Chaturmas 2012 Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Sarasvatiji Mandukya Upanishad 38

This is a Hindi-language recorded lecture (YouTube) by Jagadguru Swami Swaroopanand Sarasvatiji on themes from the Mandukya Upanishad and Vedānta. The speaker discusses the nature of ātman (Self) — distinct from body, prāṇa, mind and intellect — and critiques identification with transient objects; he uses scriptural references (Bhagavad Gītā), analogies (mind as an elephant) and practical advice on śraddhā (faith), renunciation and inner meditation as the means to realize lasting bliss (ātmanānanda).
Chapters
Om shanti sant anti a tum bam stubsatiतमचावत बूत ग्रह समूपतितबश्वीकार बोल रहे हैं बहुना प्रणाजिनाम अन्य तमम उक्त अनुक्त वह यम भावम पदार्थ 10 अन्य व, आप अभी जितने बताए 2 अनेक कर बताए न कर बना है प्राण प्राण से। ये इनमें से कोई 1 या जिसका कहा गया हो, या जिसको नहीं कहा गया हो, जिस पदार्थ को, जिसका आचार्य या कोई अन्य आप कह देता है, इधमेतत्मितीयही तत्व है सतम भावम आत्मभूत पर सचिव उसी भाव को अपना स्वरूप समझ लेता है। आयाम हामिदी मैं ये हूँ, ये समझ के या जी, ये मेरा है। तम दष्टरमसभाऊीऐसी दृष्टि जो है उसका वो भाव उसकी रक्षा करता है। यदि भाव भूत उसी के द्वारा दर्शित भाव वही होकर उसकी रक्षा करता है, स्वयं आत्मा, सर्वतो आत्मा सब प्रकार से उसका निरोध करता है। चसमन्तगहतथावनवेश तत्व में थी, वो उसको उसी गृह से ग्रस्त और उसी वाला निवेश हो जाता है। यही तत्व है कहाँ से है? ठीक है, लोग का नाम परीक्षक नाम क्या कस पे करपना भैदान उदारित लौकिक। परीक्षक जो हैं, उनके कुछ कल्पना भेद का उदाहरण देकर। अनंतवात बहुत से कल्पित भेद हैं। इसलिए asia सब कल्पनाओं का उदाहरण यहाँ पर नहीं। युदरशीतहासकदमबउम रक्षा साधक पुरुष तादात में साधक पुरुष का साधन प्राप्त करके रक्षण रक्षण प्रकार प्रकट ही साक्षात साधन रूप तो अपर कहते हैं कि वह उसी को साधारण रूप से समझकर उसी मिस्टर कर लेता है। और कहीं दूसरी जगह उसकी प्रकृति नहीं होती। तो समान्य हेतु रुकता। tippani a समुदाय तथा a a इसका अर्थ ये हुआ कि कोई प्राण को, किसी को, किसी को सुनकर आचार्यों से, किसी आप्त से उसमें ही अपनी दिरनिष्ठा कर लेता है और दूसरा छोड़ देता है। प्राण वाला परणाई में रह जाएगा। जो आज संभाला जायेगा बताए गये हैं। जिसको जिसके आचार्य ने कुछ बता दिया वो उसी में अभिष्ट हो जाता है। यही तत्व है और दूसरी को छोड़ देता है। और फिर वो जो जिसको वो अभिष्ट होता है, वही उसका आत्मा हो गया। तो वो उसकी रक्षा भी करता है, अपने विश्वास के कारण उसकी रक्षा करता है। वही 1 कहावत है आप आप पोते आप मा होई और मांग को man hai करते है अपने पो बनाते से बेटा है हुई हुई है हुई की पुजा होती आप लीपे आप पोते आप माँ हुई और न पड़े बेटो मांगे अगर राणकी कोई तो वो किससे मांग रहे है। जिसने खुद को बनाया है खुद ने बनाया है तो तुम खुली तो दे ही