Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 14

Transcript of a Hindi/Sanskrit lecture by Swami Swaroopananda on passages of the Mandukya Upanishad. The speaker discusses metaphysical categories—Brahman (with and without distinctions), ‘bīja’ (seed) as the cause of manifest world, ajñāna (ignorance), the three/ four states of consciousness (including sushupti/sleep), and the role of prāṇa (five vital airs). He also references Indian philosophical debates (e.g., Nyāya) and uses everyday analogies (seed/plant, music and rest) to explain liberation and the necessity of knowledge.
Chapters
A a a a a a a wdakeprasbdseया सब शब्द से सभी ब्रह्म का ही बोध, सबीज निर्बीज ब्रह्म है। उसका यहाँ पर बोझ नहीं है। यदि निर्वीजबरह्मभविष्यत निरबिजु ब्रह्म। यहाँ पर ऐसा बोले, ऐसा नहीं है। नाम न हो और न बीजा भावा। विशेष यहां यह बताया कि यहाँ पर गुपपराणशब्दवाच् है, शब्दवा है। जिसमे सुषुप्ति में विलीन हो जाता है। ये निर्बीज होता तो उन्हे उसका पर, उसका बंधन न होता, संसार की पत्ती पर न होता और गोबरी नहीं हो जाता। इसलिए ये सभी निर्बीज, अगर वो ये कहते हैं कि वे जैसे सुखबती है। parle brave to fir site में भी जो सोए तो यह माना जाता है कि पर्यावस्था में प्राणी अपने कर्मों के सहित संस्कारों से यह साफ हो जाता है। और जैसे मिट्टी होती है, फिर वो उन्हीं संस्कारों को लेकर प्रकट होता है। और बुद्ध संस्कार है। कर्म यदृष् रूप में है। उन्हीं के अनुसार विभिन्न योनियों में भगवान उसको बेचते है। यथा कर्म या जैसे जिसके कर्म है, जिसका उपाय कैसे होता है, ऐसे ही पुरानी हो जाता है। सो जाने पर सब 1 से हो गए है। जितने लोग सोए हैं, किसी में कोई अंतर नहीं है। लेकिन जैसे जगेंगे सबके अलग अलग, किसी का कुछ का तो वो संस्कार बने रहते है। उस समय संस्कार अनु बुद्ध हो जाते है। और जब अजागिकअवस्था में आये तो वो दूध हो गया है। इसलिए यहाँ पर सभी अवस्था है। अब यहा पर सद्ब्रह्म प्राण शब्द, वाचन, जात, कत्वा, बिमा, सतह, सद्ब्रह्म, श्वाम तथा about revel क में आता है। पंच बायुरिकारेरूडता प्राण शब्द है। वो प्राण, वृत्ति पंच, पंच। वृति मानो प्राण की 5 वृत्तियां प्राण अपान समान उदान है। प्राण तो हृदय में प्राण है, गुदा में पान है। ये आप समझ लीजिये। जिसको गुदा में तकलीफ हो जाती है, उसको सांस लेने में भी तकलीफ होती है। यहां तो कोई बर्बर नहीं है, बरबर नीचे है। उसका कारण यह है कि प्राण और अपान दोनों खींचते हैं। जब वो सांस खींचता है, अपमान भी ऊपर आती है, जब छोड़ता है तो अपमान भी नीचे जाती है, प्राण भी बाहर आता है। जब वो खींचते हैं तो अपमान को ऊपर आने में तकलीफ होती है। दर्द के कारण। इसलिए ये प्राण पान न माने जाते हैं। और अपमान न हो तो मारे, मूर्त, त्याग नहीं हो सकता। प्राण न हो तो श्वास नहीं ले सकते, छोड नहीं सकते, उदान वायु न हो। तो जो हम खाते हैं, वो गिर नहीं