Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 24

Transcript of a Hindi/Sanskrit lecture by Jagadguru Swami Swaroopanand Saraswati on the Mandukya Upanishad (Chaturmas 2012). The speaker identifies the ātman with oṃ (oṃkāra), explains Om's three mātrās—ākāra, ukāra, makāra—and maps them to the three states of consciousness (jāgrat, svapna, suśupti). He outlines three learner levels (uttama, madhyama, kaniṣṭha), three types of impediments to realization (past, present, future/attachment-based), and prescribes sādhanā, upāsanā, and repeated contemplation as remedies.
Chapters
So, महात्मा, ओं का रोज, मात्र पारा, मात्रा, मात्रा, सादा, आकार, उकार, मकार की स्थान, आकार, माता, आप। आज मत वा आप हवाई। omg, हमारा माता का यहाँ, यह बताया आत्मा आत्मा ही व्याख्या अभिधेय प्रधान। जेअबिधेऔरअभधान 2 हैं। अभिधेय कहते हैं जिसको हम कह रहे हैं, जो हमारा वर्णन विषय है। और अभिधान कहते हैं जो वर्णन है तो नाम अभिधान होता है और नामी अभिजेय होता है। तो पहले अभिजय जो आत्मा है उसका चस्पा वो कैसे सपाट है? अभी तक बताया गया, कैसे, चपाट, बताया जागृत, जागरुक में रहने वाला, फिर स्वपना स्थान, पृशुरुपतस्थान इन तीनों का साक्षी। तुली। तो ये अभि प्रधान वर्णन हो गया। अब इस आत्मा का अभिधान क्या है? ओंकार। तो ओंकार को भी मात्र मात्रा जंग में प्रधान है। उस प्रकार वर्णन होना चाहिए। तो ओंकार की भी 3 मात्राएं हैं। जैसे 3 अवस्थाएं हैं। अभिलेखी। ऐसे अहंकार के 3 अक्षर हैं। अकार, उकार, मकार जो कार शब्द हैं, वो केवल जो पहला अक्षर हैं, उसके एकत्व का बोधक होता है। जिसको जिसके आगे कार लगाते हैं बनास कारा, वर्ण के आगे अगर हम कर लगा दे तो केवल उस 1 का बोध होता। जैसे ककार, ककार, रूप, ककार, मन का मात्र। तो जैसे किसी ने किसी को मंत्र दे दिया। हरी कार तो कार लगाने की जरूरत ही नहीं है। वो जो पहला अक्षर है, वही पर्याप्त। तो यहाँ अगर उसको अलग अलग कर रहा है। वह कर जो है, मिला हुआ है। आ उ मा इसको संधी कर लेते हैं। तो आओ के योग से हो जाता है। और दांत में होने के कारण कार को नुकसान हो जाता है। तो बना है। अगर हम उसको अलग अलग करना करना चाहते हैं तो मात्र कर लगाना, पड़ेगा आकार, उकार, मकार ये 3 मात्राएं। इसको यहाँ पर भारत सरकार ने बताया कि ओंकार की जो विधान है, वो ओहंकारवोअहंकारपादस बाद से उसका प्रभाव किया जाए। तो प्रत्येक मात्रा को लेकर आदि मात्र माने, मात्रा अधिक मात्रा को अधिकृत करके रहे। वही आदि मात्र माता है। आत्मा के जो है, कैसे है का कारोबार कतमातमनेयपारा, आत्मा की जो बात है, वो कैसे हैं। तो अभिधान प्रदान से बताया। ओहोंकार ओंकार में 3 बार 33 अक्षर हैं। अकार उकार, मकार, उसके 3 पाल, ओमकार के 3 पात। अब इसका पहली टीका समझे। तब तक ज्ञान से ज्ञान समर्था, नाम, मजमा, नाम, तुम्हार, बार बार मार्ग स्लम, उपदिष्ट कहते हैं। पहले जो उपदेश दिया गया वो उत्तम है मध्यम अधिकारी और उत्तम अधिकारी। इसके लिए अधारो द्वारा बार वार्षिक सत्र का उपदेश कर दिया। इरानी तत्व समर्थन, तब तक ज्ञान, समर्थन, मध्यमान उतमाराम, क्या अधिकारी, नाम, अजा रूपापवादाभबारह, मार्च, कम, तत्व वरिष्ट हजारोपावादक्या हुआ। पहले आत्मा के चतर्पात का वर्णन किया। 