Part 1 Vishwa Kalyan Aashram Bhagwat Katha Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Saraswati

Hindi-language transcript of a religious discourse by Jagadguru Swankaracharya Swami Swaroopananda Saraswati delivered at Vishwa Kalyan Ashram announcing the start of a week-long Shrimad Bhagavat recitation and exposition. The speaker explains the purpose and power of Shrimad Bhagavat (Shrimad Bhagavata Purana), recounts how Krishna imparted knowledge to Uddhava and advised Vyasa (inspired by Narada) to compose the Bhagavat, and elaborates metaphysical themes: the nature of the supreme Truth (Paramatma), distinctions between apparent world (mithya) and the Absolute, laksana (signs) of truth, examples like mirage (mrigajal), and debates about whether nature alone can create the cosmos (prakriti vs. a conscious creator). The talk mixes scriptural citations, philosophical analysis, and illustrative stories.
Chapters
आज से श्रीमद भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ का विश्व कल्याण आश्रम में प्रारंभ होने जा रहा है। वन में भगवती भागवती कथा विशिष्ट भलाई हो जाती है। ये 7 अनुष्ठान है। श्रीमद भागवत क्या है? इस सम्बंध में श्रीमद भागवत के महात्म में आपने सुना ही होगा। 1 मुख्य बात ये है कि जब भगवान श्री कृष्ण एकादश का ज्ञान उद्धव को देकर, सधम जाने को उद्यत हुए तो उद्धव ने प्रार्थना की भगवन आप मत जाइए। क्योंकि आपके जाने के पश्चात घोर कलिकाल आ जाएगा। और कलियुग के आ जाने पर जिन खरों का विनाश करने के लिए आपने उतार लिया था और जिन खलों को मारकर पृथ्वी का भार उतारा था, वे खल पुनः उत्पन्न हो जाएंगे। ऐसी स्थिति में सजनों की रक्षा का उनका कोई आश्रय अभी तो आपकी शरण में आ जाते थे। अब कौन सा आशय रहेगा भगवान भक्तों के कल्याण के लिए? आप निराकार से साकार हुए। अब उनका कोई आलंबन तो होना ही चाहिए। आप कहेंगे कि भले ही में सगुण रूप से न रहूँ, निर्गुण रूप में सदा, व्याप्त रहूंगा ही बरनिगणोपसनेकष्टम निर्गुण की उपासना में कष्ट होता है? सबसे उसका पालन करना कठिन है? क्योंकि जो स्वयं सगुण होगा, वो निर्गुण की उपासना कैसे करेगा? निर्गुण होकर ही निर्गुण की उपासना हो सकती है। और जिसकी शरीर में आत्मबुद्धि है, उसके लिए तो अत्यंत दुखद है, कष्ट है तो भगवान आप कोई आलम्बन दीजिये। भगवान श्री कृष्ण ने इस पर गंभीर विचार किया और विचार करके अपना समस्त तेज श्रीमद भागवत की पुस्तक में स्थापित करे। इसलिए तेनेयम वांगमय मूर्ति, प्रत्यक्षा वर्ष से हरे। ये भगवान की वांगमयी मूर्ति है। और प्रत्यक्ष प्रत्यक्ष उसको कहते हैं जो इंद्रियों का विषय हो, इंद्रियों से जिसकी उपलब्धि हो, उसको प्रत्यक्ष कहा जाता है। हम नेत्र से जिसको देखते हैं वो नेत्रों से प्रत्यक्ष होता है। जिसका हम स्पर्श करते हैं, वो स्पर्श इंद्री से प्रत्यक्ष होता है। जिसका हम स्वाद लेते हैं, वो जिहवा से प्रत्यक्ष होता है, जिसका हम गंध लेते हैं, उसका गंध से प्रत्यक्ष होता है और जिसका हम शब्द से श्रवण करते हैं, वो काल से प्रत्यक्ष होता। तो ये श्रीमद भागवत, भगवान श्री कृष्ण का शब्द मय स्वरुप है। तो अगर ये हमारे कानों के द्वारा