Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 11

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Chapters
Suci कोई विशेष विज्ञान नहीं रहता है। इसलिए उसमें से तो में भूत पूर्व, भूत पूर्व रात। तो इसको कहते हैं भूतपूरी पहले, इसमें पहले प्राग कहलाता है? यह इसका विशेष प्रकार का ज्ञान है। इसलिए यह प्राक् a, a, a, a sa साधारण रूप प्राज्ञ gamsioprजञiरकहते है। प्रज्ञ जिसका स्वरूप है, वह प्राज्ञ दूसरा अर्थ किया। हाँ, आज तो नहीं है। तो यहाँ पर सब उसको को क्यों लागू किया? अथवा करके भगवान भार सरकार बोले प्रज्ञ मा प्रज्ञप्ति क्या है? गिन रहित जो ज्ञान है, वह प्रज्ञप्ति है। जितना भी ज्ञान होता है वह गियों पर रक्त होता है। जिस शो पर रक्त दृष्टि होती है। to w शुद्ध गान नहीं है। अब हम जब देखते हैं गत ज्ञान, पर ज्ञान, मत ज्ञान। तो यहाँ जो ज्ञान है, ज्ञान तो कहीं है, लेकिन घट मठ पट इसलिए रंगा हुआ है। है। तो जैसे हमारा कपड़ा अगर कपडे में चित्र बने हुए हैं तो चितचितपटजोहैं वो पट से बनी नहीं है। पर तो कई है लेकिन चित्र अलग लग है। तो चित्रों के अलग होते हुए भी जो है ये कई है। उसी प्रकार यह संसार का जो हमको ज्ञान है, वो चित्र पट के समान और जो सुसुप् का ज्ञान है, वो कूरापटजिसमे किसी प्रकार का चित्र नहीं है। जैसे शायद कल भी हमने बताया था। हमलोग दर्पण में दर्पण देखते है तो दर्पण जो दिखाई पड़ता है, उसे अपना चित्र भी दिखाई पड़ता है। प्रतिबिम्ब सहित दर्पण को हम देखते हैं। 1 ऐसी अवस्था भी हो सकती है। जबकि हम प्रतिबिंब को न देखे। केवल दर्पण देखे। तो केवल ज्ञान में ये सब विषय भाषित हो रहे हैं। मुझे केवल ज्ञान है। वो केवल ज्ञान जी बात तो सुशुप्तवस्था में ज्ञान तो रहता है, लेकिन कुछ नहीं रहता। इसलिए वो गेहूं होने के कारण प्रज्ञा माता इसलिए उसको प्राप्त रहता है। बाद में उनसे विष विज्ञान है। इसलिए बाद sri, he, she, srupasrvisrgsवरop में होने sarva, bedmatsबकाesia, ismat जापतंदरभूोअन्य शामिल है। इससे भिन्न कोई अन्य अन्यों का जापतंदरभूतहोता वैसा नहीं है। barsat masti तो यहाँ तो जागरित सपनों सुषुप्ति तीनों अवस्थायें, दृष्टि और समस्त को लेकर बताई जा रही है। तो समझती सुषुप्ति में ये स्थिति बनाई है। raja प्रधान स्वरूप क्या है। उपहार प्रावधान को चाक करके, चरित्र का प्रावधान लेकर अन्यथा स्वतंत्र न पत्ते है। यदि ऐसा नहीं होगा तो स्वतंत्र नहीं बनेगा। नई का दोस्तों ishwar को वो a, a, a, a, a, a, a, a, a, a, a, a, a, a, a, a, a जो नायक है, वो ईश्वर को निमित्त कारण मानते है। और परमाणुओं को उपधान कारण मानते हैं। तो ईश्वर तरफ है। तटस्त उसका क्या है उपधान से भिन्न होकर, उपधान परमाणु उनसे होकर और जीव से भी वन से हो जाएगा, जीव से भिन्न हो जायेगा, जी में चला जायेगा। a, a, a a su पच्चुमानेईश्वर पत्चुबानीइश्वर उसको केवल निमित कारण कहना उचित नहीं है। क्योंकि उसको ऐसा कहने से असमंजस हो समजा, असमान हो जाएगा। लो के निमित कारण। but a a हां, ये कह रहे हैं कि आप ईश्वर को अगर केवल निमित कारण मानें। जैसे कुम्हार