44 पाच कौन हुए। 1 तो हुआ अवस्था और दूसरा हुआ अवस्था का अभिमानी, अवस्था, जागरित, स्वप्न और सुसुकी और उनकी अभिमानी हो गए। विश्व, तैजस और प्राग और इन तीनों का जो साक्षी है, वह सूर्य कहलाया। तो वो उनकी कोठी का नहीं है। ये तो अवस्था है। और वो इन अवस्थाओं का सार। तो उस सूर्य में ही ये तीनों अवस्थाएं और तीनों अवस्थाओं की अभिमानी कर। पहले अध्यारू बताया मैंने तुरही में पहले तीनों का वर्णन किया जागर। स्थान है, जागरण है, यह सपना है, ये है। और इसमें विश्व, विश्व अभिमानी है, तेजस अभिमानी है, प्राग अभिमानी है। तो ये दल में अच्छा रूप किया और ये कह दिया कि ये सब कल्पित उसी तरह से कल्पित है जैसे रज्जु में सर्प कल्पित होता है के बाद कर दिया। बात कर, बात कर देने से केवल तुरी तुरी का बोध करा दिया और तुम काम बन गया। अब उसको और कोई जरूरत नहीं है। बस उसको तो इसी से काम बन गया कि मैं तो हूँ जागर स्वप्न। और विश्व प्राग मुझ में ही कल्पित थे। वास्तव में यह सब कुछ नहीं है। 1 मात्र इन सबका दृष्टा मैं हूँ। जैसे स्वप्न से उठने वाला कहता। 1 अद्युत हूँ, ये सपना था, ना चाहिए। यह सब खत्म है। तो इस तरह से अगर वो उत्तम अधिकारी है तो उसको इसी से तत्वज्ञान हो जाएगा। अब जो मजमा धिकारी हैं, मध्यमा धिकारी को कुछ शंका होती है, उसका समाधान करना पड़ता है। कनिस्टाअधिकारी को पर उपासना बताई जाती। अभ्यास करो। तो यह प्रक्रिया है। जैसे ईशा वासु परिषद का पहला मंच है। इशावाससमिदमसर्वम एयतकंचजगतयामजगत तेरतकतेरवंजीथा वा गधक का सिद धनम, ईशा वास्यम इदं सर्वं, इदमsर्वम नाम रूपक क्रियात्मक जगत, ईशा आवाsयmsजeटतेन ईटा इशा आवश्य आज शाद नियम। ये जो नाम रूप क्रियात्मक जगत है, यह इस ईट जो ईशन करता है, उसके द्वारा आज छादनी है। तो यहाँ ईश्वर ईश्वर का क्या है। तो नाम रूप को जो सत्ता फुर्ती प्रदान करना है, यही उसका शासन है। यह नाम रूप ये जिसकी सत्ता से 57 प्रतीत हो रहे हैं, जो इनको जान रहा है, वो इनका ईश्वर है। आत्मा यहाँ स्वामी सेवक के समान नहीं है, राजा प्रजा के समान नहीं है। यहाँ केवल यह देखना है कि नाम रूप क्रिया में जो सत्ता प्रतीत हो रही है, वो सत्ता इनकी नहीं है। यह सत्ता देखने वालों की आत्मा की है। इसमें जो ज्ञान प्रतीत हो रही है। 