Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 31

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Chapters
ओम् बध्यम् करने विष्णियाम देवा। बध्यम् पश्चे माक्षिभिर्यियत्ता। तिनैरंगई तुट्वाग्वं सत्तनुभिर्। विशेम देवहितम् यदाय। सस्तिनेंद्रो वृद्धच्रा। सस्तिनप्पूषाविष्रवेदा सस्तिनत्तार्क्षौरिष्टनेमि सस्तिनों विल्हस्पतिर्दधातु ओम् शान्ति शान्ति शान्ति विकुरोत्तवरान्भावान विक्रोत् विक्रोत् यपरान्भावान् अन्तस्चित्ते विवस्तितान् नियतां सवहिष्चित्ते एमं कर्पयते प्रहुः। संकर्पयन केन प्रकारेन कर्पसीत्युच्यते कहते हैं संकर्प करता हुआ संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर्पयन। संकर आत्मा कर्पयेति एवज्य सहा कथं कर्पयेति केन प्रकारेन कर्पयेति सहा कर्पयेन केन प्रकारेन आयति। सह करवेन थी। यह पात उसके अनजार नहीं हो और लगता उसके अनजार थी। सह करवेन यह कहना होगा। तो सम काट के यह सह में बिसर्व लगाये जाये। स्वह माने आत्म कर्पहन केन प्रकारिण कर्वती वासनारूपेणं वेवस्थितान।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। दूसरे लोकिक भाव माने पदार्थ। वो पदार्थ कौन से? सब्दाधीन सब्दाधीन सब्दस पर्शरूप रसगंध और अन्यांस्च और भी जो मन में भाव आते हैं सुग्दुख कादी अन्तस्चित्ते अपने चित्त में वासना रूपेन व्यवस्तितान वहाँ सहाँ रूप से पहड़े से बवच्चित थे। अभ्याकृतान जो किस्चे पे हुए हैं और नियतांस्च और नियत पृशिव्यादीन नियत पृशिव्यादी और अनियतांस्च कर्पना कारान और अनियत करपना काल में ही उसमें जोड़ लिया बहि चित्तहा सं तथा अन्तः चित्तो मनोडन असाधि लक्षनान इत्तेवं करपेति प्रभुरी सुना आत्मा इत्तेता तो यह बताया की यहां पर करपना दोनों को ही माना है जागरत को भी और सपन को भी। तो दोनों की ही कर्पना आत्मा करता है, ये बताना है उनको। कर्पना मारते हैं इस अनतार। तो क्या क्या कर्पना करता है नाना प्रकार के। लोकिक भाव, पढ़ार, सबदालिक, और अन्यास्य, अब इस कुर्थी का घार स्वच करेंगे। जो चित्वे बासना रूप से विवस्थित हैं और अभ्याकृतान अभ्याकृत जो नियत हैं पिशुब्यादीन अनियतान्स्यकर्पुणाकारान् वही चित्ता संत तथा अंतरचित्तो वहार का और भीतर अंतरचित्त मुनुनुतादि लक्षनान इत्तेवं कर्प्रेति प्रभुरीप्षर आत्मा इत्यत्था।