Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Pravachan 10

Transcript excerpt of a pravachan by Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji (Chaturmas 2012, video Pravachan 10). The speaker opens with Sanskrit invocations to Rama, stresses the centrality of Sanskrit and the Vedic tradition for preserving Dharma, and defends the authority of scripture and parampara (lineage). He explains the transmission of yoga from Vivasvan→Manu→Ikshvaku, outlines the three Vedic sections (karma, upasana, jnana), and applies scriptural norms to ethical questions (meat-eating, rituals, purity, charity, punishment). The discourse mixes scriptural citation, practical examples/anecdotes, and exhortation to follow dharma and traditional practice; it ends with devotional chants.
Chapters
तरणिषत सभर्णं कार्मगूर्णद्धिरेवा वरिकरित कभोरोड्धान दामाविरामं दिरिष्यदिरिसुताव्या नारितमित्यहं के सजणवरणश्रीलं स्रीने विग्णराजम् कल्याणानां वृधानं कलिमलमतनं पावणं पावणानां पाथेयं जन्मूक्षो सपधिपरपदः प्राप्तः प्रत्तिकत्य विष्रामत्तानमेकं कविवरवचसां जीवनं सज्ञनानां बीदं भर्मद्यमस्तप्रभवतुवतां भोतयेरामराम। श्रीराम जैराम जै जैराम। śrī rāma jay rāma jay jay rāma śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma śrī rāma jaya rāma jaya rāma धर्म की अधर्म का प्राणियों में विष्य का गो माता की गो हत्या हर हर वहारे।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। संस्कृत दिवा से बग्वान हया दुरीव का अवतार दिवस भी है। अभी आपने संस्कृत क्या वस्तु है और उसका क्या उप्योग है इसके संबन्य में सुना अमारे वेद, वेदांग, स्मृतियां, पुरान, और रामायन महाभारत, यह सब संस्कृत में हैं। संस्कृत के ही माध्यम से हम अपने प्राचीन को, परंपरा को, दर्शन को समझ सकते हैं। और परंपरा से ही जो घ्यान प्राप्त होता है उस पर हमारी सद्धा और आस्था जिर हो सकती है। तो ये समझ दीजिये आज जो इस्थती है बहुत से पंथ मिकर रहे हैं कई प्रकार के लोग खड़े हो जाते हैं और वो खड़े होकर कहते हैं मैं जो कहता हूं वे सर्वश्चेष्ट हैं और मेरे कतना नुजार आप लोग चलिये। ऐसे बहुत से लोग एक अपना पंठ निर्मान कर रहे थें। और कुछ लोगों को अपना अन्याई बना कर उनको अपने पीछे चलने के लिए प्रियरित करते हैं। वसुतहा व्यक्ति का अनुसरन अगर हम आप करें तो व्यक्ति में अनेकों धोष होते हैं वो एक तो भ्रमित भी हो सकता है प्रमाज भी उसमें हो सकता है उसकी समझ में कमी हो सकती है और उसके मन में लोगों को मूर्ख बनाने की भी भावना हो सकती है तो व्यक्ति पर विश्वास नहीं किया जा सकता है हम लोग जो हमारे अनाज या पौर्शे वेद है जो व्यक्ति के द्वारा निर्मित नहीं है, जो अनाधी है, और जिनको निर्मान करने बाला कोई नहीं है। हम लोग ये मानते हैं कि रिशीयों ने वेदों का निर्मान नहीं किया है। उन वेद मंतों के वो द्रिष्टा हैं। उनके हिदाय में उस मंत्र का एक स्वर्ण हुआ है। इसलिए जो लोग संजा करते हैं, बेद मंतर का पाठ करते हैं, वो ये देखते हैं कि एक मंतर के अनेक रिशी होते हैं। तो यदि एक मंतर का एक निर्मार्था अनेक हो, तो अदमें तो जगड़ा हो जाएगा। कि हमने बनाये कि तुमने बनाया लेकिन उनमें संभाद है कि जो मंत्र हमने देखा वो ही तुमने देखा वो ही तुमने देखा तो वो सब के सब उसके रिशी हो जाते हैं उन रिशीयों के दोरा जो वेद प्रकट हुआ सच्ति के प्रारम में