Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Pravachan 18

This chunk is a partial transcript of a pravachan by Jagadguru Swami Swaroopanand Sarasvatiji (Chaturmas 2012). The speaker interleaves Sanskrit mantras and bhajans with expository remarks about mahātman (great-souled persons), the nature of karma and expiation, and the path of bhakti (devotion) exemplified by episodes from Krishna’s lila (e.g., Yudhiṣṭhira/Bhīma’s concern for expiation, Pūtanā, Vraja/gokula devotion). The talk emphasizes surrendering actions to the Lord (Gītā’s teaching), the superiority of divine beauty and compassion, and the transformative power of devotion.
Chapters
कारणपूर्णद्दुरेप वरिकरित कभुलोध्दान दामा भिरामं घुणिष गुणिषताम्या लालितं नित्यमंके सजन भरणशीलं शीले विख्णराजं यून्तप्रविष्यममभाचमिमां प्रसुत्तां सन्जीवयत्यकिलिषक्तिधरस्तदानान्यात्यहत्यचर्णच्छवणत्तवाधि प्रानान्नमाहवते पुल्शायतुभ्यम् तज्ञिविम व्यन्धाम सारत सत्मपासमे यत्प्रसादात् परियंसे मोहांद कम सच्छताः।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। śrī rāma jai rāma jai jai rāma Ḥiram deram dedera śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma धर्म की अधर्म का प्राणियों में विश्व का गो माता की गो हत्या हर हर महान सुमवस्तित सजनों देवियों बगवाईन श्री कृषणे श्रीमन भगवद घीता में महात्माओं के सभाव का बर्णन किया है। महात्मरानस्तुमां पार्थ देवीं प्रकृति माच्रिता भजन्त्यन्यमनसो यात्वा भूता जिमव्वयं इसका आर्थ है महात्मानः जो महात्मा है महात्मा इस सब्द की विपत्ति है महान आत्मा अन्तः कर्णम् यस् समाहात्मा जिसका अन्तः कर्णम् महान है वो महात्मा है। आयां निजः परोवेति गणना लहु चेत साम। पुदार चरितानान्तू वसुधाईव खुणुबगम। यह अपना है, यह पराया है। यह लहु चेत साम गणना है। जिनका चित चोटा है। यह हमारा, यह उस पराया है। उदार चरितानान्तु। जो उदार चरित हैं। उनके लिए तो बदुधईव कृटुम्पतं। सारी प्रछुवी उनका कृटुम्प है। सबक्ह कन्यान। सबके प्रिये। सबके हितकारी। जुक्र सुक्र सरिष। प्रशंशादारी। सब सब के प्रिय होते हैं सब के हित्कारी होते हैं दुख सुप में समार रहते हैं और निन्दा अयत्ति में भी समार रहते हैं तो ऐसे लोग भगवान कहते हैं वे मेरा भजन करते हैं भजन ते नन्नमनसः अनन्य मन होकर मेरा भजन करते हैं। क्या बात है। बुरे घ्यात्वा भूतादी मग्यम्। यहाँ यह बात समझने की। कि समक्त प्राणियों के कारण सबके पिता सबकी माता भूतादी और ये भी समझ लेगे कि जो आजी में भी है और अन्त में भी है जो आजी में भी होता है अन्त में भी होता है वो है मध में भी होता है तो जो सिष्टी के प्रारम में भी थे और सिष्टी का जब अन्त हो जाएगा तब भी रहेंगे और जो अभी सुष्टी दिख रही है, इसमें भी है। ज्यात्वा भूता जिमव्वेहम्। अव्वेह है भगवान। अभी स्वामी अमृतारण जी बता रहे थे कि भगवान