Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 39

This chunk is a spoken lecture by Jagadguru Swami Swaroopananda Saraswatiji focusing on Advaita Vedānta themes: the distinction between ātman (self) and prakṛti/objects (प्रणाली), the unreality (mithyā) of worldly appearances (compared to dream/māyā), and the need for chitta-śuddhi (purification of mind) and vairāgya (renunciation) as prerequisites for ātma-jñāna (self-knowledge) and lasting sukha (liberation). He contrasts transient pleasures (lokas, sons, wealth) with the eternal bliss of self-knowledge, cites Bhagavad-Gītā’s instruction to act without attachment, and uses examples such as the gopīs and rāsa-līlā to illustrate devotion beyond ritual action.
Chapters
Om shanti shanti santi tea हाँ, प्रणाली विकल्प जो हैं, वो आत्मा से भरने नहीं है। ये कह दिया। प्रणाली, प्रणाली, नाम आत्मबल प्राप्तम। कहते हैं कि प्रणाली जो है जी, baba apr सर की तरह प्रणाधिनामअगर, प्राण आदि। आत्मा से प्रथक है। तो जैसे आत्म तात्विक है, वैसे ही ये भी होंगे, इत्या तो नहीं है। इसका अर्थ यह नहीं है कि वे सत्य हैं, वो कल्पित है? जैसे रज्जु वे जो सर्व दिखाई पड़ता है, वो रूसी प्रथक नहीं है। इसका अर्थ यह है कि प्रथक रूप से केवल उसकी कल्पना है। तो प्राण है। कल्पित? उत्तर ज्ञान iti सो विभाग कर। मधु बताया हवामार। तद्वारीणआत्मनी भेद दर्शन अभिवेकनामस्तू कहते हैं कल्प? ठान से होकर कल्पित अतिरेक सत्ता, सुरण अभावा, बिना अगर ठान के कल्पित की सत्ता उसपर नहीं हो सकते। इसलिए तदवारी आत्मन जो कल्पित है, उनके द्वारा आत्मा में जो भेद प्रदर्शन करते हैं, वो अविवेकी हो सकते हैं। जो विवेकी हैं, वो नहीं कर सकते। प्रणाली नाम आत्मा सत्य प्रमाण। प्रणाली। प्रणाली आत्मा से सत्य नहीं है। इसका प्रमाण क्या है? तो कहते हैं कि शर्म। तो आत्म वेदनों लेता की आत्मा से भिन्न कोई वस्तु नहीं है। तो का मतलब क्या है? सतासुीकेद्वारा सुचि कहती हैं कि आत्मा से भिन्न कोई दूसरी वस्तु है ही नहीं। uctisayuc्ti se to युक्ति से भी जगत का मित्या समझ लिया। युक्ति क्या है? जैसे पहले अनुमान किया गया था कि जागरदेश्यमियाजागर दृश्यम मिया स्वप्न, jis युक्ति, यथोक्त विज्ञानवान, वेद किंकरों नभावतीयशोक्त विज्ञानवान जो है, वो वेद का किंकर नहीं होता। किन्तु स्वयं विराट संभूत, सहयोग विधा। 7 वो जो विराट कहता है, वही विराट होता है। विभाग। तो विरात व्याख्यान अभिनयथीज्ञानका्णम साक्षात वस्तुपर कर्मकार को। 