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। नियतां स्चेति चकाराद अनियतां स्चेति वो कहते हैं नियत और अनियत दोनों तरह के दोनों तरह की कर्पना करता है प्रचपिच्चित करम प्रिजबत्तर्थं प्रिछति कहते हैं प्रिजबिच्चित जिसका प्रिजबादन करना है उस करम को जानने के लिए पु� संकर्पयन्निति संकर्पयन्निति संकर्पयन्निति स्लोकाक्षर्योजने बुभुस्तितों क्रोम् ब्रत्यायति कहते हैं स्रोकाक्षर की ओडिना सेवुभुच्छित माने जिग्याशित। जो क्रम है उसको समझाते हैं। उच्छते हैं। अन्यास्चेति। सास्त्रियान। अन्या माने सास्त्रिय। चित्त मद्धे बासना रूपेन बवस्तितान। चित्त के भीतर बासना रूप से बवस् अपने भीतर जो नामरूप अभी अनविव्यक्त हैं उनके विवहार के योग जोकी अनविव्यक्त जोकी विवहार के योग हैं वो अभ्याकरत कहराते हैं कर्पना काल विदुदाजी और कर्पना के समय विदुदाजी जिस समय कर्पना हम करते हैं स्वपन में तो वहाँ पर विद्धुत आधी विजली आधी की हम करपना कर लेते हैं जिससे उजिला होता है अस्तिरान जो की अस्तिर हैं ये भी उस समय करपना का मेशे हो जाते हैं तो ये हो गया भीतर और वहिस्ठित्तो वहिरमुको और बहिर मुख जब होता है तो बाहियान विवहार योग्यान पदार्थान करपेती हां ये हो गया करपना करपेती ये करपना सब की सब पता जिया किन किन मस्यों की करपना होती तो कहते हैं जब ये बहिर मुख होता है तो बाहियान विवहार योग्य पदार्थान की करपना कर अनात्मविशेषु व्यावरत बुद्धी। बहिर मुख कैदियां अनात्मविशाय में अपनी बुद्धी को लगाने वाला हो जाता है। तो बाहियार विवहार योगियार पदार्थान कर्वियती जब बहिर मुख हो जाता है। और जब अन्तस्यत्तस्तु बीता सोचता है � उनों से अलग मनो रथा जी लक्षिनान मनो रथा जी लक्षन आत्मन्नी अवस्तिकान आत्मा में जो अवस्तित हैं एसे जो भाव हैं विमारा योगिनान करपित्वा वो जो हमारे मन में संसकार हैं मनो रथा जी के मन में हैं पहले से तो आत्मा में चिपे हुए उनको विवहार के अयोगी थे वो अब उनकी कर्पना कर लेता है पुनर भहिर विवहार योगियता है करपयती तो ये बोलते हैं कि जब बाहर देखता है तब तो ये सब करपना बाहर के करता है और जब मन को भीतर कर लेता है, अंतश्चित हो जाता है तो उनसे अपनी बुद्धी को अलग करके अपने भीतर जो विवहार के आयोग मनुरथा जी है उनकी करपना करता है उनको विवहार के योग बनाता है मन में आपकी जो भावना है वासना है वो वासना वहाँ पर साकार कर लेता है फिर मना लेता है आपके मन में किसी परकार की इच्छा है तो वो इच्छा जागरित में तो पूरी हुई नहीं मन में रही तो स्वपन में उसी इच्छा को पूरी करते हुई देख लेता है कि वो हो आपके मनुरत है कि हमको नोकरी मिल जाएँ अभी तो नोकरी मिली नहीं है लेकिन सौपन में है वो कर्पना कर लेगा कि हम नोकरी मिल गई वो बेवार क्या योग था अगर भालों को मिला तो फिर उनसे तेव्यो व्यावित्वुद्धिर् मनोरताजिर् लक्षिनान् आत्मन्यमित्तान् पावान् व्यावारायोग्यान् कर्वित्वा मन्में। पुनर्वहिर् व्यावार योगिताई। पर व्यावार व्यावार की योगिता के लिए पर कर्पणा करता। तु तात्परी क्याई त जैसे लोक में कुलाल या तन्तुबाय कुलाल घट को निर्मान करना चाहेता