अमोग लील हैं। अतात उनकी लीला अव्वेर्थ है। सार्थक है। उनके संकर्प वेर्थ नहीं जाते सरवग्यों और सर्वशक्तिमान हैं और वे ही जगत की उत्पत्ती करते हैं पारण करते हैं और जब इच्छा होती है अपने में समेट लेते हैं जैसे मकडी अपने मुह से जाला निकालती है ताना बाना बुनती है उसमें गूनती है, खेरती है और जब इक्षा होती है अपने मुह में समेट लेती है ऐसे ही भगवान सब को खा जाते हैं अत्तात्राचरग्रहनात् वो अत्ता है खाने वाले जीव जो है चोटा आता है और इशर बड़ा आता है वही हम कथा सुनाया करते हैं कि महाराज जिजिथिर के मन में महाभारत रद्ध के पस्चात इस बात को रेकर पस्चात ताप हुआ कि हमने अपने स्वजनों को मारा स्वजन वद का बड़ा भारी दोष हमको लग देया हैं इसका हमको प्रायश्चित करना चाहते हैं यह नियम है यदि अपने से कोई गर्बर काम हो जाये पाप हो जाये तो उसका परिमारजन कुछ लोग ये समझते हैं कि पुर्ण करने से पाप का नास हो जाएगा पुर्ण करने से पुर्ण बनेगा अच्छे कर्म करने से पुर्ण बनेगा और बुरे कर्म करने से पाप बनेगा और दोनों गाय के सीजे से चड़ेगे पाप भी रहेगा पुर्ण भी रहेगा इसलिए अगर आपको पुर्ण का पाप का नाश करना है तो यदि आपसे मनता भ तो जीवन काले में उसका प्राईशित कर लीजे। मरने के बाद फिर आउसर नहीं मिलेगा। कहते हैं जब प्राणी पापी नरग में जाता है और रोता है तो यमदूद कहते हैं प्रतम वही काये न कीने वो सासु अव कत रोबत बड़े बड़े आंसु। अरे जब तु मनुष था तब तुने क्यों नहीं इसका उपाय कर लिया रे? अब यहां आ गया यह भोग भूमी है यहां कर्म भूमी नहीं है कर्म भूमी तो मनुष चलीर था अव कत रोबत बड़े बड़े आंसु। अब रोने से क् तो जो धार्मिक लोग होते हैं वो लोग ये विचार करते हैं कि हमसे कोई अंशित कारी न हो जाये डरते रहो ये जिन्दगी वेकार न हो जाये सपने में कहीं जीव का अपकार न हो जाये विचार करते हैं और अगर उनको लगता है कि हमसे कुछ अंचित हो गया तो उसका समय रहते प्रायचित कर लेते तो राजा इदिश्टिन ने सोचा की इस स्वजनबध का प्रायचित कर लेना चाहिए तो क्या करें तो उस समय अश्चमेज यग्य सबसे बड़ा प्राईशित माना जाता था राजाओं के लिए आजकर का जो अस्वमेद हैं वो नकली हैं ये लोग तो कराते हैं न ये नकली लोग हैं इनका तो तांगे का घोड़ा भी नहीं है इनके पास क्या अस्वमेद यग करेंगे अस्वमेद यग में जो यज्मान है अपनी पत्नी के साथ एक वर्ष तक असिधारा वरत लेता है एक शैया में सोते हैं और बीच में नंगी तरवार लेके सोते हैं असिधारा वरत और घोड़ा निकलता है उसके पीछे सेना चलती है पूरे भुमन्डल में गोड़ा भूमता है और उसको लिखा रहता है कि या तो हमाली अधिनता स्विकार करके कर दो या फिर यद करो तो जब सारे विश्व से गोड़ा गूम के आ जाता है तब अश्वमेदिया की पूरा हुँता है इसलिए कर्योग में उसको रोग दिया गया है। ना कोई ऐसा राजा है जिसका अखिर भुमन्डल में सामराज जो हो। और ना ऐसी किसी में शक्ती है कि घोड़ा छोड़ जे और कोई पकड़े नहीं। इसलिए यहां नहीं, उस समय की बात है। युधिर्थिर की भी ताकत न कि वो