7 संबंध, साधारण संबंधी बोध द्वारा परंपरा पर सर्वे विधा आत्म है। ऐसा है कि जो आत्म विता है, वो जो कुछ वेद में लिखा है, उसको जो को नहीं मानता, वो उसका विवाह कर देता है। जैसे कर्म कारात्मक भेद है, उसमें 7 साधन और सम्बंध का 7 का स्वर्ग साध यग दोनों का कार्य कारण है, सरकारी है। और यह कारण है हो गया। वहाँ। पर हम लोग तो अदित कट जाता है। तो जिसने सूची से, युक्ति से देत के विध्यर्थ को समझ लिया है, ऐसे वे जो वचन हैं, उनका वो विभाग कर देगा। ये जो विभाग हैं, ये वस्तुता अवांतर तात परी है, मुख्य तातपर्य नहीं है। वेदों का मुख्य तात परि, अद्ययित दर्शन में है। अद्ययित दर्शन ही मुख्य तातपरीहैतोक्याय द्वित बता दिया। पूरे अदूरदर्शन के लिए। चित्र शुद्धि। अपेक्षित जिसका चित्र शुद्ध होगा, उसी के मन में विज्ञा जिज्ञासा उत्पन्न होगी। परमात्मा को जानने की इच्छा सब क्यों नहीं होगी? सर्दी के लिए। पर आइए कैसे समझ लो? बात क्या है कि अगर हम भोगों में लालसा वाले रह गए तो आत्मा को क्यों आग जारन की इच्छा क्यों करेंगे? मनुष्य के मन में 3 एशणा से प्रेरित होकर ग्रस्त लोग कर्मकांड कर रहे हैं। ठीक है। तो पहला तो है लोकेशन। हम ये चाहते हैं कि मरने के बाद हमें उत्तम लोक प्राप्त है। यहाँ पर जैसे हम सुख का भोग कर रहे हैं, शब्दाजीवुषियों का भोग कर रहे हैं। इससे भी अधिक अच्छे भोग को परलोक मिल जाएंगे। यहाँ हमारा जीवन थोड़े दिनों का है। जो शरीर लंबा है, वहाँ भी सारे भोग मिल जाएंगे। अब सवाल मिलेगी ना, तो का गान मिल जाएगा, इसकी सेवा मिल जाएगी और कल वृक्ष मिल जाएगा। तो उस लोक में जानने की जानने की इच्छा, लोकेशन तो लोक में जाने, जानने की इच्छा क्यों है? क्योंकि वहाँ पर भोग, मिलेगा, भोग जन सुख हम प्राप्त करना चाहे। यहाँ हम पुत्र की इच्छा करते हैं। पुत्र, एम, लोगो, जया पुत्र। इस लोक में हमको सुख मिलेगा कि हम बैठे हैं, बेटा कमा ला रहे हैं, खिला रहे हैं, पिला रहे हैं, बीमार हो गए तो उपचार कर रहे हैं। यह पुत्र की बात है। तो पुत्र भी सुख देता है। इसलिए लोग पुत्र की इच्छा करते हैं। और इसलिए भी करते हैं कि मरने के बाद ही पदान कर देगा। अगर हमारे कर्मों में कुछ कमी रहेगी तो ये उसको पूरा कर देगा। तो पुत्र और हमें कर्मकांड करना है। यदि आजादी करना है तो बिना दर्ज की हो नहीं सकता। दक्षिणा देनी पड़ेगी तो धन की भी जरूरत पड़ेगी। विषय भोग करना है तो भी पैसा लगेगा। तो धन की इच्छा है। तो कुल मिलाकर भोगों की प्राप्ति के लिए ही लोग, पुत्र और वित्त 3 की इच्छा है। अब हमको जब यहाँ के लोगों का रूप दिख गया कि ये सुख देने वाले नहीं हैं, ये अर्थ में दुख ही देते हैं। इनकी लालसा कभी पूरी नहीं होगी। बराबर मनुष्य ये नियम है कि आपकी अगर 3 वस्तु आपको प्राप्त है तो इच्छाएं 4 हो जाएगी और प्राप्ति की संख्या अगर 3 की जगह पचहतर होगी तो इच्छाएं शो हो जाएगी। इच्छाएं बढ़ती चली जाती है हाँ। और फिर उसके बाद वही रुख भी देते हैं, अपनी याद में रुख लेते हैं, युक्त होते हैं तो दुख देते हैं, मरते, नष्ट होते हैं तो दुख देते हैं। तो जैसे यहाँ के भाग हैं, जो दुष्ट हैं, उसके ही समान अनु है। वहाँ भी यही हालत है। कुछ दिन ज्यादा हो लोग और क्या है। लेकिन वहाँ भी पूर्ण छीन होने के बाद ढकेले जाओगे। जब ढकेला जाता है मनुष्य, तब मालूम पड़ता है कि सुख का क्या राष्ट्रपति जो है, जब दूसरा राष्ट्रपति आ के विदा करता है, इस महल की उतर के हित में जाओ तो उसको पता लगता है