उस वेद का वेदव्यास ने निर उसका संकलन किया उसमें से जो पज़ भाग था उसको रिगवेद की संजा देदी जो गध भाग था उसका नाम यदुरवेद रख दिया और जो गाया गया था उसका नाम रक्ष सामवेद रिग यजु साम और उसी मेंसे जो शान्तिक पूष्ठिक मंत प्रसथ खंगरीत किये गए उसका नाम अथरवेद्या का तो एक ही वेद के चार भाग महारशी क्रिणद देपायन व्यास ने किये था और फिर उसके पशार उस वेद को लोग समझ जाये इसके लिए इतिहास की रचना की वो इतिहास क्या है महाभारत और दूसरा इतिहास महरश्य बालमिकी ने रामायन की रूप में रचायता है तो ये दो हमारे इतिहास हैं इतिहास इतिहास इतिहास आथा जो ऐसा कभी हुआ था तो वो इतिहास महाभारत बतलाता है और ये बतलाता है कि जितने भी प्राचेन लोग हुए हैं विद्वान हुए हैं त्यागी हुए हैं महात्मा हुए हैं उन सब ने वेदों का शास्त्रों का अनुसरन किया है और उसी को परंपरा से माना है परंपरा का महात्रजिया है वेदों में किति सुच्छवधीरानां ये नस्तद्विचितक्ये ये हमने सुना है जीनों से जो अनोंने हमसे कहा इति सर सुष्म पूर्वेशाम यो न तद बिज्जडक्षिले जो उन धीलों से हमने सोना पूर्मोड से पूर्वेशाम सोना तो उसको हम जो अनुसरन करते हैं अनाज परंपरा से जो चला आ रहा है जिसको हमने धीरों से रिशी मुनियों से सुना रिशी मुनियों के रहस्त को जारेने वालों से सुना वो धर्म है इसलिए आप देखिए भगवद गीता में भगवान श्री किष्ण अर्जुन को योग का उपदेश करते हैं कर्मयोग का उपदेश करते हैं तो कर्मयोग का उप्देश करते समय अर्जुन के मन में यह शंका न हो जाये की स्री कृष्णे न यह नया पांथ चलाया है। नया मत चला रहे है। तो उन्होंने कहा अर्जुन इमम विवस्तते योगम प्रोक्तवान हमव्वयम विवस्वान मनवे प्राख मनुरिक्ष्वाक वेब्रवी एवं परंपरा प्राप्तो मिमं राजः स्रयो विदु सकाले नेमाता योगो नष्टप्परंतपो सहेवायम्यातिद्य योगप्रुक्तप्पुरातना भक्तोसिमे सकाचेति राजस्यम् येतवत्तमं भगवान बोले की जो योग मैं तुझे बता रहा हूँ वो उत्तम रहस्त है। रहस्तम योग में उत्तम हूँ। ये जो योग है ये उत्तम है और रहस्त है। गोप नहीं है। धारण करने योग है। कहा महाराजा आपको कहां से मालुग हो गया। पहली पहला आप बोल रहे ह तो भगवान बोले, सिष्टि के प्रारम्म में विवस्वान का जन्ग हुआ था। सूरी का जन्ग हुआ था। इमं विवस्वते योगम् प्रुक्त्वान आहम अव्वयम्। ये अव्वय हैं, अविनासी हैं। अर्थात ऐसा नहीं है कि पहले नश्ट हो गया हो। पिर हमने उसको जनमि दिया हूँ। वो पहले कर्प में भी था। ऐसा अव्ययोग मैंने विवस्वान को बताया। प्रोक्तवान हम अव्ययोग। और विवस्वान ने मन्वेप्रहा मनु को बताया। वो मनुने अपने पुत्र इक्ष्वाकु को बताया। और फिर उसके पस्चात इक्ष्वाकु वन्श में परंपरा से ये योग चलता रहा। इस योग के अंसार ही इक्ष्वाकु वन्श के राजा प्रजा का पारण करते रहे। और प्रजा का पारण करते हुए धर्म अनुध्यान करते हुए अन्त तो भत्वा सब ओर से वरक्त होकर परब्रम परमात्मा को प्राप्त होगा। परन्तु वो योग बहुत काल हो जाने के कारण खिन हो गया था। योगो नश्टपरन्त। ये नश्टपराय हो गया था। सेवायम्यातेज्य योगप्रुक्तपुरातन वही पुरातन योग में तुमको वद्धा रहा हूँ।