गोड़ा चोड़ के वापस बढ़ा रहे थे। उनकी ताकत, उनकी शक्ती भगवान श्री किष्ण थे। इसलिए उन्होंने अपने भाई भीम सेन को द्वार का भेजा जाओ भगवान श्री किष्ण को बला कर रहा। वे आएंगे तो यग्यों होगा। तो भीम सेन गए भगवान श्री किर्ण को बलाने के लिए द्वार का वहां पहुंचे उस समय का वर्णन आता है जेमिनी अस्मेद पर्व की माता यशोदा ब्रजस्यों में चली गई थी और विविक प्रकार के बेजन भगवान श्री किर्ण को बना कर परुष रही थी बगवान आरुग रही थे इतने में क्या हुआ कि भीम सहर पहुँच गये उन्होंने खबर भेजी हरस्तिनापर से भीम सहर आप से मिलने आये हैं उन्होंने मिलना चाहेते हैं बगवान मुस्कराये बोले कहे तो भोजन कर रहे हैं भोजन के बाद मिलें भीम ने जो भूजन का नाम सुना तो पेड़ की आग परजुरित हो गए और पहरे दारों को धक्का देते हुए पहुंच गए चौकिर में कि जब भूजनी हो जाएगा तो रेख आ जाएगा भगवान बले हम जानते थे कि तुम रुक नहीं पाओगे दोनों हो मामा पूफा क भगवान श्रीकेशन से प्रेम करते थे और भगवान भी करते थे तो हुआ ये कि दोनों भाईयों ने मिल कर भुजन किया बर पेट भुजन कराया भगवान ने भीम सेन को उसके बाद थोड़ा विश्राव दोनों ने किया फिर भगवान ने पुछा कि कहिए भीम आप कैसे प बोले महराज युदिश्ठिर, हस्तनापुर के स्वामी अस्मेज यग करना चाहेते हैं और उस यग के द्वारा आपकी पूजा करना चाहेते हैं पर बिना आपकी सहायता के वो नहीं हो पाएगा न तो बोले भवान बोले क्यों करना चाहेते हैं तो उन्होंने कहा इसलिए करना चाहते हैं कि सोजनों के मारने से गुरुवों को मारने से अपने पूर्वजों को पितामों को मारने से अपने रिष्टेदारों को मारने से उनको पाप हो गया है वो पाप से डर गये है इसलिए प्रायस्थित करना चाहिते हैं। तो भगवान बोले कि भीम से क्या बात करते हो। तुम मूर्ख हो। अरे जब हमने गीता में सब कुछ कह दिया है तो फिर क्या काम कर रहे हैं। बीम से ने पूछा कि महराज आपने हमको मूर्ख क्यों कहा? मूर्ख कहने का अभिप्राय क्या है आपका? कोईलें मूर्खता के दो लक्षन हैं तुम में एक लक्षन तो यह है कि तुम खाते बहुत हैं जिसकी खुरांग जादा होती है अकल भी मोटी होती एक तरब चारो पहन रहो। द्रोबदी और कुन्ती। और एक तरब अकेला भी हो। और दूसरे तुम कुयोनी गामी हो। तुम होतो मनुश हैं। लेकिन तुमने विवाय किया हीलीमबा से। जो राक्षती हैं। तो भीम सेन ने कहा महराज। यदि यही लक्षन मूर्ता के हैं तो वो लक्षन तो सुरीमान के भी है। भगवान बोले हमारे कैसे लक्षन है। बोले हम तो भूजन करते हैं। और आप। पत्तं पुष्पं फलं तोयं यूमें भक्त्या प्रेच्छती तदहं भक्तु पेतं अस्नामे प्रेतात्मणः। प्रत्पात्मणः। हम तो महराज फल खा सकते हैं। तुम तो पत्ता भी खा लेते हैं। फूल भी खा लेते हैं। पत्रं, पुष्पं, भरं, सोयं। जो आपको प्रेम से नमर्पित कर दे आप उसको खा लेते हैं। क्या भाई फल, फूले ही त पुरे हम तो खाते हैं ये रोग जानता है और आप खाते हो इसको सात्र जानता है वेद जानता है यस्य ब्रह्मचा क्षत्रंचा उमे भवत ओधना ओधना बृत्तुर्यस्यो पसेचलव कैत्था वेद