हृदय में जाता है तो प्रत्यक्ष रूप से भगवान श्री कृष्ण ही हमारे हृदय में जा रहे हैं। इसलिए इसका पाठ करने से, श्रवण करने से, चिंतन करने से भगवान के ही सानिध्य का लाभ प्राणी को मिलता है। तो वह श्रीमद भागवत की कथा आप सब लोग सुनेंगे। बड़ी अद्भुत और मंगल मई है। इसका प्रारंभ होता है महान। श्री कृष्ण द्वैपायन व्यास ने महाभारत और 17 पुराणों की रचना की, परन्तु उनके हृदय में संतोष नहीं हुआ। उनको लगा कि अभी कुछ बाकी है, जो मुझे करना चाहिए। उसी समय नारद जी ने उनको श्रीमद भागवत के 4 श्लोक सुनाए और कहा ये हमने नारायण से सुने हैं, ब्रह्मा से सुने और ब्रह्मा नारायण से सुने। इन्हीं का आप विस्तार कीजिए। भगवान श्रीकृष्ण के गुण गुणों का वर्णन निर्णय होगा और जिस वाणी से भगवान के गुणगणों का वर्णन होता है, वहीं वाणी मंगल हीं होती है। प्राकृत प्राकृत प्राणियों के गुणगणों का वर्णन करने से वाणी को तो पश्चात लाभ होता है। तो आप जो दूसरे पुराणों में, महाभारत में वर्णन किया है, उसमें प्रधानता दूसरे विषयों की है, भगवान के गुण गणों की नहीं है। इसलिए आप श्रीमद भागवत का प्रयन कीजिए। ये नारा जी के उपदेश्य से प्रभावित होकर कृष्णदिपागनब्यास ने श्रीमद भागवत पुराण की रचना की। और किसी भी मुख्य महत्वपूर्ण कार्य के पहले आवश्यक होता है कि हम उसकी निर्विग्न परिसमाप्ति के लिए अपने इष्ट देवता का स्मरण करें। तो ब्याज महाराज ने 1 श्लोक में अपने इष्ट देवता का स्मरण किया। जमासतोरेश्रविग्ञ सरा तेने ब्रह्म रला मुयतयसूरयजोमदामय था। यत्रतिशरओमृशा धमना सेन सदान रस्त कुढ़ कम सत्यम परम धिमही, सत्यम परम दीमई। उन्होंने कहा हम परम सब्त का ध्यान करें दीमई। लिंग, लड़का, लोट के अर्थ में ये छांदस प्रयोग और धीमरी बहु बचना है। इसका अर्थ यह है कि हम अकेले नहीं, अपने शिष्यों के सहित ध्यान करते, किस का ध्यान करते हैं। आप बोले सत्य का ध्यान कर। वह सत्य कैसा है। परम सत्य, सत्य परम धीमहि। हम परम सत्य का ध्यान करते हैं। अब उस परम सत्य का स्वरूप क्या है? लक्षण क्या हैं? लक्षण, प्रमाण्यम्, प्रतिज्ञा मारण लक्षण और प्रमाण से वस्तु की वृद्धि होती है। तो लक्षण 2 प्रकार का होता है। 1 स्वरूप लक्षण और दूसरा तरफ लक्षण। स्वरूप लक्षण उसको कहते हैं जो स्वरूप से संबद्ध, स्वरूप में रह कर रही अन्य से स्वरूप को प्रथक कर दे। वो स्वरूप लक्षण दूसरों से बिना प्रथक किए हम वस्तु को नहीं जान सकते। सारे संसार को। 1 साथ हम नहीं जान जान सकते। सबको अलग करके ही किसी वस्तु को जान सकते। उसके लिए हमें उसका स्वरूप निर्धारित करना पड़ता है। कि हम किसका ध्यान कर रहे हैं। तो जो स्वरूप में रहकर अन्य से व्यावृत कर दे, उस लक्षण को स्वरूप लक्षण कहते हैं। तो क्या सत्य वो परमात्मा सत्य, परम सत्य, यह उसका स्वरूप है। सत्यम ज्ञान, मनंतर, वो, परमात्मा सत्य, ज्ञान रूप और अनंत सजाती बजाती स्वगदभेदशून्य है। ऐसे परमस का पता कैसे लगा? बोले पता ऐसे लगा की उस परमात्मा में था मयो जिस परमात्मा में ये झूठा संसार भी रहने के कारण परमात्मा की सत्ता से सत्त्व प्रतीत हो रहा है। जैसे रस्सी में हमको सर्व का भ्रम हो जाए तो सर्व की कोई प्रथक सत्ता नहीं है। रस्सी की सत्ता ही सर की सत्ता है। तो संसार की जो सत्ता है वो परमात्मा की सत्ता से ही 57 हो रहा है। इसलिए आप देखिये राम चरित मानस में कहा गया है जहाँ सु सत्यता ते जड़ माया, भास सत्व मो साया। ये जड़ माया भी जिसकी सत्ता से स्वत प्रतीत हो रहा है, या हो रही है। ये जल जगत भी जिसकी चेतना से चेतनवत प्रतीत हो रहा है। 