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।। ब्रह्मतत्व का भूत उपनिष्टों के दारा, वेद के दारा होता है। वेदैस्य सर्वई रह्मेव वेद्यः। समस्त वेदों के दारा मैं ही वेद हूँ। वेद में वैसे देखा जाये तो तीन कांड है। कर्म कांड, उपासना कांड, और घ्यान कांड तो कुछ वेदमंत कर्म कांड का प्रित्वादिन करते हैं कुछ उपासना कांड का प्रित्वादिन करते हैं और कुछ घ्यान कांड का तो ये जो वुर्व कांड हैं कर्म और उपासना परग वेदमंत है इसे सीधे सीधे तो ब्रह्म का पुरिष्वादन नहीं करते हैं। लेकिन परमपरया ब्रह्म में ही इनका ब्रह्म ज्यान में ही इनका परियोसान होता है। जैसे कर्मकान। कर्मकान में कर्म का उद्दिया जाता है। जो तुम्हारा भरन है, जो तुम्हारा आच्छम है, जो तुम्हारे कर्तव हैं, सास्त्विद, उनका तुम पालिन करो। उन कर्मों का पालिन करते रोगे, वो ही धर्म है। सास्त्विद कर्मों को ही धर्म कहा जाता है। और सास्त्व के द्वारा निशिद जो कर्म है, उनक तो जो बात सास्त्रों में कर्तव रूप से बतलाई गई है वो तो धर्म है और जिसको नहीं करना चाहिए ऐसा कहा गया है वो अधर्म है जैसे आपने सुना हमारी पुछले प्रवचन में कि जब बाली ने कहा कि हमको आपने क्यों मारा तो भवान बुले, अनुज बदु भगणी सुतनारी सुनशट ये कण्या समचारी इनही कुदिष्टि विलोकै जोई ताही बधे कचु पाप न होई। तो यहां उन्होंने चार को कुदिष्टि से देखना अधर मना। अनुज बदु छोटे भाई की पत्नी और अपनी बेहन और सुत नारी अपने वेटे की पत्नी और कन्या कन्या चाहे अपनी होता है चाहे दूसरों की होता है जो छोटी कन्या होती है वो गोरी दुर्गा का रुप होती है उसको जो कुदिष्टी से देखता है वो पाप है ताही बज़े किस पाप नहीं होता उसको मारने से एसे व्यक्ति को जो अधर्म कर रहा है वो शत्ये के द्वारा बद्धे हो जाता है कुछ आपने हमको युद्ध में ललकारा हो था और युद्ध में ललकार के आप लड़ते फ़र हमको मारते हैं आपने सिद्धी मान मार दिया उन्होंने कहा यह है कि अपराजी को लड़के नहीं मारा जाता अपराजी को सज़ा जी जाती है जो जज्ज है वो जिसने हत्या किये उससे योद्ध थोड़ी करता है वो तो कलम से लिग देता है कि इसको फांसी दे दो तो अपराधी को युद्ध से नहीं बल्कि उसको दन्दित किया जाता है उसको युद्ध का मुका नहीं दिया जाता है तो इस समय पूरे भारत में पूरे भारत का समराट राजा भरत भरत का राज चल रहा है हसी खेल नहीं है और उस राजा के हम प्रतिजी हैं। इसलिए उसकी ओर से हम ऐसे पापियों को दंड़ित करने के अधिकारी हैं। इसलिए लड़ने की कोई जरुवत नहीं थी। यह भी एक उत्तर है बगवान का। तो कहने का मतलब यह है कि बहुत सी बातें एक सर्जन आया हमारे पास कर परसों कहने लगे महराज मांस खाने में क्या नुक्सान है मांस खाने से तो सरीद की पुष्ठी होती है अण्डा खाने से पुष्ठी होती है क्या नुक्सान है भगवान ने इसको तमो गुणी क्यों कह दिया कीता हमने कहा देखो मांस खाने के पहले किसी जीव को मारना पड़ता है उसका प्राण योगानकूर व्यापार करके उसकी हत्या करनी पड़ती है तब मांस मिलता है कहा आप गेवु और चना और फल ये क्यों खाते हो? हमने कहा कि गेहु का पौधा गेहु पेदा करके खतम हो जाता है दुबारा उससे गेहु की उत्परति नहीं होती है चने के पेड की नहीं होती है जितने पौधे हैं वो अपना फल दे कर समाप्त हो जाते हैं इसलिए उनको मारना नहीं पड़ता केले का फर केला फर दे कर समाप्त हो जाता है इसलिए उसको मारना नहीं पड़ता और जो आम का फर है अमरूत का फर है वो फर भी पेड़ काट के नहीं दिया जाता वो तपक जाता है इसलिए उसको दे रहते हैं पेड़ काट के सोड़े लेते हैं तो फिर उसने और हमसे कहा कि गेहु के बीज में भी तो जीव रहता है हमने कहा ये तो फिर अच्य प्रसक्ति है गेहु को खाने के बाद तुम्हारे सरीग में जो रसरक्त वनता है उससे भी तो कुछ पैदा होता है तो ये कहां की बात है? तो कहने का अर्थ ये है कि ज़्यादा तर्क करने की अपरिक्षा हम लोग ये देखते हैं कि शास्त्र में इसका विधान है या निशेद है? तर्क से अगर कोई बात सुद्ध