यत्यसा ब्रामण और क्षत्रिय से उपलक्षित चराचर प्रपंच जिनका भात है उद भात को मोत की दान से रपेट के आप खा जाते हों माराज अत्ता चराचर ग्रहनार आपके समान खाने वाला कौन होगा अच्छा ठीक है हम कुई उनी गामी तो नहीं हैं। जा महराज हैं। चला अपनी तरह भी देखो। हमारी तो राक्षसी हैं जो बनुष्यी बन जाती हैं। तुमारी जामवान की रड़की जो भरलूकी हैं। जामवती वो कौन हैं। तो हम और आप दोनों हैं। इसलिए हमारे उपर आप दोस यस्तो भयो समो दोशा परिहारस्य तादिशा तत्य कुन परियोन्युक्तव्या तादिगर्त्य विचारने। जो दोनों के दोश का समान हो और उसका परिहार भी समान हो तो एक को उसके लिए दोशी नहीं बनाये जा रहता। बोले फिर भी तुम मूर्ख हो। बोले अब बता वोले बात ये है कि जब हमने भगवद गीता में पहली से अर्जुन को कह रखा है यत करोशी यत शनासी यत जुहूशी ददास यत यत तबस्त सिगौंत हेल तत कुर्ष्रम अधरपणम ए अर्जुन जो तु करता है यत करोशी यत शनासी जो तु खाता है, जो हवन करता है, जो दान करता है, वो सब मुझको अरपित कर दे, तो क्या होगा इससे? सुभासोऽफलईरेवं, मोक्ष से कर्मबंधनै, सन्यासेयोगयुक्तात्मा, विमुक्तोमामुपहिष्यसी, कर्म का बंदन क्या है? कर्म का बंदन यह है यदि आपने सात्र भीत कर्म किये हैं यदि आपने धर्म किया है तो सुभफल मिलेगा और यदि आपने अधर्म किया है असुफल मिलेगा, फल जरूर मिलेगा कर्म कवी निष्पर नहीं जाता सुभा सुफरेरेवं मोक्ष कर्मवन्धने तो तु अपने कर्म मुझको समर्पित कर दो तो आप लोगों ने जो पाप किया है महाभारत में वो आप मुझको समर्पित कर दो पाप से मक्त हो जाओंगे भीम सेन ने कहा की भगवन नेरा मूर्ख मस समझिये जो वस्तु आपको समर्पित होती है वो अनन्त गुणी होकर समर्पन करने वाले की तरब लोट के आती है अधि हम पाप का समर्पन करेंगे तो अनन्त गणतों के पाप लोट के आएगा है इसलिए हम तो पुर्ण करेंगे धर्म करेंगे और वो धर्म आपके चर्णों में अर्पित करेंगे। तो कहने का मत्रव यह है कि मनुष्य पाप और पुर्ण यह जो दो कर्म हैं इन कर्मों के बंदन से कैसे मुक्त हो इसके सम्मन्द में उसको सोचना पड़ेगा। तो इसके लिए भगवान के तत्व को जानना आवशक है और भगवान के तत्व को जानने के लिए पहले गुरु की आवशक तो बड़ें ग्यात्वा अभूताजि मभवें भगवान को जानोगे तबना उनका भजन करोगे जाने विल्ल होई परती थी बिनु परतीति नहोई प्रीति प्रीति बिना मनाई भक्ति दिर्णाई जीवि खगेस जर की चिकनाई जीवि खगेस जर की चिकनाई आप पानी में गोता लगाएं सरी चिकना हो जाएगा लेकिन हवा लगते सुख जाएगा ऐसे बिना मना प्रीति के भक्ति दिर्ण नहीं हो � तो पहले आवश्चक है कि भगवान के स्वरूप का बोध हो, भगवान का ज्ञान हो. अभी स्वामी जी ने एक प्रस्ण उठाया था, ये कहा था कि भगवान तो अभोक्ता है, तयुर अन्य पिपरं साद्वत्ति अनच्छन अन्य अभिचाक्रिति।