Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Pravachan 7

This is a recorded pravachan by Jagadguru Swami Swaroopanand Sarasvatiji (Chaturmas 2012). The speaker opens with devotional chants and then explains the four goals of human life (artha, dharma, kama, moksha), stressing that dharma sustains society and supports the other aims. He teaches a karmic account of suffering and reward across births (rebirth), uses parables to show how dharma protects one from misfortune, and urges listeners to practice righteous conduct and pilgrimage for spiritual benefit. The talk emphasizes moksha (liberation) as the highest, enduring good.
Chapters
कर्ण घूर्ण जिलेफा वालि करितक बोलो दानो दामां भिरामं घिलिष घिलिष ताव्यां लालितं नित्यमं के सजन भरन शीलं शीले विक्न राजं यून्तप्रविष्यममवाचमिमां प्रसुप्तां सन्जीवयत्यखिरशक्तिदरस्तधान्मा अन्याच्यहत्यशर्णश्यमनत्तवाधि प्रानान्नमोभवते पुर्षायतुभ्यम् तज्ञिविमवेन्धान्म सारस्तमुकास्तमहे यत्प्रसादात्प्रदियंते मोहान्दतमसच्चताः śrī rāma jaya rāma.
Jaya jaya rāma śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma śrī rām jai rām jai jai rām śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma dharmakī.
अधर्म का प्राण्यों में विश्व का गो माता की गो हत्या हर हर महाद समुपस्तित सजनो देवियो धर्मों विश्वस्त लिगतप्प्रिष्टा लोके धर्मिष्टं प्रजा उपसर्पन्ती। ये वेदवचन है कि समस्त विष्व की प्रतिष्ठा, मर्यादा, जगत की रक्षा, धर्म से होती है। इसलिए जो व्यक्ति धर्मनिर्च्व होता है, प्रजा उसका आधर करती है। आदर ही नहीं, उसका अनुकरण, अनुसरन भी करती। बात यह है कि मानों जीवन में चार कुर्षार था। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। अर्थ कहते हैं धन को, धन भी एक पुर्शार्त है। क्योंकि हमें भोजन चाहिए, रहने के लिए मकान चाहिए, धन धांकने के लिए कपड़ा चाहिए। और ये अर्थ से मिलता है। इसलिए लोग अर्थ को पुर्शार्त मानते हैं। और दूसरा है काम लोग यह चाहिते हैं कि संसार में हम दब आये हैं तो खाने का, पीने का, सोने का आराम हमको मिलना चाहिए तो यह काम काम का सुख लोग चाहिते हैं अर्थ काम और दूसरा है मोक्ष जब मनुष्य संसार में आता है संसार के स्वरुप को देखता है यहां कुछ भी सुख नहीं है तो वो ये चाहिता है कि हमें अक्षे सुख की प्राप्ती हमें धन से जो सुख मिलता है काम से जो सुक मिलता है वो क्षणक है और उसके सांसार दुख भी मिला हुआ है इसलिए ऐसा सुक चाहिए जिसका कभी अंत न हो और जो अक्षय होते हुए भी सबसे अधिक हो तो ऐसा सुक परमेशर की प्राप्ति से ही मिलता है तो पर्मात्मा की प्राप्ती का ही नाम मोक्ष है। और बीच में जो पुर्शार्त थे धर्म, धर्म इन तीनों में सहायक है। जो व्यक्ति धर्म का अनुष्थान करता है, उसको इस जीवन में धर्म भी मिलता है, भोग भी मिलते है। आज संसार में जो विशम्ता है ये विशम्ता अकारण नहीं है कोई सुखी है कोई दुखी है बड़ी मनुष्य कुछ भी करें रेकिन हम ये देखते हैं कि सब कुछ होने पर भी लोग दुखी हो जाते हैं बहुत धन एकठा करने पर भी लोग सुखी नहीं हो पाते है और भोग भोग करने पर भी लोगों को सुख नहीं मिलता ये सुख ख्षणिक है नित्त सुख नहीं है पर ये भी जो हम को मिलता है वो हमारे कर्म के अनुसार मिलता है पूर जन्म में मनुष्य ने यदी धर्म किया है तो इस जीवन में उसको सफलता मिलती है कई लोग ऐसे हैं जो सोना उठाते हैं तो मिट्टी हो जाती है और कई ऐसे हैं कि मिट्टी उठाते हैं सोना हो जाता है क्या कारण है कहना होगा कि