Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 45

A Hindi-language recorded discourse by Jagadguru Swami Swaroopananda Saraswathi (Chaturmas 2012) on the Mandukya Upanishad and Advaita Vedanta. The speaker elaborates non-duality (the Self as witness), emphasizes that realization entails steady absorption in the Self (nididhyasana) and cessation of identification with body-mind, and describes the conduct of realized seekers (renunciates/jivanmuktas) — relinquishing honors, practicing smriti and bhajan, and avoiding worldly attachments. The chunk contains Sanskrit/Hindi chant fragments and concluding liturgical invocations.
Chapters
पद्रं पशेमाक्षमिर्यद्यत्रा।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� तस्तिनोऽवृहत्पतिर्ददातु ओम् शान्ति शान्ति शान्ति तस्माधेवं विदित्तेनं अध्वेते योधे एक्स्मितिम् अध्वेतं तमनु प्राप्य जडबर् लोग महाचरेज। यह हो गया? यस्मात सर्वार्णर्चप्रसंरूपत्त्वाद अध्वयम् शिवं अभयम् जिस कारण से समस्त अनर्थों का प्रसमं समस्त अनर्थों की शान्ती रूप है अध्वे और स्व बाने सुख स्व बाने सुख है ना और अभय है अध्वेत में ही अभय है अत एबं विजित्त्या एनं अध्वेते स्मृतिम्युजे तो जब ऐसा हैं, तो इस परकार इसको जान के अध्वीत में ही अपनी स्मृति.
को लगा हैं। अध्वीतावगमाः.
यही स्मृतिम कुर्याजित्य अर्था अद्वेत के अवगम, मानवोध के लिए ही, अपने इसमुति करना चाहिए। तच्छ अद्वेतं अवगम्य आमस्मि परंब्रम्यति। कहते हैं, अद्वेत को जान कर क्या हो गया? आमस्मि परंब्रम्य। मैं ही परंब्रम्य। इति विदित्मा असनाया अध्यतीतम् स्वाक्षाद अपरुक्षाद अजम आत्मानम् सर्वलोकव्यमारातीतो जनहर्लोकमाचरेत् अप्रक्यात् अप्रक्याप्रन आत्मानम् आमेव आहमेवं विशा हित्तभिप्राया हा।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� असनाया बानें भूँग और प्रिपासां इनसे अतीत आत्मा में ये सब नहीं हैं। असनाया अतीत.
है। जैसे रूप.
आधी का अनुभव नित्र आधी से होता है। और सुरुखादी कर्म अन्ता करवद द्वारे होता है। कि तु आत्मा का जब अपरूख से नहीं है। किसी की द्वारे नहीं होता है। वो साक्षात अपरूख से है। स्वैम अपरूख से है। साक्षात करती.
है स्वैम अपरूख से। साक्षात.
नहीं है। किसी के द्वारा आपके सामने घट है। इसका आपको साक्षातकार हो सकता है। करने तर नहीं हो तो नहीं हो सकता है। मद्ध में एक कोई दूसरी चीज है। जिवाल है यह। इसी तरह से अपरोप्छे सूदो के भी होते हैं। लेकर अगर अंता करन नहीं हो, शुक्ति में सुरुख का अन्वाव नहीं होता। लेकिन आत्मा का जो अन्वाव है, उसको द्वारांतर, द्वार की जवर्थ नहीं। निर्द्वारक ग्ञान है। और जो ग्ञान है, और सबका ग्ञान जो है, सद्वारक। और ये निर्द्वारक, किसी परिकार का द्वारक अन्न भोगों से जो सुख मिलता है वो सद्ध्वारः है। कोई ना कोई द्वार है सुख के प्राप्ति का। और आत्मा रूप जो सुख है आनन्द निर्द्वारः है। कहीं नहीं जाना है। किसी को नहीं देखना है। तो ये कहा साक्षाद अबरुक्षाद अजम अजम माने जन्मरहिक ऐसा आत्मा सर्वलोकब्विवारा थीतो फिर क्या करें लोकब्विवार से अपने को अलग कर ले अब हम ब्रह्म हैं, तो क्या विवहार करेंगे हम? हम अपना बरन नहीं है, आच्रम नहीं है, नाम रूप नाम नहीं है, क्रिया नहीं है, संबंद नहीं है, तो क्या विवहार होगा? तो अपने आपको ऐसा जब समझ लें, तो सब प्रकार के विवहारों से सुवेम को अलग कर लिए। जडवर लोग आ चरेगी। मूर्ख की समान हो जाए। इह ख्यापित न करें कि अरे हमें देजे ग्यानी हैं। हमको ऐसा घ्यान हो गया है। मैं घ्यानी.
हूँ।.
इसका मतलब यह है कि जिसका मुझे घ्यान है मैं उसते एलग हूँ। तब ही न घ्यानी बनोगे। मैं घ्यानी हूँ अगर कोई कहता है। इसका मतलब किसका घ्यान है तुछको? कि ब्रह्म का घ्यान है। तो तु ब्रह्म को जानने वाला ब्रह्म से अलग हैं। तो जानी.
कहा रहा हैं। ये.
बात है। तुलसी दाज जी कहते हैं। ग्यान मान जहां एकव नाही देख ब्रह्म समान सब्रमान। ग्यान उसको कहते हैं जहां एकव मान नाही, किसी प्रकार का मान नहों। ग्यान ते मान पान ते लाजा। ग्यान हो.
जाने पर मान कतम हो जाता है। अनुभुत्याचारिय।.
