Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 21

Recorded Hindi lecture (Chaturmas 2012) by Swami Swaroopananda Saraswatiji on the Mandukya Upanishad. The speakers analyze the four states of consciousness—waking (jagrat), dream (svapna), deep sleep (suśupti) and the transcendent turiya—explaining differences (e.g., bīja-nidra/seed-sleep, presence/absence of avidyā), using analogies (rope–snake) and textual references (Bhagavat, Gita) along with anecdotes and didactic commentary.
Chapters
अच्छरेरंगरितुच्छवागुम् सस्तनुभिर्ण। बशेमदेवितं विरायुँ।.
सस्तिन इंद्रुविद्धस्थवाः।.
सस्तिन पूशाँ विश्वेदाः। सस्तिन स्तार्क्षिव अरिष्टनेमि। सस्तिनो विश्वतिर्दरातु। ओम् शान्तु शान्तु शान्तु। ओम् शान्तु शान्तु शान्तु।.
ओम् शान्तु शान्तु शान्तु। ओम् शान्तु शान्तु शान्तु।.
ओम् शान्तु शान्तु शान्तु। ओम् शान्तु शान्तु शान्तु।.
ओम् शान्तु शान्तु.
शान्तु। ओम् शान दियितस्याग्रहनम् तुल्यम् अभियो प्राग्यतुरियोः। बीजि निद्रायुतप् प्राग्यः साचतुरियेन विद्धिते।.
यह।.
यह हो गया। अब इसका माश है न। निमिन्तान्तर प्राप्त आशंका निमृत्य सोयों स्रोका। निमिन्तान्तर प्राप्त आशंका की निमृत्य के लिए ये स्रोक है। कथम् दुईताग्रहनस्तुल्यत्वात् कार्णवद्धर्त्मप्राज्यस्तेव। नतुरियस्थेति प्राक्ताशंकानिवर्तते यस्मात् बीजनिद्रायुतस् तत्ताप्रिज़ोदो निद्रा सैवचाविशीषप्रिज़ोदप्रसवस्तबीजम् साबीजनिद्रा तथा युतः तथा युतः प्राज्ञा सदार्धिक सवावत्त्वात् सत्त्वप्रजूद्रक्षनां निध्रां निध्रांत्रिये नविध्यते अतू कार्णबंधस तस्मिन नित्तवि तस्मिन तस्मिन नित्तवि प्रायःठी तु.
जहां ये बता रहे हैं.
की सुशुपती और तुरिये दोनों में क्या अंतर है? केते हैं अग्रहन तो दोनों बराबर हैं सुशुपती में भी अग्रहन है जागरित और स्वपन दोनों में अन्यथा ग्रहर हैं अग्रहर और अन्यथा ग्रहर दोनों हैं माने तत्तु का अग्रहर और अन्यथा रूप से ग्रहर अपने स्वरूप का अनवभोध और जगत का भोध तो अंतर इतने है कि जागरित में.
इंद्रियों की दौरा जगत का बोध.
होता है प्रपंच का बोध होता है और स्वापन में बिना ही इंद्रियों के प्रपंच का बोध होता है लेकिन अपने स्वरूप की विश्मिती दोनों समान हैं दोनों हैं अनुथा ग्रहन जागरित भी अनिता ग्रहन अग्रहन अग्रहन अनिता ग्रहन अग्रहन माने अपने स्वरूप का अनौभोध जागरित में भी है और सौपन में भी है सौपन भी.
तभी दिखता है जब हम अपने आप.
को भूल जाते हैं और इसी तरह.
से जागरित भी हम को जो दिख.
रहा है हम � हम کو जगत का जगत दिखता है। यह समझ रो कि आप सहर के किसी चोराहे में बैठें। और सलक सामने से चली जा रहे हैं। लोग जा रहे हैं, आ रहे हैं। कोई इदर जा रहा है, कोई उदर.
जा रहा है, कोई भी कर रहा है। तो हम कभी इतने तनमे हो जाते.
हैं कि अपना भान नहीं रहता कि हम कहा हैं केवर हम दिश में ही आसक्त हो जाते हैं और जब.
तक अपने को नहीं भूलेंगे हम दूसरों.
को देखने नहीं जाकते हैं तो आत्मविस्मति के बाद ही इसलिए कोई पीछे से आपके हाँ बंद क.
अगर कोई बराज.
जा रही है तो खुश हो गए। मुर्दा जा रहा है तो दुखी हो गए। ये सुख दुख करम हम कर रहे हैं। यद्धे भी मरग बेटे हैं। हमारा उन से कोई समबन्ध नहीं है। इसी तरह से जो आपको प्रमज दिखाई पढ़ रहा है। इसका आत्मा से.
आप अपने को जनमने.
मरने वाला समझते हैं। आप अपने को सुखी दुखी समझते हैं। तो इज ये प्रबंच आपको दिखाई पड़ रहा है। ये आत्मा के अगरहन से दिखाई पड़ रहा है। और ये जो प्रबंच है ये अनिता गरहन।.
तो अनिता मानें जो भस्तु �.
तो.
ये स्वपन में, जागरत में और स्वपन.