बाप रे। अब क्या हो गया? और जो मिनिस्टर है, चीफ मिनिस्टर कहता है, इस्तीफा दे 2 तो उसके ऊपर बार बार लगता है। इसी तरह से बड़ा कर रहा। ये क्या हो गया? तो वहाँ से भी गिर जाओगे, ढकेले वहाँ से भी जाओ। तो भाई, हम तो ऐसा सुख चाहते हैं जो दुःख से मिश्चित न हो। वह सुख सुख ही नहीं। जिसमें दुख है, डरना है, रोना है, मिलावट से जो है खाली, उसी का नाम सोना है। वह सुख सुख ही नहीं। ये नोट करने लायक बात है। वह सुख सुखी नहीं। जिसमें रुक है, डर है, रोना है। मिलावट से जो है खाली, उसी का नाम सोना है। तो संसार के जितने सुख है वो दुख रूप है। तो जब हम उनको दुख रूप समझ लेंगे तो इससे हमको बैराग हो जाएगा। तो जब चित्र की शुद्धि होगी, चित्र शुद्धि क्या है? सर्वोत् विरक्ति का ही नाम, चित्त की शुद्धि राग ही अशुद्धि। तो सर्वत्र व्यरक्ति को ही क्षेत्र की शुद्धी कहते है। है न? तो व्रक्ति क्या है जिसा क्या करने की इच्छा अब भाई मरना तो है। ये संसार के दुख दे रहे हैं। पर लोग जाएंगे, वहां भी हालत है। ऐसे सुख की खोज करो कि जिससे की हमें दुख न हो। तो वो वो सुख जो है निशु। आत्मज्ञान से होगा कि जाकर श्याम you a o m, m लोग है। और जो कर्म कर्म जो परलोक है, कर्म से परलोक मिलता है। तो हमको जब आत्मा रूपी लोग लोग थे ज्ञान। तो जब आत्मा का हमको ज्ञान हो गया कि यही सुख स्वरूप है तो हमको दूसरी की जरूरत क्या है? तो उस आत्मा के यात्म को जानने की इच्छा जब होगी तब वो समय इस रास्ते में आएगा। इसलिए पहले चित्र को शुद्ध करना चाहिए। चित्र शुद्धि कैसे होगी कर्मकांड से, वहां तो 2 हित है। तो पहले आप धर्म जब करने जाएंगे, धर्म छोड़ देंगे। अधर्म का त्याग हुआ। तो अधर्म जो है, ज्यादा कचरा कूड़ा तो अधर्म से ही होता था। अब बचा धर्म तो धर्म करने के लिए संयोग सदाचार की जरुरत सवेरनिमेदूसेउठो निरोध करो। हर संझा मवासी, नियम पूर्वक आपको सब कर रहे हैं। तो नियम निष्ठा से आपकी जो बुद्धि है वो अलग हो जाएगी। इसलिए जो ब्राह्मण हैं, उनके लिए ये लोग है नहीं। राजपुत्र जीव, माँ जीव, ऋषि पुत्र जीव, अमर बा सा 2 ब्याज मां जी, मा मर, हे राजपुत, तुम चलन जी, राजा के बेटे तुम चिरकाल तक जिओ। क्योंकि तुम पाप कर रहे हो। मरने के बाद तुम को नरक में जाना ही पड़ेगा। और हेरिस के बेटे माँ जी, मां जी, इसी पुस्तक माँजी सी पुत्त मत जियो। क्योंकि तुम जीओगे तो सवेरे सवेरे उठा, चाहे सवेरा हो, चाहे जाडा हो, चाहे गर्मी हो, चाहे बरसात हो, उठ ही जाना है। गर्मी के दिनों में 2 बजे तक तो रू चलती रहती है नींद। अच्छी आती है। 4 बजे और सास के जल्दी उठो रात, काली चाय, निद्रा सापकारनीप्रातःकाल निदान करना चाहिए। अब उठ रहे हैं, बरसात लौट रहे हैं, ठंड में उठ रहे हैं। तो संयम सदाचार से रहते रहते भोगों से अलग होने की भावना आ जाती है, आत्म संयम आ जाता है। ये चित्र शुद्धि हो गई। जब इस तरह के चित्र शुद्धि हुई तो मनुष्य की जो तोमर और रजोल की भावनाएं हैं। ब्याज माजीवमामरहेब्याज। तुम जियो तो तुम ऐसे करोगे, मरोगे तो तुमको नरक में जाने ही जो.