उन्सो निर्मणो मोह। कर्पितो नर्प दुक्य रह। संसार दुख वे तारो बिचारे न विलियते। जो पूर्ष हैं, निज मनो मो कलपिता हूं। अपना जो मन है, ये भी मो से कलपिता हूं। यही दुख देने वाला है। संसार दुख वे तारो। संसार रुपी दुख संसार में हैं। संसार दुख जो है, संसारी दुख हैं। यह वितार हैं। वितार मन भूत हैं। विचारे नहीं विदीत हैं। भूत जो है, बाग जाता है। विचारो की अनुान जी पहुँछे। भूत पिसाच निकर नहीं आवे। महामीर जम्राम स्लाम है। इसी तरह से विदान्त विचार जब कर लोगो तो विदान्त विचार ही हन्माजी है। वसंसार दुखरूज्यु वेताल। बाक कड़ा होता है, हम में संसार है ही नहीं। तो जड़वल लोक मा जरेत अप्रक्यापयन आत्मानम् आहमेवं विधा अपने आपको मैं इस परकार हुँ, इस परकार ख्यापित ना करें। एक महात्मा किसी शिष्य के हाँ, अपने भक्त के हाँ, रात के समय पहुंचे। रात के समय पहुंचे वो। तो उन्होंने किवार खट कराया। किवार खट कराया। तो उसने भीता से बुचा कौन है। तो कुछ नहीं बुचा। तो फिर खट कराया। ने कौन है, बदमास है क्या? कर नहीं है। फिर बुछप हो गया। अब वो गारी देता जाये वितर से और वो मना करता जाये वो नहीं जब कुछ कौन है तो फिर छुप हो जाये तानत में जंदिला के उसने किबार खोला तो देखा गुरुजी खड़े है पहले मारे आप है आपने नाम क्यों नहीं बता जिये पहले हम कुछ होते तो बत जो तुने आरूबित किया, उसको हमने निषेध कर दिया, कि यह हम नहीं है। हम क्या है, यह कहनी की बज़ाई नहीं है। अपने आपको प्रक्षाब्यान, अपने आपकी खाती नह करके, जर के समान हो जाया। हो गया? अब इसकी की कहां? किमती, नहीं है ना, प्रेटीश मुझे है ना, प्रेटीश.
मुझे है ना, प्रेटीश मुझे है ना.
प्रेटीश मुझे है ना, प्रेटीश मुझे है.
ना, प्रेटीश मुझे है ना, प्रेटीश मुझे.
है ना, प्रेटीश मुझे है ना, प्रेटीश मुझे है ना, प्रेटीश म सिद्धतित्याहातस्माजिकी मिठ्याज्ञानप्रशय।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। उसकी संसकारों के कारण बेदान्तास तत्परी तत्परी बताओं बेदान्त का जो अर्थ है तत्परी किस में है इसको जानने वाले भी पंडित उनकी नाज़ैति पृतेदार्धिम् सिद्यति अज़ैत में उनको पक्का निष्य नहीं हो पाता तसमात जिवस्थास्तात अध्यितं अभवं स्मृति संततिं कुर्वताः लोकानुवर्तते बिजिनियमाः कहते हैं सास्त के जारा अध्यित को जानकर स्मृति संतति क्या है निरिध्यासन यहाँ और क्या इसमन अनुभा? क्योंकि आत्मा की इसमृति संभाव नहीं है। क्योंकि इसमृति जो है अनुभाव के नास के बच्चात होती है। तो आत्मा का अनुभाव पहले नाठ थोले तब इसमृति होगी। तो आत्मा तो अनुभाव सुरुफ है और अवि इसलिए उसका नास तो होगा नहीं तो इस मची बनेगी कैसे। तो यहाँ तो यह है अनिदी शासन। अतरा स्वाणशत देना अपूर्वत्वन नास्तीत्य। अपूर्वत्वन नास्तीत्य। ताओ देवा। अन्भूला नास्चेग्ञान विद नास्तान। अतरा � और जैसे गगवद गीता में है नश्टो मोहस मिर्चर लम्धा। नश्टो मोहस मिर्चर लम्धा। यहां भी स्मृति है। साथ-साथ कार ही कहना पड़ेगा। कि हमको अपनी सुरुप का भोध हो गया। हम पहले ही थी थे। अपने आपको भोध गये थे। तो य इसलिए सद्धिन कुर्वत लोकानु भरतने बिजिनियम आहा बिजिनियम क्या कहते हैं नियम बिजी नियम बिजी अपूर बिजी नियम बिजी परिशन का बिजी बिजित्या मारतते हैं.
विदी.
रत्तन्दम प्राप्त नियमापाक्षि के सति तत्चान्यत तप् प्राप्तो परिशंक्या विदीयत है। तो यहां पर रत्तन्दम प्राप्त तो है नहीं, नियम विदी है। नियम विदी मैंने यह हुआ कि क्या करे अद्वाइत का बोध हो गया, तो क्या करते हुए रहें? तो सच्छन्द विमार करते हुए भी रह सकता था। तो नहीं करते हुए। अद्वाइत में ही अपनी बुद्धी लगाएं। यह आवच्छ है। जैसे तंदुर निष्पत्ती तंदुर निष्पत्ती करना है जो बृही है बृही कहते हैं धान को छिरके सही जो चावर है वो बृही है और उसको अलग कर देने के बाद जो बचता है वो तंदुर है तो तंदुर को तंदुर की निष्पत्ती अगर हमें करने है तो दो तरह से हो सकती है। एक तो नक से हम थुर्के हडा रहे हैं। और दूसरे आवघात से। मुसला आवघात हैं। मुसला आवघात हैं। तो यहां पर नियमिधी हैं। कि आवघाते नहीं। तन्दुरिरिष्पत्तिम कुरियात। न नक बिदल ना दिना। इसी तो उसका निरिध्यासन से ही अपना जीवन विताना चाहिए। इधर उदर प्रभंच के कामां में लगने का की आवच्छकता नहीं। यही नियांबृदी।.