सकते थे। गं के भीतर हम उसको िरखते हैं। पानी हो, चाहे अन्य हो। उदान वायु काम करती है। और समान नाभिमंडल, समान वायु दोनों को मिलाती है। अपमान को ऊपर नहीं आने देती और प्राण को नीचे नहीं जाने देती। अपान से सारे शरीर में। इसलिए आपके शरीर में कहीं मच्छर बैठे हैं। तुरंत हाथ वहाँ जाता है, या वायु बता देती है। तो ये 5 बिकती हैं। प्रण तो यहाँ pran है। वायु प्राण में जाके री, रो, प्रयोग के साथ अव्यकत प्राण शब्द से अन्य रू हो। प्राणी शब्द का अभ्यास novak की है। उसका विषय ब्रह्म है। तो ब्रह्म। तो प्राण शब्द का जो प्रयोग है उससे ब्रह्म ही लेना चाहिए। अब व्याकृत क्यों कहते हैं? अब व्याकृत में सब कुछ दिन हो जाता है। ये कह रहे है मां ने साथ ही पहले था तो सत शब्द से दिया जा रहा है। है तो वही पर शब्द का है। 2 बीजात्मक बीजात्मक जो अभ्यागत है ये ब्रह्म के है, बीज इसी से है। तो बीजात्मक ब्रह्म होने के कारण ये सभी ब्रह्म हैं। a a a a a a a a जीव विजात मुकदमा का बीज विजात जैव जीव के का बीज बीज है उसको उसको परीक्षा के बिना उसके प्राण स है। तो यहाँ पर बोले जी शब्द का यहाँ पर क्या है। तो तो फिर जी सर्व कारजात का रक्षण कमसमतकालजसब परमात्मा से उत्पन्न होता है। तो वो सच जो है सब का बीज। तो यहाँ पर बीज शब्द का जगत का प्रसव जिससे होता है ऐसे ब्रह्म को यहां पर कहना है। जीव का भी कारण है जी समस्त प्रबंद का उपरिक्षक है उसका कारण। तो अब वो जो ब्रह्म है वो सविशेष ब्रह्म है, निर्विशेष नही है अगर निर्विशेष होता तो यहां bata sade उस ब्रह्म को जो जगत का कारण है उसको सब शब्द से कहा गया, प्राण शब्द से कहा गया। तो वो बाते हो गया, सच शब्द बाच्चे हो गया, प्राण शब्द का बात बा हो गया है। किसी शब्द का बात नहीं है। तो बच वर्तन से मन समेत। तो ऐसी स्थिति में अगर निर्विशे at be duाकरणesasoe समय तो उस समय सत से संपन्न हो जाता, अपने आप का उसमें विलय कर देता है। तो ये सत से मिल जाता है। तो सत का अर्थ यदि निर्विशेष ब्रह्म होता पर पुरलुत् होता फिर तो उसका मुख हो जाना चाहिए था। इसलिए वो वहां रहता है। इस प्रसंग में 1 बात हमारे स्मरण में आई, किसी नेता ने कहा था कि ईश्वर है कि नहीं, मैं नहीं जानता। अजी वो है भी तो उसकी कोई जरूरत नहीं। क्योंकि इस समय जनता को जरूरत रोटी और कपड़े की है। रोटी औ कपड़े के बिना वह जीवित नहीं रह सकता। मकान भी सही है रोटी कपड़ा मकान इसकी जरूरत है। ईश्वर की क्या जरूरत है कि नहीं, हमको मतलब नहीं, हमें तो यह काम करना है। यह उसका कहना था, बहुत बड़ा नेता था। तो उसका उत्तर यह है कि ईश्वर की जरूरत है। क्योंकि मनुष्य सारे व्यवहार करने के बाद सोना चाहे का किसी ने संगीत गोष्ठी बुलाई बड़े बड़े संगीत के आए वह बहुत बढ़िया हाल बुक कराया गया। उसमें बहुत से श्रोता भी जुड़ गए जो संगीत के रसिक थे। अब 1 के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा गायक आता है, पर भोग गान करता है। अब वो गान सुनते सुनते so jamie s o jaye तो संगीत की