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� और कैत्था वेद यत्यसा जहां ये माया रहती हैं वो तो अगम है सामान रूप से इनन्त्या उसका बोध नहीं किया जा सकता उसका बोध तो आत्मरूप से ही होता है और जब आत्मरूप से हो जाता है तो फिर वो डर मिल जाता है कि सब यदि बगवान की दोरा लीन हो जाएगा हमारा शरीर भी लीन हो जाएगा तो हम भी लीन हो जाएगे अरे तुम लीन नहीं हो जाओगे जो जिसमें सब लीन होने बाला है वही तुम हो तुम से वो भिण नहीं है तो सारा संसार अगर लीन होगा तो तुम में होगा तुम्हारा किसी मले नहीं होगा। ये सबजने की बात है। तो भगवान के स्वरुप को जानने के लिए भी लोग भगवान का भजन करते हैं। इसलिए जिग्ञासूं को भी भगवान ने वक्त कोटी माना है। अब ये दिखना है। हम ये बता रहे थे कि भवान संकराचारी ने कहा अरे चित चिंचलता को चूड के मन के तराजू से तोड़ के दे एक तरब सारे विश्यों को रख और दूसी ओर भवान को रख किस में तेरा विश्राम है किस में तेरा हित है अगर तुझे लगे कि इसर संसार के भुगों में भित है तो यहां अपने मन को ले जा और अगर इसर लगे तो इधर ले जा तो हम यह बता रहे थे कि भगवान को और संसार को अगर हम सोंदली माधुली की जिस्ति से देखें तराजु से तोलें तो संसार कि किसी प्राणी में वो सौन्दर्य नहीं है जो भगवान के स्वरूप में है इसलिए भगवान शी राजवेंद्र जब बन जाते हैं तो ग्राम वासी कहते हैं अरे विधाता ने इनके भाग्य में बन गमन क्यों लिग दिया? एक कहा ये वीधी न बनाये कोई कहता है ब्रह्मा ने इनको नहीं बनाया आप ही प्रकट हो गये आप प्रकट भये वीधी न बनाये तो इनको देखके दूसरा बनाने लगा ब्रह्मा जब नहीं बना विगड़ गया तो इनको बन में भेज़ दिये जाओ। तो यिरिशा बन में आज बठाएगा। तो कहने का विपराय है कि इतना सौंदर्य संसार में और कहीं है ही नहीं। इतना भगवान के स्वरूप में है। इतना माधुर्य नहीं है। और हम ये बात कह रहे थे कि सौंदर्य यदि हमको संसार में कहीं मिल भी जाये तो वो सुभाव कहां मिलेगा? जो भगवान का सुभाव है। माराम सुभाव जिल जाना तिन्ने भजन तजी भाव नाना भगवान के सुभाव को जो जान लेता है वो उन्हीं का हो जाता है। तो भगवान के भीतर करुणा है। भगवान के मन में अपने आशितों के प्रती अनुराग है। जो उनका आश्वय ले लेता है वे उसका ना तो दोश देखते हैं और नो उसका कभी त्याग करते हैं जिसको अपना रेते हैं उसको अपना ही रेते हैं और यदि उसमें कुछ दोश आते हैं तो अन दोशों को स्वेम नट कर देते हैं भगवान को भक्त वस्थल कहते हैं भक्त वच्चल का अच्छे वच्चम लाती की वच्चला गाय का नाम है वच्चला जब उसके पेड़ से बच्चडा निकलता है तो जिल्दियों से लिप्टा रहता है जमीन में गिरता है और भी कुछ लग जाता है उसके चरीद में तो उसकी मा गाय ये नहीं कहती है कि तु नहा के साबुल लगा के आ तब तुस से प्यार करूँगी। वो चाट चाट के चाट चाट के अपने बेचे को, अपने वच्छडे को उजवर कर लेती है वो ये नहीं देखती है कि कैसे आप मरिन है, कैसा है अभी आप लोग भागवत की कथा सुन रहे हैं। भगवान धूरी धूसित रहते हैं। भगवान स्री किषन को माता ने उर्टन लगा के नेलाया है। बार में कंगी कर दी है। आँखों में काजल लगाया है। पीरी जैस्ट में जो जंग्री पेनाई है उनके कमर में टुन्टुनी बनी है पेर में पैजनिया है और बड़े चंचन है