तो ही.
हो गया। तो ही है। नियांबृदी महा अध्वाईतमृति। लोकानुवर्तने विधिन्योंमाः। कैसे? लोकानुवर्तने.
विधिन्योंमाः।.
कैसे? लोकानुवर्तने.
लोकानुवर्तने विधिन्योंमाः। कैसे?
लोकानुवर्तने विधिन्योंमाः। कैसे? अद्वीति स्मृतिम् योजियत् अद्वीता उगमाने स्मृतिम् कुरियान् तज्ञाज्वितम् गम्यां आमास्मृति प्रमर्मिरित् विजित्वा असनायाद दतीतं साक्षाद अपरुक्षाद हर्मात्मानं सर्वभुवारातीतं विजितितों जर्वन लोकमाचरेत् अप किकाखार क्या कहर कहर कहर कहर कहर कहर कहर कहर कहर कहर कहर कहर कहर.
�.
अद्वाहिता गमा यही में स्मर्थिम को जाते हैं। एवकार है न। इसलिए एवकार से नियम विधिम यही है। मुझेने अद्वाहिता गम में ही। जैसे हमारा नियम विधिम यही है न। तबिर निष्पत्ति आते नहीं वर। अर्छात दिधिध्यासन में ही मन लगा एवकार वहाँ लगता है। तो हुआ.
तस्मादित्तस्नहर्मत्.
यस्तस्मस्मात् एवमृति निर्मिकल्बत्त्वात् निर्मिकल्बत्त्वाजिपरामर्षान् विजित्त्वा साथ्तत्वावघम् अध्योईतावगति दार्धार्थम। सुत्यसंतरिकर्तवितायाम् नियम्भिःम्। लोगान वर्तर नहीं हैं अध्योईतावगति दार्धार्थम। अध्योईतावगति दार्धार्थम। सुत्य संतत्य करो तब बतायां। नियम विधिम अभिनु जानाति। कर तब बतायां सुत्य संतत्य। अध्वितेति। अधितमत्त तरादार्दों भिवत्य। जर्शदिस्यस्य कथं लोकाँ चरण। अभुद्धि पूर्व कारित्ताच इच्छा संक्याः। जर्शदिष्य कथं लोका चर्णं। अभुद्धि पूर्व कारित्ताच इच्छा संक्याः। सर्वलोकेति। एक यादो। यादिच्छिक सात्रा नर्मदप्रत्यत्नवितरिकु यादिच्छा तिरा संतुस्तु यादिच्छिक यह तो पहला है। दूसरा है लोका चर्णम। लोका भेवहारान कुला भेवहारम। अच्छा यह है। ठीक है जी। समयद विष्टा कहते हैं कि लोका भेवहारान अतीत्यां। अब इसो जडबत आचर्णम की दिशम इत्तवेक्षायां चतुर्थम् भार्मनुतित्तात्मनिमा एवं विदोहं इत्त्यात्मानं विद्जाभि जनाजिभिः अप्रक्षाबियन् जर्वजेव विद्धानलोकमा चरेद्।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। निस्तुतिर्निनमस्कारो निस्तनाकारेवचाम चलाजरनकी तस्च यतिर्यादिष्को भवेद।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। जो यती ज्यानी हैं वो तर आजन करें। स्मृति नमस्कारादि सर्वकर्म बजिता। तक्त सर्वभाहिष्णाः। न किसी की सुती करें न किसी को नमस्कार करें। सर्वकर्मों से रहित हो जाएं। तक्त सर्वभाहिष्णाः। सभी भाहिष्णाः का त्याक कर दे। इशना क्या है? लोके इशना पुत्ते इशना पुत्ते इशना तो लोके इशना क्या है? वैसे तो आजकर विवहार में लोग कहते हैं लोक में अपनी ख्याती पसिद्धी के लिए लोग यतन गरते हैं प्राणी अपनी अभिव्यक्ति चाहेता है। लोग हमको समझ हैं कि हम भी कुछ हैं। तो यही लोकेशना है। लेकिन यहां मुक्रू से एक लोकेशना है। परलोक में सुक्की त्रिषना हम मरने के बाद स्वर्गाजी लोक में आएंगे वहां सुकता अन्वो करेंगे। क्योंकि यहां के जो सुक हैं, वो थोड़े दनों के हैं। और थोड़े परलोक मजा हम जाएंगे स्वर्ग में, तो लंबी आयो मिलेंगी। सरीर में रोग नहीं होंगे, अगर हुँगे भी, तो धर्में अंदर ही बैठें। सब परखार के वहाँ वो चिलकाल तक मिज्जे रहेंगे। ये इच्छा मननश के होती है। इसका नाम हो गया लोकेशना। अब दूसरे पुत्रेशना। तो लोकेशना पूरी करने के लिए यागाधी करो। यग याग अदी से परलोक की प्राप्ति होगी। तो उसके लिए बित्तिष्णा। यग याग अदी से बिना धन के नहीं हो सकता। पैसा एकठा कर लो। तब यग होगा। तो बित्तिष्णा मन गई। और फिर इस लोक में सुक के लिए पुत्रिष्णा। पुत्र होना चाहिए। एक बता रहा था हमको कि एक सादु था वो किसी दुकान दार के आगया उससे कुछ मांगा तो उसने जब नहीं दिया तो वो क्रोत करने लगा उसपर कहा हम क्या समझा तुमने हम को हम तवस्पि तमारी कितन साल की तबस्चा है। वोले हमारी तबस्चा बारा साल की है। तो वोले ठीक हैं। हम देखते हैं तमारी तबस्चा बड़ी की है। एक दुकांदार था किलो एलो रहते हैं न सेल। बाड़। उसने उठा के सड़क में फेग दिया। कहा इसको उठा के हमार اگر تمہاری اندر طبسہ ہے تو یہ مارٹ اٹھا کے ہماری وکھاں میں رکھ دو۔ اب وہ رکھ نہیں پایا اور اس نے اپنے بیٹی کو بلائے، بارہ سال کا بیٹا تھا۔ کہا بیٹا یہ مارٹ اٹھا کے، پھلانگے اس نے لگ دی کہ تمہاری طبسہ بڑی کیا ہماری؟.
