिए पत्नी मंत्री होती है इसलिए जदी वो.
अच्छी शिक्षा दे तो पती को उसको.
सुनना चाहिए यह भवार नाम कहते है.
यह नहीं है कि इसती की बात.
हमेशे ही खाटदी जाए। वो भी अच्छी बात कहती हैं। मंदोदाली.
की बात अगर रमण मान लिया होता.
तो रमण बच जाता। अगर.
तारा की बात मान लिया होता बाली.
तो बच जाता। तो मूर तोही अतिषे अविमाना। तो.
बाली में सुगर.
और वो बाविमान भी अत्यस्य है अत्यस्य यों कि जिसके पीछे राम हो उसको मारने की गुस्ताखी जिसका रक्षक राम हो उसका आप अलिए करना चाहेते हैं और फिर एक बात है ये तो तुम्हारी पत्ती ने कहा था.
शायद तुमको ये विश्वास नहीं हुआ हो.
कि जो बात कह रही है वो ठीक है। लेकिन जब मैंने सुगरीव की गले में अपनी माला पहनाई। और.
सुगरीव से भगवान नहीं कहा था कि तुम दोन भाई एक से हो इसलिए.
हमने अभी बारणी मारा है। अब.
ये माला पहन के ज.
कि किसी.
की माला पहने हुए आया है तो.
भाई इसको मत चेड़ो जिसका राम रखवारा है उसका दुनिया क्या बिगाड सकती है परत्तु मम भुजबल आच्छित ते ही जानी मारा चहती अधम आभिमाजी तेरा अभिमाज तो अधम हो गया इसलिए मुझे मारना पड़ा और भगवान ने सुगरीव को जब वो निर्वल हो गया सुनेरी मेंने निर्वल के बलराम जब प्राणी निर्वल हो जाता है तो राम उसकी रक्षा करते हैं जब.
तक उसको अपने बल का भरोसा रहा.
राम ने हस्तक्षेप नहीं किया रक्षा नहीं किया जब निर्वल हो गया � उसका दुख दूर कर दिया। अब बाली के साथ बातीत होने लगी। सब मार्च चला। उसने का माराज आपने हमकु मारा। वोले अनुज बदुर्भविनी सुतनारी सुनुशटिये कर्ण्या समचारी इनही कुदिष्टि विलोकै योई ताई बधे कशु पाप न होई। अनुज बदु चोटे भाई की इस्ती और भगनी सुत नारी और अपनी भगनी भगनी मानें बहन और सुत नारी बेटी की बहु और कन्या अनुज भदु भगनी सुत नारी.
और सुनसत कन्या सामये जारी कन्या जो.
है जैसे होती हैं वैसे अनुज बदु होती अपने बड़े भाई, अपनी छोटे भाई की इस्ती कन्या की समान और भगनी तो होती है कन्या की समान पर स्वद नारी पुत्र बदु, पुत्र की इस्ती भी कन्या की समान होती इनही कुधिस्ति विलोकै जोई ताही बधे कचु पाप नहोई। इनको.
जो कुधिष्टी से देखता है उसको मारने.
में कोई पाप नहीं लगता। वोले महराज ये नियम जो है मनशों के लिए है। ये हम बानर हैं, हम मनश नहीं हैं। हम जानवर हैं। इसलिए.
हमारी उपर ये नियम नहीं आलगों नहीं.
हो� तो बात क्या है एक किसान अपने खेट में हल जोत रहा था उसका ही खेट था उसके हल था उसी के बैल थे और वो उनको गाड़ी दे रहा था धनी की गाड़ी दे रहा था तो मुरु मुरी गाली गाली हम देना नहीं चाहेते हैं आप लोग जानते हैं देती रहते हैं तो वो गाली दे रहा था बेलों को गाली दे रहा था एक सादु वेशधारी वहाँ से लिखला उसकी गालिया सुनके उसने खड़ा होगे पूछा कि भाई ये खेत किसका है कहा हमारा ह उस किथान ने कहा कहा ये हल के सा है बोले हमारा है बैल किसके है कहा हमारे है तो गाली है ये किसकी लगती है कहा नहीं कौन है कहा हमें है कि गाली किसको लगी का जो साला समझता है जो समझता है उसको लगती है हम तो समझते.
ही नहीं है कि गाली कहा जा.
रहे है.
तो जब तुम यह समझते हो कि हम पशुर हैं यह हमारी उपर नहीं लागु होता है तो जो.
जानता है उपर लागु जाएगी तो फिर उसने कहा कि महराज आपके सामने हमारी चात्री नहीं चलेगी लेकिन वाली कहा वाली नहीं कहा कि स्वामिशन चलन चातुनी मुरी प्रभु अजुहु में पात्की अन्तकाल गती तोरी अन्तकाल में जो आपकी शरण में आजाता है गती माने चरण अन्तकाल में मैं.
आपकी शरण में हूँ और बोलो मैं.
