Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 17

A recorded lecture by Jagadguru Swami Swaroopanand Saraswatī on the Mandukya Upanishad (mūla chaturtha pāda). The speaker examines whether words can denote Brahman, debating adhishṭhāna (substratum) and the inapplicability of jāti–guṇa–kriyā predicates to Brahman. He also explains the three empirical states—waking (jāgrit), dream (svapna) and deep sleep (suṣupti)—and the notion of turīya as the one witnessing consciousness that underlies them.
Chapters
Shani, shanti, shanti, मूल चतुर्थ पाद, क्रम प्राप्त वकतव्य इत्याह नाम तो ना आगे 3 पात का कथन हो गया। अब कम प्राप्त चतुर्थ पाद का होना चाहिए। प्रगम के द्वारा कहेंगे सर्व शब्द priti विशेष कहते है जो ली है सर्व प्रवृत्ति नि। 0 का समस्त शब्दों की प्रवृत्ति के जो निमित है उनसे 0 है। इसलिए शब्द का अभिधेय नहीं है। इस कारण विशेष का पर्व करके ही तरी का निर्देश कर करेगा करेंगे। 0 में कहीं जब सबका निषेक कर दोगे तो सुन ही नही जाएगा कर ना मिटा मिटा विकल्प है उसका कोई नियमित नहीं हो ऐसा नहीं है। नहीं सर पुरुष विकल्प शुक्तिका तानूरा क्या कल भी तुम ये बताया कि मिया विकल्प जो हैं उनका कोई होता है। जैसे सुख वृद्धि होती है और रज्जु में सर्प की वृद्धि होती है में पुरुष की परिधि होती है उस में होती है। तो ये जो विकल्प है पुरुष और का ये शुक्ति का रज्जू सानू और उना और अवश्वसहावस्तु में नहीं होता। कल्पना किसी वस्तु में होती अ वस्तु में कल्पना नहीं होती। इसलिए 0 अधिष्ठान नहीं हो सकता, दुनिया में ब्रह्म नहीं होता। ब्रह्म को अधिष्ठान कोई न कोई होना चाहिए। ये 4 ब्रह्म है रजत, सर्व पुरुष और उसर तो सर्व का जो हमको महान होता है सर्व रजत, सर्व पुरुष और उस तो का भवन नहीं करता, सुक्का में होता है। इसी प्रकार जो सर्व का भ्रम होता है रूम होगा और जो पुरुष का भ्रम होता है थानो में होगा देते है और जो हमें मुरकसेशरंखला का भ्रम होता है वो ऊसर में होगा। तो इसलिए कहीं न कहीं ब्रह्म होगा। मेरा आधार कोई ब्रह्म नहीं होता न ब्रह्म नहीं होता इसलिए 0 बनेगा। तो इस तरह से एवं प्रणाली है। तो कहते है कि जब ऐसी बात है के निर्देश ठान होता है तो जो तुरी है वो प्रणाली सर विकल्प का आस्पद है अर्थात है। इसलिए तुरीय शब्द वो शब्द बात होगा। इसलिए बताए इसलिए कराया जाए से उसका भूत कराया जाए यह आवश्यकता नहीं है। जैसे उदकधारा जो है उदर का आधार जो है वो जैसे परत के द्वारा नहीं बताया जा सकता। सीधे बता 2 आप को बता ता कहते है की प्रणाली है वो होते तो आधार होता तो उसको के द्वारा कहा जाता। बोले ये जो आप रहे है यदि यहाँ लागू नहीं होता क्योंकि प्रणाली है वह मिच्छा है। तो मिक्षा होने के कारण प्रणाली विकल्प का जो अधिष्ठान है वो नुषेरमुकभीसे बताया जा सकत। नई संसदों संबंध शब्द प्रवृत्ति निमित भाग अवस्था कहते हैं। सत और असत का जो संबंध है वो शब्द की प्रवृत्ति का निमित नहीं हो सकता क्योंकि वस्तुत वो संसद बन नहीं सकता न ही