क्या हुआ? एक प्रियोग।.
बांट उठाने वाला। तो बतना वी है कि ये किस बिशा में बोल रहे थे हम? पुत्रेश्ना। पुत्रेश्ना। पुत्रेश्ना। पुत्रेश्ना। पुत्रेश्ना।.
पुत्रेश्ना। पुत्रेश्ना।.
इस पुत्रेश्ना। लोक में पुत्रेश्न पुत्त से जीता जा सकता है। तो मनुष्य पुत्त उत्पन करना चाहेता है। तो पुत्त सुक देगा। जब हमारे पैर में दर्ध होगा, तो पैर दबाएगा। तो सुक मिलेगा पुत्त से। सरी पुत्त उतपन करना चाहिए। यह मन में भावना आ जाती ह आजकर के पुत्ते तो ऐसे हैं। पिता ने कहा, पुत्ते हमारे पेर दर्ध कर रहे हैं। पेर दबा दे। कहा, महराज, पेर से तो आप कहीं जाते नहीं हो। बूलते जादा हो, कोड़ गरह दबा रहे हैं।.
तो.
यह कह रहा है कि तीनों प्रकार केशना हैं। लोकेशना में यह दिक्कत क्या है। स्वर्ग में क्या तकलीप है वह। तकलीप। हैं।.
वापस.
आना पड़ता है। यह बड़ इतनी नहीं है। वहाँ कुरसी.
अलग-अलग है। पुर्णों.
का तार्थम हैं। तो जिसके जदा पुर्णों गे उसकी आसान उच्छी होगी। और जिसके कम होगे उसकी आसान इच्छी होगी। तो उन्हें इस बात का जनन रहेगी कि यह हमसे उच्छा क्यों ब तो ये परिशानी अपने मरतलोक में तो नहीं हो सकती। आज आप ठानेदार हैं, तो आई-जी हो सकते हैं। जैसे हमारे द्वालेरिये हो गये हैं। आई-जी हो के रेटाइड हुएं। पहले थोड़े नीचे क्रेड में थें। एस्पी थें। दी-एस्पी थी पहल फिर आई-जी बनें। तो ये आई-जी बन सकते हैं इस लोक में अच्छे काम से। वहाँ तो जो बन गयें तो बन गयें। तो वो जड़न प्रेजा होती है। तो मनुश को इस बात का सुख नहीं मिलता है कि हम कोई सग बन गया। वहाँ इसको मिलता है एक क्यों हो गय वहां पर नहीं नम कृता कृते तफता है। नहीं नम कृता कृते तफता है। कृत अकृत मतलब यह है कि जब वहाँ स्वर्ग में जाता है तो यह सोचता है कि अगर हमने अच्छे कर्म और कर लिये होते तो इस से बड़ी कुर्सी मिलती है। वो हमने किया नहीं। तो यह अकृत तपाता है। और कभी कृत भी तपाता है जब नर्ग जाते हैं। लेकिन जो घ्यानी हैं, जो पुर्ण पाप से रहे थें, इशना तरह का जिसने त्याग कर जिया है नाकरवं किसम साधुं पापमु करवं। एक तो यह हो गया, तार्थम है। तार्थम में बड़ा दुग्दी था। हम लोगोंने देखा कि दाने, बाए, बैठने में आदमियों के आपर्ति होती हैं। आसन में अगर माये तरब बेठा रहो करवा हमको चोड़ा समझते हैं। दाहने बेठने चाहिए। तो यही सब आसन थोड़ा सा नीचा हो जाये तो बड़ा कष्ट होता है। स्वामि करपात्र जी ने शङकरनन्द को कासी पीठ अधिस्यार बना जिया। तो एक तो वो तुस सिन्हसन ले के गया । और उनके लिए तखत थोड़ा उंचा बेशा दिया गया। इसी भी नाराज हो गया। फर दक्षिना के बाद आई। दक्षिना के बाद आई। तो जो दक्षिना दिया रेज्मान लोगों ने तो उसने गिना। और वोल्हों को क्या दिया विड़ों को क्या दिया। अब उन लोगों जाके बता जिये। कि ऐसा कह रहे थे। उसके बाद उन्होंने उसकी तरह दिश्टी ही नहीं की। ऐसा त्यागा उसका। उन्होंने बनाया था। तो यह हरत होती है। तो कहने का मतलब यह है कि जब मनुश के अंदर मान आ जाता है, तो फिर थोड़ा सा भी अफकर्स नहीं दिखा जाता है। तो वहाँ सर्ग में आपको यह अफकर्स भोगना पड़ेगा। आप कुछ भी करें, इंदर आसल में तो नहीं बेट सकते। इंदर तो उपर ही बेटेगा। बगल बाला भी आ� अब तो वहाँ पुर्ण कर नहीं सकते। वहाँ तो अगर पुर्ण बढ़ाना है, तो यहां लोड़ के आओ। यहां लोड़ के भी नहीं आ सकते। जब तक तुम्हारी आयू है, तब तक वहाँ रहनी बढ़ेगा। यह परिशानी हुआ। इसलिए स्वर्ग में भी दुख है मनुष्य को सबसे जादा दुख अपने से बड़े को लेकर होता है। किसी वेक्ति ने किसी देवता की आरादना करके बरदान मागा कि हम जो चाहें सो हो जायें। जो संकल्प करें वो पूरा हो जायें। तो देवता बोले तथास्तु। अब वो घर आया। घर आया तो उसके गाउं के बाहर कूआ था। तो वहां से पानी लेके उसकी अउरत आती थी। उसने संकल्प किया कि हमारे आगन में कूआ हो जाये। तो देवता ने कहा था कि जो तुम चाहोगी वो हो जाये लेकिन तुम्हारे पडूसी को उससे दुमना तो उसके आगन में कूआ हो गया पड़ोसी के हाँ दो कूआ हो गया तो वो सोचता था कि पूरे गाँ के लोग हमारे आगन में आएंगे वो जाने लगे पड़ोसी के हाँ बरसात आई तो उसने संकल्प किया कि हमारा दो मंजिल मकान बन जाये तो वो बन गया लेकिन प� वो संकरपूरा होता जाये लेकिन पड़ोसी के ओसे दुगना होता जाये तो वो इतना जल गया कि उसने ये संकरप कियें कि हमारी एक आँख फूर जाये जिससे पड़ोसी.