में, दोनों में बराबार हैं। कौन? अग्रहन और अनिथा अग्रहन। और स्वशुक्ति में अग्रहन हैं। अनिथा अग्रहन नहीं है। चीज़े? तो.
सुशुप्तो यत पश्चति अत्मानमेव पश्चति।.
नहीं, आत्मानम तो नहीं पश्चति। आत्मानमेति अज्ञानम पश्चति। अम किनचितमर्जानामे। तत्र सुशुप्तो सुरुपस्मृति जायत बर्तते हो। अगरनाम बर्तते हो। स्वरूप की विश्मती होने पर ही अग्यान दिखाई पड़ेगा। तो वहाँ पर अग्रहन है, बीज निद्रा। जो बीज निद्रा वहाँ पर है। तो अव यहां पूछते हैं कि सुशुप्त में और तुरिय में क्या अंतर है। तो यह बताया इसमें कि जो सुशुपती है वो बीज सबीज है सबीज निद्रा से युक्त है सुशुपती क्योंकि सुशुपती के पस्चात पना जागरन में आता है यह स्वपन में जाता है तो वहाँ स्वपन.
और जागरत का बीज है.
तुशुप्ति में। इसलिए वो तुर्य नहीं है।.
तत्वा.
ग्रहन भी बीज है। तुशुप्ति में तो यह है। अनिथा ग्रहन भी फिर हो जाता है।.
तो हम गाड़ी निद्रा में सोने के.
बाद इसलिए उठते हैं कि गाड़ी निद्रा में जागरित और स्वापन का बीज पीजरूप से यह बने हुए हैं। यह अंतर है। तो यह बता रहे हैं हैं भाष्यकार। जईतस्यां ग्रहनम् तुल्यम् उभेयोः प्राग्य तुरेयोः मानें प्राग्य और तुरेय दोनों में दैत का अग्रहन तो समान है माने प्राज्य जो है वो भी दैत का अग्रहन कर रहा है और तुर्य भी दैत को अग्रहन कर रहा है तो शुपती में दैत नहीं है लेकिन बीज निद्रा योतस्प प्राज्य जो प्राज्य है बीज जो निद्रा है अग्यान.
यहाँ पर निद्रा ही बीज.
हैं प्राग्य जे बीज निद्रा युतः जो जागर स्वापन का बीज है वो निद्रा इसमें है और साथ तुरिये न विद्धते तुरिये में तुरिये में वो बीज नहीं है वो अनिद्र है यह प्राग्य तो सू गया इसलिए इसको कुछ नहीं दिखाई पड़ रहा है लेकिन जो तुझे है वो नहीं सोया है वो उसका भी साक्षी है माने सुशुपती का वो भी माने कुछ नहीं दिखता इस बात का भी वो साक्षी है इसी को भाष्यकार.
नहीं कहा निमित्तान्तर प्राप्ता शंका निमित्तर सोयं.
स्लोका निमित्तान्तर से प्राप्त जो आशंका है उसकी निमित्ती के लिए ये स्लोक है क्या है शंका कथम दोईता गरणास तुल्यत्ता माने सुशुप्ति में दोईत का अगरन होता है और तुरी भी दोईत का अगरन करता ह तो कारण से कारण.
से.
तुलिएत तो है कारण बद्ध तो प्राज्या से ही हुआ नतुलिया से तो अग्रहन जब दोनों का है तो प्राज्या को कारण बद्ध कहते हैं और तुरिय को कारण बद नहीं कह रहे हैं। इसका कारण क्या है। तो इसके उत्तर मैं कहा प्राक्ताशंकन्यवत्ति यस्माद बीज निद्रा युतत्तत्त्तवा प्रजभोधु निद्रा। बीज निद्रा से युत जो तत्तव का प्रजभोध है वो निद्रा है। यस्मान्द बीद निद्रायुतस् तत्वा प्रिज्वदू निद्रा। और साथ्या विशेष प्रिज्वुद्धां बोदप् प्रसमस्य बीजम्। सहिव। कोई निद्रा जो है। कोई विशेष प्रिज्वुद्धां का प्रसमस्य जो होता है उसका बीजम्। साथ्या बी और सदा द्रिक सुभाव द्रिष्टा ही जिसका सुभाव है उसमें है तत्त्वा प्रदिभोद रख्षना निज्ढा तुलिये नविद्यते तत्त्वा प्रदिभोद रख्षना तुलिये नविद्यते तत्त्वा प्रदिभोद रख्षना तुलिये नविद्यते तत्त्वा � श्रोक में बताया हूँ की विश्व और तेजस कारी कारण दोनों से बद्ध हैं और सुशुप्त माने प्राक्य कारण बद्ध हैं और ये कारी कारण की जो बद्धता है तुरीये न भी दिते दोनों ही तुरिय में नहीं है। ना तो तुरिय कार्णवध है और ना ही कार्यवध है। तो उसमें ये समस्या आ गई कि तत्ता ग्रहन। तो दोनों अवस्थाई हैं, प्राग्य में भी है और तुरिय में भी है। तत्वा ग्रहन अग्रहन जिसको कहते हैं तत्वा ग्रहन तो नहीं कह सकते अग्रहन अग्रहन भी वहाँ पर है तो यह कहते हैं कि अग्रहन बिश्व में है आत्मा में तुरी में नहीं है तुरी उसका भी साक्षी है ज्रक्षरूपत्त जिक वाने दिष्टार उसका सुरूप है। अब इस किर्टी का दिख लिया।.