है और पट तन्तुबाय क पट को निर्मान करना चाहेता है आरो वहारा योग्यां व्यक्तिम बुद्धों अविर्भावे ये साफ किया, ठीक है साफ ये किया कि निर्मान कैसे करते हैं तो जब कुलाल बैठता है घड़ा बनाने के लिए तो पहले घड़ का मन में उसकी भाव आ जाता है कि हमें घड़ बनाना है तो उसकी मन में पहले घड़ बन जाएगा भीतर तब फिर वो प्रेज़न करेगा कि वहाँ पर चक, शीवर, मिर्चिका ये सभी कट्टी करेंगा। जाना थी इच्छा थी। हाँ ये। पहले वस्तु का ज्ञान होगा फिर उसकी इच्छा होगी तब वो करेंगा। तो पहले मन में कुलाल के घट आ जाएगा। और तन्तु वाहे के मन में पट आ जाएगा। फिर वो मन में उसकी कर्पना करके, अभी तो वनुरत हैं, विवहार के युग ही नहीं है, तो विवहार के युग बनाने के लिए, वो साधन करके उसको बनाता है, इसी तरह से, तत्युआयं आजी करता, आजी करता पी, माया लक्षने स्वरेचित्ते नामरुपाभ्याम अभ्यक्तरुपेन खितान सश्टव्यः प्रदार्थान प्रसुम्सिजिक्षिता कारेन अंतरविभाव्य पस्चाद वही सर्वप्रजबत्ति साधानरुपेन सम्पाधेति कर्पनायां क्रमाधिगतमाधिगतिवितिर्ति ये बताया कि जैसे कुलाल पहले मन में घट को रख करकर उसको विवहारिक रूप देना चाहेंदा है और तंत्वाई पट को मन में रख के उसको विवहार के योग मनाता है इसी तरह से जो आजी करता आत्मा है आत्मा, यहां भार परवात्मा ही ले रहे हैं तो परमात्मा जो है वो अपनी माया को लेकर मन में ये सोचता है कि हमको क्या बनाना है तो तद एकशत उसने एकशन किया कि हमको क्या बनाना है फिर माया से उनका पहले वो नामरूप उसके भीतार छिपे हुए हैं तो वो ऐसा माना जाता है कि नामरूप सुक्ष्वरूप से पहले से ही प्रलह कालम में रहते हैं अव्याक्रितवत्ता में जब संसार का प्रलह हो जाता है अधेव व्याकरवानी तरकटंगरवानी नाम रूपे व्याकरवानी वाला जाये वो सरीर के बिता जाये तो देखशत एको हम बहुत स्थाव बजाये नाम रूप सुक्ष्वरूप से प्रणायकार्ज में अव्याकरित रहते हैं वो कहां रहते हैं माया में रहते हैं माया जो है यहाँ पर प्रकृति के अथ में मायान्तु प्रकृतिं बिद्जात तो माया में ये सब छिपे रहते हैं सदेव सोमेदम अगर आसी एक मेवाद विथियव तो यहाँ पर सत सब्द का जो अर्थ है वो निर्विषेष ब्रह्म नहीं है माया विशिष्ट है तो अपने में आधिकरता है न वो तो आधिकरता तो तोड़ी बननेगा जब उसके साथ माया रहेगी तो वो जो माया मायावी पुरुष है आत्मा पहले स्रिशिक्षा स्रिशिक्षा करता है किनकी स्रिशिक्षा नामरुप जो उसके अभ्याकरित रूप से पहले से भी जमान हैं। और उसके बाद फिर उनको संकर्प के द्वारा पृश्वी आजी उत्पन कर लेता है। अपने संकर्प से ही करता है। तो संकर्प से करता है इसलिए कर्पना हैं। माया का प्रिलेव में नास नहीं होता है। माया का प जब आत्मा का घ्यान हो