भी नहीं होती और शास्त्र में उसका निशेद है तो उसको निशिद्ध मा एक अनुवान है। नर्शरक्वालं सुची प्राण्यंगत्वात् संख्षुद्गाजिवत् मनुष्की खोपडी पवत है। मनुष्की खोपडी अगर कट गये जा किसी तरह से अस जली हो गयी है। तो वो पवित्र है। उसको चूड़ने से कोई दोष्य नहीं है। क्यों? प्राणेंग नत्मात। प्राणी का अंग है। कहा कि प्राणी का अंग है। और वो पवित्र है। इसमें कोई उधारन है। कदिस्तान्त शंक। शंक जो है प्राणी का अंग है� पर उतको बजाते हैं पवित हैं शुक्तिका ये भी प्राणी का अंग है लेकिन हम उतको अच्छा बानते हैं इसी तरह से बनुश का घीला सिर्फ पवित है कहा रे ये पन्वान सात्व के वृद है सात्व कहता है कि अगर बनुश के जीली सिर का इसपर्ष कर गए तो कपणों के सहित श्नान करना चाहिए। इसलिए ये निशिद वाने जाता है। ऐसे अपने हां बहुत सी बाते हैं जो निशिद वाने जाते हैं। जैसे नारीयों का रजस्वला आवस्था में किसी वस्तु का इस पर्ष भुजन बनाना और दूतरा काम करना प्रिशिद्ध माना जाता है। आजकर के लोग तर्क भी तर्क करते हैं, कुछ नहीं है। इसको मानने की जुरुत नहीं है। वैसे तो वैज़्यानिक द्रिश्टी से भी ये देखा गया है कि उस अवस्था में तो जिस बात का साथोने मना कर दिया कि ये मत करो तो वो करना पाप है उसमें क्यों नहीं लग सकता जिसका बजए बताय जाए वो बजए उस आदेश को कमजोर बनाता है जिसमें आदेश का कोई करन बताय जाए कहा ये मत करो वो सही मना जाता है। इसी बात को साथ समाज में हुता है। विदि निषेधमै करीमन हरनी कर्म कथा रविनन्दी निवरनी। ये साथ समाज में प्रयाग में त्रोयनी है। एक तो है जमना। जमना क्या है? विदि निषेधमै करीमन हरनी। बिदिन्शेद का उपदेश किया जाता है सर्वातमों आजकल जो बड़े बड़े पढ़नाल लगते हैं सहरों में या चेनल में आप लोग सुनते हैं कई लोगों के प्रभुतन सुनते हैं कोई बिदिन्शेद की चर्चा करता है ये करो ये मत करो कोई बोलता है कोई चर्चा पहले तो अधर्म से अपने को बचाओ। अधर्म का त्याग करके धर्म का आचरण करो। तो अधर्म का त्याग करने से आपके मन की आदी सुद्धी हो जाएगे। जो आप मन माना खाते थे काम भाज, काम भाज, तार कामभक्ष मनमाना आप बोलते थे वो बंद करो जूद बोलना कठोर सब्द बोलना छोड़ो कामभक्ष जो चाय जैसा खा रहे हो सोचते नहीं हो कि ये खाने योग है कि नहीं है जो आया खाना शुरु कर दिया नहाए हैं तो नहीं नहाए हैं तो जैसे भी तेसा सामने आया और जैसे बकरी का मुझ चलता है एसा बकरी का मुझ चल रहा है एक काम भक्ष है तो एसा मत करो बजिवत भगवान पहले वो बनाओ और सुद्ध सदीध से नहां दो के भोजन बनाओ फिर वो भगवान को अरपण करो तुलसी नानो फिर तदियम वस्त तदियम वस्त गोविन्द तुम हमेव समर्पहे हे गोविन्द ये तुमारी वस्तु हैं हम तुमको अरपण करते हैं तो मन में ये भावना करो कि भगवान ने सुखार कर लिया और तुम तोल के देख लो भोग लगाने के बाद एक भी इंच कम नहीं हो गया बल्कि स्वाद बढ़ जाएगा उसका कि भगवान ने अपनी नजर से देख दिया नजर में गुण होता है कहते हैं सावन के बरशे और माता के परस कहा बात है की नहीं सावन के बरसे और माता के परसे वो यह माता परुस देती है अपनी आँख से देख कर तो वो गुणकारी हो जाता है इसलिए अपने आँथ देखो उस गाय का दूद पीते हैं जिसका बच्चा जीवित रहता है जिसका बचना मर जाता है। उस गाय के दूज में वो कुण नहीं रहता। क्योंकि माता नहीं है, वो बास्तर नहीं है, वो मंग नहीं है। तो ये माता की जब बात है, तो सारे जगत की जो माता है, वो अगर देख देख तम्हारा भूजन, तो वो परुच हो जाएगा। त कामभक्ष खतम करो तो पहले अधर्म का त्याग करना चाहिए ये हमारे वेद