अन्मानप्रियुक्ताम् तुरिये.
भी कार्णवद्धत्वासंकाम् परिहरती। अन्मानप्रियुक्ताम् तुरिये परिहरती। भी अन्मानप्रियुक्ताम् कार्णवद्धत्वासंकाम् तुरिये भी कार्णवद्धत्वासंकाम् परिहरती। ये है प्राज्यस्त कार्णवद्धत्तुन साधेति प्राज्यस्त कार्णवद्धत्तुन का साधेन करते हैं नातमानमिति तुरियस्य कारिकार्णाभ्यां असिश्पृत्रत्वं सप्रत्यति। तुरिय जो है कारिकार्णों से असंश्पृत्र हैं। सुरोख भ्यावर्त्रां आशंकामाः कतमिति। एसे दोनों में अंतर क्या है, कैसे? तो वास अभदत वास अभदत कतमितित्यस्य अनुबृति। � प्रताम् ब्रह्म चोजो तरत्रे पादत्रे ब्यातर्ते।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� भई धर्मियो धारनम् यसा प्राज्ञस्त विभाग विज्ञाना भावे फर्माः प्राज्ञस्त विभाग का विज्ञान न होने बर उसका परणम क्या हुआ तो अच्छा यतोक्ति तमसी कारिलिंग कम अनुवानं सूचियति यतोक्ति तमसी कारिलिंग कम अनुवानं सूच कथं पुन कार्णवद्धत्तुम् प्राज्ञस्तुरिवेवा तत्वागर्णानिथानलक्षनावु बंदवु नचिद्यता यस्मात आत्मविरक्षिनम् अविद्याविर्जप्रसूतम् बाहियम् दैतम् आत्मविरक्षन अविद्याविर्जप्रसूतम् बाहियम् दैतम् � ایسے پڑھا کے کچھ بھی نہیں دیکھتا ۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔.
अब कहते हैं कि निमित्तान्तर प्राप्त आशंका.
निमित्तर सोयं शुरू का निमित्तान्तर प्राप्त क्या हुआ अनुमान प्रुक्तम् तुझेवी कार्ण बद्धत्व आशंकां पर रहते हैं मान कार्ण अग्रहनात्त्वात् ग्रहनाहितत्वात् यह था प्राज्ञा कारण बध्धा तसेव तुर्यूपि किमन भवे। ये शंका है। तो वो नहीं इस शंका का निभान करते हैं। क्या करते हैं शंके? नूत नांतरेति। विमतं कारण बध्धं। दुईता ग्रहनत्मा अत्प्राज्ञमत। इत्तं मानमे हो दर्श्यल। विमतं कारण बध्धं विमत्वे कारणबद्ध है। दोईता अगरहनत्वात प्राग्वत इतनमानमेव दाशिर्ण।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� प्राग्मा भी द्वैत का अग्रहन है। द्वैता.
अग्रहन हे थू, द्वैता भावों पि विध्यते हैं। द्वैता भावों पि द्वैता अग्रहन हे थू। विशया.
भाव हा। यहाँ विशया भाव। यहाँ.
स्वस्वरूपस्य अग्रहन, तत्व अग्रहन माँसी है। त.
यह है, चीज़ी है। तो दोनों में अंतर क्या है? पहले अन्मान देखने हम लोग। विमतम् माने तुरियं भी कारण बद्ध है। क्योंकि दोईता ग्रहनात, दोईत का वहां अग्रहन होता नहीं है सुरुपति में। जैसे प्राज्ञ कारण बद्ध है, वैसे तुरियं भी ये अन्मान दिखा कर तानतर में वो दूसरा अन्मान निर्त बताते हैं कथ में ती कैसे अन्मान कृता शंका निवर्टकत्तेन स्रोकम उतारेती अन्मान कृत जो आशंका है उसकी निवर्टक रूप से स्रोकता उतारेती प्राप्तेती प्राप्तेती.
ये है.
प्राप्ते जी गहाई है? नतुरी.
ये सेध प्राप्ता आशंका निवर्ते थे। मूल.
मूल, अच्छा, भाष्य, भाष्य। अन्मान.
क्रित्सांगा निवर्त करते हैं ने सुवर्गर्व बता.
रहे हैं प्राप्ते जी ये प्राप्ता आशंका निवर्ते थे।.
प्राग्यस्ते.
उत्तर भावी परिज़बोध अनी कार्यापेख्षया नियत पूर्वभावित्तम कार्णवाद्यत्ते प्रिज़कम। कत्रभाश्ये.
आकार प्रश्रेशत द्वयं दत्तमिजिते आशंकायति। कत्रभाश्ये.
प्राग्यस्ते आशंकायति।.
अतरा भाष्या अनुसारों ही प्रतिकों था अवधरतीं। अता भाष्य पाठा शंकाई के विज्जिती। ये ते ही शोधनन सम्यत कोता। ये था आंदे गुदितो पाठा आशंकाई के बहरे। असंका.