जाएँ। आत्मा का घ्यान हो जाएँ। तो माया कभी नाच हो जाएँ। और माया से बनोगे जो संसार है। माया मेटन करनती थे। हाँ यह। माया मेटन करनती थे। सविलास्मा मुहग्राअग्रासे कर्पणा। विश्वमायानिवृत्ति। व पहले सिशिक्षा सिशिक्षा सुक्षमुरूप से जो विद्धमान है ये माना जाता है कि कारण में कार्य सुक्षमुरूप से विद्धमान रहता है सद्कारिवाद सद्कारिवाद तो ये शब्द पर विचार करिए सदेव सोमेद मग्र आसी एसोम्य इदम इदम सब्द सिखा लेना नामरूप क्रियात्मकम् जगत् अग्रे सृष्टे प्रात् सत् एवासी एक नामरूप क्रियात्मक जगत् सृष्टी के पहले सत् ही था तो उसको अव्याकृत कहते हैं लेकिन अव्याकृत जो है वो किवल माया है। लेकिन यहाँ पर चेतन के बिना वो रह नहीं सकती। माया किसी में रहती है। तो वो चेतन उसका आश्चा है। इसलिए वो ईश्वर है। तो ईश्वर ही यहाँ पर सत सब्द से विवक्षिद है। उसके पेट में यह सारा संसार था। जैसे हमारे पेट में सपन की भावनाएं रहती हैं तो हम उसको सपन में बना लेते हैं इसी तरह से पर्मात्मा के भीतार ये पहले थे और उसको उन्होंनें बाहर बना लिया ये क्रव हैं हाँ ये मुझे है कि इदर उदर मत दोड़ाओ विशय को लगाओ चित्त कालाये इन्तस्तु द्वय कालास्तु ये वही कल्पिता एवते सर्वेख विशेशो नाने तु कहा कहते हैं स्वप्रवच्छित्वरिकल्पितत्वम् कल्पितम् सर्वं इत्दादव आसंख्यते। यहात् छित्वरिकल्पितेर् बनोनथाजि लक्षनैच्छित्वरिछेद्यै वैलक्षन्यं बायानाव अन्यून्परिछेद्यत्वम् इतिसानयुक्ता। आशंका। चित्तकाला ही इन तास्तु चित्तपरिष्चिद्दा परिष्चिद्द्या। नानस् चित्तकाला प्रित्रिकेण। परिष्चिद्द कालु यिशाम् ति चित्तकाला। कर्पनाकालेव उब्रव्यन्ति त्यर्था। द्वैकालस्च भेद काला अन्नुन परिछेद्या हाँ ये तो ये कहते हैं अंतस्तु चित्त काला ही जो हमारे मन में स्वपनाजी दिखाई पड़ता है वो किवर चित्त काल जब तक सिर्थ रहता है तो भी तक दाई पड़ता है। दै काला की जड़ा टिपनियों बढ़ रहे हैं। दै काला कारिवर्द्वयम् दै काला ततो अर्शाद जेशीं कारिवर्द्वयम् अन्तायित्यत्ता विशेशा प्रत्रिविज्ञा विशेत्रुको विशेशा चित्ते थी चित्तं कर्पना तत्पुरिछेद्धेई तत् सप्कारी ने रितर्था। तो सप्रवच्छित्वरिकर्पितं सर्वं इत्तित आसंग्यते। यहाँ पहड़े शंका बना रहे हैं कि आप कहते हैं कि जगत जागरत जगर जो दिखाई पड़ता है यह स्वपन के समान है यह बात नहीं है क्यों नहीं है क्योंकि स्वपन जो है हमारे भीतार दिखता है चितकाला। जहां हम अंतर मुख हो जाते हैं, सो जाते हैं, तभी दिखता है। और ये जो जागरित है, ये सपन में भी दिखता है, मन में भी दिखता है, और बहार भी दिखता है। तो द्वेकाल हैं। तो कहते हैं, जो चितकाल हैं, स्वपन। और द्वेकाल ज्यागरित है। कहते हैं कलवता येवती सर्वे। सर्वत्रकालशिद्धा