की दोहरे फूर जाये यह.
उद्ध है तो इसलिए लोकैशना ये सब बातें बिचार से आती हैं। जब सस्संग में बैठते हैं तो ये सब भावनाये निकल जाती हैं द्माग से। तो लोकैशना और वित्तैशना और पत्तैशना ये तीनों से विमुक्त होकर अपने आपको बिना ख्याती के अप्रख्यापन करता हुआ। यह नहीं बता कि हम बहुत वड़े ज्यानी हैं कि क्या हैं कुछ नहीं। यह.
हो गया? और.
फिर यह बता है, यह बता है। ननुपरापल देवयो। अरे हाँ, अभी यह बात है। ननु परापर देवयो सुरी पूर्वक प्रामस्य साथ जाई। विक्रियायस्य करता विदया। परिवन्दात कथं मिदुशो। जनवलाचर नमिति तत्ता हो। कहते.
हैं कि परापर.
देवयो हो। सुरी पूर्वक प्रामस्य। शाधाजी क्रियायास्थ कर्षब्यतया। कहते हैं परदेवता हो ये चाया परदेवता हो। उनकी सुथी करना चाहिए। सुथी पूर्वज प्रणाम करना चाहिए। ये कर्षब्यता होती है। और अपने पूर्वजों के लिए शाधाजी भी करना पड़ता है। वो भी कतब है। इनसे प्रजिवन्द होने कारण कतम भी कुछ हो। जर्वदाचनम। विद्वान पर जर्व के समान कैसे रहेगा। उसको यह सब तो करना पड़ेगा। बंदेर जाएगा तो पनाम करेगा। किसी देवता हुए तो उनको पनाम करेगा। स्राध का मौ तो जरके समान कैसे होगा? तो निस्तुती तथाभी जीविता क्वापी सातव्यक्त्वाद आशम उद्धिष्यं प्रवृत्ते आवश्गत्तात कुतों जरजवादिष्यं इच्छा जंगाय चरियती। तो वेले ना तो इस्तुती करें, ना नवसकार करें, पर ना नि फिर उसकी मार्ग क्या करें। चलंचा चलंचा चनाचले। ति निकीतु यस्वास्या सतसा यति दियावत। कहते चनाचल निकीतस्या। दो तरे का मार्ग, निकीत मने स्थान होता है। तो यति के लिए बदाएंगे ना चल ना चलने। चल आश्राम भी ना हो, अचल आश्राम भी ना हो। चलता जाएगा। मुर्ण.
करता जाएगा। चल आश्राम नहीं करता जाएगा। आश्राम.