बतलाते हैं अधर्म का त्याग करके धर्म करो अग धर्म करने में लोगों की प्रवृत्ति नहीं होती का बाई सबेरे उठके संजा करो गुरुमांत लिया है तो सबेरे उठके कम से कम पांच माला तो जबो कहा महाराज आरेश से आता है तो करने का जी नहीं होता तो फिर सास्त्रों ने बताया कि तुम ऐसा करोगे तो तुमको ये फल मिलेगा फल का रोग दे दिया अगर बेटे को वुखार आ रहा है तो पुराने जमाने में वुखार की दवा गुरूची होती थी हमने खाया है वुखार की दवा होई थी न जो गुरूच होती है न गुरूच को कुछल के उसका रस और साथ काड़ी नीव की उसकी डंडी, वो जो होती है, मोटी-मोटी उसको पीश के उसका रस निकाल लो और थोड़ा सा गरम कर के पीनो तो वो खास दूर हो जाता है वो लगती है कड़वी बच्चा कहते है, मैं यह हम तो नहीं पेंगे हमें कड़वी लगती है तो मा कहती है वत्स गुरुची उन्पे बगेव खन्ड लडु कंते दास्यामी पेटा तु गुरुच पी ले अगर तु पी लेगा न तो मैं खान का लडु खिलाऊँगी तो खान का लडु खिलाने के लोग से वो खा जाता है पी लेता है वो खान मन जाता है तो माता का उज्ञे खान का लड्डू खिलाना नहीं है। गुरुषी बलाके उसका रोग दूर करना है, जड़ दूर करना है। तो शास्त्रों ने प्रोगन दिया कि तुम ऐसा करोगे तो इस फल की प्राप्ति हो जाएगी। इससे तुम्हारे पशु बढ़ेगे, तुम्हा कामणों से लोग धर्म का आचन करते हैं और फिर ये भी है कामणों को लेकर कोई यदी धर्म करता है तो ऐसा नहीं है कि केवल प्रदोभाण है उसका फल होता है भवान स्रिकर्ण भुईता में कहते हैं कामशन तक कर्मणाम सिध्धिम यजन्त यह देवता चिप्प्रम्मानुशे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा कर्मों की फर्की इच्छा करके यदि कोई कर्म करता है यजन् करता है तो उसके फर्की प्राप्ति उसको होती है लेकिन जब वो कर्म करते करते फर्की इच्छा करते करते उसका हर्दाय निर्मन होने लगता है। तो फिर वो उस फल की एच्छा छोड़ देता है। फिर वो सुद्धर नहीं होने के कारण भगवान की ओर आकरिष्ट होता है। जो मनुष्य पवित्वानत्वा करन होता है उसी का भगवान से प्रेव होता है। आप देखे, जब पानी मलिन हो जाता है, चाहे तालाब कहो, चाहे नजी कहो, तो उसकी तरंगे भी मलिन होती हैं, तो जिसका अंता करण मलिन होता है, उसके विचार भी मलिन होते हैं, उसकी पुरियता भी मलिन पदार्थों में होती है, अच्छे में नहीं होती। मक्की जो है, वो गंदी जगह बैठती है। आप कभी नहीं देखेंगे कि फूल, भुराब के फूल में मक्की बैठी होगी। वो बैठेगी वहाँ जहां कोई सनाध होगी। इसी तरह से जिसका अर्देम मलिन होता है, उसके गुरू भी वैसे ही ह उसके मित्र भी वैसे ही होते हैं उसके जो इष्ट देवता हैं वो भी वैसे ही होते हैं यजन्ते सात्रका देवान यक्षरक्षान शिराजसा प्रेतान भूत गणावन चानने यजन्ते तामसा जना बगवान शिर्कित ने कहा कि जो सात्रक लोग हैं वो देवताओं का इजन करते हैं। रजो मुणी लोग यक्ष रक्षन से किला जेता हैं। यक्ष रक्षों के पूरीन करते हैं। कैसे करेंगे? क्यों करेंगे यक्ष रक्षों? उनको यह पता लगया कि यहाँ पर गणा हुआ धन है। लेकिन यहाँ पर यक्ष हैं। जब तक कि वो उसको समाले हुए है, तब तक वो गड़ा धन निकलेगा नहीं। तो उसको बनाओ, उसकी पूजा करो। होता है न? जहां धन गड़ा रहता है, वहाँ साप रहते हैं। साप कुंडरी मारे मेठे रहते हैं। अब वो कुंडरी मारे हुए सापों को अगर आप मा इसलिए उनको राजी करना पड़ता है। तो यक्षा जिकार है उन्हां। यक्ष जो हैं, वो उनका जिकार है। तो उनको मनाओं तो वो अपने आप हर जाएगे, आपको मिल जाएगा। इस लोग से लोग यक्षों की भूजा करते हैं। राक्षसों की भूजा, ब्रह्म राक वो भी