इस प्राणी ने पहले जर्म में पुर्ण किये इसलिए यहां उसको सबरता मिल रही है। तो जो आपको संसार का भी सुक्त मिलता है, धर मिलता है, भोग मिलते हैं, आपको जो उत्तम सरीर मिला है, स्वास्त मिला है, बुद्धी मिली है, बहुत से लोग कहते हैं, हम भगवान का जीया हो तोड़ी खाते हैं, अपनी मेहनत का � हाथ पेर चलाते हैं या अपने मस्तिष्क से बुद्धिमत्ता से व्यापार करते हैं तो हमको धरमिलता हैं उससे हम क्या सुखी हो रहे हैं इसमें धर्म का या भगवान का क्या हात है लेकिन आप ये समझे कि अगर आपके हात में ताकत न होती आपके हात में लक्वा लगा होत और मस्तिष्क आपका विक्रत होता तो क्या कमा रहे थे आप? तो ये जो सफ़त सरीर हैं आपके जो हाथ और पैड़ हैं इनकी सफ़तता किसकी दिवही है? आपका जो मस्तिष्क काम कर रहा है वो किसका दिया हुआ है? किसकी कारीगरी है? वो कहना होगा कि इश्वर की लेकिन इश्वर की एकेरे हो अगर मान लें तो सब के साथ इश्वर एक साथ कहनी क्यों नहीं करता कोई सुखी है, कोई लुखी है, कोई पागर है, कोई मुझमान है, कोई मूर्ख है ये विशमता क्यों है? तो इसका उत्तर अपने हाँ सात्रों ने दिया है कर्म � जो जस करे सो तस पल चाक्या जिस प्राणी हम लोग ये मानते हैं कि ये संसार ये सरीर पहली बार नहीं मिलाये इसके पहले भी हम थे आत्मा का जन्म नहीं होता है आत्मा सरीर धारन करती है उसी का नाम जन्म होता है और आत्मा की मृत्यू भी नहीं होती शरीर की मृत्य होती है आत्मा तब भी रहता है किसने देखा आत्मा को जन्म लेते हुए किसने देखा आत्मा को मरते हुए आप बोलेंगे हमने उसको मरते हुए देखा है उसके शरीर को देखा है कि आत्मा को देखा है और वो कहे कि मैंने अपने को जन्म लेते देखा है तो � जर्म होना कैसे देखते हैं? पहले आप थे तब ही नहीं जर्म देखा मृतु को भी आप देखते हैं तो अगर आप हैं तब ही तो मृतु को देखेंगे अगर मरी गए तो मृतु कोईं देखेंगे आत्मा अजर अमर है उस आत्मा के द्वारा पहले जर्म में जैसे कर्म किये � उसके अंसार इस जन्म में उसका फल मिलता है और कभी कभी ऐसा भी होता है कि इस जीवन में आपको बहुत बड़ा दुख होने वाला है पर यदी आप धर्म का आचारन करते हैं तो वो सूली का काटा हो जाता है धर्म तोड़ा से बचा लेता है एक कोई जमिनार थे उनके दो रड़के थे और उनके गाओं से तोड़ी दूर पर एक शहर था तो उनके दो रड़कों में से एक धर्मात्मा था और दूसरा नटकर था तो उस सेहर में जो उनके गाउं के पास में था एक महात्मा आये है तो वो बड़ा लड़का महात्मा के सचसंग में कथा सनने जाने लगा और दूसरा एक नर्थकी आयी थी उसका नाच देखने जाने लगा अब दोनों अलग अलग पिता धार्मिक था वो चाहेता था कि बेटा धर्म के अनुसार चले लेकिन वो धर्म की हची उड़ाता था भगवान को भी नहीं मानता था और एक दिल बड़ी हद हो गई कि बड़ा भाई लोट के आ रहा था उसके पैर में कील गड़ गई लोहे कील गड़ गई पैर में आर� तरना बंद हो गया लोग उसको टांग के लाए वो बड़ा उपचार किया जाने लगा और वो आ रहा था उसके पैर में ठोकर लगी तो उसने नीचे देखा एक सोने की इंट थी तो उसको सोने की इंट मिल गई वो रेके आया अब दोनों जब आये तो उसने बड़े चोटे ल बड़े भाई साहब के पेर से तो कून निकल रहा है। बैज राख्टर उपचार कर रहे हैं। कहारे क्या रखा धर्म में। बड़े धर्मात्मा बनते हैं। भगवान ने कब अच्छे लिया तमको। और देखो हम तो इसो मानते नहीं हैं। हमारे पेल में ठूकर लगी और हम तो एक बहुत बड़े जोत्सी आये। उनसे उन्होंने पुछा कि महराज यह कैसे हो गया। तो उन्होंने उसकी जन, दोनों की जनपत्ती देखी। और देख के बताया कि जिस दिन तमारे पुर्त को काटा गड़ा उसको सूरी होने थी। तो सूरी पर इसको चरना था, एसा � वो काटा मनके रह गया क्योंकि ये सत्ता के बजाता