प्रमाण रूप गवा। अब इसकी टीका देख ली जाए। तो बात व्याखा व्याख्या थे गरम चतुर्पाद व्याख्या पर बोला व्याख्या था व्याख्या पूरे जैसे 3 बाद बिजी मुख से ही व्याख्या हो गए। तो चतुर्थ पाद का भी बिजी मुख से ही व्याख्यान हो जाना चाहिए। न करके सबका करके क्यों बता रहे हो? तो उसके उत्तर में कहा कि सर्व शब्द सुनता, सर्वाणी सस्ट्री, गुनगुना, स 0 होगा निर्देश संभवत, ऐसा शब्द की प्रवृत्ति है। वो जाति, गुण क्रिया, सम्बंध सृष्टि। यहाँ पर उपरक्षणहैसम्बंध में जाति या जाति गुण क्रिया? और सम्बंध इसको लेकर ही सर की प्रवृत्ति होती है। तो शब्द का जो अर्थ है वो जाति को लेकर होता है। जैसे हमको घट कहना है? तो जिसमें घट जाती है, उसको घट कहेंगे। तो घट जाती को लेकर घट का घटकु शब्द का विषय बनाया जाता है। तो यहाँ ब्रम में जाति नहीं, जाती, क्यों नहीं है? एकत्र अनेक, तत्व, जाति 1 होकर जो अनेक में रहे, वो जाती होती है। तो यहाँ ब्रह्म अनेक है। नहीं, कही है। 1 जाति होती है, वो भी नहीं, अनेकता होगा, अनेक हो और अनेक पदार्थों में कोई 1 अनुगत वस्तु हो। तब जाती बनेगी। जाती कहलाएगी? तो जाती है नहीं। अब उसके बाद क्रिया लाभ? कहाँ? 5 कहा लकड़ी काटने वाला है, भोजन बनाने वाला है। तो क्रिया के आधार पर उसको हम बताते। ऐसा जो करता है तो ब्रह्म अकरी है। तो करे होने कारण गुण, जाति, गुण, गुण और गुण कहते हैं लाल, पीला, हरा है, गुण ब्रह्म जाती भी नहीं, गुण भी नहीं, हरा पीला हम नही सकते। क्रिया लकड़ी काटने वाला है, यह भोजन बनाने वाला है। तो उसकी क्रिया को लेकर हम करे। तो वो क्रिया उसमे नहीं है। क्रिया और सम्बंध उसका कोई सम्बंध नहीं है। इसका ऐसा कोई सम्बंध नहीं है। तो उसके आधार पर हम उसको कह सकें। तो जाति गुण क्रिया? सम्बंध से रहित होने के कारण समस्त शब्दों की प्रवृत्ति का निमित नहीं है। इसलिए ब्रह्म को विधि मुख से नहीं कहा जा सकता है। तो गुणादि कौन है? मितानी कौन है ना। आपको बता दिया। कई बातचीत का योग वो बात नहीं है। इसलिए निर्देश सभी साक्षात बातचीत साक्षात बात का अभाव ज्योतित करने के लिए निर्देश करते हैं, निर्देश कर रहे है। इस शब्द से ही मालूम होता है। साक्षात नहीं बने। यदि चतुर्थ, मुख्य निर्देश, यदि से निर्देश करने योग्य नहीं है। तभी अब तो सुन ही रह गया हो। तो कहना होगा कि वो 0 चतुर्थ में है, किसका उत्तर देते हैं, कि नहीं की है? 0 नहीं है। इसके लिए अनुमान किया। अनुमान क्या है? विमतमविमतममाँने प्रणाली विकल्प था। सब अधिक थान, बना है। क्यूँ कल्पित कल्पित होने के कारण तथा वेद आदि के इस अनुमान से st, st, side, a है। son tom a a। तो कहते हैं यदि तुरी को न कहना चाहते हैं तो जब है तो है। तू भी अधिरठानवाअधिरठान होने के कारण। तो ये ये कहना होगा। तो यह है तुनियमराचम। इधिष्टानकरेंतुरियम वाचा वाणी का विषय है। अधिष्ठान जो अधिष्ठान होता है वह वाक्य होता है, अधिक वाक्य होता है। जैसे जल का आधार, घट, जल का अधिष्ठान कहलाता है? वक्त तो अधिक है। सुता वो समझ नहीं रहे हैं। अधिकार और आधार में अंतर है। आधार जो होता है वो स्वत