तो कोई सडक से निकलता है राह गीर उसके पीछे लग जाते हैं उसके भीशे लग जाते हैं तो तुन तुन तुन की आवाज सुनके वो जब लोट के देखता है तो बाग कड़े होते हैं और धूली से लिप्टे हुए माता की गोड़ में आके बैठ जाते हैं माता आचास से उनका मुझ पहुँच कर अपना दूर पिलाते हैं तो ही जो बात यह भगवान में हैं। चाहे वो पुरुष रूप में हो, चाहे मात्री रूप में हो। हम जगलंबा अच्छपर सुन्दरी के सम्मन में बता रहे थे। उनके सम्मन्द में सौन्दरी लहरी में भगवान शंक्रशायर ने लिखा है कि भवानित्वन्दासे मै वितर्यदिष्टिन सकरुणाम। इतिस्तोतुम् वान्चन् कते अतिभवानित्तमितिचा। तदेवत्तं तस्मई दिशसि निजसायुज्य पदवीम्। मुकुन्दब्रहमेद्रस्वुतिमुकुटनीरा जितबदाम। किसी वक्त ने भगवत्ति के बन्दिर में जाकर हाथ जोड के कहा कि हे भवानी आप मेली और करुणामयी द्रिष्टी से देदो जसादागी अस्चा दरदरितनी लोद परिरुचा दवीयान सम्जीनम् सनपय कृपया मामस सिवे सनपय कृपया मामस सिवे अनेया अनेनायं धन्यो बवद्यनज्ते हानिरियता बनेवा हर्मेवा समकरुनिपातो एमकराख मा तुम्हारे जो विशार नेत्र हैं विशार जागियस्या दर्दलिद नीरोत पल जा अर्खिले नीर कमल के समान कांची वाले तुम्हारे नेत्र हैं परम सुन्दर उन नेतों से जो अमरित न कर रहा हैं उस अमरित से मुझे एक बार इसलान करा दो मेरी ओर देख दो मैं इतने सही धन्य हो जाऊँगा आप से और कुछ मांगने की आवशक्ता मुझे नहीं है चंद्रमा जब छिटकता है पूर्णमा का चंद्रमा तो महल में भी चमकता है महल में भी उसकी किरने बढ़ती है और बन में भी बढ़ती है बन में कोई जानता नहीं महल में चमक जाता है महल तो मैं चमक जाऊँगा तुम्हारे केवल देखने मात तो वो कहता है भवानित् तुम दासे मैं वितर दिष्टिन से करुणाम मा मुझ दास में आप अपनी करुणामाई दिश्टि डालो मानो उद करुणामाई दिश्टि रुपी अमरित से मुझे एक बार इस्रान कराजो और पूरा नहीं कह पाया भवानित्तम इतना ही उसके मुख से निकला और उसके प्राणपखेरी उलगे भगवती के धिव वो मनी में जो भगवती का धाम है, मनी जीव है वहाँ पहुँँ गया और भगवती के चरण कमलों का उसको साहिर जी मिल गया भगवती की जो चरण कमल है उन में जाकर वो विलीन हो गया भगवानित्तुम कहने वाला तो भगवती अपने सिंघासन पर वेटी हैं ब्रह्म सिंघासन पर ब्रह्म विर्णु रुद्र ईश्वर जिस संगासन के चार पाये हैं सदास्यो जिन का फलक है उसके लूपर जगदंबा विराजमान है एक चरण सिंघासन पर है और एक चरण मनी के पीड़े में रखा है मनी में पीढ़ में रखा है तो हिंदर, चंदर, बरुन, यम, कुबेर बड़े बड़े देवाजी देवा आते हैं और अपने मुकुल जुकाते हैं पार पार उस पार कीत में अपना मस्तक जुका कर उठाते हैं मानो उन चर्ण कमलों की अपने मुकुल मनी से आर्थी उतार रहे हैं तो ये आर्थी उसकी हो जाती हैं जो उस चर्ण में बेटा हुआ है केवल भवानित्तम केने मात्य से उसकी इतनी महिमा बढ़ गयी। ही भवती का सौंदरी के साथ साथ जो सवभाव है, जो करुणा है, वो और कहीं नहीं मिलेगा। संसार में यह आपको नहीं मिलेगा। जो सवभाविक रूप से लोग कल्यान करते ही रहते