सवा को छोड़ कर वह अपने घर में आ जाता है, घर में अपने बिस्तर में लेटता है। उसकी प्यारी पत्नी आकर उससे बात करना चाहती है तो उससे भी मुँह मोड़ लेता है और सो जाता है वो किस लिए हो जाता है। इसलिए कि वहाँ उसको ईश्वर से मिल रहा है। ईश्वर से अगर नहीं मिलेगा। तो यहाँ जो के मन जाता है, तो उसकी बैटरी डिस्चार्ज हो जाती है। जब वो गहरी नींद में सो लेता है तो बैटरी चार्ज हो जाती है, थक के सोता है, तर होकर उठता है। इसका मतलब यह है कि इस सर से रोज रोज। अगर वो न मिले तो उसका काम नहीं बनेगा। पागल क्या है, पागल का लक्षण होता है, उसको नींद नहीं आती, नींद नहाने का परिणाम होता है कि उसके सामने रोटी रखो। तो लात मारता है, कपड़ा फाड़ता है, अपने घर में खुद आग लगाने। 2 तो बिना परमात्मा के न रोटी, काम की, कपड़ा, काम का मकान, इसलिए ईश्वर की जरूरत पहले है। sriman आपको नींद तो आप नेता ही बनेंगे, आपको पागल खाने जाना पड़ेगा, उसका रोज प्राणी सत परमात्मा से मिलता है। लेकिन थोड़ी सी बात रह जाती है। वो यह है कि पर्दे के साथ मिलता है, अज्ञान का पर्दा उस समय रहता है। अगर वो पर्दा न रहे तो फिर सदा के लिए आनंद में मगन हो जाए। संसार में उसको लौटना ही न पड़े। तो सभी में सता, सदा, सब परमात्मा में विलीन हो जाता है। smo करता तो ये बताया शुद्धि ब्रह्मणि, ने काजी में शुद्ध ब्रह्म मिल जाता है। वहाँ और किसी वस्तु की बात नहीं है। तो बोले कि फिर पुरत्थान नहीं होगा। और दूसरा यह है कि अगर होता है। तो ये कहना होगा कि मुख बात फिर जन्म होता है, को हो गया, परमात्मा से, मिलने को मुक्त है, परमात्मा से सम्पन्न हो गया, मुख हो गया और मोक्ष हो गया। तो उसने की जरूरत ही नहीं है। और अगर उड़ गया, मुख भी उठता है। तो इसलिए बीज रुप, the jo भाव, न जाना, न जाना, न, सर्वसारण विभीषण। इसलिए कहा कि ज्ञान राय, बीज के अभाव में ज्ञान का शक्कर नहीं हो। यह बताया अगर सुषुप्ति में ब्रह्म से निर्विशेष, ब्रह्म से मिलन हो जाता, अर्थात ब्रह्म में विलीन हो जाता। तो पर ज्ञान की जरूरत क्या थी? ज्ञान की जरूरत तो इसलिए थी कि जो ज्ञान के द्वारा अज्ञान का नाश करना है, अभी ज्ञान नहीं हुआ। तो इसलिए सुषुप्ति में अगर ज्ञान से जलने वाला बीज अज्ञान न होता तो फिर ज्ञान की जरूरत भी नहीं होती, अपने आप ही नष्ट हो जाता। अज्ञान व sकीकापरणतवदेशहै और sbi रात पर सवाह witsa इसका टीका देख ली जाए। ननु अनाज, निर्वात, ज्ञान, संसार के बीज ने, पूर्व, पर, शक, अनिर्वान संसार का बीज है, ऐसा नहीं है जो अज्ञान ब्रह्म का विश्लेषण हो। ग्रहण में ज्ञान, तब, संस्कार, नाम, अज्ञान शब्द, बा, त है। मुझे अग्रहण, अग्रहण माने, किसी का ग्रहण न होना है, टिपणी है, ठीक है बढ़िया अग्रहण, अग्रहण जाना, ज्ञान का प्रभाव ग्रहण है, नजयाजञानबरांति, संस्कार, संस्कार है। तो अग्रहण। a jana raghava, ये नैयायिक लोग मानते है कि अभाव 4 प्रकार का होता है प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अचंता, भाव और अन्योन्याभाव। तो