वस्तु का होता है, इंसान है, मित्रा का होता है। अधिरसाननहींहैहा अगर जल कल्पित होता? तो घट को हम कहते हैं। वो आधार है। लेकिन वो आधार को को 1 बता कर अनुमान कर रहा है। सा एवं तरी एवम तरी पर गया। यदि प्रणाली है तो वो है। आवश्यकता, क्या, बोला? जैसे आधार है, वैसे प्राणी विकल्प का आधार आत्मा है। प्रण, प्राण विकल्प जो है, वो है। इसलिए किस तरह से है? जैसे वो नई शब्द। तो कहते हैं सत और असत का सम्बंध। अब यहाँ पर असत हो गया। सजभिन्नरजतसझभिन्न, रजत, सर, पुरुष और मलजल असत है। और सब जो है, सत है। जो सत और सब का सम्मान नहीं हो प्रवति है। हाँ, देखते हैं की कम। यहाँ पर ये जो हेतु बनाया, वो प्रात भाषिक है। प्राधिभाषिक हेतु है। यह है, बात बन नहीं सकता। अगर वो प्रभाष है। तो है न विरुद। he to a o, a कहाँ? pr yeh है। भाषिक न गया, शांत हो गया। तो इस तरह से प्रक्रम भंग हो जाएगा। उसको मानने पर प्रवृति हो गया। उसमें वो कहते हैं प्रक्रम भंग क्या है? प्रक्रम है। पहले विधि मुख से ही वर्णन करते चले आ रहे हैं। अब आप बिलों का चाक करके निशेष मुख से जो बन करने जा रहे हैं। ये प्रक्रम का बंद है। हाँ, यह है। तो उसके उत्तर में पूछा ये जो आपने अधिष्ठान तो कहा? वो प्राप्त वस्तु का अधिष्ठान है? या वस्तु का स्थान? तो ना 10 का नाजामानभाषिअगर? प्राजभाषीका तो उसका ही हो। ता है। तो कर्म का विरोध नहीं होगा। शुक्ता कल रणा प्रणाली थी? a, a, a, e, a नई पुरानी है। कहते हैं अगर कहेंगे। तो कहना पड़ेगा शब्द वृत्ति का निमित, sci, जाति, गुण, नई नई आधार, उसका सम्बन्ध तो आवाज तो रूप होने ही नहीं लगता। यह है। ठीक है। ऐसा है कि यहाँ पर ये बताया नई संसद हेतु। जब कभी वस्तु कोई होती है तब उसके साथ सम्बंध शब्द का होता है। इसी वस्तु का सब सृष्टि सृष्टि। व सम्बंध। तो शब्द और अर्थ का जो सम्बंध है, वो सस्ती है। सरदार सम्बंध वाचक सम्बन्ध। तो शब्द वाचक होगा। वस्तु वाचक बात होगी। तो अगर वो वस्तु है, तब तो उसका वाचक शब्द होगा। और जब वो वस्तु है ही नहीं, तो उसका वाचक शब्द कैसे हो सकता है? किसी को टिप्पणी में कहा है? टिप्पणी में कहते हैं कि धूम और अगनी दोनों सस्ता है। समान सत्ता वाले धूम की भी व्यवहारिक सत्ता है और बढ़ने की भी व्यवहारिक सकता है। तो उन दोनों का सम्बंध। इसी तरह से आप रज्जू और उसमें दिखने वाले सर्व का कोई सम्बंध नहीं बता सकते। यह सम्बंध आज झासी होगा। इसलिए वो शब्द की का नई प्रमाण और किसी दुसरे प्रमाण का विषय tu ne हो। a, a मानक शब्द के अतिरिक्त और किसी प्रमाण का विषय आत्मा हो नहीं सकता। क्योंकि आत्मा में कोई उपाधि नहीं। शब्द का रह गया, उसमे हो नहीं सकता। क्योंकि सामान्य शेष भाव उसमें सामान्य विशेष बनेगा नहीं। व्यक्ति विशेष होता है। और कई व्यक्तियों में जो रहता है, वो सामान्य कह जाता है। तो यहाँ पर ब्रह्म व्यक्ति है। इसलिए यहाँ जाति बनेगी नहीं। to ऐसे sthiti में कहा जी, t, i उतराद कमल से नील कमल, तो नील उसमें गुण हैं, तो नील गुण गुण होने के कारण हम उसको कमल नील कमल कर सकते हैं। कोई गुण ही न हो। to use bol rudi