कालवान ही थी। सर्वत्रकालशिद्धा तद्वती। चित्तकालवान, द्वेकालवान। चाहे वो चित्तकाल में हो, चित्तकालवान हो, ये द्वेकालवान मन चित्त मे दोनों में कोई फरक नहीं है। कर्पना एवते सर्वे। दोनों ही कर्पना है। विशेशो नाने हितुका। दोनों में कोई विशेश नहीं है। कोई अंतर नहीं है। अब इसकी ठीका देख लीजिए। कर्पितानाम कर्पनाकारात अन्यस्मन्कारे सत्वाभावात जागरितभावानाम कर्पनाकारात कारांतरेवि प्रत्विग्या सत्वावघमात अनुपण्नम्तेशामिठ्यात्वमिठ्यासंक्या ये कहते हैं कि स्वप्न में और जागरत में अंतर हैं स्वप्न जो है जब तक हम देखते हैं तो भी तक रहता है उसके बाद नहीं रहता है और जागरत जो है जब तक देखते हैं तब तक नहीं पहले भी रहता है कैसे? कि जिस परवत को हमने कल देखा था उसी को आज देख रहे हैं ऐसा होता है न? माने वस्तु को ऐसा नहीं कि आज यही परवत हमने उत्मन कर लिया मनी दीव जो है कल भी था आज हम उसमें बेटे हैं। स्वप्र का जो बड़िंग भी वो पहले थोड़ी था। जिस समय हमने कर्मना की तो भी तक है। नो उसके पहले है न पादमे है। और जो जागरत का है वो हमको पत्रविज्ञा से हमको याद होता है कि ये पहले भी था। इसलिए ये द्वैकाल है आया समझ में? नहीं शंका है क्या समझ में आया? जागरत में जो दोनों काल में है एथामरी दी और स्वपन में जो एक काल में जो चित्त में देखा वो तो स्वपन के बाद है नहीं मानिया स्वपनी के समय में उत्पत्ती हो जाती है और स्वपन में ही खतम हो गया जैस और ये जो संसार है, ये हम जिस समय देखते हैं, उसके पहले भी है और बाद भी रहेगा। हम देख रहे हैं, आज देख रहे हैं, कल भी रहेगा। तो द्वेकाल है, मण वो चित में रहेगा और बाहर भी रहेगा। ये शंका है इसलिए जागरत को मिठ्या नहीं कह सकते तो ये करबना कारभाविन भावा मनस्यंतरवर्दन्ते ये च पुर्वाक्पर कारभाविनो भहिरे ववायोग्या दिश्यन्ते ते सर्वे कर्पता संतो मिठेयो भवन्ति ये सिद्धान्ति कह रहा है कि जो कर्पना कार होते हैं भाव जो मन के विदार रहते हैं वे और जो प्रत्विज्ञायमान होकर पूर्वा कार भावी है और बाहर ही विमार के योग दिखाई पढ़ते हैं ये सब के सब कर्पता है इस प्रित्याक प्रत्यविज्ञायमानत्तु रक्षणु विशेषत्तु न अकल्पितत्तु प्रयुक्तः कहते हैं प्रत्यविज्ञायमानत्तु रक्षणु विशेषत्तु न अकल्पितत्तु प्रयुक्तः कहते हैं प्रत्यविज्ञायमानत्तु रक्षणु विशेषत्तु तत्रूरं न सत्यत्तं जिभभाव। यह कहते हैं। कर्पितेट उस्तनी पृत्यविज्ञा दर्शनात। यह बात है। स्वप्रमें भी जो हमको बदार दिखाई पड़ते हैं, तो हम यह कहते हैं कि यह हमारे पिता है, जो हमको मिल रहे हैं। सोयम। सोयम। यहां भी तो पृ तो ये तो हमको जाहरत में प्रत्यविज्ञा हो रही है। ये भी स्वपन के तुले। स्वपन में भी