1 ज्ञान व्यापता सिद्ध करती है कि ज्ञान 1 ही है। गेंग की अनेकता से वो अनेक प्रतीत हो रहा है। तो सत्ता स्पूर्ति जो प्रदान कर रहा है, फिर उसको आच्छादित कर लिया जाए। इसको अच्छादित करने का अर्थ क्या है? नाम रूप का निषेध कर के जो केवल केवल चित है, उसको स्पष्ट कर दिया जाए। तो वहां भगवान शंकराचारी ने यह दुष्टां दिया है कि जैसे चंदन की लकड़ी पानी में बहुत दिनों तक गिरी रहने से उसमें कलिता काई आ गई है तो उस काई के कारण उसका जो सैट सौगंध है वो ढक गया है। अगर हम उसको रगड़ दे काई हटा दें काई, उसमें आरोपी थी, आरोपी किसके द्वारा थी? जल के संपर्क से तो उस आरोपी को हटाने से जो शहर सौगंध है, वो कर देता है। इसी तरह से यह सबका साक्षी सबका सबको सत्ता देने वाला सच्ची है। नाम रूप का बात करके यदि उसको समझ लिया, उसका साक्षात्कार हो जाए। इस आवाज से सर्व जगत्याम, जगत इतना कह देने मात्र से उत्तम अधिकारी को बोल गया। अब उसको कोई आवश्यकता किसी साल की नहीं है। क्योंकि ज्ञान को वस्तु के बोध के लिए केवल प्रमाण की आवश्यकता होती है, अन्य किसी साधन की नहीं होती है। जैसे ज्ञान हो गया, बस वस्तु वैसे निश्चित हो गए। तो नाम रूप का बात करके केवल चिदघन आनंद में है। उसके सिवा कोई दूसरी वस्तु नहीं है। ये जब हमको ज्ञात हो गया, बोध हो गया। इसका तो कोई कर्तव्य कर्तव्य नहीं रह गया। इसलिए पंचदशीकार ने कहा ज्ञान कृतयसयोगीननयवास कर्तव्य? ज्ञान रुपए मृत। जो योगी है, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है। असिचेदयदिवोअपना कर्तव्य कुछ मान रहा है तो उसने को नहीं जाना। तो वो तो हो गया लेकिन जिसको समझ में नहीं आया तो उसके लिए बताया ततकतिनबंजीथा जो तुमको बोध हुआ है, उसको तकतेनमजीथातकतेजो वो किसी का पालन नहीं करता। इसलिए कहना होगा? क्या क्या है सन्यास सर्व कर्म, सन्यास करके उसका निष्ठा का पालन करो। अभ्यास के द्वारा जो बोध हुआ है तो ये उसको बनाए रखने के लिए इमजमहोगयापरथामाने, उसको बार बार अभ्यास करके, निदहास करके और निदिझासन के लिए आपको इशना्तयकात्याग करना पड़ेगा। okasa viisनaपutशaमनुष्य की बुद्धि को मलिन है suतवtनारcनातीनi, कह कर मत इनकी 3 मलिनी ये जो 3 एशनाएंहैंइनसे बुद्धि मलिन होती है। तो मागृधकसशुदधनम तो बोले किसी के धन की इच्छा मत करो, माने ना का त्याग कर। 2 तो vitas the oकasनापuttasna का maa धन है किसका किसको आप अपना समझ रहे हो। इसलिए जो वस्तु स्थिर नहीं है, वास्तविक नहीं है, उसकी इच्छा मत करो वाली के लिए इतना हो गया। मध्यमाधिकार नाम के भी मुक्त है। ये मध्यम धिकारी नाम चतुर क्या हुआ? मध्यम और कनिष्ठों के लिए है। यह नहीं, वो तो अधिकारी नहीं है, इसका अधिकार है। और तुम्हाधिकारी का उससे कम हो गया। उसके बाद आप सन्यास लीजिये, सर्वकर्मों का, सन्यास कीजिये, वेदांतों का, समय कीजिये, वेदांतों के समन से प्रमाण गत, संसय की निवृति होगी और मनन से प्रवेगतसंसयकी निवृति होगी। इस से बेपरिया की निवृति होगी। जब संसय बेपरिया प्रतिबंधक है, ज्ञान के ये प्रतिबंधक जब दूर हो जाएंगे तो आपको ज्ञान जो बताया गया है, वह ठीक ठीक काम करेगा। प्रतिबंधक रहने से वस्तु यद्यपि समर्थ होती है, तब भी वो काम नहीं करती। जैसे अग्नि के साथ, अग्नि के साथ संबंधो, घास, घास या काश, अग्नि के साथ संबद्ध है तो अगनी उसको जलाती है। लेकिन वहाँ अगर चंद्रकांत मणि रख दी जाए तो वह प्रतिबंधक हो जाती है। तो वो प्रतिबंधक उसको बोझ नहीं होने देता। इसी तरह से ज्ञान के भी 3 प्रतिबंध है। 