हम लोग ये मानते हैं जो वेदांत है, सांख हैं, सत्कारी बात मानते हैं, ये मानते हैं कि कारण में सुखमुलुसे कार्य रहता है, उसकी अभिव्यक्ति होती है। बीज में सूक्ष्म रूप से वृक्ष रहता है। तब उस बीज को जब हम पानी धरती में डालते हैं तो धरणी, अनिल, अनल, धरनी और अनिल उष्णता। इसके सहयोग से उसकी अभिव्यक्ति शुरू हो जाती है। तो वो बीज ही अंकुर रूप में परिणत होता है। और अंकुर ही धीरे धीरे वृक्ष हो जाता है। तो उसका मूल वहां था पहले से बीज में, इसका कारण 1 और भी है कि बीज में वृक्ष रहता है। इसका प्रमाण यह है कि इमली के बीच से इमली का ही ब्रिक्स पैदा होगा, आम के बीच से आम का ही ब्रिक्स हो जा। आप खेत में अनाज बोते हैं तो जिस तरह का पौधा आपको चाहिए, उसी का बीज बोते हैं। तब वो उससे उत्पन्न होता है। आपको गेहूं पैदा करना है, थोडा होगा गेहूं। तो पड़ेगा कि बीज में सु रूप से बृक्ष लेता है। तो बीज कारण है। वो, वृक्ष कार्य है। तो कार्य कारण में रहता है। 1 सिद्धांत अब जो नैयायिक लोग है, वो ये कहते हैं कि कार्य कारण में नहीं रहता, कारण में अगर होता तो वो उसकी उत्पत्ति की जरुरत का ती। तो फिर महा उनसे पूछते हैं कि फिर कै क्यों मिट्टी से घड़ा पैदा होता है, क्यों सूत से कपड़ा बनता है? तो वो ये कहते हैं कि मिट्टी में घट का प्रागभाव है और सूत्र में वस्त का प्रागभाव है। तो जिसका जिसमें प्रागभाव है, उस से उसकी उत्पत्ति होती है। तो हमारे चित्र में ज्ञान का प्रागभाव है। तो जब ज्ञान का प्रागभाव है, इसलिए अभी ज्ञान नहीं हो रहा है। जब ज्ञान की उत्पत्ति होगी तो प्रागभाव करना हो जाएगा। तो इसका नाम है अग्रहण। ठीक है अग्रहण, अn्यthagrhnnthagrn, sardi, he, branchen, the grhan पूरे में ज्ञान का प्रागभाव रहता है। और ये पूर्व पक्ष चल रहा है। जी, इस चाहे। तो वो ये बोलते हैं की अग्रहण, मिथ्या, ज्ञान, संस्कार नाम, अज्ञान शब्द के साथ ही पूर्व पक्ष ही कह रहा है। अज्ञान नाम की कोई चीज नहीं है। बोह, अग्रहण, मिथ्या, ज्ञान, रुस्की, संस्कार, ज्ञान शब्द, gानेकiयबतायाजञान, रांची, संस्कार, a not ये कहते हैं कि अग्रहण वख्याज्ञानऔर उसके संस्कार भी ज्ञान है। ज्ञान नाम का कोई अनाज भाव रूप पदार्थ नहीं है, संसार का कोई बीज नहीं है। यह कह रहा है। तो उसके उत्तर में बताया कि अज्ञान का प्रमाण है। अज्ञान जो है प्रति द्वारा, अज्ञान में आगया हूँ। ज्ञान, अपरोक्ष, ज्ञान अपरोक्ष है। अगर प्रागभाव न प्रोक्त। वो कहते हैं आप प्रागभाव कह रहे हैं, ज्ञान का प्रागभाव अज्ञान है। तो प्रागभाव परोक्ष है, उसका परोक्ष नहीं होता। ये। तो जब आप कार्य त्पन्न हो जाएगा, तब आप कहेंगे कि इसमें इसका प्रागभाव था। तो ज्ञान ग्रहण। अर्थात ज्ञान का प्रागभाव इसलिए नहीं है कि प्रागभाव रुख है। और जो हम परोक्ष jan कoकiजोप्रागभाव है, उसके साथ जिंदगी का संघर्ष नहीं होता। अनुपलब्धी से वो गाँव में होता। अनुपलब्ध मतलब यह है कि अगर यहाँ उसका भावभाव न होता तो इससे इसकी उत्पत्ति न होती है। कमी, अगर यहाँ यदि