प्रत्यविज्ञा होती है। तो कहते हैं प्रत्यविज्ञा जो हैं सत्यत्व का प्रयोजक नहीं है। अगर प्रत्यविज्ञा सत्यत्व का प्रयोजक होता तो स्वपन मे ये बोल रहे हैं। सुरुकब्यावर्त्यमाशंकाम् जशियति। स्वप्नवजिति। यथा स्वपने दिश्यमानम् सर्वं कर्वितम् मिथे विष्यते। तथा जागरिते भी द्रिष्णम् सर्वं चित्तस् पंदितम् तेन कल्पितम् मिठेव इतनाद्याभी निर्धारितम् शंका है कि जैसे स्वपन में द्रिष्णमान सब कुछ कल्पित मिठ्या ही माने जाते हैं उसी प्रकार जागरित में भी जो कुछ दिखाई पड़ता है चित्तस्पन्दित। तेन कल्पितं मिठेव। यह सब चित्तस्पन्दित है और उसकी दोरे कल्पित है। इसलिए मिठे है। यह बात सिद्ध है। नहीं हुई अभी तक। मुझे यस्मात। यहाँ पर कह दिया। यस्मात। भाषेर। यतां कोदोहन मास्ते यावधास्ते तावधगाम दोगधी। यावधगाम दोगधी तावधास्ते तावा नयमे तावान। साइति परस्परिछिद परिछिद कत्मं वाह्यानं भेदानं ति द्वैकाला अन्तस्यत्काला वाह्याच्यद्वैकाला किरपितायेवसर्वेन वाह्यो द्वैकालत्तु विशिष्क किरपितत्वित्रेकेर अन्यहितु चाहिए मूल कई लगने यथा स्वप्नियं किर्षिमान चित्काराद हिये ने स्तूर्वे काराद चिये वही कर्पिता एवते सर्मे विशेशोन अन्न जैतका। यस्मात चित्वरिकर्पिताहिर। मुरोणथादि लक्षने चित्वरिछेद्यहिर। वही लक्षन्यम् वाहियानाम् अन्नोन परिछेद्यत्ममस्ति इवे दिधी। सान चित्तगाराही एन तर्तुप चित्तवरिखिर्जा यत कर रहे हैं यहावर कहते हैं यता स्वपने दिश्मानम् सर्मं कर्पुतम् मिठे विश्वते यस्मारिति शंका जुबताई यस्मारिति चित्तवरिखर्पुतेर् मनोर्शत्साई रुथाजिरक्षिनाई चित्वरिछेद्देहि वहिलक्षन्यं वहियानाम अनुन वरिछेद्दत्म इति। कहते हैं, जो स्वापन के दृश्य हैं, वो चित्वरिछेद्धे हैं। चित्वरिछेद्धे हैं, इसका आरती है कि जब तक चित रहेगा। जब तक वो रहेगे। चित्वरिअजि उस समय � और ये चित परिछिद स्वपन के जो जागरित कार हैं ये चित के दोरा दिखाई बड़ता तब भी रहते हैं या चित परिछिद में नहीं हो? अन्यन्यन परिछिद हैं तो ये उसके उत्तर मोलते हैं आत्मा विद्या भी बड़ते हैं चितते हैं तावद अंतर विनिर्मिता मुनुनत्रुपा मनस्यंतर वर्तमाना वही लज्जु सर्पालया चत्ते नहीं वो परिश्चित जंते कहते हैं जैसे आत्मा की अविध्या के विवर्त शेर परिणामेने की तर्था चित्त के परिणाम चित्त के परिणाम आत्मा विविज्जा विवर्तेनु चित्तेनु आत्मा की अविज्जा के विवित विवर्त जो चित्त है आत्मा में जो अविज्जा है उसी अविज्जा से चित्त मना इसलिए वो आत्मा की अविज्जा का विवर्थ है। तो ये बोले की उनसे अंतर बिनिर्मिता दनर्था रूपा मनस अंतर मारत्मा वहो उसी से भीतर बिनिर्मित जो मनुरत रूप दिश्य हैं मन के भीतर वे और जो बहार रज्जू सर्पादिक हैं ते चित्ते नेव परिछिद्यन्ते