1 भूत प्रतिबंध है, 1 वर्तमान प्रबंध है और तीसरा भावी प्रतिबंध है। ये 3 प्रकार के प्रतिबंध होते हैं। बहुत प्रतिबंध क्यों हैं। आपका पहले से कहीं राग रहा? वो राग जो है, ठीक ठीक ज्ञान नहीं होने देता। तो 1 व्यक्ति किसी महात्मा के यहाँ गया और कहा हमको ज्ञान का उपदेश दीजिये। हां तो उन्होंने उसको ज्ञान का उपदेश दिया। लेकिन उसकी समझ में न आया तो उन्होंने पूछा भाई यह बताओ तुमको किसी से प्रेम है? कहानी इस समय है तो किसी से नहीं। का पहले कभी किसी से प्रेम था? बोले हां महाराज, हमारे घर में 1 भैंस थी, उससे हमारा बहुत प्रेम था। तो ऐसा बोले अच्छा तुम भैंस का ध्यान करो। अब भैंस का ध्यान करो। गुफा का बस वहीं उसकी शहजान भोजन की व्यवस्था कर दी। कुपईमें निकालने की जरूरत नहीं है बस यहीं रहो और भैंस का ध्यान करो। तुम भैंस का ध्यान करते करते इतना तन्मय हो गया कि वो स्वयं को भैंस समझने लगा। तो गुरु गुरु जी ने 1 दिन उसको पुकारा अरे बेटा मर आओ गुरूजी गुफा के द्वार में सिंह आ रहे हो। अब ये धयान करो भैस मर गई, कहा महाराज मर गई, आप को मर गई, दिख रही है बोले इसमें 5 तत्व पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि पृथ्वी पृथ्वी में समा गई, जल में चला गया, अगनी अगनी में चली गई, वायु वायु में मिल गई, आकाश आकाश में मिल गया। अब भैंस कहाँ रही कुछ नहीं, अब आ जाओ बेटा और उसके बाद बाहर निकाल के उसको तत्व का उपदेश किया, उसको समझ में आ ा। तो ये भूत प्रतिबंध की निवृति हो गया। वर्तमान प्रतिबंध क्या है, प्रज्ञा माध्यम है। 3 प्रतिबंध वर्तमान में होता है, प्रज्ञा मांध्यम बुद्धि की कमी समझ में नहीं आता और विपरीय बहुत दिनों से जो विपरीत धारणा बनी हुई है, बोले निकल रही है, बार बार वही हो जाती है। तो बेपरिया के कारण साफसाफ बात बता देने पर भी समझ में नहीं आता। 1 राजा था उस राजा का, 1 मंत्री था जिसका नाम था बरखू, वरसू बड़ा बुद्धिमान था और राजा को बहुत प्रिय था तो और मंत्रियो से जलते थे। तो 1 बार उन लोगों ने षडयंत्र रचा कि राज्य की सीमा पर विद्रोह खड़ा कर दिया। तो उस विद्रोह को शांत करने के लिए राजा ने सेना भेजी लेकिन विद्रोह शांत नहीं हुआ। तो मंत्रियों ने कहा कि महाराज भरचा जाएगा, तभी विद्रोह शांत होगा, यह बुद्धिमान है, यही कर सकता है। तो राजा ने भर्चू को भेज दिया, वो गया और इन लोगों ने राजा से कहा कि महाराज बहुत दुख की बात है कि भर्चूविद्रोहियों के द्वारा मारा गया राजा को बड़ा कष्ट हुआ? हमारा इतना बुद्धिमान मंत्री मारा गया। शोक मनाया उसके पास 4 और लोगों ने यह कहना शुरू किया कि वर्चू मरकर प्रेरित हो गया है और तरह तरह का