मिट्टी से घड़ा बनाता है। तो मिट उपादान कारण और कुम्हार निमित कारण। इसी तरह से संसार का उपादान कारण परमाणु है। और ईश्वर निमित कारण। नैयायिक लोग मानते हैं। तो इसका खंडन किया है। असमंजस हो जाएगा, कैसे हो जाएगा। बोले जो कुम्हार है, कुम्हार का मतलब है, वो घड़ा क्यों बनाता है, उसको घड़ा बना कर पैसा कमाना है। कुछ चाहिए, उसको का बनाया वो इतनी मेहनत में क्यों करेगा? इसलिए कि उसका किसी वस्तु में राग है। और उसको प्राप्त करने के लिए जबकि अपेक्षा है, किसी में देश है, उससे बचने के लिए भी। जब की अपेक्षा है। तो राग। देश से प्रेरित होकर ही कोई किसी वस्तु का निर्माण करता है। ईश्वर जगत का निर्माण क्यों करता है? अपने लिए, अपने लिए करेगा तो अपने लिए। तो उसको जरूरत नहीं है। और फिर जिसका निर्माण कर रहा है, वो जिन जीवों का निर्माण कर रहा है। मतलब जीवों को शरीर दे रहा है। तो सबको 1 से शरीर को नहीं देता। किसी को कुछ, किसी को किसी को मूर्ख बना दिया, किसी को बुद्धिमान बना दिया, किसी को सुंदर बना दिया, किसी को सुंदर बना दिया। तो संसार में जो विषमता देखी जाती है, वह विषमता। ईश्वर अगर बनाता है। बिना कारण के। तो उसमें बेशम निदोषता है। माँ ने उन्हे कपट किया, किसी को अच्छा बना दिया, किसी को बुरा बना दिया। अब आप समझिए कि कोई मिष्टी है, दीवार बनाता है तो किसी ईट को नीचे रखता है, किसी ऊपर रखता है, ऊपर नीचे, तो करता है। करे मकानी कैसे बनेगा? इसी तरह से दुनिया में अगर भेद न करें, परमात्मा तो सभी ही रहे। तो ये भेद बनाया। तो भेद बनाने में। कुछ। तो यह ईश्वर की इच्छा है। तो ईश्वर की इच्छा है। ऐसी उल्टी क्यों है? तो जिसको अच्छा बनाया गया, बनाया, उससे उसका प्रेम, जिसको बुरा बुरा बना दिया, उससे उसका देश बहुत से देखते हैं, लड़के लड़कियाँ, चल, फिर नहीं सकते हैं। दिमाग का विकास नहीं हुआ है। ऐसा क्यों बना दिया भगवान ने? होता है, कोई मर जाता है। तो जिसका मर गया, वो गाली देता कि इस ईश्वर ने ऐसा क्यों किया, हमारे साथ ऐसा अन्याय किया परमात्मा ने। बहुत लोग तो सारे राम शिला फेंक देते हैं कि तुम्हारे रे, हमारा ऐसा हो गया, हम तुम्हारी पूजा नहीं करेंगे। तो ये ईश्वर में संभावित हो जाएगा। अगर केवल मान माने, बता, उसमे वो बात नहीं है। समाज समंजसहोजाएगा इसलिए ईश्वर है। अभिन्न निमित का कारण वो खुद ही संसार बन जाता है। यहाँ तो उत्तर यह दिया गया है कि परेल में सब बराबर सोएगा। उसके बाद सृष्टि जब भगवान बनाते हैं, करते हैं तो सृष्टि के सिटी में का बनाने का उद्देश्य उन जीवों को उनके कर्मों का फल देने के लिए बनाते हैं। तो जिसके जैसे कर्म से, उनको लेकर वो सोया था, उसके अनुसार यहाँ पर शरीर दे देते हैं। तो कर्म के अनुसार परमात्मा ने सृष्टि रची है। उनका, इसमें कोई राग जूस नहीं कर्म प्रधान। विश्व करि राखा जो करे सो, पर करम प्रधान है। और फिर असल में बात ये है कि सृष्टि क्या है, वो खुद ही पड़ रहा है। जो दिखाई पड़ता वो है नहीं। आगे बताए। se na sn bna a to b a a din is a a a a a a a a a a।
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