2 को मृषा यत्र यस्मिन परमात्मन सत्य। ये जगत मिथ्या होते हुए भी सत्यवत प्रतीत हो रहा है। अथवा अमृषा इस जगत में जो सत्यता प्रतीत हो रही है, वो उस परमात्मा के द्वारा हो रही है। परमात्मा में रहने के कारण हो रही है, तो वो परम सत्य है। ये तो सत्य नहीं है, सत्य नहीं है। जिसको अपनी सत्ता के लिए किसी अन्य सत्ता की आवश्यकता न हो, वो परम सत्य होता है। और जिसको अपनी सत्ता के लिए किसी अन्य की आवश्यकता हो, वो सत्ता जो है, उसकी बात की सत्ता नहीं होती। या तथ्य सरगो बोले, आप बताइए क्या कोई वस्तु झूठी होते ही रोते हुए भी स्वत प्रतीत होती है। कहाँ तेजोवारिमृदाम यथा मिनी मया देजओबारिमरदाम मरुमरीशीका। राजस्थान की मरुत्त भूमि में जब सूर्य की प्रखर किरणें पड़ती हैं, तो वो ऐसा लगता है कि सामने समुद्र लहरा जैसे तेज किरणों में जल की भ्रांति हो जाती है। मृगजल में जल नहीं है, लेकिन उसको जल मानकर मृग ग्लास के मारे पीने के लिए भटकता है। इसी प्रकार इस जगत में सत्यता नहीं है। परमात्मा की सत्ता से सत्य मानकर इस संसार में प्राणी उलझा हुआ है। तेज वार। कभी कभी जल में मिट्टी की बुद्धि हो जाती है, मिट्टी में जल की बुद्धि हो जाती है। और इसको समझना हो तो आप श्रीमद भागवत में पढेंगे। आगे की दुर्योधन ने जब राजसभा को देखा, 2 को जल में थल का भ्रम हो गया और थल में जल का भ्रम हो गया। जहाँ जहाँ जल था, अपना कपड़ा ऊपर उठाया जा था, वह डूब गया। तो 1 में दूसरे का भ्रम देखा जाता है। इसी प्रकार 1 की सत्ता, दूसरी की सत्ता, दूसरी को सत्य जैसी प्रतीत करा देती। यत्रतगोमृये हो गया। भगवान का स्वरूप लक्षण दूसरा लक्षण। जनता यता यस्मात परमात्मन् का। 7 अस्त जगता जन्मादि। जिस परमात्मा के द्वारा जगत की उत्पत्ति पालन संहार होते हैं, शुद्ध कहती है? तो जीवन, जिससे संसार की उत्पत्ति होती है, जिसमें रहते हैं, अंत में विलीन हो जाते हैं। वह परमात्मा का क्या प्रमाण है? कि परमात्मा से जगत की उत्पत्ति पर संहार होता है। बोले परमात्मा है सच्चिदानंद। तो जगत में परमात्मा का अन्वय है। कैसे अनभय है, घडा है, मकान है, कपड़ा है, हर चीज में है, लगा है, जो वस्तु है, उसमें है रहता है। और जो नहीं है, उसमें है नहीं लगता। इतरता बांज का बेटा है। कोई कहता है, कोई नहीं कहता आकाश का फूल है, कोई कहता है उसमें, यह नहीं लगता। तो जितना भी कार्य जगत है, उसमे है। शत्रू से सन, सन सबके साथ है लगायें। इसलिए कहना होगा की यह परमात्मा के द्वारा, इसमें परमात्मा का अन्य है और जो परमात्मा से उत्पन्न नहीं हुआ है, उसमें उसका अब 1 प्रश्न आता है। अन्य वितरिक से आपने यह सिद्ध करना चाहा कि परमात्मा से जगत की उत्पत्ति पालन संहार होता है। अगर हम ये कहे कि सांकवरिकल्पित प्रधान से होता है। क्योंकि शंख में 3 गुण माने गए है। कौन कौन से सत रज। तम तो संसार में सुख दुख और मोह देखा जाता है। किसी वस्तु से आपको सुख मिलता है, किसी से दुःख मिलता है, किसी से मोह मिलता है, तो सुख का कारण सत्वगुण है, दुःख का कारण रजोगुण है और मोह का कारण सगुण। तो प्रकृति के द्वारा उत्पन्न जगत में भी सुख दुख