हाँ कहानियाँ, कोई कहता हमको मिला था, कोई कहता हमको मिला था, हम से बोल रहा है। यह कहा था तो राजा से। मंदियों ने कहा कि महाराज बर्चूप्रेत हो गया है और आपको उससे ज्यादा प्रेम था, हो सकता है कि आप को बना आ जाए, आप उससे सावधान रहिए। तो राजा ने पहरेदार लगा दिया, सावधान बर्चू प्रेस यदि आए तो हमारे पास मत आने देना। अब क्या हुआ कि वर्चू बेचारा बिदरो दबा के आया राजा के पास खबर देना चाहता था कि हमने बिदरो को समाप्त कर दिया लेकिन पहरेदार रोक दिया। अब उसको बेचारे को आने न दे घर में गया, घर वालों ने भी भगाया तुम हो गए हो, तुम यहाँ क्यों आये? अब बेचारा भट के कोई बिठाने को तैयार न। तो उसने सोचा की राजा से अब मिल के हम बताएं की भाई हम जिंदा हैं। तो 1 मकान की छत पर चढ़ गया और राजा हाथी में बैठ के शिकार खेलने जा रहा था तो हाथी जैसे उस मकान के सामने आया और वर्चू उठा जो भरचोदेखआदीराजा हाथी भाग गया उसने अब बेचारा क्या करता संसार से बराग हो गया बैराग होके जंगल चला गया वहाँ कुटी बनाकर कंजमूरफलखाते हुए तपस्या करने लगा दाढ़ी मुझ बढ़ गई रूप ही बदल गया। 1 दिन राजा शिकार खेलते खेलते भटककर वहां पहुंचा जहां भरूकी कुटी थी। तो वो कुटी में आया भूखा प्यासा तो उसने उसका स्वागत किया बैठाना कुछ कंदमूल भरकर के पानी पिलाया फिर रात हो गई थी आप रात को विश्राम कीजिए। अब विश्राम होने के बाद थोड़ा सत्संग होने लगा, चर्चा होने लगी क्या हो रहा है आपके राज्य में? क्या हो रहा है? तो होते होते उन्होंने कहा। वर्चू ने कहा कि राजन राज्य में अनेक और षडयंत्र हुआ करते है कभी भी ऐसा होता है कि जीवित व्यक्ति को मृत घोषित कर देते हैं और ये भी कह देते हैं कि वो प्रेत हो गया है। तो बिचारा कहा जाए। तो इस तरह से बहुत लोग किया करते हैं राजा को उनसे सावधान रहना चाहिए कहा महाराज तो आपने ठीक बताया हमारा भी 1 मंत्री था और उसके बारे में लोगों ने कह दिया की बुरकपरेतहोगयातो हम तो अब समझते न जाने कहाँ गया होगा, वो मृत है है कहा कि राजन हो अरे ऐसा है का बताएं आप मृत नहीं थे, आपको दिया था इसलिए हम यहाँ आ के अपना बन में भजन कर रहे हैं। राजा का हुआ इसी तरह से भेद बाजी बहुत से लोग कहते हैं अरे हाँ तुम बात में वेदांतियों के चक्कर में पड़े हो, ईश्वर में बड़ा अंतर है जी ये सब भ्रम है, ये सब वेदांती हैं, भ्रमित कर रहे हैं। तुम्हारी भक्ति नष्ट हो जाएगी, तुम्हारा संसार बिगड़ जाएगा। इनसे दूर रहो तो वो सुनते सुनते ही ईश्वर का ही हो सकता है। ईश्वर सारी सृष्टी बनाता। तुम की बना के बताओ तुम मक्खी भी नहीं बना सकते। इस का दावा करते हो तो ये वन में बेपरिया बैठा हुआ है। तो वो बेपरिया नहीं निकलता 1 मुसलमान था उसको लोगों ने हिंदू बनाया और उससे कहा भाई अब तुम हिंदू हो गए हो राम राम राम राम राम राम कहो अब वो राम राम राम राम कहते कहते खुदा खुदा कहने लगा तो लोगों ने उसको डांटा कि नालायक राम राम कहना चाहिए, खुदा खुदा क्यों कहता है हुजूर 50 साल का खुदा घुसा हुआ है, वो जल्दी नहीं करता है। तो बहुत से अभ्यास हम लोगों का हो गया है। शरीर को आत्मा समझ लेगा तो बार बार शरीर में आगवुद्धिहो जाती है। तो इसके लिए विपर्य दूर करने के लिए यह भी आवश्यक है कि अभ्यास हो जाए और दुराबराददुराग्रह बेपरिया। दुराग्रह। 