पात्की हूँ तो जैसी भगवान की शरण में बाली जाता है बाली की सिर में भगवान का करकमर पहुँँ जाता है। भगवान कहा, भगवान बोले तुम अपने सरीर में प्राण रखो। राम कहा तुम राखो प्राण आप। अब तुम प्राण दारण करो कोई चंता की बात नहीं है तुम बच जाओगे। भगवान.
ने मृत्तु से ब� का अश्वासन दे.
दिया लेकिन बाली ने मृत्यू का बरण किया बाली बोलता है कि महराज जन्म.
जन्म मृत्यू जन्म जन्म मृत्यू जतन कराई.
अंतराम कही आवत नाई बड़े बड़े मृत्यू.
जन्म जन्म यत्न करते हैं कि कम से कम मरते जवर राम नाम होते.
निकल जाये लेकिन राम नाम नहीं आता एक सेड़ जी की मुत्तों निकट आ.
गई लोगों न कहा की पिताजी राम.
राम को हो वो ले जिसका नाम.
लेने के लिए कहते हो वो नहीं.
निकल रहा है वो ले इतना बड़ा.
�.
अन्तराम कही आवत नाई। राम राम नहीं करता है बढ़ा कठिन है। तो जन्म जन्म मुनी जतन कराही अन्तराम कही आवत नाई। एक दूसरा अर्थ यह भी है कि जन्म जन्म मुनी जतन कराही अनेको जन्म में मुनी लोग यतन करते हैं अन्तिम जन्म में जब राम कही राम कह दिया तो आवत नहीं तो संसार भी नहीं आते जिस राम नाम का ये प्रभाव है और दूसर यह है कि राम नाम जिनका राम नाम दुरलब है नाम नहीं आता अब वो नाम ही आ देया मेरे पास नाम की तो बात क्या जिसका नाम दुरलब है वो दुर्रव.
पर्मात्मा मेरे साम्ये है सो लोचन गोचर.
वोरे आवा प्रभुव की अब इससे बढ़के और कौन सा बनावा बनेगा इसलिए अब.
मुझे आप जीवन रखने के लिए मत.
कहिए मैं अपने शरीर का त्याग करना चाहेता हूँ अंगर को भगवाईन की शर्मदे.
जैसे कोई पूनों की माला छोड़ दे.
वैसे उसको मरने का कोई कट भी नहीं हुआ तो कहने का अर्थ यह है जो हम कह रहे थे की.
मरने से डरने की आवशक्ता नहीं है.
मरना सीखना चाहिए इस परकार मरना चाहिए की मरते समय और किसी का इस केवल भगवान का इसमाल है बड़ी मुश्किल है मरने के समय लोग कहते हैं कि तार दे दो सबको मना लो सबको हम देख ले और हम आ जाते हैं और कहते हैं दद्दू हमें पहचानत हो वो.
पहचानत है अरे भगवान.
को पहचाने की तुम्हें पहचाने तुम्हारे पहचानने के लिए तो सारा ज़िन्दी दारा जीवन बिता दिया अब तो अन्तिम समय है भगवान को पहचाने भगवान कैस्मन करें तो.
कहने का विपराये है कि मृत्तु के.
परचाद यदि कोई भगवान का नाम �.
तब तो उसका जन्ममरण का चक्र छूड़.
जाता है और यदि भगवान का इसमर्ण नहीं किया फुन्ड किया तो स्वर्ग जाता है और स्वर्ग में जाकर अपने पुन्णों.
का कुछ काल भोग करने के पचार.
खीने पुन्ने मरते लोकम विशंती फिर इसी.
संसार में लोटके � पाप और कुण दोनों बेडी है कर्म जो है बन्धन.
है चाहिए लोहे की बेडी हो चाहिए सोने की बेडी हो प्राणी उससे बनता है इसलिए आवशक यह है कि जीवन में पर्मात्मा के साथ सम्बन्द जोडे पर्मात्मा को प्राप्त करने का प्रेत करें स्रीराम.
जैराम śrī rāma jaya rāma śrī rāma jaya rāma śrī rāma jaya rāma śrī rāma jaya rāma śrī rāma jaya rāma.
Śrī rāma jaya rāma śrī rāma śrī.
Rāma jaya rāma śrī rāma jaya rāma śrī rāma काशी jaya rāma विष्णात गन्दे.
हरारमा.
देवचंबो काशी विष्णात गन्दे.
वो काशी विष्णात गंदे। ए.
हरारमा देवशं वो काशी विष्णात गंदे। हरारमा.
देवशं वो काशी विष्णात गंदे। काशी.
विष्णात गंदे काशी विष्णात गंदे काशी विष्णात गंगे.
हर.
हर महा देवशंभो काशी विष्णात गंगे एहरःतमा देवशंदो काशी विष्णात गंधे। धर्म.
की अधर्म काण प्राणियों में विष्ण का गोमाता की तो हच्या अरहरमा.
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