न वर्त करते हैं। आशंका तो हैं।.
शंका.
आशंका जो हो हो अगर अन्मान कृता आशंका अन्मान कृता जो आशंका है तो उपर है वही तो है अन्मान कृता आशंका करते हैं स्रोकम अवतार्यति प्रतिक दे रहे हैं आशंका प्राप्तेति प्राज्ञस से उत्तर भावी प्रतिबोधाद कारिया अपिक्षया नियत पूरु भावित्तम कार्ण बधथत्य प्रियोधिकम् प्राज्ञ जो है उसके पस्चात होने वाला जो प्रतिबोधादिक है आजी से सौन ले लिया प्रतिबोध से जागर ले लिया उस कारी की अपिक्षया नियत पूरु भावित वो कारण मद्धत्वे प्रेवधिकं। कारण.
जो होता है.
कारिक का नियत पूर्वभावी होता है। कारिक का नियत पूर्वभावी ही कारण होता है। तो सुशुप्ति जो है जागरन का नियत पूर्वभावी है। नियत पूर्वभावी सुशुप्ति से वो उड़ता है। � तो कारण भीज होता है। तो वो भीज तक उसमें आ गया है। इसलिए.
तत्वा ब्रोध भीज निज्ञा के तस तत्वा.
ब्रोधो पर प्रिजबोधो निज्ञा। भीज निज्ञा से युक्त तत्व का प्रिजबोध वहाँ पर निज्ञा है। सैवचा.
विशेशा प्रिजबो.
वो ही विशेर प्रज़बोद के प्रसव का भीज है सा भीज निद्रा तयार तप प्राज्या हैं उस भीज निद्रा से युट प्राज्या हैं लेकिन ये तुरी है सदा दिक्ष्वमावत्वात सदा दिक्ष्वमाव है इसलिए तत्वा प्रज़बोद लक्षना निद्रा तत ऐसी निद्रा तुरिये नविद्धते। तुरिये में नहीं है। अतोना कार्णबद्धत तुसमें इत्तमी प्राया। इसलिए तुरिये जो है कार्णबद्ध नहीं है। आया इस पश्चन? जी। क्या? बोलो। सभी जी निद्रा तुरिये में सुसक्ती में कार्णद्धत है प्राज्य जो है उसमें निद्रा भीज है। उससे युक्त है वो प्राज्य। और ये जो है आनिद्र। जिक्सवरूप जो है उसमें कहा निद्रा है। वो तो तब देख ही रहा है। सुशुपती को भी देख रहा है। प्राज्य में अग्राण है। वो बीज निद्वा से युकता है। जो जागरन अनिथा ग्रहन है। उसका बीज है उसमें। बीज मानें कारण। चीज़े न है। और कारण उसको कहते हैं जो कारी के अभ्यवेत पूर्व होता है। कारी की उत्पत्ति के पहले जो रहे वो कारण होता है। तो.
प्राग्य जो.
कि उत्पत्ती के ठीक पूर्व है। इसलिए वो कारण है। वो कारण कौन है। निद्रा।.
तो.
निद्रा रूपी बीज से युत विश्व है। प्राग्य। प्राग्य। क्योंकि वो उसी का विमानी हैं। सुरुपती का विमानी हैं। लेकिन जो तुरी है उसमें निद्रा न.
अनिध्य.
है वो आजम अनिध्य अस्वपनम आगे बिशेशन देंगे क्योंकि वो सदा देख सवरूप है सदा देखते ही रहता है भाव को भी देखता है अभाव को भी देखता है अनादि माया सुप्तु यदा जीवा प्रभुत्यते वजम अनिध्यमस्वपनम अनिध्यत.
मा तोड़ना कान बंधत.
तस्पिर नितर स्वाप्न नित्रायुता बाद्यो। स्वाप्न नित्रायुता बाद्यो। प्राग्नत तस्वाप्न नित्रया। न नित्रा नहीं वचा स्वाप्नम्। तुरिये प्रस्चन्तिनिश्चिता। स्वाप्नु अन्यथा गर्णम् स्वर्� तत्मां प्रिदुरूद लक्षिनम् तमां।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। रज्जू का स्वर्वरूप से ग्रहन अन्यता ग्रहन है। तो सोपन भी अन्यता ग्रहन है। जो वस्तु वहाँ पर नहीं है वो देख रहे हैं। अब हम देख रहे हैं सोपन में कि हम मर गए हैं। अभी जिंदा हैं। तो.
ये हमने देख रहे हैं अन्यता ग्रहन.
है कि इसी तर.
बहुत पहले मरे.
माता पिता दिखाई पढ़ रहे हैं जो कि ख़तम हो गए हैं अन्यथा ग्रहन हैं तो अन्यथा ग्रहन मानें जो वस्तु जैसी नहीं है बैसी दिखाई पढ़ रहे हैं तो समझ लो अन्यथा ग्रहन हैं तो सपन में अन्यथा ग्रहन हैं भगवन इसके उल्टा.
एसा है कि ये रस्टान.
दिया है बागवत में बागवत में आता है कि जो पूतना थी पूतना ने कृष्णो को पकड़ डिया ये समझ के कीत को हम खाई जाएगे ये क्या है छोटा सबस्त तो जैसे की सरव जिती अबुद्धर जिती अबुद्धर जिती.