है। वो उसका जो आत्मा है, वही हो बन के उसका फल देगा। ये कहना आत्मा ही जिसमे आप विश्वास कर लेंगे वो आत्मा फल देरा। लेकिन आपने उसमें निवेश कर रखा है। आप मान बैठते हैं, इससे हमको यह फल मिला। दूसरे का छोड़ देते हैं। का गीता देवता सदस्य यमराम हाँ श्रद्धा 10 श्रद्धां थामे और विधा है। यह है है। जिस धन को बक्षी से मनुष्य पूजन करता है। भगवान कहते हैं कि मैं उनकी श्रद्धा को वहीं निश्चित कर देता हूँ। पर जो वो फल चाहते हैं, उनका फल अंत्वान होता है। अंतव्ुफलंतीशाम मभतरांतिमामापी। तो यहाँ आत्मा, श्री कृष्ण सबकी आत्मा है। वो आत्मा ही सब में अपनी निष्ठा बना देता है। और उसे फल प्राप्ति प्राप्ति दिखाई पड़ती है। वो प्राप्ति है, उन्हीं की है। आत्मा की। आपके ही संकल्प से सब कुछ हो रहा है। तो अपने आप को भुला कर। आप दूसरी जगह उसमें निष्टा करते हैं। ये कहना है? यह वेदांत की बात है, उपासना की बात नहीं है। और फिर ये है की सबके अलग अलग देवता होते हैं। कोई किसी को मान रहा है, कोई किसी को मान रहा है, कोई किसी को मान रहा है और सबको फर की सिद्धि हो रही है। जो जो लोग चाहते हैं, वो हो रहा है। तो वो कहा रहा है? वो अपने आप से ही हो रहा है और वो आरोपित कर रहे हैं। मैं अब आगे चलिए एवं करे। एवम आत्मनो प्रथक भाव भूत रेश। आत्मा कल्पता, 2 राणाजी बताए गए। यह आत्मा से भिन्न नहीं है। लेकिन पृथक भूतही रेश आत्मा है। हाँ, पृथक भाव भूत। इस आत्मा जो आत्मा है, प्राण जी, जो विकल्प है, वो उसी में कल्पित है। बसुता, यह सच नहीं है। आत्मा ही सत्य पर महावर अपरधकमुतेहतमा सराज रुप परसदेव रक्षित हो। अभी रक्षित मूरे कहते हैं कि ये जो है, प्रणाली प्रणाली, जो भाव है, जो पहले बताए प्रणाली, जो कई कल्पनाएं बताई गई। तो इनके साथ आत्मा को लोग जोड़ देते है। यही है, यही आत्मा है। आत्मा से इनको संयुक्त कर लेते हैं, किस प्रकार कर लेते हैं? हम मम, यह मैं हूँ, यह मेरा है। इस तरह से इनके साथ जुड़ जाते हैं। लेकिन ये कल्पना है? बसुता आत्मा इनसे सर्वथा विलक्षण है। जैसे रज्जु में सर्प, उसी तरह से आत्मा में ही कल्पित है। वो इनसे बने, ये वस्तुतः आत्मा से भरने नहीं। अर्थात यहाँ पर बाद सामान्यकरण है। सर्वर जो कुछ है, आत्मा जो आत्मा है, वो सब है। आत्मा, आत्मा, सर्व, सर्व विध। तो ये सब के सब पहले इन सब से थक कर के ब्रह्म के, आत्मा के स्वरूप का निश्चय हो जाए। कल्पना का त्याग करके कल्पना के ठान को जान लें। और उसके बाद ये जो अध्यास है, जो कुछ दिखाई पड़ रहा है, सम आत्मा में कल्पित है। और आत्मा से भिन्न नहीं है। अभी तक जो गर्म, उसका लता है, तो पहले इनसे उनको अलग करना पड़ेगा जी, क्योंकि ये उसको बांध रहे हैं। अहंता ममता में। तो इनसे अहंता ममता का त्याग करके ये समझ लो। ये तो स्टांस की बात अपने ऊपर घटाओ। तुम अपने को शरीर मान रहे हो, इंद्रिया मान रहे हो, प्राण मान रहे हो, मन मान रहे हो, बुद्धि मान रहे हो, ठीक है। और इसी तरह से ये सब भीतर के हैं। इनको हम कह रहे हो, ये मैं हूँ। और इसे शरीर से सम्बंधित जो है, मेरा क्या रहे