संध्या कोई नाम रख दिया। हाँ आरूणी तो ब्रह्मा का कोई नाम नहीं है। है तो ये हो गया न। तो गाने निर्देश। इसलिए विधान के द्वारा, उसका तो उसका विधान से हो नहीं सकता। अनात्म का नाम वावहउत्पाशुखगागम कृषणा नहीं ात्मा सत्य विद्या सत्य विद्या कृष्णा samvat bole सच था, शुक्ति है राजपाल विषय। कृष्णा कहते हैं कि जैसे शुक्ति आदि होने पर राजा विषय की घटना दूर होती है। तथा साक्षात कर सती। कहते हैं अगर हमें रजत का सुक्ता में हो रहा है तो यदि हमें सुक्का का बोध हो जाए तो रजत की चना दूर हो जा। और अगर हमे ऊसर का बोध हो जाए। इच्छा आपने जैसे रजत को देखा, शुक्ता में तो रजत की ना उत्पन हो गई, पकड़े गए वहाँ मिली आपको जो रजत की इच्छा है, वो हो जाएंगे। ना को देख के। जब आपके मन में भ्रम हुआ की ये जल है, वहाँ गए तो जल मिला नहीं कसर मिली तो आपको सम्बंधित सुचना है, वो दूर हो जाएगी। अगर के ज्ञान से है, वो निवृत हो जाती है। यह बात तुझे बताया आत्मा आत्मा आत्मा सम्भव आत्मा को लेगा तो उसकी सारी तृषणा समाप्त हो जाएंगी और होने वाली डोज भी समाप्त हो जाएगी। कहते हैं। और ऐसी आत्मा के नौगाम में कोई कारण भी नहीं है। तेरी आत्मा है इस बात का न हो, ज्ञान न हो, इसका कोई कारण नहीं। क्यों समस्त को उसके ही लिए, आत्मा के ज्ञान के लिए। who can i m a m a r a? सर्वार्थ हेतु धन नाक मत पे। जब भी शेष विशेष रहे तो आत्मरूप से उसका आवगम कैसे हो सकता है? क्योंकि उसका कोई हेतु नहीं है। वे बोले नहीं, समझता है उसी के अवगम के लिए। और न बता दिया। b womsama chintu bebeजesiam। कत्सरम्रबंशोप्रबं शांत व चतुर्थ है। इसके लिए। 3 बात बताए नशे मुखेन महात्मा परमार सम समम उक्त पद दीजाकुरथनिअरानि, अभिजात कम परम स्वरूप रजुस्ानिमसरपाज निराकरण। कहते हैं कि यहाँ अभी तक परमाणरमारूपषबात ये कहा गया था। तो अरमान रज और उनका स्वरूप है, वीजांकुर स्थानीय है। समय अभिधात्मक परमात्मा स्वरूप रजस्थानी। सर्वादी थानियों। सरवाजीस्थानियों का जरा गणि। यहाँ ये बताया कि रमा और परमार्थ 4 पाद हैं। सूर्य महातम चतुष्पात। यह आत्मा 4 पाद वाला है। 4 पाद में बताया का। जैसे 1 रुपए में 4 आने होते हैं, चवन्नी 4, चोर 1 रुपए में 4 करनी होती है, उसी तरह से इस आत्मा के भी 4 बार है तो 3 बार तो है। जागरित, जागरत, सपनों और सुषुप्ती ये 3 है। और चौथा तुरी है तो यह 3 बार जो है। ये अपरमार्थ है, अपरमार्थ है। चौथा परमार्थ कैसे यह समझ लीजिए कि जो ब्यावर होता है वो मिर्चा होता है। जो कभी है, कभी नहीं है। जागृत स्वप्न में नहीं है। और स्वप्न जागरित में नहीं है। जागृत स्वप्न सुषुप्ति में नहीं है। सु जागरित स्वप्न में नहीं है। लेकिन जो तुरी है इनका साक्षी वो तीनों में है। वो अनुरक्त है, संविधिक इधर भी है। जागरित में भी जागरित अलग से दूसरा है। यहां तो 3 बार 3 अवस्थाओं को लेकर चल रहा है। तो जागरित जो रावत होता है, वो मित्र होता है, वह कल्पित होता है? और जो व्यावर न हो वो अकल्पित होता है। तो ये कहना होगा कि पुरी है चौथा सबका साक्षी, जागरत का जो साक्षी है, वही स्वप्न का साक्षी है। और