इदी पूर्थना.
जो है साप और सरीख किर्णोस के लिए साप था उसको रजु समझ के पगर डिया उसने इसलिए मारी गई है अन्यता ग्रहन है मानें जो वस्तु जैसी नहीं है उस रूप में उसका ग्रहन होना अन्यता ग्रहन है अतास्मित अद्भुद्धी जो बस्तु जैसी नहीं है उसमें वैसी बुद्जी हो जाना इसी का नाम अध्यास है। अधश्मित अजबुद्धिर अध्यासा। अध्रा.
रज्जो रज्जो सप्पान च्यासो भुवेत अधिका महान अनुथ्था। रज्जो सप्पान च्यासो भुवेत अधिका महान अन�.
यही तो अनर्च है कि जगत जुए ये सर्फ है इसमें सत्यत्य बुज्जी है मानी हो गई इसी को सत्य मान बैटे हैं अन्या अन्या ध्यास हो गया तो वसता अन्या अन्या ध्यास कद्धू परकार है एक होता है सुरुपा ध्यास दूसरा होता सनसर का अध्यास हन्योन्या अध्यास तो आत्मा में अनात्मा का स्वरुपा अध्यास इसलिए आत्मा.
घ्यान से अनात्मा की निवर्ति हो जाती.
है लेकिन अनात्मा में ज़िए आत्मा का स्वरुपा अध्यास मानेंगे तो अनात्मा की घ्यान से आत्म तो इसके लिए यहाँ पर कहना होगा कि ये संसर्गाध्यास है संसर्गाध्यास है तो अनात्मा में आत्मा का अध्यास.
मानें अनात्मा के साथ आत्मा का संबंध.
मान लेना जो अनात्मा के गुर्धर्म हैं उन गुर्धर्मों को अपने में आरुपत कर लेता है। तो जो कुछ हमको सुगदुख का अनुभव हो रहा है। वो सुगदुख अन्ता कारण में हो रहा है। उसको हम कहते हैं हम सुखे हैं, हम दुखे हैं। अपने में मान लिया है। अब.
कर्म जो हो रहे हैं.
वो इंद्रिया और मन बुद्धी ले के मिल के करम कर रहे हैं। प्रकृती के जो गुन है। यह है न गीता में। हाँ वो ही बात है। गुना गुनेश वर्तन थे। इति मत्तु आन सज्जते। गुन गुनों में वर्त रहे हैं। ऐसा समझ कर आसक्त नहीं होता। भगवत घीता में बताया है। गुना गुनेशु वर्तन्ते का क्या मतलब क्या है। गुन जो है सत्वरजतम है। यह सत्वरजतम ही है जो अपंचिकित पंच महा भूतों से जिन गुनात्मक प्रकृति से अंता करन के उत्पत्ति होती है। और समश्टी सत्वांच से प्रकृति के समश्टी सत्वांच से अन्ता करण की उत्पत्ती होती है और बेश्टी से पच्च ग्यानेंद्रियों की उत्पत्ती होती है यह मान जाता है की जो शोत्र है यह आकास का कारी है त्वक वायू का कारी है। सोतरक त्वक और रसन नितर अगनी का कारी है। और जेवा ये जल का कारी है। और नासिका ये परिश्वी का कारी है। ये अपंची कित पंच महाभूतों के बेश्टी सात्रक अंच से उठपन होते हैं। हो गया और फिर उसके बाद ये जो सब जसपर शुरूप रस्कन्ध है ये पंची के पंच महाभूतों से उतपण हुए तो सबका कारण एक प्रकृति है और प्रकृति जो है गुनात्मक है सत्वरत्तम तो ये गुनों के कारिवी गुन हैं गुना गुने से बरतन थे। अब ये किसी से पूछ दिये ना गुना गुने से बरतन थे, इसके क्या मदद है? गुन गुनों में बरत रहे हैं। अरथात नेत जो है अगनी का कारी है। और रूप भी अगनी का कारी है। और मन जो है पाँछों का कारी है। तो मन का साथ सयोग रह गया तो नितन रूप को देख दिया कान न शब्द को सुन लिया नाग में गंध को सून लिया जेवा न रस ले लिया तक न इसपर्ष कर लिया ये सब का सब इंदियों और मन मिलकी थो कर रहे हैं आत्मा कहा कर रहा है आत्मा तो इनको देख रहा है गु.
अब इनके साथ जुड़ गया.
इन गुनों के कर्म कर्म को अपना कर्म मान लिया वो ही हमने उदिस्तान देते हैं कि जैसे बेल गारी के नीचे कुट्टा चलता है तो वो ये.
मान बेटता है कि बेल गारी हम चला रहे हैं.