हो। तो ये सब के सब हमसे अलग है। पहले यह समझा है। क्योंकि जो दृष्टा है, वो दिश्य से अलग होता है। जो जिसको जानता है, वो जिसको जानता है, उसे जानने वाला अलग होता है। तो शरीर को तुम जानते हो तो शरीर को जानने वाले तुम इससे अलग हो। यह विचार की प्रणाली है। विचार की प्रणाली यह है कि पहले स्थिर आसन से बैठ जाए स्थिर। हासन से बैठ के। तो मन में आपके, सही जाएगा। शरीर आपके मन में आ गया। इसका मतलब है शरीर जो है जे हो गया, आपका ध्यान का विषय बन गया, दे हो गया। और जे होता है, गेंद से जाता अलग होता है। तो तुम शरीर नहीं हो है। अब उसके बाद तुम्हारे मन में ये आएगा, इस शरीर का संचालक में हूँ, मैं इसका संचालन करता हूँ। ये निकल गया शरीर। हाँ, ये तो समझ गए, मैं इसका संचालक प्राण, प्राण इसका संचालन करता है। तो प्राण का ध्यान करो। प्राणी हो गया होने के कारण हो गया। तो प्राण भी तुमसे अलग है। फिर उसके बाद मन में तुम्हारे मन में आता है कि मैं जब संकल्प करता हूँ तब क्रिया होती है? तो क्रिया का मूल मैं हूँ। मन मन तो मन का ध्यान करो। मन से हो गया, औधे हो गया। तो घिन हो गया। तो मैं मन नहीं हूँ। ठीक है। अब उसके बाद तुम्हारे मन में आएगा कि मन को जहाँ मैं भेजता हूँ, जहाँ जिस जिंदगी के साथ मैं मन को जोड़ता हूँ, वो हिंदी विषय का ग्रहण करती है। तो मैं निश्चय करता हूँ। हाँ बुद्धि हो गयी। तो बुद्धि आप बन गया। बुद्धि का ध्यान कीजिए। तो बुद्धी दे हो गई, हो गई उसके नेता। तो अब उसके बाद आप कहेंगे आपको? कुछ समझ में नहीं आ रहा है, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। तुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा की तुम जान हो। तो वो अपना स्वरूप पक्का कर रही है। और ये जो है स्वरुप है, चित स्वरूप है, जानने वाला है। यह हो गया। बनाया है बुद्धी को देह बनाया, न समझी को देव बनाओगे। भाई कुछ समझ में नहीं आ रहा है। तो न समझी भी अज्ञान है, आनंद में कोष है, इसके भी तुम साक्षी हो। तो वो जो सब का साक्षी है, वो चित वरूप है है। ये चितस्वरूप हो गया, वहाँ जाके बैठ जाओ। अब तुम से अलग है। अब ये क्या है, ये देखना है। तो अब ये समझ लो कि ये शरीर और ये सारा संसार क्या है? का है 80, इसमें प्रतीत हो रहा है, हैं, सब में लगा है, है गठेपरठेमठे। तो घट पट, पट तो बदलते हैं लेकिन यह नहीं बदलता है न। तो जो है उसी का नाम ब्रह्म है, है न, वो ब्रह्म हैं। आप, वो ब्रह जो हैं हमसे भिन्न है, क्या भिन्न है? ये देखो जगत तो खत्म हो गया। क्योंकि सत मत है। अब अगर हमसे भिन्न है तो वो भी जगत के समान हो जाएगा। और अगर हमारा है, हमारा है तो हमारी सेवा और रह क्या गया। 