घट रहता तो उसकी उपलब्धि होती। यहाँ पर उपलब्ध नहीं हो रहा है, इसलिए घट नहीं है। हाँ, यदि यहाँ पर घर रहता, उसकी उपलब्धि होती नहीं है। इसलिए नहीं, तो यहाँ प्रागभाव अगर न होता, तो इसकी, इसी की उत्पत्ति क्यों होती? तो यह अनुपलब्धि प्रमाण से कम है, अपर नहीं। a, a सरकारी कार्य, भ्रांति और उसके संस्कार जो है, ये अभावितरकार्य है, अभाव से उत्पन्न नहीं हो सकते। इसलिए उपाधानापेशणावो भ्रांति और उसके संस्कार प्रागभाव, ज्ञान को, अज्ञान को, रियायत लोग, ज्ञान भाव मानते है, अज्ञान को ज्ञानाभाव मानते है। और विदांत में अज्ञान को भाव माना है, अभाव नहीं है, मैं अग्ञहूंयेप्रचिति हो रही है। और दूसरी चीज ये है कि भ्रांति और उसके संस्कार अभाव से किसी की उत्पत्ति नहीं होती। तो कहना होगा? कि कोई उपादान चाहिए किससे किस कारण हमको भरांतहुईरस्सी में हमको शाम का भ्रम हुआ, तो रस्सी को उसका उपादान है। नहीं। तो अभाव से तो रस उत्पन्न सर्प उत्पन्न नहीं हो जाएगा। तो अज्ञान को मानना पड़ेगा। तो कहते हैं कि भ्रांति और उसके संस्कारों के लिए उपादान की अपेक्षा है, कारण की अपेक्षा है। तो वो कारण अज्ञानी है। इसलिए अज्ञान भाव रूप से सिद्ध होता है। कि बात कट गई? भ्रांत, भावित कार्य, अभाव से इतर कार्य होने के कारण उपधान हेतु और केवल आत्मा है, इनका हेतु हो नहीं सकता। इसलिए अनाज ज्ञान की सिद्धि होती है। उपादान के हेतु से ज्ञान की प्रमाद। परमात्व प्रमात। ये महाविज्ञान वान महाविज्ञान का रक्षण है। जिसमे किसी अन्य की हम सिद्धि करने जाए, तो उसके पसंद से अन्न की सिद्धि हो जाए। ये महाविज्ञान अंध की सिधि हो जाए। इस में देवदत्त प्रमा, देवर। परमा ये पक्ष हो गया। देवदत्त प्रमा, प्रमा, प्रभाव, प्रभाव, देव की जो प्रमा है, वो तर प्रागभाव से अधिक अनादि की, परधनशनीहैजेयोदत्त की। जो प्रमा है, परवाने थार्थ, गान प्रमाण से जो थार्थगान होता है, वो ब्रह्मा के नाश और प्रमा अज्ञान का नाश करती है। तो देव परम देव की प्रमा के संबंध में अ सा बता रहे। देवदत्त प्रमा तनि अर्थात देव देवदत। जो प्रमा का प्रभाव है, उसके अतिरिक्त किसी अनाज का प्रंस करने वाली है। rmatarmahoeकाr प्रमा है। the titan rmadbrmanito उससे अतरिक्त किसी अनाज की है, ठीक है, पराया है, ठीक है। उनको अनादि का नाम न लेकर केवल अनादि शब्द से कुछ कहना है। और इसको घटाना है में घटाना है। जे। अब ये घटेगा और इसके ब्लाक खान में लिख रही हैं। मेरे मे जाना। तो क्या हुआ? इसलिए कहा कि राजी प्रागभाव भी है, प्रजा भी अनाज है, पराग किसी अनाज का प्रध्वंस करने वाली हैं। देवदत्त प्रमा यग्ञद्तप्रभाव यज्ञदत प्रमा है। वो तनिष्ठ माने माने दिदतनि्टजोप्राघभाव है। उसके अतिरिक्त अनाज की बंधनी तभी लिफ्तात बने है, वन की रमा है। वो अगर सीधे हम के दे। तो सादसमहोजाएगा। अगर हम ये कहें कि जैसे देवदत की परमा है, वैसे यग्दतकीपरमा है। तो दृष्टांत कैसे बनेगा? माने जो पक्ष हैं, वही दृष्टांत नहीं हुआ करता। तो यहाँ पर पक्ष है। देवदत्त प्रमा, दृष्टांत