2 कुछ लोग ऐसे होते है कि जो मन में सोच लेते हैं वो सोचते हैं कि बस यही चीज तो विपर्य में दुराग्रह हो जाता है। कुतर्क सिटी के विरुद्ध, तर्क करना, ये कुतर्क है। तो प्रज्ञा, मां, कुतर्क और विपरियादौराग्रह। ये वर्तमान प्रतिबद्ध है। वो तो पहले छूट चुका है, कतर, तीसरा भावी प्रतिबंध है। मन कुछ ऐसे कर्म होते हैं। या किसी का साफ होता है कि तुम्हारे अनेक जन्म होंगे तो उसके कारण उसको जन्म लेना पड़ता है। जैसे कि जल भारत। इनको जन्म होना था, भारी प्रतिबंध था, इसलिए ज्ञान नहीं हुआ। तो इन प्रतिबंधों की निवृति के बाद ही ठीक ठीक बोध होता है। तो उत्तमाधिकारी में प्रतिबंध नहीं है। इसलिए केवल महावाक्य का उपदेश कर दिया जाए। तब तुम सी और उसका ठीक ठीक बोध करा दिया जाए। उससे उसका काम बन जाता है। लकी समाज कर्तव्य था। तत्व दृष्टि हँसी देत। अगर समाज करनी चाहिए। तुमको ऐसा कोई उपदेश्य करता है, कर्तव्य है। तुम्हारा समाज। तो तत्वदृष्टि हँसता है। अरे समाजी विक्षेप मन के है। मुझे आत्मा में न समाज है, न विक्षेप है। मेरे लिए कुछ कर्तव्य नहीं है। वो समझता है। तो जो मध्यमा धिकारी है, उसको अब साधन बताना है। तो साधन बताने के लिए ओमकार जो विधान है, उसके 3 मात्रा बताई जाती है। तो अकार, उकार मकार। तो यहाँ ये बताया जागरकता। आकारा, अकारा, मात्रा, आपके, आज, मतवादवाआपनोंकी, हवा, सर्वान, कामान आदि भोज्य इस बात को भारकर ने बताया कि विधेयक प्रधान ओमकार व्याख्या था। यहाँ सोय महात्मा, स्वयं महात्मा अध्यक्ष, अक्षर विधान प्रधानी, मान अध्यक्ष रम किपनसक्षरमओमकारा, सोय मोम कारा वो ओमकार क्या है? परसा उसका विभाग कर दिया जाए। तो अजमा मात्रा को लेकर चीन हो जाता है। तो वो ओमकार की मात्रा कौनसी है? अकार उकार मकार अब विशेष नियम करिये। विशेष नियम क्या है? आकार क्या है? आकार का विजय क्या है? उकार का विजय क्या है? मकार का विधेय क्या है? वो बता रहे है। तो विश्व विश्व कार्यों। 1 साजिश तुम ये बताया कि विश्व रकार इन दोनों का एकत्व यह आरोपित करना है। तो कहते हैं कि सादृश्य सचि आरोपी। तो सक्षम साजिश होने के कारण साजिश होने पर ही रूप बनता है। अन्यत स् तस्मिन, रूप सं, अन्यत स्चिव तस्मिन, अरूप संरचना तथा जक तथा रूप। प्रयोजन कहते हैं कि अन्य सत्य आरोप क्या होता है? आरोप किसी वस्तु में किसी अन्य वस्तु का आरोप होता है। हाँ यह कहना है कि रज्जु में सर्प का आरोप होता है। तो कहीं अन्य सर्प हैं? तभी आरोप वहाँ होगा जिसने सर्प देखा ही नहीं। तो सर्प देख न देखने के कारण सर्प का साजिश देखेगा। रस्सी में सांप को उसने देखा कि तेरा