ब्रह्मराक्षत था। लेकिन वो इतना बड़ा ब्रह्मराक्षत था कि उसके कंट्रोल में कहीं ब्रह्मराक्षत है। तो उनकी पीरा जसको हो गई है वो उनके यहां जाते हैं। प्रेतान भूत गणान शानने यंते ताम साजना तम वुनी लोग प्रेतों का भूतों अब किसी को कोई तक्रीप हुई तो भुमका बढ़ाया कसर है कशु बाहरी बाद आये तो भराज भुमका जी बताओ कहा यहाँ पर तो आपको मुर्गा चणाना पड़ेगा बक्रा चनाना पड़ेगा सुर का बच्चा चनाना पड़ेगा सराप की बोतल चनानी पड़ेगा अब प्रेतों को राजी करो भी ये खाओ और जाओ और कई लोग क्या करते हैं कि प्रेतों को सिद्ध कर लेते हैं प्रेक यदी बस में हो जाता है तो कई समत्कार वो कर सकते हैं एक वेक्ति हमारे पास आया बोला महराज हमको अपना शिष्य बना लो तो हमने उसके पारे में सुन रखा था ये मेरट की बात है वहाँ का जो बहुत बड़ा सेट था वो उसका भक्त था और हमारे पास उत्से बड़े सेठ नहीं आते थे उस समय तो हम तो उससे चोटे ही थे समझ लीजिए वक्तुं की दिर्थी से और वो आया हमारे पास सिश्वर ने हमने कहा, तुम क्यों आ रहे हो? तुमारे पास सिद्धी है बड़े-बड़े सेठ तुमारे पास आते हैं तु बिन्दावन का पेड़ा बड़ा देते हो बड़े बड़े चमतकार दिखाते हो तो तुम्हें क्या ज़रूरत है हमारा सिष्च बनने की? वोला माराज हमको शान्ती नहीं है हमने कहा यह होता है क्या है तुम यह चमतकार कैसे करते हों? उसने बताया कि हमको एक प्रेत का मंत मि उस प्रेत के मन्त को जब कर हमने पहले उसका पुरस्चरण किया और पुरस्चरण करने के बाद मनुष्य के कपाल में, कोपडी में कीर पकाई और वो इस मशान की आग से पकाई और मन्त बढ़ा और उससे वो कीर का हमन उती इस मशान में अगरी में किया तो वो प्रेत प्रकट हो गया और उसे ने कहा कि हम आपके बच में हैं जो आप हम से कहता हैं हम करेंगा तो हम उसको जो कहते हैं वो कर देता है तो वो लाके दे देता हैं हम लेकिन जो वस्तव लाई जाती है उसका दाम भी चुकाना पड़ता है नहीं तो हमको दन्ड मिलता है तो उस प्रेत की पूजा करने लगे ये चमतकार के लिए प्रेतान भूद गणान चानने निरंते ताम साधना ऐसे लोगों की दुर्गती होती जब भरत जी माता कोशल्या के पास गए तो उन्होंने कई सोगंधे खाई हैं कि मेरे कहने से राम का बनवास नहीं हुआ है मैं याद मेरी सम्मत की एकदम नहीं थे। तो बहुत से कार्ण बताते हुए, बहुत से सपत खाते हुए उन्होंने कहा जीपरी हरी हरी हर चरन भजा ही भूद गनगोर तिनकीगति मैं पाँ। जो जननी मतमोर।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।।� वो गूत प्रेत की पूजा करते हैं रजोगुनी एक्षराक्षत की पूजा करते हैं और सात्मिक लोग देवताओं की पूजा करते हैं और उसके बाद जब उनका हदे और विशुद्ध हो जाता है तो और किसी में उनका मन नहीं लगता है इसी प्रकार जो व्यक्ति उत्तम कर्म करते हुए धर्म करते हुए अपने मन को निर्मल करा लिता है तो उसको ग्राम में गोश्ठी में आननद नहीं मिलता जहां हसी मजाक वुरा हो गंजी बाते चल रही हो वहाँ की चर्चा उसको पसंद नहीं आती यह यहां क्या रखा है तर भाई सट्संग करें कि य तो स्वावाविक रूप से उसको उनकी गोर्टी अच्छे नहीं रखती उनकी मित्रता अच्छे नहीं रखती और जो गुरु संसार में लगाता है वो गुरु भी उनको अच्छे नहीं रखता है वहाँ तो लगई ही हैं तुमारे बिना उपदेश के हम लगे हैं तुमारे उ ससाद को अच्छा लगते हैं अच्छे सब्द अच्छे लगते हैं अच्छे अत्पर्त लगते हैं तो कहने का विप्रा ये है कि जब मुनुष्य का हुदे धर्मा अचरन से सुद्ध होता है तो वो उपासना में जाता है भगवान की आरात्मा करता है फिर उसको भगवान � धुतात्मापुर्षक्रिष्णो पादमूलम्नमुन्चति मुक्तसर्वपरिक्रेशः