हैं। ऐसे भगवान शी राम है, भगवान शी कृष्ण है, भगवान सदार्शियों हैं, बुरी नात हैं। ये समा प्राणी का कल्यान करते रहते हैं। तो भगवान में सुन्दरी भी है और साथ इसाथ सद्गुण भी है। कहते हैं इसलिए तो सुगदेव जी महाराज ब्रह्म का ध्यान कर रहे थे एकान्त में बैट के जंगल में ध्यान कर रहे थे ब्रह्म का ध्यान कर रहे थे ब्रह्म ज्यान प्राप्थ हो गया था उनको तो वियास जी ने दो विद्धियार्थियों को भागवत के दो श्रोप प तो वो लकडी रहने के लिए वहाँ गए। एक विद्यार्ची गया। बर्हापीडम् नटवरवपु। कर्णयोग कर्णिकारम् विव्रद्वासक् कनकगविषम् भईजेयन्तीन् चमालाम् रंद्रान्मेनो रधरतुदया। पूर्यन्गोकवृण्दई वृण्दारण्यम् सपधरमणम् प्राविषद्गीतखीर्तिः परहापीडम् मयूर्पिछका जिनोंने मुकुर्धारण कर रखा हैं अपने मस्तक में और नटवर्वपुः सेश्ट नट के समान नटवत्वर्वच्छवपुर्यत् सहा नटवर वपू नट वर वर विद्वान लोग कहते हैं कि नट जो है अभाव में भाव दिखाता है नाटक में आता है नट कहता है ओहो इस समय सीतर मंद सुदंद भवन चल रही है ये हाद विलाता है तो अपने भावों से जो वस्तु नहीं है उसको भी दिखाता है। तो ये विप्रियोगात्मक सिंगार है। और वर्व प्यत्यग्र भोपता दूला जो वदुन को प्रात करता है। तो ये संजुप्थम् प्रियोगात्मक सिंगार है। तो भगवान के स्रीविग्रह में दोनों हैं। प्यास भी है और पानी भी है। दोनों जिसमें। नटवरभपु। कर्णयोः कर्णिकारम। कानों में कर्णिकार के फूर लडग रहे हैं। ये भी सुनते हैं कर्णिकारम में एक बचन है। कर्णयोः। कभी एक काण में कनेन का गुच्छा डालते हैं कभी दूसरे काण में डालता हैं विब्बरद बासक कनक विशम और सोने के समान पीर द्वर्ण का जैसे विजली चमकती हो वैसा चमकता हुआ चमचमाता पीतांबर जिनके श्यामरि श्रीयंग में मानों जैसे काल मेग में जो आजकर मेग आते हैं ना काले काले जैसे बिज्डी चमकती हैं एसे श्रीकिर्ण के श्यामर श्रियंग में पीतांबर चमकता है विब्रद वासक कनक कपिशम बैजियंती चमालां गले में बैजियंती माला बनमाला धरन किये हैं और वेणु के रंध अपनी अधर्थ सुधा से पुरुवित कर रहे हैं। ऐसे बग्वान सपदरमणम अपने पदसे रमण करते हुए, रम बनाते हुए बृंदारण्यम प्राविशत बृंदावर में प्रवेश किये। तो वो मूर्ती सुगदेव जी के हरे में आ गई। क्यों आ गई? अगर कोई सामान सौंदरी होता तो उस ब्रह्म घ्यानी शुक्देव के हुदे को आगरिष्ट नहीं कर सकता था। लेकिन आ गई मूल्टी पर लगा कि इतना बड़ा सुन्दर सुरूभाला जिसका इतना मैभव है हम अकिन्चंग से कैसे मिलेगा हम तो जंगर में रहने वाले जिनके पास एक कोपीन भी नहीं है। कृष्ण के पास जाएं तो हमें कैसे अपनाएंगे। कुछ देने को भी तो नहीं है। क्या देके जाएं। तो उन्होंने कहा, रे तुम रहने की बात कर रहे हो। अहो वकीयम दूसरा बोलता है। अहो वकीयम् तनकाल कूटम् जिगान सयापाय यदप्रसाद्जी लेवेगतिम् दाचिरितम् ततोञ्यम् कम्वादयानुम् सरणम् प्रजेमा अहो वकीयम् ये वकी पूतना क्या लेके गई थी का दूद पिलाने गई थी अरे दूद नहीं इस तन में जहर नपेड के गई थी लेकिन जनों ने उसका इस