भी ना हो, अचल आश्राम भी ना हो। चलता जाएगा। मुर्ण करता जाएगा इसे नमस्काराज सर्वकर्वाजितस् चत् सर्वाई वाईशनाई वाईशना प्रिजपन्न पारमहन्स परिब्राज्जे चविप्राया। कहते हैं प्रिजपन्न पारमहन्स परिब्राज्जे परिब्राज्जे हो जाये। सन्यास ले से। ये तवात्मानमिरित्मा चदि सुत तद बुद्धिया तद आत्मानं कस जन्निष्ठास तद पुरायना।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। प्रदिक्षन मन्यता भावात अजनं आत्मतत्तम् चल सरीर सरीर के हाँ प्रदिक्षन मन्यता भावात सरीर जो प्रदिक्षन दूसर होता जाता है कैसे होता है? सर्डुनकार सर्डुनकार हाँ जायते बरसते अपक्षियते हैं। और यह आप प्रतक्ष देख सकते हैं कि आप स्मास लेते हैं और छोड़ते हैं। अगर एक बार आपने स्मास ली और छोड़ दी तो वो परिवर्तन हो गया, दूसरी स्मास करते हैं। पहली स्वांस में जो आप थे, दूसरी स्वांस तक आप नहीं रहेंगे। क्योंकि अधिया आप उस स्वांस को रोक रहें, तो मरे जाएंगे। तो वो स्वांस वाहाँ छोड़े दिया आपने। तो वो बदल गया, वो स्वांस वाहाँ सरीर छोड़े दिया। दूसरी स्वा हर सर में आदमी मरता है और चन में जिन्दा रहता है। यह चन है। प्रतिक्षन परिवर्तित होता रहता है शरीर। लेकिन यह है कि दिखाई नहीं पड़ता है। कैसे नहीं दिखाई पड़ता है। जैसे ककडी है, कीरा, तो पहले छोटा से होता है। फिर बड़ते बड़ते बहुत लंबा हो जाता है। तो किस दिन ये लंबा हो गया? ठीक साथ नहीं होता। वो क्रम साथ बड़ता है। आम की अमियां छोटी सी होती। लेकिन फिर किलो भर का आम हो जाता है। वो इतना बड़ा कब हो गया? ये कहना हो ये निरंतर परिवर्ति इसी तरह से हमारा इस सरीज जो है चाल है। प्रदिक्षनमन्यतामावात अचरमात्मतत्म अचरात्मतत्म। यदा कलाजित बोरिनादी भिवार निमुत्तम् आकासमत अचरवूपमात्मतत्म आत्मनो निगेतम् आशेमात्मस्थितिम् विष्मित् आमितिमन्यते यदा तथा चलो जेहो निकेतो यस्व स्वयमेवं चराचर निकेतां विद्वान नपनर्माये विश्यास्या सचयादेच्छिको भवेत एरिच्छा प्राप्त कोपीनाच्छादन ग्रासमात जेहस्तु तुरिच्छरतां ये ठीक है आपना कहा था चराचर निकेतां तो चल कहते हैं चल सरीन है अचल आत्मा है.
तो कभी.
जब भूँ प्यास रखती है तो सरीन में आत्मुद्धी चोड़ी देर के लिए हो जाती है तो चलनिकेत हो गया। चलनिकेत हो गया तो क्या करें। चुद्धा एक व्याधी है। उसका रोज इलाज करना पड़ेगा। तो भिक्षा रूपी दवा खा लो। कई रोग ऐसे होते हैं। जिनकी रोज दावा करनी पड़ती हैं। वो लूर नहीं होता। तो भूख रोग ऐसा है जिसे रोज-रोज होगा। तो रोज-रोज इसके इलाथ कर लो। और फिर भूजन करने के माद आत्मा में इस्तित हो जाओ। फिर और प्रभजना करो। इसलिए भिक्षा का मौका तुम तुम्हें आत्म चिंतन में कोई ही बाधा नहो। आत्म चिंतन में कोई बाधा नहो। हमारे पास एक वेक्ति आया। पुरे महराज हम भजन करना चाहेते हैं। और हम कुछ कुछ नहीं चाहें। हमने कहा ठीक है करो भजन। जाओ विचार सिला के पास बैठ जाओ। वहीं हम भुजन पहुचाएंगे तुमका। तो हमने विवस्था कर जीने। पर भजन कहा होता है, फिर चाय की अच्छा होने लगी। भुजन मीर तरह का अच्छा नहीं लगे, तो वो घर-घर जाने लगा। तो हमने कहा, फिर ऐसा है कि अब भजन तुमसे होता नहीं, सेवा तो बिना सेवा के तुम नहीं रह सकते हैं। या तो भजनी करो। या भजन नहीं हो सकता, तो फिर जो समय बचे, उससे आश्णम की सेवा करो। नहीं तो उत्तम कलप तो यही है, ठींग है। इसी तरह से घ्यानी जो है। वो अपना सुधा की निर्वित्ति के लिए उसको वि उसके आत्मचिंतर में बादार ना पड़े। गरस्तों से कह दिया कि भाई, यह भजना नंदी है। इसको वो जंदी दिया करा। आत्मचिंतर.
कर रहा है। तो.
भिक्षा के दारा अपना छिदा प्रपासा दूर कर ले और उसके पस्चात अपने आत्मा में इठित हो जाये� पर आकास के समाचल रूप आत्मतत को आत्मा का निकित आश हैं। आत्मस्तिति को विश्मित तो हमें जीवन निते हैं। अपने सुरुफ को छोड़ के सरी में आत्मद्धी हो जाये तो चर हो गया। चर उसका निकित हो गया। और फिर उसके बाद आत्मस्तित हो जाये तो अ� सच यादिश्चिको भवेत यादिश्चा प्राप्त कोपीना चादन ग्रासमात अधिहस्ति यादिश्चिका यादिश्चिका कार्थ किया.
है स्वास्त्रा.