चल रही है बेल गारी। इसी तरह से आत्मा जो है वो मिरलेफ है देख रहा है। लेकिन हम उसको उसके साथ जोड लेते हैं। जोड लेते हैं तो फ़स जाते हैं। यह बात है। वो जो द्रिष्टान था हमने जिया कि हम चोराहें बैठे हैं। अपने को भूल गए और देखन तो कोई दिश्य अच्छा आया तो खुश हो गए। कोई बुरा आया तो दुखी हो गए। अगर एक्सिजेंट हो गया तो चीख निकर पड़ी। और अगर अच्छी बरातने के बाजा बज रहे हैं। लोग नाच रहे हैं तो देख के खुश हो गए। तेरा क्या समबन है। � स्वप्ननिद्रायुतावाध्यो हो गया न? स्वप्ननिद्रायुतावाध्यो हो गया न? स्वप्ननिद्रायुतावाध्यो हो गया न? स्वप्ननिद्रायुतावाध्यो हो गया न? स्वप्ननिद्रायुतावाध्यो हो गया न? स्वप्ननिद्रायुतावाध्यो.
हो गया न? स्.
गराण इन से विश्व तई जा से। युक्ते हैं। अतस्तो कारी कान बद्धो इत्युक्तो। प्राग्यात्तू स्वप्न वर्जित केवले यु निद्रा युता। प्राग्यनहे स्वप्न से वर्जित होकर केवल निद्रा से युते हैं। श्री कान बद्धो युतता। नु विरुद्धात्वात् सुवितरीव तमहां। जैसे सूरी के सामने अन्धकार नहीं है उसी तरह से आत्मा के साथ अज्यान या तत्वा ग्रहन नहीं है इसलिए उन में ना तो अग्रहन है और ना अन्यत अग्रहन है ना वो कारिकार्ण बद्ध है ना कार्ण बद्ध है इसके निच्चिता मानब्रम्युदा तुरिये नपश्चन्ती कथं तुरिये निच्चितो भवती चुचदे कहते हैं तुरिये में कैसे निच्चित होता है स्वपन जागरतियोर अन्यथा रज्ञाम सरभियो कारिका कारिका न अन्यतां गृष्णतस् स्वपनों निध्रां तत्तुम जानतः विपर्यासे तयोग खीने तुयियं पदम अश्णुते निशिता कथम वा बनते तत्तुवित्ता कैसे बनते हैं कैसे होते हैं वोले स्वपन जो है अनिथा गरन करने से होता है यह हो गया और निध्रा तत्को न जानने से होता है तो यह दोनों में वरियास जब खीन हो जाते हैं तो तुरिय पद को प्राप्ट कर लेता है इसी को भाष्यमागार बोलते है.
ग्रिहतस् तत्तुम् सोपनों कश्चति कहते हैं सोपनों जागरित.
इन दोनों में जो अग्रहन और अनुथाग्रहन.
हैं ये.
बताये.
स्वपन जागर्ण में रज्ञाम सर्पेव रस्ती में जैसे सर्प अनिथा ग्रण होता है उसी तरह से तुरिय में स्वपन और जागर्ण दिखाई पड़ते हैं उसमें नहीं है तुरिय में क्रिसो सकती है अब ये तुरी का बढ़न कर रहे हैं न? तुरी ये निशिता? सर्वासामोस्थानम अधिष्ठानम तुरी में है आ जा ठीक है ये बताया की जो अधिष्ठान है उसका घ्यान हो जाने पर अध्यस्त की निवित्ती हो जाती हैं तो जैसे रज्जू सर्प का जिथान है। तो रज्जू के घ्यान से सर्प की निवृति हो जाती है। तो दोनों दरे से कह सकते हैं कि.
सर्प की निवृति से रज्जू का घ्यान.
हो जाती है। तो यह जो जागरत और स्रोपन है यह अन्यथा ग्रहन है। और.
सुचुपतु जो है अग्रहन है।.
ये दोनों आत्मा में रज्जू में सर्प के समान कर्पित हैं। तो इन कर्पनाओं का अधिस्थान तुरिय है। तो इनका जब निशेध हो जाएगा कि ये कर्पित हैं। किस में कर्पित हैं। तुरिय में। तो तुरिय में जब आप उसको जान लेंगे तो तुरिय में आप.
निद्वा तत्वा नाना.
तस्तु अवस्थासु तुलिया। तत्वा का ज्ञान। तिशु नुवा अवस्थासु। त्थासु। यहाँ आकार चाहिए। चुखे। तुलिया। स्वापने निद्वयोग हो। तुल्यत्ताद विश्व तेजस्यू एक राचित्म। स्वप्नो.
निध्रां। दोनों.
में एक राची में हैं। विश्व तेजस्य। दोनों में अनिता ग्रहन। अनिता ग्रहन प्राधान्याच्छ। गुर्वूता निध्रां। यहाँ पर निद्रा जो है गुर्भूत है। तश्मिन पर यासा स्वपन है। तो अनिदा गर्ण प्राधानन्याच गुर्भूता निद्रा। यद्यवी अनिदा गर्ण का प्राधान दोनों में है। लेकिन.
स्वपन में एक और विशीवता आ गई.
जो वहाँ निद्रा आ जात उसमें जो विपरियास होता है जागरित का, वो सबने हैं। तृतिये तूस्ताने तत्त्वा ग्यार रख्षनो निध्रेव केवला। और तृतिये तुस्तान जो सुषुप्ती हैं। उसमें.
तत्तव का अज्यान रूप निध्राही केवल रहती हैं। वो.
ही विपरियास है। अ.