था और इसको राज मिलने वाला था लेकिन इसने पाप किये इसलिए राज की जगए सोनी की हीट मिलने रहे था इसलिए अगर आपके सामने दुख हाता है तो उस दुख को हलका करने के लिए धर्म करना चाहिए और पाप से बचना चाहिए। यहां तक लिखा है कि तिविर्वर्शैस् तिविर्मासैस् तिविर्प्रक्षैस् तिविर्दिनैस् अत्युत्कट्पुर्णपापानाम् यही भफलमशुते। अत्युत्कट्पुर्णपाप यदि किये जाएं तो पूर्वजन्म की अपिक्� तीन साल में तीन महने में तीन पक्ष में और तीन दिन में उसका फल मिल जाता है इसलिए पाप से बचना चाहिए और धर्म का आचरन करना चाहिए धर्म क्या वस्तु है ये तो उभ्युदाय निश्रियस् सिद्धिस्थ धर्मा जिसे हमारा लोक पर लोक में अभुदय हो और � उसको धर्म कहते हैं हमारे साथ मरने के बाद यहाँ से कुछ भी नहीं जाने वाला है धरानी भूमू पसवस्त गोच्ठे नारी ग्रिहद्वारी जनास्वशाने देहच्यतायां पररोकमार्गे धर्मानुगोगच्छति जीवेका धन जितना भी है वो रह जाएगा यही बेंक का बेंक में रह जाएगा जमीन में गड़ाओगे तो जमीन में रह जाएगा सिजोडी में रखा तो सिजोडी में रह जाएगा लोकर में रखा है तो लोकर में रह जाएगा औप पशु गोच्छ में रह जाएगे इस्ति घर के दर्वाजे तक पुछा के लोड जाएगी उसके आगे जो यात्र होगी उस समय आपके साथ केवल आपका धर्म जाएगा। इसलिए ये माना जाता है कि मनुष्य का यदि कोई सच्चा धर्म है सच्चा मित्र है तो वो धर्म है। इसलिए ये धर्म का आचन करने से अर्थ काम और यदि निषकाम भाव से किया जाए तो धर्म ही मनुष्य के लिए मुक्य है। उसी धर्म के प्रचार के लिए उसकी रक्षा के लिए भगवान का उतार होता है। उसके ही उपदेश के लिए लोगों को धर्म में परिजनिष्ठित करने के लिए संत्महत्मा आते हैं। और वो लोग घ्यान का उपदेश करके लोगों उन्होंने भी बहुत परिष्णम करके सनातान धर्म की रक्षा के लिए कारी किया। बहुत से गरंतों की रचना की। और श्रिविध्या का प्रचार करें। श्रिविध्या राजराजेश्वरी। प्राया जो देवी मंदेर हैं उनमें वज्ञान होता है। तो वज्ञान को द तो ये राजराये शरी जो हैं इनके लिए इस परकार के उपचारों के कोई आवशक्ता नहीं है साथ्तिक उपचारों से ही राजराये शरी माता भगवती की पूजा होती है इसलिए जगदंबा की लोग सरन में जाने में आवशक्ते नहीं हैं और उस से लोगों को बहुत ला� प्रस आज इतना ही कहकर अभी आप लोगों ने सम्बुलाटा से लो सम्हलो अपनी कामण लुट गई मैं अफागन यहां पर बड़ा ही करण और बड़ा स्थिक्षप्रद याख्यान है लोग आज भी भगवान शंकर की बड़ी अराद्ना करते हैं इस शावन का मेना भगवान शंकर का महिम्रा माना जाता है। यहाँ के लोग मद्धपुरेश के कामर लेके मादखपुर जाते हैं। इसी तरह से बहुत से लोग बेर्णगंगा का जल लेकर गुर्धाम जा रहे हैं। और अब यहाँ अपने परवंसी गंगा ख्षेत्र में क� शावन मास में आये थे। तो ये परंपर डालनी चाये। ये पैर भगवान ने किसले बनाये। चरन राम तीरत से चली जाए ही। राम वसहुतिन के मन माई। इन पैरों का उभ्योग यही है कि इन से चलो। धर्मकारी के लिए चलो। भगवान के दर्शन के लिए चलो। अच तो बस इतने ही कहकर आज का प्रोटन समाफ़त करेंगे तोड़ा सा भगवान.
का नाम लीजे शीराम जैराम जैजैराम śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma प्यारी जरातो मन में विचारो का सात लाये अरुले चलोगे जाता सदा सात यही पुकारो गोविन्द दामो धर्माधवेति हे कृष्ण हेया दवहे सकेती, स्री कृष्ण गोविन्द हरे मुणारे, एनाथ नारा यडवासु देवा, śrī kṛṣṇa govinda hare mūḍhāre he nātha nārāyaṇa vāsudevā धर्म की.
जय हो, अधर्म का आस हो, प्राणियों.
में सद्भावना हो, विष्व का तल्यान हो, गो माता की जय हो, गो हत्या अन्ध हो, हर हर महाने.
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