1 अद्युतीय आत्मा में तुम्हारी स्थिति हो जाएगी। का अपने मन को अपने स्वरूप में स्थित करके कुछ चिंता न करे। ये आत्मा के अनुसंधान की विधि तो इसको अपने में घटाना चाहिए। दांत से हमने समझ लिया और उसको अपने को देखो तो जैसे वैज्ञानिक लोग 1 सिद्धांत का निश्चय करके प्रयोग शाला जाते हैं। ऐसे हम लोगों को बैठ कर मनन करना चाहिए है। इस तरह से मनन करने से जिंदगी पढते हो और पढ़ते रहो बड़े। बड़े। पंडित ने कहा मैं जो दारा प्रवाह लगाते हैं, सब विवेचन करते है और चेलों से कहते हैं भैया जगत में अच्छा होगा। क्या जगत में छा है, उनको कभी विश्वास ही नहीं होता क्योंकि उसका प्रयोग नहीं करते। वो देख रहे हैं। तो ब्रिट गुरु के अभाव से और श्रद्धा नहीं होने से ब्रभमिनिस्टगुरु कहाँ से मिले हैं? उन्हीं से पढने गुरु आते हैं। विधान पढ़ने तो साधू जाते और उनसे जो पढ़ रहे हैं वो न के गुरु कैसे बन सकते है? तो ये मुश्किल हो रही है। चलिए आगे बढ़े तो होगा है। आत्मा आत्मा से होकर किसी का भी सत्व नहीं है। स्वत पता ना रज्जु में जैसे संकल्पित होता है, वैसे ये कल्पित आत्मानम स्केवर निर्वकर्मरमववेद जो केवल आत्मा को, निर्वकर्म को जानता है। तत्व सतियु्सतसेयुक्ति सो, अभिसंखितह वविशंकितमानेिसंक होकर विलार्थमविभाग करवेज करवेती। इदवंपरमवाकमइदो। अधो अन्य परम तो वो विराट की कल्पना कर सकता है कि इसका तात परी है और इसका तार परी है। जब वस्तु को जान लेता है तो बच्चनों का भी उसकी समझ में आ जाता है कि किस बच्चन का क्या तात परी हो सकता है? नहीं है न जात मविवि तुम, क्या तुम, तत्वता जो आत्मवेत्ता नहीं है, वह बेदार तत्व को तत्वता नहीं जान सकता। यह नहीं सुनते मानव बचन मनु मनु ने भी कहा है कि जो अनाध्यात्मवित है, अध्यात्म को नहीं जानता है, वो क्रिया का फल नहीं प्राप्त कर सकता। क्रिया का फल क्या है? आप जो भी क्रिया करेंगे लौकिक, बेजिक, वो क्रिया का फल क्या है? सुख है। सुख के लिए ही सब क्रियाएं होती है। तो चाहे लौकिक क्रिया का फल हो, चाहे वैदिक क्रिया का फल हो, वो सुख है। तो इनके फल रूप से जो सुख मिलता है, वो क्षणिक होता है, थोड़ी देर के लिए होता है। और आत्मानंद जो है अपने स्वरूप में जो आनंद है, वो अपार है। तो उसके भीतर सवानंद आ जाते हैं। क्रिया? यज्ञादी लौकिक में आप जो प्रयत्न कर रहे, विषय भोग के लिए। श्रद्धा जी, विषयों के संपादन में जो आप पर्यतन कर रहे हैं, वो लौकिक हो गए। तो आप प्रयत्न करके आप संगीत साथ में चले जाएंगे। ठीक है आपके मन में भावना आई कि अच्छा संगीत हम को सुनना है, उसके लिए आपने चंदा किया, चंदा करके बहुत से लोगों को इकट्ठा किया और भारत के सभी बड़े बड़े गवैया बुला रही है। और हाल लिया एयर कंडीशन। वहाँ पर। अब संगीत सभा हो रही है। सब सदस्य बैठे हैं, उस गाय है, गाय का रहे हैं, अमुक गाय कह रहे है, सुनता जा रहा है। हाँ हाँ हाँ बहुत अच्छा, बहुत अच्छा। थोड़ी देर के बाद उसको जम्हाई आने लगती है। अब टाइम हो गया। भाई, चलो रे, वो संगीत छोड़ घर जाता है, घर जाके अपने शैया में लेटता है तो उसकी औरत आती है। वो कुछ बात करना चाहती है, उसे भी मुंह फेर लेता है, उससे मोह फोरके कहा जाता है। सुशुप्ति में जाता है, सुशुप्त में जाके मेरा यास जो आनंद है जिसमें किसी प्रकार के प्रयत्न की अपेक्षा नहीं है, उसका अनुभव करने के लिए सब छोड़ देता है। तो वहाँ तो अज्ञान रहता है। ऐसा ज्ञान, ऐसा ऐसा आनंद है जिसमें अज्ञान भी न हो, वो पर है। उसको प्राप्त