यह जो है कारी कारण स्थान वाले.
अनिथा ग्रहन लक्षन विपर्यास है। अनिथा ग्रहन लक्षन विपर्यास में जो कारी कारण स्थान यो अनिथा ग्रहन लक्षन विपर्यास है। कारी कारण बंद रूपे परमान तत्त्व प्रिजबोजता। क्या.
होने की यहां? कारी.
कार कारिकान थान यो ठीक है कारिकान थान यो गए अन्यथा ग्रहन जागिरत तो सौपन है और कारिकान थान होगे सुसुपती है ये अन्यथा ग्रहन है तीनो अन्यथा ग्रहन रक्षन विपर्यास कारिकान बंद रूप है कारिकान से बांद रहे है परमार्थ तत्व प्रिज� परमार तत्व का जब प्रिभोद हो जाता है तो क्षीने तुरियं पदमा सुनते तो फिर तुरिय पद की प्राप्ति हो जाते हैं तद उभै लक्षनम् बंद रुपम् तत्या वशन्स तुरिये निसितों भवती उभै लक्षन जो बंद है वो तुरिये में वो नहीं देखता यह समझ गईजे कि तुही उसको क्यों कहते हैं यह तीन है तीन अवस्ता है और तीनों अवस्ताओं के तीन अफ़िमानी है जागरित एक स्वापन दो सुशुप्ति तीन यह तीन अवस्ता होगे और जागरित का अभिमानी विश्व स्वपन का अभिमानी तईजस और सुशुपती का अभिमानी प्रात हैं अब इनके दो विभाग कर लो एक.
विभाग में स्वपन और जागरित आ जाते.
हैं ये दो तीनों से बद्ध हैं कारिय बद्ध और कारण बद्ध कारण जो है तत्तु का प्रदिभूद इन दोनों में हैं। और.
कारिय से बद्धे मानें जो आनिता दिखाई.
पढ़ रहा हैं। अज्ञान भी है और अज्ञान से उत्पन संसार की प्रतिती हैं। प्रबंच की प्रतिती दोनों हैं। तो ये एक राशी मोगें। और सुशुपती में प्र� ये अग्रहन हैं तो अन्यथा ग्रहन और अग्रहन अग्रहन अन्यथा ग्रहन एक राशी स्वपन और जागरण और अग्रहन दूसरी राशी सुशुपती ये दो हो गए दो तो तुरियेन पश्चता तुरिय उसको कहते हैं जो तीनों से विलक्षर हैं तो.
उनको विलक्षर कहन.
वो कोई अवस्था नहीं है। वो अवस्था को देखने वाला है। तो ये तीनों जो हैं नहीं हैं। ये यद्ये भी दिखाई पड़ते हैं। लेकिन ये बिविचारी हैं। जागरत स्वापन में नहीं हैं। स्वापन जागरत में नहीं हैं। जागरत स्वापन सुचुप्त क्या हुआ? समाधी.
समाधी में दीनों का अभाव है समाधी.
नहीं तुरिय में समाधी क्या है? समाधी कोई अवस्था नहीं है तुरिय अवस्थान है अपने स्वरूप में जो अवस्थिति है वो तुरिय है तो अवस्थान जो है वो तुरिय से भिनने नहीं है वो स्व और ये जागरत स्वापने जो है ये बस उता नहीं है क्योंकि ये विविशारी हैं तुरिय में ये है नहीं तो.
तुरिय को जानने के लिए इनका बात.
कर दिया जाता है तो ये बताया अनाधि माया सुपतो येनाजीवप्रभुद्धिते अजम अनिध्यमस्वपनम् अध्वितम् बुद्धितेतना अनाज माया से सोया हुआ ये जो माया है इसको आप माया कह.
लीजी अग्यान कह लीजी अविद्धा कह लीजी.
प्रकृति कह लीजी ये अनाज है इसका कभी आजे नहीं है। इसलिए इसका कोई कारणा नहीं कहा जा सकता। लोग कहते हैं कि ये बताईए कि सबप्रकास चिदात्मा में ये अघ्यान कहां से आ गया। अधितिये सबप्रकासे चिदात्मा नहीं। ये अघ्यान अविध्या कहां से आ गई। मोलें ये बताओ। तुम्हारे उपर अगर साम पड़ जाए, तुम्हारी कंदे.
पर एक साम गिर जाए, पहले उसको.
फेकोगे कि पूछोगी कहां से आए।.
अच्छा.
वो उसको फेग नहीं जिया। जब वो फेग देंगे आप, वो रही नहीं जाएगा। जब नहीं रहे गया, तो कहाँ से आए? ये पूछने के ज़रूते ही कहा नहीं। तो ऐसी अनाजी माया से जियों सोया हुआ है।.
अपने.
को भूला हुआ है। तो.
जैसे सोया हुआ व्यक्ति जब जाग जाता.
है तो जो स्वापन में देखा अपने आप समझ लेता है कि ये कुछ नहीं है। अब आप स्वापन में देखते हैं बहुत बड़ा संसार दिखा ही पढ़ता है। रेल में बैठे हैं रेल चर रहे हो, नीद आ गई। और.
स्वापन में देख रहे हैं कि अभी.