वही सुषुप्ति का साक्षी है। साक्षी 1 है, ये सब साख है, इनको वो जानता है। और ये ब्यावर है, कभी है, कभी नहीं है। और वो अनवरत गई है। इसलिए यह समस्या आ जाती है कि सुषुप्ति का अभिमानी प्राग्य है। अब वो प्राग्य है। सुषुप्त अवस्था के न रहने बनी रहा। तो कौन स्मरण करता है कि मैं आज सुख से सोया, मुझे कुछ पता न रहा। नियम यह है कि जो अनुभव करता है वही स्मरण करता है। जो अनुभव न करे, वह स्मरण कैसे करेगा, अन्न को अनुभव करे और अन्न को स्मरण करे। इसलिए ये कहना होगा की प्राग का भी साक्षी है, वह उस शुप्ति का अनुभव कर रहा है। इधर स्वप्न में और जागरित में भी स्वप्न का जो तेज भिमानी है, उसका भी साक्षी है। जब जागरित अवस्था जागरित अवस्था आ जाती है। सजा तो रहता नहीं। लेकिन आज मैंने देखा ये साक्षी है। और इस तरह से जागरित में भी हम देखते हैं, भिन्न भिनन वस्तुओं का स्मरण करते हैं। ये अमुख है, यह मुख है, ये घाट है, ये है। 1 ही वस्तु को हम देखते हैं। दोबारा कहते हैं इसको हम देखा था तो वो है, तभी देखा था तो उसके उसके अस्तित्व में कोई बाधा नहीं है। और इनके अस्तित्व में बाधा है। इसलिए ये कल्पित है। तो इससे उसको अलग कर रहे हैं। तो तुरी शब्द उसके ऊपर लागू। इनकी बराबरी से नहीं हो रहा है। इन तीनों का साक्षी होने के कारण उसको तुरी देते हैं। माया संख्या, तुरी। हां। तो माया की दृष्टि से इनको तुरी कहा गया है। वास्तव में यह आत्मा बस इसी रूप में जाना जा सकता है। नाम त प्रज्ञ हो गया, प्रश्न आया कि आत्मा है। इस प्रतिज्ञा से ही प्रतिज्ञा करके पदक पदक का गठन कर दिया। तो चतुर्थ से क्या देते, क्यों कर रहे हैं ना? सर्वाधिक, विकल्प पर से न tv tum to go suru को रू है। तो ये बता रहे हैं कि जब रज्जु का हम स्वरूप, रजू का स्वरूप कब होगा, सर्व का निश्चित कर देंगे, नायम हो जाएगा। इसलिए तीनों अवस्थाओं का निश्चेत करने पर उसका प्रात भाषिक वैलक्षण ने, विशेष अतंत बहलक्षणभवातारम, प्रिय, विशेषता, प्रांत, भाषिक बलक्षय ने भी विशिष्टों पर लक्षण लक्ष्य हो। आत्यंतिक भाई, रक्षनयभावातनतकम, विशिष्ता, धन्य, अन्यथा, अत्यंत, संस्पर्ष विरहों हो। उपायों के 7 है। इस शर्त। तो यहाँ यह बताया कि प्रातभाषिविशिष, अत्यंतिक, विलक्षण, भाव, कम, विशिष्ट भाषिक होने पर भी पक्ष नतरात्मक। तो ये सुशिष्ट। तो यहाँ बताया कि जैसे सर्प का हमने निषेद किया तो सर्प का निशेध करने पर जो रज्जू का हमें बोध हुआ, तो रज्जु भी विशिष्ट है निर्विशेष। तो नहीं है। इसलिए हमें निर्विशेष का बोध कराना है तो केवल रज्जू के विरोध के विरोध से। रज्जु का बोझ होने के कारण रज्जू का बोध हो जाए। इस आधार पर हम तुझे का अधिगम निकाल सकते। इसलिए उसके बोर्ड के लिए और कोई साधन होना चाहिए तो उसके लिए सूची है। छुट्टी से ही उसका बोध होता है। तब मस्ाजीबततमस्ाजी के समान दुनिया। इसलिए साथ साथ अगर होगा तो 1 से दूसरे का बोध नहीं हो पाएगा। इसलिए ये कहते है कि निषेध होने पर भी 7 से उसकी बच्ची होती है। a a a a a a ओम शांति, शांति शांति।
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