साधु.
साधु जी, मरबा, साधु जीते हो। तो जीवन मुक्ति का सुख सुख मरो। तो मुक्ति का सुख मरबा, साधु। तुम्हारे लिए जीवन दोनो बराबर हैं। ना भी जल्दी बढ़ जाएगा। तो तत्पर यह है कि जो ज्ञानी है वो कहेगा भाई ये कर्मकांड चित्त शुद्धि जनक होने के कारण अंत तो ज्ञान का ही आधार और सुखी भी कहती है? सर्ववेद पद समस्त। वे जिस पद का कथन कर रहे है तो वो पद तो 1 ही है। स्वर्ग तो सब का पद नहीं है। ब्रह्म है। तो किस तरह से है? तुम भाग करेंगे। 1 का मारा परी है और 1 का महातातपरीहतोमहातात परी। सबका जो है, ब्रह्म है और मारता तार परी है। कर्म, कर्म, वो बा। to bina spnmaiastispn अध्यातम ध्या, क्रिया, क्रिया, प्रमाण, क्रिया, फल, क्रिया, मान, प्रमाण और प्रमाण का फल क्या है? तब उसका फल या बुद्धि शुद्ध दवा है। वो बुद्धि की शुद्धि के द्वारा उनका प्रयोसानवनीजाता है।
विचार.
बसुता, सहयोग प्रथक न्याय। 1। संयोग प्रसक्त न्याय। तो संयोग, संयोग प्रथक। ये है अपनी मनसा का। जैसे दधनाजहूतीदधनाइंदी कॉमर से जुडी खाद्यों युपोभवचिखादिरम वीर कामरस गुरिया। तो यहाँ पर सिद्धांत है उत्पत्ति वाक, जो मिमांसा का उत्पत्ति वाक है। करम, स्वरूप बोध को विधि, उत्पत्ति कर्म के स्वरूप का बोधक जो विधि है, उसका नाम उत्पत्ति, विधि है। तो कर्म का बोधक है कर्म का बोधक। बोर्ड में कैसा मंडप होना चाहिए, कैसा यूप होना चाहिए, कैसा कुंड होना चाहिए, किस कर्म में किस तरह का ये सब होता है। तो ये सब बिजी हैं। बिजी के अंतर आता है। केवल हवा नहीं है। चाय जहाँ बैठ के हवन करने लगे, सोहासा आपका, उसका आकार हो, उसके द्वार हो तो हर भी किस लकड़ी का हो। यह सब। तो कर्म के स्वरूप का बोध करने वाला जो विधान है, उसका नाम है उत्पत्ति, विधि, विधि, उत्पति बिधि शब्द है। पुल्लिंग है। तो खादिरोyupohायमें, खदिर का ही यूप होना चाहिए। खदिर नाम का है। खैर उसका यूप होना चाहिए। तो वो उत्पतिविधि में चूत है। i, m, a 1 तो हो गया। अंग साधन जो याग है, उस याग का अंग हो गया। स्वर्ग जिसका प्रयोजन है, स्वर्ग के लिए याग किया जाता है। और दूसरा है। अवांतर। तो 1 ही वस्तु के 2 फल यहाँ वर प्राप्त हुए हैं। तो यहाँ पर कहते हैं संयोग पर, संयोग पर, संयोग पर हो जाएगा, कामना नहीं है लगा मिलेगा। और अगर वीर कामना से करेगा तो वर मिलेगा जो जो किया है उसकी प्राप्ति हो जाएगी। दर्जन इंद्री, इंद्री, काम, इंद्री की कामना दजी, ऐसी हवन होती है। उत्पति विधि में, विशेष याग में दर्जन जो होती, दी, सी होता है। लेकिन अगर इंद्री की कामना भी की, उसका मन करेगा तो इंद्री फल की प्राप्ति होगी। 