हो जाने के बाद फिर जो हमको रागादि से प्राप्त होता है, उसकी अपेक्षा नहीं रहती। चाहे हमको स्वर्गादी का राग हो, चाहे लौकी का राग हो, राग से सुख ही तो होगा। तो जब सबसे बड़ा शोक हमको मिल गया तब सर्विस ब्राह्मण से जानता। तो कर। हम प्रवचन में बता रहे थे के मन 1 अगर नहीं होता, मन की बात चल रही थी। तो ये मन क्या है? हाथी है, मन हाथी, प्यासा है, प्यासा मन रूपी हाथी। वृषा रूप ताल तलैयों में जाता है। पानी पीने के लिए तो उसमें पानी में सूर डालता है और पानी खींचना चाहता तो खींच लाने लगता है। इसी तरह से आप विषय रूपी काल तरिया में जा रहे हो और मन रूपी हाथी। उसका पानी पी के सुखी होना चाहता है। लेकिन वो सुखी नहीं हो पा रहा है। या उसकी चिपटी नहीं होती, उसकी चिपटी तब होगी, समुद्र भरा, पूरा शेर उसको मिल जाए। तो फिर उसके बाद वो कहीं नहीं जायेगा। क्या जरुरत है, मिल गया है, ये है मन मस्त हुआ हंसा पाया। तो जो आत्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेता है उसके लिए सांसारिक विषय चाहे लौकिक हो, चाहे लौकिक हो, दृ्टवदानुषसविकम दिष्ट, बदला, नुषसरिकममतलबये। जो विषय आज हमको यहाँ दिखाई पड़ रहे हैं, जैसे ये हैं वैसे परलोक के हैं। अंतर क्या है? वहाँ भी जो विषय मिलेंगे, वो इस तरह के होंगे। तो जब इनमें 2 है वह भी है। तो ऐसी स्थिति में हमें ऐसा सुख चाहिए जिस सुख से बड़ा कोई सुख न हो। और वो सुख है, बाहर नहीं है, वो अपने स्वरूप में ही है। सर्वे कर। बाद शमिल भागवत में दत्ता ने अपने ध्यान में सुनाया। उन्होंने कहा कि वो कहते है कि मैंने कृष्णा जिसकी कभी पूर्ति नहीं होती उससे प्रेरित होकर अने को कर्म किए और अनेको फलों को प्राप्त किया और उनको भोगने के लिए नाना योनियों में गया तो कहीं भी मुझे शांति नहीं मिली। जब मैं मनुष्य बना तो यहां पर भी मैंने प्रयत्न किया कि मुझे सदा सुख मिले दुख न मिले दुख की हानि और सुख प्राप्ति के लिए मैंने कर्म किए। लेकिन कुछ हुआ नहीं। दुख आता गया और सुख आया तो चला गया। बल्कि वो दुःख का बीज डाल के चला गया। तो मैंने छोड़ दिया है। वो कहते हैं सुखमय मनो रूपम सर्वे प्रति तनु समस्त विषयों हाहा, सर्वे हे प्रति, तनु समस्त हा। अर्थात इच्छा की उपर्तिहीजिसका स्वरूप है। ऐसा आत्मा है जिसमे जाने पर, जिसमें निष्ठा हो जाने पर समस्त शिक्षाओं की उपरति हो जाती है, हो जाती है। वो आत्मा सुख स्वरूप है। तो मैंने उसको जान लिया इसलिए मैं आनंद से बहता हूँ। कुछ करता धरता तो होता क्या? उन्होंने कहा कि जैसे किसी नदी का जल काई से लगा हुआ है जल तू, भाई, चन्न, हितवाग्ञोजकामया, दाब तथा नतद्टनतद्नतदिये कह रहे है कि जैसे जल से काई निकालती है और जल को ढक लेती है तो वो काई से ढके हुए जल को देख कर जो पानी पीने की इच्छा पर पशु है वो पानी पीने के लिए उस जल को छोड़कर मृकतृठना के पीछे दौड़ता है होने के कारण कारण इसी तरह से अपने आत्मा को छोड़कर अन्य को की तरफ दौड़ने वाली की हालत यही है। सतह अन्रि वो होता है तो ऐसी स्थिति में मैंने बाहर जाना छोड़ दिया और अपना बैठा रहता