चित्त के ही दौरा जाने जाते हैं ते ही कर्बना काल मात्त भाविनो न प्रम्यन्ते वो कर्बना काल मात्त है ऐसा नहीं रगता तैसे वे रक्षिन्यं मनसो भेर जागर दिश्चानां बावानां उ मन्सो भहिर जागरित दुष्यानाम। मन और बहर जो जागरित दुष्ये हैं उन भावानाम अनुन परिछिद्यत्तुम। कालत द्वयाव अच्छिद्नत्तेन। पृत्तविग्यां गोचलत्तमिति असमाद उपलब्बिते। तस्माद अयुक्तुम जागरितस्यं। सप्रव की जो जागरित दिर्श हैं वो अन्योन परिछेद हैं अर्थात पहले और बादमे पीजे रहते हैं और स्वापन जो है वो पहले और बादमे नहीं रहता केवर छिप्त काल में रहता है तो उन्होंने ये मताया कि बसतुता स्विती है कि वहां भी जैसे प्रतिविग्या वैसे यहां भी जो आजनों ने परिच्छितता दिखाई बड़ती है। वो भी जोड़ी है। यह मुझे तो नहीं बतता है। छित कार्मण। बाच्चार्थ मुक्तु अभिवक्षितार्थ। अभिवक्षितार्थ बता रहे हैं। कहना क्या चाहेते हैं। कर्मने की। कर्मना निरी पार्यमतार्मया करोती। द्रेतिये मन्सो वही रुप्रभ्यन्ते ते बेदकारा। कालस्त बेदो भध बेदकारा। जो मन के बाहर दिखाई पड़ते हैं वो बेदकार हैं। काल का बेद बेदकार हैं। सहे शामते तथा इत्तु विपत्ते। तथा अन्नेन पूर्मेन इसलिए भिर्ण कारा वच्चिन अत्वेन। भिर्ण कारण से अवच्चिन होने के कारण प्रत्विज्ञाय मान है। इसलिए ये मिच्चा नहीं है असागा तुम सोचते हो। तो प्रत्विज्ञाय मान। पुदाननिष्टतया सुर्यदियतेति। आगोधोहनम् गोधोहन पर देवदत्तस्तिष्ठति।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� यहां बताया एक द्रिष्टान दे दिया। यह प्रत्यभिग्याय महान का। जेवदत् यता आजोगहन कार्ण आजोहनमास्ते यावदास्ते तामद गुदोगधी। यावदगामदोगधी तावदास्ते। जैसे वो गुदोहनमास्ते। गोधोहन मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल मूल यह अन्योन परिछेद का उदाहरन है, कि जब तक गोधोहन रहता है, तब तक देवधत रहता है, और जब तक रहता है, तब तक गोधोहन होता है, तो यह अन्योन परिछेद है, माने... यहाँ जागरत में कैसे घटा रहे हैं? अब इसको ठीका हो देखें, आदोहनम आगोधोहनम गोधोहन परियंदम आस्ते देवदप्ता तृत्रति।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� प्रत्विज्ञाँ विश्यत्मं तस्यदर्श्यति यावदेति। यावत कालेन आयम् घटो हर्थक्रियाव नवर्ति तुम् सक्नोति। तावता कालेन अवच्छिन्न सन्नेश। तिष्टति उदार्णांतर माहा तावानिति। परुक्षितयासितो यावता कालेन अवच्छि अपरंबुदहर्नमा। तो ये बत्ताते हैं कि याथा गोधोहनमास्ते याथा अस्ते तावद गोधोगजी। याथा गामदोगजी तावद आस्ते। जेवदत्त का जो अस्तित्व है वो पहले से है। गाय को दोहने के लिए देवदत गया है। और वो जब तक गाय का दोहन होता है तब तक रहता है। और जब तक गुदोहन रहता है