मेरा होता है। तो रस्सी को टेडी मोड़ी रास्ते में देख कर सामान्य रूप से उसको देखा, विशेष रूप से देख नहीं पाया। तो उसको गर्म हो गया की ये तो साफ है। तो यह सादृश्य जो सर्प का है व सर्व को देखने वाला कोई होगा। इसलिए आरोप के लिए पहले सर्प का ज्ञान होना चाहिए। उसी का नाम है साजिश। कहते हैं अन्य सचिव अन्य है। तस्वीर नारू। तो साजिश क्या है? आकार में और जल खान में दिल, सामान्य, आपके, आपके, व्याप्त, कार्य, आप, कर व्याप्त है। अकारण, सर्वा भाग व्याप्त था, आकार जो है, उसमें सही समस्त वाणी व्याप्त व्याप्त है, आपके है। आकार में सब वाणी व्याप्त है। क्या मतलब है। अब हम लोग जो बोलते हैं इसी आग को जरा जीव से बोले तो आ हो जाएगा। इसी को दूसरे स्थान से बोलो तो ई हो जाएगा और जीता से बोले हो जाएगा। इसी तरह से कंठ से आकार बोलेंगे तो का हो जाएगा और वीरता से बोले का हो जाएगा। तो आकार ही अनेक बाणों के रूप में परिणत हो जाता है। और बिना आकार के किसी का उच्चारण हो नहीं सकता। स्वर्ग तो वही है और जो व्यंजन हैं उनमें भी आकार जब तक न रहेगा तब तक उनका उच्चारण ही हो पाएगा। तो वो समय व्याप्त है। तो इसी तरह से विश्व भी समय व्याप्त है। अकारो आपके शर्मा ाग व्याप्त है। अकारो शर्मा और सूची भी कहते है। आकार ही समस्त वाणी तथा बईश्वरेजगतबश्वर के द्वारा जगत ब्राप्तसहवावतस बशर जो बहश्वरात्माहै कहते हैं सुचेजामusutेजा वो उसकी मुर्दा से यह बताया कि वह श्नरब्राप्तहअभिदाना अभिदान चाचा। अभिधान राधे का। 1 हम भूल चुके हैं। आज आज का आदी है जिसका उसको कहते हैं। आजमान तो आज पद आकार है। इसलिए भी वो प्रथम पाद है तथा वईसवनरसमारवईसन मुर्दा है। इसलिए ही सामान्य से अकारात्मक वईस्वनरस्यहै तरीक। इस 1 को जानने वाले का, फल बताया, आप मोती वही सर्वान का, मान आदि परसम्चभवतीमहातान यहाँ पर उपासना बता दी। आकार को विश्वानर से अभिन्न मान कर जो उपासना करता है। मैंने 10 मिनट तक बुद्धि हो गई। मैंने आकार में वैश्वानर बुद्धि करने वाला। जैसे आकार प्रथम है वैसे वह पुरुषों में वो प्रथम हो जाता है। प्रथम का शब्दों का शब्दों में प्रथम आकार है। तो आकार को शान रूप से कोई उपास न करेगा तो उसकी कीमत बढ़ जाएगी। आकार की करेगा दोनों की एकता उपासना होता है। जैसे सारे ग्राम में हम बृठणुबुद्धि करते हैं, है। इसी तरह से आकार में बैसानबुद्धि हा कर में आज ही आकार इसी तरह से आकार को रूप से समझता है। मैंने यहाँ पर उपासना ये अलग बात है, ज्ञान का विषय नहीं है। यह बता दिया कि इसके फल छूती। इसको अगर आप मानेंगे उपासना करेंगे तो सबसे पहले आपकी गणना हो जाएगी। जहां महा पुरुष बैठेंगे वहाँ आपको प्रथम स्थान मिल जाएगा। इसका मतलब यह है कि तात्पारी उसका यह है कि आकार को वैसा करके साथ साथ इसको देखो। तापरी चलिए आगे तू कभी बनेगा। जी पूरा पढ लो। जी स्वपना का वितीय मात्रा उत्करात व उत् ज्ञान संत समान भवति ना कुले भवति। अब यहाँ पर हो गया। स्वपना