ननुमत प्रेतन विदेविकु यादिश्चा तया संतिष्टो स्वास्त्रसि अननुमत प्रेतनसि यदिश्चा प्राप्त कोपिनाच सादन यदिश्चा मानन स्वामाविक रूप से सहज में कोपिंग मिल जाए ढहा करने के लिए अचना मिल जाये और ग्रास मात भोजन मिल जाये उससे देहस्ति अपने कर ले। हो गया? अब इसकी थी कहा? ही कहा हो गया? वही मतलब सभाभी रूप। ननु क्रापर देवेव सुत्रि पुर्वर्ग पुर्णामस्त सर्शार्धें कि पिरिक्रियास करता बितया। पिरिद्वन्जात कथं विद्सो जर्वाजनमिति तत्तानि सुत्रि। सताभी जीविता क्वावि सातव्यत्त्वात् आश्रेम उद्धिष्य प्रवत्ते आवच् तरही थी। चलंचाजनंता चलाचरित्ति। निकितो यस्साचरेस तथा। तथापि कोपिनाच्छादन अशनपानादि देहत्ति प्रयुजकाप्रिक्षिया। प्रिवर्ति ध्रम्यात् नमिद्सो जर्तोल्लेत्वा। भुजन की इच्छा तो रहेगा, जर कैसे होगा। तो पूर्वार्णाक्षिनानिवैचच्छे। कैया। बनास्रमाभिमान्वताः। कत्तत्कर्मदुभर्तमानस्य। कत्मदंविशेष्णमित्यसंक्राहा। चक्तेकि। सबकुझिस्नावोंकर छुड़ दिया। पारवं परमहनस्वारेवराज्यम् प्रिजबत्युम अशक्यम् को प्राप्त करना अशक कहें क्योंकि प्रामानिक नहीं हैं। ऐसा गहों ये गलत बात है। सुतिस्मुति प्रशिद्धत्वात। सुतिस्मुति में ही प्रशिद्ध हैं। विजित्त्वात्या बात कम बेदरं। वित्यान हेतुत्तेन उच्छते। विजित्त्वा कह दिया न पहले सामान रूप से बिदित हो गया, सामान रूप से बिदित होने के बाद विश्वित रूप से जानने के लिए फिर सन्यास ले जाया। तस्मिन्नेव परस्मिन वस्तुनी विश्वानतर्व व्यारुत्ति वुद्धेनी विश्वानतर्व। थदेव परम् वस्तु आत्मा ایسا جو برم بستو آتما ہے، اینے روپ چری تھا روپ، ایسا ہم تصور کر دیتے ہیں، تس منیو پرسمن آتما نشتہ نشہنم، و تضمدی تضات مانم کا عرض کر رہے ہیں۔ کہتے ہیں، اُسی برم بستو، پرسمن بستو میں، بشیانتہ سے بیاورت مددی جو ہے، तद बद्या हो जा। तदेव परवनस्तु आत्मानुरूपतरितं सुरूपं। और वो भी पर है। परमस्तु माने आत्मानुरूपतरित। माने स्वावारुक सुरूप जिसका है। वो प्रदात्माना। तस्मन्यो परस्मनात्मनिष्ठा। उसी परस्मनात्मनिष्ठा। इत्तर निष्टा हो गया। तदेवा आत्मभूतं परम मस्तु परम आयनं परागति। वही आत्ममस्तु परम आयनं परागति। जिनकी है वो पराजन। आय सब्देन सर्वकर्मानि मनसा। सब कर्माओं का मनसे त्याग करके त्याजवाक्य मुझे जन। कदापनस्चरुदेह विवख्षेते ही काल विशेशे। विवख्षेते ही काल विशेशे। विवख्षेते ही काल विशेशे। विवख्षेते ही काल विशेशे। विवख्षेते ही काल विशेशे। विवख्षेते ही काल विशेशे। विवख्षेते ही काल विशेशे। विवख्षेते.
ही काल.
अभी वि सूर्विदि शासम् विश्विशासम् भावर्त्यम्।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� باہی بشیہ، نبو نہاں؟ باہی بشیہ؟.
تطنم.
آدھا دھکم دستور तत्तं दिर्ष्णातु माहियता। तत्ति भूत तदारामहा। तत्त्वा तप्रच्छितो भवेत। अहमेव करम्ब्रह्म नमत्तो नियस्ते। बाहियां प्रशुब्याजी तत्मां आज्यात्मिकं च देहाजी रक्षनम्। बाहियां प्रशुब्याजी तत्मां आज्यात्मिकं देहाजी रक्षनम्। रज्जु सर्पाजिवत् सप्नमायाजिवत् च सत् बाहियां और आंतर तो बाहियां प्रशुब्याजी और आज्या स्वप्न माया के समान असथ हैं। वाचार मुनम् विकारो नामधेयमि तरी सुते हैं। आत्मा चास भाईया भ्यंतरो यजा। आत्मा न तो भाईये न भ्यंतर हैं। अज हैं। अपूर में अनंतर हैं, अभाईये हैं। कृत्न हैं। आकास वस्तर्वगता। सू निश्क्रिये। वो ही सत्य है। वो ही आत्म है। तत्तमस्यी। इति सुते हैं। इत्तेवं तत्तम् जिष्ट्वा। इस वगाद तत्त को जान कर। तत्ति भूतस्तदारामः। तत्ति भूतो कर तदारामा नवाहे रमनो। बाय विश्व में रमन न करके। यथा अतत्दर् चरितमात्मानम् मन्यमानः। तत्वाचरितम् भियाजिभूतमात्मानम् कराचर्मन्यते। रच्चतोवामात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात्मात् और जब छित चंचर होता है तो अपने आपको भी चंचर मान लेता है। तो वो यह समझता है कि तत्वाच्छरितं दिहाज़ भूत मात्वानम्। तत्तु से चरित होकर दिहाज़ भूत आत्मा को कभी मान लेता है। तो यह समझता है कि प्रछत्वामात्म तत्वात्म। में � यह इसमें लिखा है। सुराजने सुरुपात। यदानियों काश्यावस्तम् तसातूर्देश्वसात। क्या हुआ? प्रच्चितोभारमात्मा अन्तनिकम्प।.
वो.
शरीर को ही जब आत्मा मान देता है, तो पहले शरीर था है सूल, अब हो गया क्रिश, पहले हम प्रच्चित हो गयें, तो ये हो जाएं. अब अतत्तवित्ता की बात कर रहे हैं न, तो वो अपने को समझ लेता है, आजीमी.
हो देखता है। ऐसा.