तन पी कर उसको अपनी माता मान लिया और उसको माता की गथी दे दी ब्रह्मा जी पूछते है की भगवन इन व्रजवासियों को आप क्या दोगे आपके पास इनको देने के लिए क्या है। भगवान बोले हम इनको मोक्ष देदेगे। तो ब्रह्मा जी बोले मोक्ष तो आपने पूतना को भी देदिया। अले जनोंने अपना धाम, अपना घर, अपना सब कुछ आपके चर्णों में निशावर कर रखा है। उनको वही दोगे जो पूतना को दे दिया। जो आपने पूतना को दिया वही त्यसोदा को दिया। दे दोगे। सब्धान बाईश पशेरी। बोले भाई इस पूतना को हमने मोक्ष दिया है। और गुकुल के लोगों के कुल कुटुम को मोक्ष दे देगें। सारे कुल कु� वोले आप कहते हो कुल कुलम को वोट्स दे देंगे अरे इस पूतना के कुलम में कौन बचा इसका भाई था बकासर वो भी मुक्त हो गया अगासर था वो भी मुक्त हो गया इसके भी तो खुटम में आपने खुटम को तार दिया कहना होगा कि भक्त के आप रिनी रहेंगे आ� और भगवान अपने को करदार मानते हैं। यह विशेवता है। हन्मान जी जड़ सजीवन मूरी लिकर आये तो भगवान श्रीराम ने कहा बानर कपे तुमने हमाले साथ जो उपकार किया है तुमाले उपकार अगनित हैं। अगर एक एक उपकार के लिए हम तुम्हारे उपकार के बज़े प्राण देना चाहें तो कितनी बार प्राण देना पड़ेगा कुछ खाना नहीं है इसलिए फिर भी उपकार बच रहेंगे इसलिए हम ये चाहेते हैं कि तुम्हारे के हुए उपकारों के हम अदमर्ण रणी ह और इसले भी हमने नी बनना चाहेते हैं कि हमने विपत्ति आई हैं इसले हमको उपकार की जरुवत पड़ी तुम्हें कभी विपत्ति ना आए ना हमको उपकार करने की आवस्थक्ता पड़े और ऐसा कहकर उन्होंने हर्मान जी को अपने हर्दें से लगा जीया तो ये भगव भगवान शी कृष्ण का समभाव दिगरंबा का समभाव और सौंदरी तो है ही इसकी अतिक एक बात बदिक विश्तार में नहीं जाएंगे फिर बताएंगे वो यह है कि विश्यों के सौंदरी माधुरिय से हम आकिष्ट होते हैं तो बरावर उनमें फस्ते चले जाते हैं और � जगी भगवान के सौंदरी माधुरी में हमा कृष्ट हो जाते हैं तो और कहीं हमारा मन जाता ही नहीं है। वहाँ जाकर हमारी सारी इच्छाएं अपने भोग की समाप्त हो जाते हैं। यहां संसार में हमारा काम होता है और भगवान के प्रती हमारा प्रेम होता है। काम में और प्रेम में अंतर यह है ससुक सुकित्तुम काम अपने सुक में सुकी होना काम और अपने प्रेतं भगवान के सुक में सुकी होना प्रेम तो यह आप देखेंगे भगवान की लिला में भक्तों के चरित्त में तो आपको लगेगा कि दोनों में कितना अंतर है तो आज śrī rāma jay rāma he jay rāma कारे जरातो मन में विचारो क्या साथ लाए अरुले चलोगे जहाता सदा साथ यही पकारो गोविन्द दामो धर्मा दवेती। ए कृष्णहेया दवहे सकेती। śrī kṛṣṇa govinda hare mūrāne hē nādha nārāyaṇa vāsudevā śrī kṛṣṇa govinda hare mūrāne एनातनारा जणवासु देवा। धर्म की अधर्म का प्राणियों में विश्व का गो माता की गो हत्या हर हर महादे.
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पूज्य शंकराचार्य जी महाराज ने #अयोध्या_मामले को लेकर पहली प्रतिक्रिया दी #सुप्रीम_कोर्ट का आदेश सुनन