स्थान, स्वपना स्थान, स्वपना स्थान जो तेज है वो ओमकार है। वो ओमकार की जो करतिया ये कार है किन सामान्य कहते है कि उकार में, उस में उत्कर्ष से समझ आता है कार उत्कृष्ट उकारा आकार से उतकृष्ट के समान है। उकार तथा तेजस विश्वास उस विश्व से है, दूसरा है। इसलिए अकरम अकार मध्यस्त आकार और मकार के बीच में होने के कारण ये में इसलिए ओकार जो है विश्व के मध्य में है तेजस, इसलिए ओकारी दोनों के बीच में है। इसलिए ओकार और तेज अब बुखार को तेज 1 समझने का फल विद्वत फल भले कि ज्ञान की संतति उत्कर्षजी, ज्ञान परंपरा का उत्कर्ष उस हो जाएगा। अर्थात विज्ञान संतति उसकी बढ़ेगी समाना तुल्य मित बक्ष पक्ष में भी समान होगा, उसका करने वाला है। और ये बताया अब ब्रह्मविद स्कुली नबी। इसके कुल में कोई अब ब्रह्मविद ब्रह्म विदा न हो, ऐसा नहीं है, ये उसका फल है। यह या का कल, बोकारो और सदृश नहीं, नहीं, ये सब समझाने के लिए है। वस्तु आकार को, वैश्वानर बस्न को अकार के दार मिलाया मैंने आकार और वैश्वानर 1 ही समझ लो। क्या उत्कर्ष मतलब यह है कि अकार के पश्चात ही आता है। स्पष्ट है आनंद में बाद में आएगा, वो बाद में आएगा। पहले हमने सीजर बताया 1 और समझ लो। 1 छुट्टी और मकार कुतिया मात्रा मिटटी व मनोज व मुरगुन हवा इधर गुम सर्वम अपषिष्ट भवती बताया स्थान प्राग समाकर मात्र माता प्राग है। वो मकार है। ओंकार की तृतिया माता किन सामान्य या सामान्य मान मे प्राग है। विश्व प्राग के द्वारा मानो मापे जाते हैं। निगम अभ्याम, प्रि और उत्पति प्रवेश और निर्गम के द्वारा पराग को मापता है। सूर्य कुल इससे नापते भाई, तो उसमें जब डाल दिया। घर निकाला जता है। इसी तरह से सुषुप्ति में सुषुप्ति में से जागरित हो ता है। कभी स्वप्न नजर आ जाता है। यह सपने से सुषुप्ति में जाता है। तो प्रवेश और निर्गम। तो जैसे किसी माप के द्वारा, पाई के द्वारा, कुडों के द्वारा। यह को हम पैलेस में प्रवेश कराते हैं और निकालते हैं। इसी तरह सुषुप्ति में विश्व और तेज हो जाते हैं। पर निकालते हैं। इसलिए मकान जो है तीसरा प्रा पाल है। तो कहते हैं तथा ओंकार समाप्त पूर्ण प्रयोग आकारों, आकारों में ओंकार की समाप्ति के बाद पुन प्रयोग करने पर आकार, आकार जैसे उत्पन्न होते है। अपीतराअपअपीतपअपया हमारा मिलन होना 1 भाव भाव भाव खा ओंकार का उच्चारण करने पर। अंत में, अक्सर में जब कहते हैं तो आकार का है 1 भूत हो जाता है। तथा विश्व तेजस सुशुप्त काल में प्राग में 1 भूत हो जाते है। अत वह सामान्य प्राग कार्यो। इसलिए पराग, पराग और मकार में एकत्व है। विद्वत पर माह मनूतवामनूतीहवा शर्म जगत याथात्ममजानाति को समझ लेता है। अभी इस का जगत कारणात्मक भवती अभितिबरनेजगत का कारणात्मक हो जाता है। अब प्रधान साधन प्रधान साधन की स्थिति के लिए है। वास्तव में इसका कोई राय नहीं है। badam satna pura ओम शांति शांति शांति।
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