है बड़िया बता है कि कुछ लोग अपने को आत्मभाव से रहित होकर चित के साथ जोड लेते हैं। चित जब चंचल होता है तो कहते हैं हम आत्मा से चित हो गये हैं। क्योंकि हम आत्मा में चित नहीं हैं। वो ये समझते हैं कि आत्मा में हमारी जो इस्तिती है वो चित के अधिन है। चित यदी स्थिर होगा तो हम आत्मा में स्थिर रहेंगे। चित यदी चंचल होगा तो हम आत्मा से प्र तो आत्मा से कभी प्रच्चत होते हैं। सीजी मात है। चित के बीचे क्यों लोडते हैं। तो जो घ्यानी है, जो आत्मतत्व को जानने वाला है, वो स्वरुप से कभी प्रच्चत नहीं होता। कहते हैं एक बार, ये विशय चला ग्यानी विचारकों में कि कौन पक्का तत्वदर्शी हैं किसको पूर्ण रूप से ग्यानी तत्वदर्शी माना जाया है तो परस्वर बिरोध हो गयां कि उन्हों भाई जो समाधी रिष्ट है जो ऐसा है वो ऐसा है गुनों के लिए कि लोग कहने लगे तो निश्य के लिए राजराजेश्वरी माता तिवरसंद्री का द्यान किया गया। वो प्रकट हुई। उनसे पूछा गया कि मा ये बताईए। घ्यानियों में स्रेष्ट कौन है। वो रहे जो समाजी काल में हैं, वो ही गोर ग्रहार काल में जो आत्मा से आप प्रच्चत अगर आसा आप समझते हैं तो अभी आपका घ्यान कच्छा है। ये सिधारती.
हैं। हो गया?
तो तत्तुसी अच्छरित हो गया। जे आत्मात्मूत अपने को मान के। कहते हैं मैं आत्मात्मूत तत्तुसी बिच्चरित हो गया। और समाहित्मन हो जाये तो बरिया हम नसात्तदात्मविद्भवेत् आत्मविद्धवेत् आत्मविद्धवेत् आत्मविद्धवेत् आत्मविद्धवेत् आत्मविद्धवेत् आत्मविद्धवेत् आत्मविद्धवेत् आत्मविद्धवेत् आत्मविद्धवेत् आत्मविद्धवेत् साप्रेचुतात्मनाः आत्मतत्त दर्शिनाः। साप्रेचुतात्मनाः आत्मतत्त दर्शिनाः। साप्रेचुतात्मनाः आत्मतत्त दर्शिनाः। साप्रेचुतात्मनाः आत्मतत्त दर्शिनाः। साप्रेचुतात्मनाः आत्मतत्त दर्शिनाः। साप्रेचुतात न काल विशीश नहीं तम किन्तु नज़ितान कतब में।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� इसे जयान्मो करके परमार्त वस्तु स्वलोग आत्मा को जानकर उसी में अपने चित को लगाकर बाही मुर्ष्यों से ब्यावरित्त बुद्धी हो जाये उसी तत्त में जो परमार्त भूत है उसमें प्रथिष्टित होकर तद्धर्शन निष्ट हो जाये प्रसिव्यादी जो इन में किसी में भी अगर परमार्थ मानोगे, अदुईत निष्ठा कैसे सिद्धोती है। वो जब ही सबके सब आत्मा सारग नहीं है। रिज्जि सर्व के समान मिच्चा। ये बाचारहमन कारणदेव नामधेव यिस्वतिया। दिर्श्वात्मनों दिर्श्व प्रतियोगि आत्मा जो है द्रिष्ट का प्रतियोगी है। मुना द्रिष्ट भी सत्य है। तो बोले कैसे बनेगा। तो बोले कि ऐसा नहीं है। आत्मा चेती, आत्मा जो है वो एक रस है। बाया भेंदरो जैजुवा पूर्वा अनन्तुरमाईयाय। भहुतु बरस्ते आत्मानत्तो जत्ताओ थागो मर्जानी जिन्जी सांत। उक्तु रक्षनत्तुम तथाभी। देश्वरात्मनुर्ण ततुक्तुरुपत्तुम इत्यासंक्यानि जत्सत्ते। मुझे जत्ते। विशेष्णानि दूपराज्जीनानि। ततु दाइगमो पात प्रत्यगात्मा में ही पंचत्र जो होता है मुझे आत्माराम। तत्वालाप्प्रछुतों भागे। इसका अर्थ क्या हुआ? बित्रोखे मुझे, अतत्वदर्शी। आत्मविदो ना ब्योवस्तितं आत्मदर्शनम। आत्मविदता का अप्भ्योवस्तिता आत्मदर्शन इसलिए उसका प्रिष्योद नहीं हो सकता। बस्तुद है, सदिक रूप है, और उसमें उसकी तुतिय सुनिदरी प्रिष्योबकार जी, पंडिता समधर्सी नाम। समसर्वेश भूतेशु। ये एसी जो हैं, वो ही पंडित होते हैं। सवरुप से आप.
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इति स्री गोबिनोहरत्पाण सिश्यस्ये परमंज़ परिवराजकाचारी संकरभगोत। नोता कृतायु कृतों गुर्बादिये आगं सार्भाषे। वितात्ताक्युं दूतियो प्रकर्णों। अबों मर्द्रम् कर्णे विष्णयाम देवा। मर्द्रम् बस्ये माक्षिवि प्रस्वेम देवे कम्यजायो सस्तिन इंद्रो वृद्धस्रवा सस्तिन पूषाविष्वेदा सस्तिन स्तार्ख्यो रिष्ठनेमि सस्तिनो ब्रिहस्पतिरदनातु.
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