पान्थस्वसर्णम्यता जो धुतात्मा अवित्रात्मापुर्षे है वो भगवान के चर्णो को नहीं छोड़ता जैसे कोई पथिक पर्देश से घूंप घूंप करके लोटकर आज ये धर्मसाला में सोय, आज ये धर्मसाला में सोय जल्दी उठो भाई आगे बढ़ना है लंभी जो मंजिर है थक जाता है विचारा, रोज थक थक के जब वो अपने घरा आता है तो घर में टांक पसा के सोता है कि हम कहीं नहीं जाना है अब वो घर में आ गया है, कहीं जा इसी तरह से जब भगवान की शरण में प्राणी चला जाता है तो तांग पसार के लिए होता है। तो यह है पान्थस्त से नम्द तांग भगवान की शरण में चला जाया है। अब फिर भी एसा है कि जो मनुष के मन की बात सुनाये हैं वो पीछा नहीं छोड़ती है। मन में अमारे कुछ इच्छाएं हैं, आकांख्षाएं हैं, वासनाएं हैं, तो हम कहां जायें? तो वो कहता है कि हमको जो कुछ चाहिए, वो हम भगवान से लेंगे। और किसी के सामने हात नहीं बता रहे हैं। दाता एक राम भिखारी सारी दुनिया। अगर देने बाला कोई है तो रामई है। और लोग तो कुदे ही बाँगते हैं। तो उनसे हम क्या बाँगें। राम दाता है। वहाँ राम के सम्मन्द में, बाजमी की रामायन में बताया ह कि जब भगवार राम के पास कोई धन मागने जाता था कि हमको धन दीजिये तो वो मौन से बोलते थे पहले आपदामेक मागारम आपदामेक मागारम किर्नुबान्शसिरे धनम इत्युक्त्वारिज सर्वस्त्वम अर्थिने सम्प्रयच्छति अरे आपच्ति का एक मात्र घर धन है रे क्यों मानता है धन जो है जिसके पास है उसको तो कलेश है कलेश है धनिकों को कलेश क्या है पहला क्यों से राज तहां हमारी ऊपर इंकाम् टेक्स न लग जाये ये द्धन है वो बचाना है टेक्स की फिर छोर तहां कोई चुरा न ले जाये कहां रखें बेंक में रखते तो टेक्स रखता है वहाँ रखते तो जाने कोई चुरा जीवन और फिर सुरक्षित थान पर रख भी नहीं तो भाई बंदु हैं वो बटा नहीं ले इसमें हमारा भी हक है उनसे बचाना चाहेता है फिर मांगने वाले हैं भाई हमको इतना रुपया चाहिए उधार और उधार मांगने वाला पर दुबारा नहीं आता आप दे दो। तो फिर वो आजमें भी गया और रुपया भी गया। क्योंकि वो इसलिए नहीं आता कि अगर हम जाएंगे सामने, तो यह माँगेगा। इसलिए न जाओ नहीं किसे बाहर। तो मांगने बालों से जरता हैं। पैसे भी आजमें, जब कंजूस होता है, धर से प् बहुत कटलाई होती है तो अर्थे भ्या और काल तहा समय बीद जाये हम कई मर न जाये तो ये कहां जायेगा इसलिए उसको छपा के रखते हैं कई लोग गाण देते हैं और कई लोगों का तो बेंक में जमा रहता है और वो कहते हैं जरुरत हो रहे हैं पर हम निकाल ले रहे हैं और जब जरुरत होती होती तो कहते हैं अभी जरुरत नहीं है बाद में जरुरत आएगे बीशे भी मर जाते हैं तो इस तरह से काल से भी उसको डर रहता है कि कहीं मर न जाये बड़ा मुश्किल है एक पंडिजी थ तो उनके पास जो धन था, परिवार उतना नहीं था उनका, चेले-चेले थे, तो जो भी उनके पास रुपया आता था, उसकी वो गिर्णी बना लेते थे, गिर्णी जो है, जादर रुपया चेले रखने की ज़्यूरत नहीं थे, आजकार नोट रखते हैं, उनोंने गिर्णी अब इसके बाद एक बार उनको भुखार आने लगा। भुखार में बीच-बीच में विहोषी आने लगी। तो नहीं सोचा कि हम विहोष हो जाते हैं। कहीं हमारी गिन्दिया कोई ले नहीं जाएं। तो उन्होंने अपने चेले से कहा, बेटर हलुआ बना के लाओ। हलुआ और स्वारी गिर्णीया हलुवा से लपेट लपेट के खा गये। सुरक्षित। पेट में सुरक्षित हो गया थी। अब पेट में जट्रागणी वैसे ही कमजोर थी। हलुवा ही नहीं पज्चता था, पर गिर्णी कैसे पज्चती। उसके बजन से वो गुरु महराज मर गय अब मरने के बाद चेले लड़ने लगे वो कहने लगे वो मोहरे कहा है तुमने चुराया तुमने