1 तु संयोग पर। तो इसी तरह से आप स्वर्ग की इच्छा से, धन की इच्छा से, पशु की इच्छा से, पुरुष की इच्छा से। कोई कर्म करेंगे तो आपको स्वर्ग पशुपत प्राप्त होगा। अगर इच्छा रहित होकर वही कार्य करें, वही करेंगे तो वो आपके चित्र की शुद्धि का हेतु बन जाएगा। इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता में कहा काय न मनसा बुध्या, वली रिंदरपीयोगिनकर्म, कुरवंतीसंगमतत्म, शुद्ध काय से, मन से, बुद्धि से, योगी जन कर्म। योगी कर्म करते हैं, फल की आशक्ति छोड़कर क्यों करते हैं आत्मशुद्ध? यह आत्म शब्द का अर्थ है अंता करण। अंता करण की शुद्धि के लिए करते है। तो ये हो गया। तो चित्त, शुद्धि, संयोग.
सदा, जनाना होती है, संयोग है.
होती, हो जाता है। कुल मिला तो इसलिए माना जाता है की श्रीकृष्ण की जो गोपियाँ थी, ये सूची थी कृष्ण और गोपियां। सूची है। तो सूचियों के 2 रूप हैं उड़ा और अनूठा। कुछ गोपियाँ ऐसी थीं जिनका विवाह हो गया था और दूसरी ऐसी थी जिनका व्यवहार नहीं। दोनों कृष्ण से प्रेम करती थी। तो इसका मतलब कि जो उड़ा है वो कर्म कारात्मक उनका वां है। कर्म में था। तो ये अपने पति पत्रों को परोस रही है, घर के काम धाम कर रही हैं। और कोई केवल कृष्ण से प्रेम करते हैं। उनका काम धाम से कोई मतलब ही नहीं है, अनुरा है, ये है। तो ये जो सूचियां हैं, यही तो खेल है। रासलीला क्या है? सूचियों के द्वारा दर्शन, यही राशलीला है। आप सुखियों का, अध्ययन कीजिये और उनके तात परी का विचार कीजिये। विचार से निष्कर्ष निकलेगा कि सर्वे सुशील पर, ब्रह्मणी सर्वे वेदा पावनंतीयपदमावनंती तपस्या भी, जिनके लिए, उन्हीं के लिए किए जाते। सपरमाययथाषटगमगरम, यथा तथा विश्व मिधमदिष्टम। यदि अशत्वमुकतजोदोत असत् कहा गया, युक्त विदांत परमाण विदांत के प्रमाण से अवगत है। स्वप्न माया का स्वप्न, माय, स्वप्न और माया जो है। सब माया असल वस्तु आत्म के असल वस्तुआत्मकहै, असत्य, वस्तुत, स्वप्न और माया जो है। सत्य नहीं है कि सब जैसी दिखाई पड़ती है किनको अविवेक अभियो को प्रसारित बना। जन व्यवहार की। गंधर्व नगर समान। एव सचइकस्मारअभावतम गतम सिस्टम। कहते हैं नगर गंधर्व नगर दिखता है। बात बड़ा नगर है, जहाँ पर बाजार लगा हुआ है और सामान वहां फैला हुआ है। घर बने हुए हैं, महल बने हुए हैं, इसी पुरुष हैं। बहुत से लोग व्यवहार कर रहे हैं। ऐसा गंधर्व नगर दिखाई पड़ता है। और दिखते दिखते कसमार अभाव को प्राप्त हो जाता है। ऐसा जो स्वप्न में स्वप्न भी सब कुछ दिखता है। और जैसे ही उठे तो खत्म हो जाता है। तो असर तथा आ सके समस्त कहाँ? कहाँ? कहाँ देखा गया? विलान तेश वेदांत में क्या कहा गया है? मस्ती