तब तक वो रहता है। तो इसका मत्तब यह है कि वो पहले था और आगे भी वो रहता है। तो यहाँ कारबरीच्छेद है। इसी तरह से जागरत के जो दिश्यें हैं वो पहले भी रहते हैं और बाद में भी रहते हैं अन्नोन परिछिद तो कहते हैं परुक्षिते सितोयावता कालेनवच्छिन्न सकाजियावन्मुर्ति निर्मिर्णोत्ति इतावता कालेनवच्छिन्न सत्यस्ठति इत्तवान उदार्णवान इतावान। दूसरा भी। अनुचित कारा भाईया तुद्वे कारा। इतावान। इतावान। इतावान। यता गोधोरन मात्ते यावधास्ते तावधगाम दोगधी यावधगाम दोगधी तावधास्ते तावान आयं एव एतावान इति परस्पर प्रिछेद्य प्रिछेद्य कत्तं बाह्यानाम वेदानाम ति द्वैकाला तो ये कहते हैं कि यावता कालेन अयम् खटो अर्चक क्रियाम् निर्वर्तितुन चक्नोति। तावता कालेन अवच्छिन्न संत्नेश तिर्ष्टति उदानमान तावानिति। परोख्ष दयास्तितो यावता कालेन अवच्छिन्न स्वकार्यम् निर्विर्ति रिल्मनोत्ति तावता कालेन अव� चकालेन परिछीद्यत्तम। जागरदुष्यानाम भावानं उप्रभिते। कालद्वेसच परिछीद्गत्तम। सतुत्सर्विभावामहिरदुष्यमाना। द्वेकालेन कालद्वेन परिछीद्यामहुन्ति। तृति बादम ब्याजःति अंतरति। तृतुत्पादार्थम पृत्तविज्ञानत्तु रूपः विश्विषों अन्नेत को नभवति। कर्वते वि तत्थावित विश्विषिन सुमवात इत्या दिश्टान्तमा त्राभी। इत्या वि सर्वं जाताना जातम। कर्वते वि तत्थावित विश्विषिन सुमवात इत्या दिश्टान्तम तो आपर यही है कि प्रत्यभिग्याय मान होता है जब तक वो रहता है गोडोहन गाय को दोता है तब तक वो रहता है तो मतलब यह है कि पहले उसको परुक्ष बताया कि आदो गोडोहनम आस्ते देवदक्ता फिर उसके बाद कहा कि आवदास्ते तावद कामदोग दी जब तक रहता है तब तक दोता है तो पहले परुक्ष रूप से उसका वर्णन किया उसके बाद उसका परुक्ष रूप से वर्णन किया तो कालत द्वय परिछेद हो गया पहले पूरु काल फिर उत्तर काल इसलिए � और स्वाप्न जो है किवर चित काल में हैं। इसलिए वो मिठ्या है। तो इसलिए जागरत को आप स्वाप्न के समान मिठ्या नहीं कह सकते हैं। इसके उत्तर मैं कहा कि स्वाप्न में भी प्रत्यविज्ञा होती है। तो जैसे वहाँ की प्रत्यविज्ञा जो है वो सत्यत्त प्रत्तविज्ञा सत्यत्त का प्रयोजक नहीं हो सकती क्योंकि प्रत्तविज्ञा वहां भी होती है स्वपन में प्रयोजक क्या है चित्त कारत्तों जब तक चित्त रहता है तभी तक संसार की स्वपन का भान होता है इसी तरह से यह संसार का बारवी तब तक होगा जब तक कि � छित नहीं रहेगा, संसार का भाण नहीं रहेगा। छित का डियें हैं, दोनों इसलिए कर्पित हैं। ओम् बद्रम् कर्णेमिष्णियाम देवाः। बद्रम् बस्तेवाक्युबिर्ये जत्ताः। त्रेरंगई तुष्टवागों सत्तनुविर्ण। विशेम देवेतं यद Om Shanti, Shanti, Shanti.
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