चुराया तुमने चुराया आपस में लड़ने लगे अब लोगों ने सोचा कि अब इनकी लाज को ठिकाने लगा फिर कुछ लिया जाये तो उनका जाय संसकार किया गया जब तीसरे दिन उनकी राक उठाने के लिए लोग गये तो वो एक गुट्टा सोने का मिला जो पिगल के एक हो गया था तो ये होता है तो धन जो है कहीं कोई हमारी हच्या ना कर दे धन के बीचे और होता ही है आप लोग तोनते हुँ तो इस तरह से धन से अजिकों अनर्ष्ट होते हैं ये भगवान समझाते हैं उस मांगने वाले को आपदामे कमागारम किन्दुवान्शसिरेधनम तो बहुत सी लोग उपदेश करते हैं इसलिए करते हैं कि उनको देरा न पड़े दूसरोग उपदेश देते हैं अगर आपको हलुआ कहना है और सोचते हैं कि उसको नदे हम अरे भाई तुम को हलुआ कहाऊगे तो भीमार पड़ जाओगे तो अपने खुद ही कहा रही थे तो उसको नदेना पड़े इसलिए उपदेश देते हैं बहुत से लोगे ऐसे भी लोगे एक बार करकते में हम उस याग में एक बहुत बड़े सेड़ थे। उनको लोगों ने बुलाया, स्टेज में बढ़ा रहा था। और उनका कुछ स्वागत किया, कि कुछ एनाउस्मेंट करें गये, कि हम इस याग में इतना रुपय देते हैं। इस लोग से उनका स्वागत किया गया। पर क्या हु� तो वो बोले कि आप लोग जो यग कर रहे हैं ये बहुत अच्छा काम है लेकिन इस यग मेंसे कुछ रुपया आपको बाड़ पीरतों के लिए भी देना चाहिए आपने कुछ नहीं देना है जो यग वालों ने बुलाया था कि इनसे कुछ अमको मिल जाए तो हम यग्यों में ब्रावणों की दक्षिना पूरी कर दें। विदा पैसे की दक्षिना तो पूरी होती नहीं। लेकिन कुछ दुष्ट को ब्रावणों की दक्षिना की फ़िकर नहीं रही। बहुत वहाँ में जेदो तुम। तो मैंना इनका पेट और काट दो। जो बिच आपको एसा करना चाहिए। हमारा एक आशा में जारखंड में विश्व कल्यार आशा। एक सेट को अब रोबर बनाया की गरीबों की सेवा के लिए कुछ करे हो यहां आपको पपीता रगाना चाहिए और पपीता बेच कर उसके खर्चे से लोगों का सेवाच करना चाहिए बड़ा भारे उपदेश देने रहा है भाईया ये तो आप खुद ही समझते हैं तो भारे � एसे कुछ रूप बाचार होते हैं पैसा उनके पास रहता है ना किसी को दान दे और ना कुछ खाए मैं मर जे हूँ तुहें न बजे हूँ भले ही मर जाऊँ लेकिन तुछ को भजाऊँगा नहीं तो एसे लोगों के उपदेश का कोई अर्थ नहीं भगवान श्री रामचन्द जी माँगने वाले से कहते थे कि आपत्ती का एक मार्थ घर धन क्यों माँग रहा है एसा कहकर इत्युप्वा निजः सर्वस्वम अर्थिने सम्प्रेच्छति अपना सर्वस्वस को दे देते थे ले जा धन एसा देते थे कि उसको फिर कभी किसी के दर्वाजे में जानी जरुयत नहीं पड़ती थी फिर दूसरे लोग उसके दर्वाजे आते थे ये भगवान की लिथी हैं तो वो दाता है अगर हमें कुछ चाहिए तो भगवान के पास जाएंगे थोड़ा मांगेगे तो बहुत देगे भगवान ऐसे हैं जिनके पास कोई कमी नहीं है लक्ष्मी जी उनकी पत्नी है, घर्वानी है वो देगे इसके राम भगत जगचारी परकारा सुक्रती चारी अनह बुदारा वक्त के मार्ग में आते हैं अगर कोई इच्छा उत्पन होती भी है तो वो इस उस इच्छा को भगवान से ही पूरी करवाते हैं और किसी के पास नहीं जाते हैं बस इतना ही कि कराज के प्रभवें पूर्ण करते हैं श्रीराम जैराम जै जैराम śrī rāma jaya rāma jaya jaya rāma jaya jaya rāma jaya jaya rāma क्या सात लाये अरुरे चलोगे जाता सदा सात यही पुकारो गोविन्द जामो धरमाद वेती Govinda dāmo dharmādhaveti He kṛṣṇa he ātavahe saketi Śrī Kṛṣṇa Govinda Hare Murāre एनाथ नारायण वासुदेव। स्वी कृष्ण गोविन्द हले मुरारे। धर्म की अधर्मकार्ण, प्राणियों में विष्यकार्ण, गोमाता की गोहत्या, हरारमहाने.
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