हूँ काम धाम करता नहीं हूँ। प्रश्न यह था कि तुम काम धाम तो कुछ करते नहीं, हो, करते नहीं। और मोटे तगड़े क्यों हो। तो किसी ने कहा की कारण धूसर मोट की, कारण धन। भूसर मोट कहते हैं कि धन की फिकर, न ऋण की चोट। यही कारण धमधूसर, धन की फकर नहीं है और किसी का कर्ज नहीं। कर्जवाली से आदमी कर्ज लेने वाला जो है, वो साहुकार से उसी तरह डरता है जैसे बैगर टिकट का आदमी टीटियाईइसदेखके डरता है, जिससे आप कुछ ले लो। जब वो मिलने आएगा तो आपको होगा। क्या मांगता है, यह बली न मांगे। इसलिए न हमको धन चाहिए, न हमे किसी से को लेना है। कहाँ भाई भोजन, कहाँ से मिलेगा? शोक कहाँ से मिलेगा का दुःख कैसे मिल जाता है? दुख के लिए कोई प्रयत्न करता है, प्रारम्भ दुख जाता है। इसी तरह से प्रारंभ दिवस सुख भी आ जाएगा। प्रारंभ पुषेतबबुरिजन्चल, प्रारंभ शरीर की रक्षा करेगा। ऐसा निश्चय कर के निश्चल हो जाता है। तो ये आत्मनिष्ठा है। तो ये बता रहे हैं भगवान। a, s, o na, अब आगे क्या है? क्रियाफल ने ये हम क्या रेट है? जो क्रियाफल हम ये कह रहे थे? क्रिया का मुख्य फल क्या है? सुख तो क्रिया का मुख्य फल है। जो आत्म नहीं है, उसको नहीं बन सकता। क्रिया का मुख्य फल तो सुख है। हमको सुख चाहिए, पदार्थ नहीं चाहिए। मनुष्य का प्रेम सुख से है, पदार्थ से नहीं, पदार्थ से पैदा होने वाले सुख से है। बहुत से लोग कहते हैं भाई, अगर भगवान को हम मेरा कर मानेंगे तो हम भगवान से प्रेम कैसे करेंगे? सगुण से प्रेम होता है, साकार से प्रेम होता है। बहुत से लोगों का यही कहना है। तो भाई बात यह है कि साकार से प्रेम होता है। साकार आपका कोई है, पर उसका आकार, उससे आपका प्रेम है कि उससे मिलने वाले सुख से प्रेम है। और शोक का क्या आकार है? कार है। कहा? तुम अब आगे बढ़िए। यहाँ सीधा जो है। मानव का कि किया? फल? यह अर्थ ने कहा, हमने वही व्याख्यान किया। वैसे उनका ये कहना है कि जब तक कि आप शरीर से भिन्न आत्मा को नहीं मानेंगे, तब तक कर्मों का फल नहीं मिलेगा, करवाई नहीं करेंगे आप। क्योंकि हर कर्मों का फल इसी जन्म में नहीं मिलता। जिसमें योग्य, आजादी का फल तो स्वर्ग जन्म में मिलेगा ही नहीं। तो अगर आप शरीर हैं तो शरीर को ही जल जाएगा। तो अगर आप शरीर से भिन्न आत्मा को नहीं मानेंगे तो क्रिया फल की प्राप्ति आपको कैसे होगी तो न तो वो क्रिया करेगा और न उसका फल उसको मिलेगा ये सीधा सा अर्थ है लेकिन जो हमने यहाँ पर मानो वो इस किया है की समस्त क्रियाओं का फल ही है सर्व के तावान सर्वेश जानता, उतपानेमानित, शुद्ध, जरासेम जलाशयों में जितना, सर्वतस् दुध के सबो सबों से भरे बुरे, मधुर जलाशय के प्राप्त हो जाने पर तालतलहियामें जितना प्रयोजन रहता है। तावान सर्वेश विदेश, सर्वेश विदेशी का अर्थ क्या है यहाँ पर रक्षणा करनी होगी, बेरुक कर्मसु और कर्म भी लक्षणा करनी पड़ेगी वेरुक्कर्मफरेशू तावान सर्वेश brahman बदल करने, बदल। trngtustagumstnuvi पuरaवiaसरिष्टनेमी, फस्तनोबिहसपदिरदरातु, ओम, शांति, शांति, शांति।
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