ात्वाभूतइत्यादि। इन लोगों, इन सूचियों से मालूम पड़ता है कि जगह तय नहीं, किनके द्वारा विचक्षण नी चाहिए। बुत सी वस्तु को देखने वाले जो पंडित है, उनके द्वारा तमस बुधबुदधसनिभम नाशोतरमभाबगम व्यास की स्मृति है। ब्याज महाभारत का तमस, श्वभ्र अंधकार के समान आकाश बादल हैं, उनके समान और वर्ष बुदबुद सजनम वर्ष होने से जो पेड़ जल में बुदबुद उत्पन्न होते है, वो रूट के नष्ट हो जाते हैं, नाश प्राय हैं और सुख से रहित हैं। और नाश के बाद सर्वाना भाव हो जाता है। ऐसा ही संसार है कृतिका। अवश्य। जहाँ कहते हैं जो बिल कहा गया, वो प्रमाण से अनुग्रह या सूची उसका समर्थन करती है। तो भात असत् वस्तु सत्र के समान कैसे बात होती है। तो कहते हैं जैसे पन्नी पणन क्या है? क विक्रे जबानी का विक्रे ही पण है? हे हर में, बाजारों में रहता है, प्रसारित वस्तु फैली हुई है। प्रसाद मनमलस्रीपुर्ीऔर पुरुष, जनपद, इतिशा, व्यवहार इंडिया व्यवहार कई संकीर्ण। ऐसा कोई नगर आकाश में दिखाई पड़ता है, जिसका नाम गंधर्व नगर है। तो सपना को यह बताया है। वैसे ही संसार है। बताई जो पढ़ा सामने तो उसका अर्थ कर रहे हैं। तमाकीमनदाधकरीाने कहते, तब मैं कार में रजजूरoमेंजैसी। भूत इस रूप से उसके समान है। हा, हम सब तज भ्रांतिया भारतीय तजनिभमत्तुलनमेवीज हुई। विषम, विषम, सत्चातीवसंचलन, अलक्षित, नाशा परायण। वर्तमान में गाड़ी में तज योग्यता, सत्वा सुख करम उपलब्ध थे। दुहितर कभी भी सुख देने वाला नहीं माल होता। दुःख क्रांत, दश्ते, दुःख से आकरम दिखाई पड़ता है। तब नाशक व नाशकों से गलत है, नासा र्धम। असमें नाशक असत हो जाता है बर्मा परमाण। इसलिए उसका तो नहीं है। परमाणु को ही न हो। 22। नमी मुख.
स्वप्न.
S, s.
सद बस्तुआ, अश्विन घंटे सत्य है, सत्य है, सत्य.
है। माया। तो यहाँ पर तो सत्य होगा और सत्य होगा।
मूल नस्ती बस्ता व्याख्या को। व्याख्या मूल नाश्ते.
घर गया।
सती सत्य सत्य के सदा भासे थे। वस्तुत के सत्या, सत्या से, वस्तु के लक्ष्य थे। सब सत्य.
और ठीक सं बढ़िया ठीक है, ठीक है, ठीक पार्टी, ठीक है, सत्य पार्टी। इसी की माया और सनाया। यहाँ पर सत्य हने से पुल्लिंग आ जाता है। इसलिए सच के अर्थ में, सच अर्थ में ठीक है। तो सच यहाँ पर आकार नहीं रहेगा। कहाँ है? सब? ठीक है, आकार है। मां ने असत होते हुए भी सब वस्तु जैसी दिखाई पड़ती है। अगर पहली यू कहने का भी प्राय न होता। अच्छा टीका में क्या है.
असम के विषय का ग्रह?
और उन्होंने आगे कुछ कहा नही है। अब आगे बढ़े न। अब इसको समाप्त कर रहे हैं। a a a s no पदरातuऔशांति शांति शांति।
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