हम टिकट कोज रहे हैं। रेल छूट गई। अब क्या करें। और उसके बाद जब नीद उठती है, तो कहते हैं, अब तो चर ही रहे हैं, कहां। तो ये जो जाग जाने पर जो आप.
स्वापन देखते ह.
इसी प्रकार तुरिय में.
जाग जाने पर ये जागरित स्वापन सुप्ति.
में जो किसाब देख रहे हैं ये सब किसाब मिठ्चा सिद्ध हो जाएंगे केवर आज अनिद्र अस्वाप हैं वो कहते हैं आज अजनमा निद्रा रहित और अद्गैत कोई दूसर नहीं हैं हम यहाँ ये सिद्धान्त्र। योयम् संसारी शाथ। योयम् संसारी जीवः साउभै लक्षिडेन तत्वाप्रजिवदुरुपेन बीजात्मना अन्नथा ग्रह लक्षनेन सानाधि कालप्रमृत्तेन माया लक्षनेन सपनेन मायां पितां पत्तोयं नप्ता छेत्रं पस्वो आमेरं स्वामी इस माया से सपन देख रहा है क्या सपन देख रहा है यह.
मेरे पिता है अरे जब तू अनाजी.
हैं तो कहाँ तेरे पिता हो गया? मुमायं पिता, पुत्रोयम, यह मेरा पुतर है, यह मेरा नाती है, यह मेरा खेथ है, यह मेरे पशु है, मैं इनका स्वामी हूँ, मैं सुकी हूँ, दुक्की हूँ, और इनसे मैं रहित हो गया हूँ, और.
इनसे युक्.
इस प्रकार अदेनो इमं प्रकाराद स्वपनान सहनद्ध्यविपिपश्छन। इस.
प्रकार के स्वपनों को जोनों इस थानों.
में देखता हुआ। सो रहा है। यदा वेदान्तार्थ तत्ताभिग्येन। वेदान्त के तत्त को जानने वाले जो परमकारुनिक गुरु है। व किर्तु तत्तवशी तु हित फरात्मक नहीं है किर्तु तत्तवशी तु वही है इसी प्रजिबुध्यमानो यदा तदेवं प्रजिबुध्यते तो जब गुरु जगा देते हैं तो उठ जाता है तो ये देख रहा है वो एक दिर्छान्त है एक आजमी का एक रड़का था और उसका उससे बहुत प्रेम था तो अपने खेत में फसर की रख्षा के लिए मचान में सोया था स्वपन में उसने देखा की उसका विबाय हो गया दूसरा और उससे साथ रड़के हुए.
ایک.
سے ایک سندھر گڑکے سوپن میں دیکھ رہا ہے اور پھر کوئی بیماری آئی تو کرم سے ساتوں مر گئے تو.
وہ ساتوں کے مرنے سے رو رہا.
تھا اتنے میں کسی نے اس کو جگایا جگایا کہ چلو تمہارا بیٹا بیمار ہے تو وہ اس کو دیکھنے گیا.
تب تک وہ بھی مر گیا.
तो उसका रोना बंद हो गया। और लोग रो रहे थे। वो नहीं रो रहा था। तो.
लोगों ने उससे पूछा कि भाई तो.
वो रोते क्यों नहीं हो। तो मारा एकलोता विटा मर गया। तो.
बोले कि साथ के लिए रोग। कि.
एक के लिए रोग। वो.
साथ मर गये उन के लिए रो.
سوپن میں شاد دیکھا ساتوں ہی مر گئے ساتوں مر گئے اور یہاں بھی.
یہ بھی تو اپنا سوپن ہی ہے.
یہ بھی گیا یہ بھی گیا چلا گیا کہاں کس کا کون باپ ہے جیو جو ہے انادی ہیں دونوں انادی ہیں باپ بیٹا دونوں انادی ہیں تو.
باپ اس کو کہتے ہیں جو پہلے.
ہو تو جو پہلے ہوگا وہ نہ ہمارا باپ بنے گا اور پہلے سے.
دونوں ہم برابر ہیں.
तो कौन बाब, कौन बेटा, इसी तरह बेटे की बात है, नाते की बात है, और धन की बात है, कहते हैं यह धन मेरा है.
जो आपके पाकेट में नोट है, यह कितने लोगों के पाकेट में.
आ चुका है, तक्साल से निकलने के बाद, सब ने कहा मेरा, मेरा, मेरा, मेरा, और सब बदलता चला जा तो तुम्हारा कहा है केबर अजमान कर दिया तुमने के यह मेरा है तो यह सब के सब सपन हैं जब परमकारुनिक.
गुरू मिल जाते हैं और वो जगा देते हैं कि अरे तु यह नहीं.
है भाई यह सरीन, इंद्री, मन, मुद्धी तेरा सुरूप नहीं है � तो जो.
उसको बताया तो वो जागे आता है.
क्योंकि अपने भारत वात है। तो वो अद्वित को प्राप्त कर लेता है। बास।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।.
सस्तिनप्पूषाविष्ववेदाः.
सस्तिनस्तार्क्यो अरिष्टनेमि सस्तिनो विहस्पतिर्दनातु ओम् शान्ति शान्ति शान्ति.
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