है, प्रमा रमा। तो यहाँ पर हमको ये ले जाना है कि प्रागभाव से अधिक चाहिए। माने। देवदत जो प्रागभाव है, किसका ज्ञान का प्र प्रागभाव, उससे अतिरिक्त की बरदधनचुनीहैमाने ये प्रमा है प्रमा किसी न किसी ध्वंस करेगी तो देवदति्प्रागभाव का नास करेगी नहीं, क्योंकि देवदत्त प्रभाव इसमें तो है नहीं, इसलिए अनाज अज्ञान की फिरती तो यहाँ पर दृष्टांत द्वारा उन्होंने अनाज को से कर दिया ये माँ vijan से हमारी डायरी में लिखा है, हमारी पुरानी डायरी है a copy to कहते हैं कि अगर वो परमा किसी का नाश न करे, तो नहीं हो गया सकजञानजञानर्थवतन सम्यक, ज्ञान रथ, अगर वो किसी को ना नहीं करेगी तो सम्यकज्ञान अर्थवा होगा छणिक भ्रांति, संस्कार, सच सत्य समय ज्ञान है कि रचना ग्रहण तो बोले कि भ्रांति चमक होती है इसलिए वो प्रमा, निवृत, अनिवरतहैऔसंस्कार, ज्ञान और संस्कार है ज्ञान होने पर भी कृति और ग्रहण का भी ध्यान से निवर्त तो नहीं है ज्ञान, व ध्यान से उसकी निवृति हो सकती है तो ज्ञान तो यहाँ उन्होंने कह दिया कि अगर ज्ञान नहीं होगा तो सम्यक ज्ञान जो है, निर्शक हो जाएगा तो भ्रांति जो है, ज्ञान से निवृत नहीं हो सकती क्योंकि ज्ञान क्षणिक है और संस्कार से 70 ने ब्रांच, ब्रांच, भ्रांति चणक ज्ञान से उसकी निवृत्ति नहीं हो सकती और उसके जो संस्कार है, वो समय ज्ञान के रहने पर भी बने रहते हैं ग्रह, ग्रहण भी, grahan, ग्रहण, जब वो परीक्षा ही नहीं है, अपरोक्ष ही नहीं है, ज्ञान से, उसकी निवृति क्या होगी, ज्ञान जान, उसकी निवृत्य रू है, तो ज्ञान, संसार, ज्ञान, ज्ञान से ही, संसार का भी ज्ञान, ज्ञान के के लिए मानना पड़ेगा तो इसलिए अनाज जो ब्रह्म है, उसी का कारण, तो यहाँ सुरक्षित है, अत कारण, परिशुद्ध ब्रह्म सूचि कारण का निश्चित कर के ब्रह्म, सूचियों ने उपदेश दिया है, परम परमात्मा ही कर अव्याकृत, अव्याकृत, अव्याकृत माया तो जो माया है वो अक्सर किस लिए है कारिया कारा कार्य, कार्य की अपेक्षा से ऊपर है, अक्षर, अक्षर, पर, यहाँ पर, वही दावा पुरुषों के रक्षा cut to पुरुष है तो है और कूट से जो माया है, प्रकृति वो है अक्षर, तो ये जो प्रकृति है, अक्षर जो है कार्य अपेक्षा कार्य का नाच होता रहता, उसका नाच नहीं होता और दूसरी यह पर है यह कार्य की अपेक्षा कारण पर होता है पर कार्य कारण, कार्य कारण, दोनों से पिता पुर है, समझ में बना जो पर है, मैंने किसी पर, अपने कार्य से, पर, अपने कार्य से पर करे, उससे भी ऊपर ही है मन कार्य दोनों से ऊपर है और दूसरे समय यहाँ by i कार्य और अंदर तक न धातु to sit ने वाला धातु है, जमा किया सूर्य होने के कारण या तो ब्रह्मण का मनुष वाणी मन के सहित बिना काश हो जाते हैं वह ब्रह्म, अनंत रूप विद्वान, न विवेकी, उस ब्रह्म को जो आनंद रूप है, उसको जानने वाला कभी नहीं डरता नीति नीति की विपसियासर्वमआरोप, अभाकरियथेजोदो आरोपी थे, सबका आदि सब्जी तू राज शुद्ध शुद्ध ब्रहमा ssinostariname sasti शांति शांति।
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