दिखाई पड़ते हैं। हो गया। जो प्राकृत पदार्थ नहीं है, उसे सुख दुःख मोह भी नहीं है। तो ये लक्षण जो आपने बताया जिसे जगत की उत्पत्ति, पालन, संहार उसमें है, वह कारण है। तो कारण प्रकृति में भी जाती हैं। क्या आप प्रकृति का, संग परिकल्पित प्रधान का स्मरण कर रहे हैं? राजीव से पूछा का नहीं। अर्थेश्ुविज्ञान ये प्रकृति जल है। जल प्रकृति संसार की रचना नहीं कर सकती। इसकी रचना किसी चेतन, किसी सर्वज्ञ मान परमात्मा ने की है। जड वस्तु किसी की उत्पत्ति नहीं कर सकता, वो दिया करते हैं। 1 कोई बहुत बड़े ऑफिसर थे, उनकी हिस्सी बड़ी धर्मात्मा थी। उसने अपने बेटे को भगवान का ध्यान करना सिखाया वो रोज उठ कर भगवान का ध्यान किया करता था। 1 दिन उसके पिता ने उसको पुकारा पर वो ध्यान में बैठा था। इसलिए आने में विलम्ब हुआ। पिता ने नाराज होकर पूछा तुमको आने में देर क्यों हुई? उन में ध्यान कर रहा था किसका ध्यान बोले भगवान का जान कहा? तुम्हारी माँ ने तुमको गलत बता दिया। भगवान नाम की कोई चीज नहीं है। तो यह संसार कैसे बन गया? पिताजी बोले नेचर ने बनाया, प्रकृति ने बना दिया। पृथ्वी जल वायु आकाश, पृथ्वी जल वायु आकाश। इन 5 तत्वों के सम्मिश्रण से अपने आप जगत का निर्माण हो गया। बेटे ने कोई बहस बना कि रात को 1 बड़ा सुन्दर चित्र बना कर उसको रंगों से भर दिया और पिता की मेज के सामने रख दिया। जब पिता सबेरे उठकर आया और सुन्दर चित्त को देखकर प्रसन्न होकर बेटे से पूछा अरे बेटे ये चित्र क्या तूने बनाया है? बेटे ने कहा नहीं पिताजी प्रकृति ने, नेचर ने बनाया है। कागज पाता रंग पड़े थे, हवा चली उसमें से परमाणु उड़े और इस में भर गए। तो उसने कहा ऐसा नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता तो कोई रंग कहीं होता? कहीं होता? ये व्यवस्थित क्यों हैं? कोई कारीगर, कोई चित्रकार ही इसको बना सकता है। जो चित्रकला का निपूर्ण हो। तो उसने कहा पिताजी, ये संसार बिना किसी जानकार के बन गया तो उसको लाचार होना पड़ा। अर्थेश्वविज्ञान भगवान ने कहा भगवान ने देखा की मैं संसार की रचना करूँ। इसलिए ब्रह्म सूत्र ने ये तेरा शब्द, शब्द, प्राण, प्रमाण, रहित, संकिल्पत, प्रधान जगत कारण ईक्षण पूर्वक सृष्टि हुई है, किसी जानकार ने बनाया है। आप अपने शरीर की रचना देख लीजिये। शरीर में ऐसी कोई ऐसा कोई अंग नहीं है जो काम का न हो। जहाँ जिसकी जरुरत है वहाँ भगवान ने रच दिया है। नाक नहोती सुनते गये थे, आग न हो। देखते, कैसे, सुनते, कैसे पेट के भीतर भी कई तरह के यंत्र बने हुए हैं। तो ये सब के सब भगवान की प्रेरणा से बना है। इसलिए हर्थेश्वविज्ञा महाराज ऐसा है की कोई ानी जीव ने ही अपनी तपस्या से संसार को बना दिया होगा। जैसे विश्वामित्र जी ने नारियल बना दिए। बोले अरे सराठसमेरआजतेजी सराय उसको किसी के अनुग्रह की आवश्यकता है। तो फिर ऐसी बात है। तो संसार की रचना हिरण नगर ब्रह्माजी ने किए। हिरण नगर समवर्तत भूत शी कहते हैं सबसे पहले हिरण नगर् की उतपत्ति हुई है जो सब प्राणियों की उत्पत्ति का कारण है तो क्या आप हर ब्रह्मा जी की स्थिति कर रहे हैं पर नहीं महाराज देने ब्रह्म हृदा आज कब आज कभी ब्रह्मा के हृदय में जिन्होंने वेदों का ज्ञान प्राप्त कराया ब्रह्मा जी के हृदय में वेदों का मंत्र हुआ, आज कभी ब्रह्माजी के बीज उन्होंने वेद प्रदान किया वो परमात्मा है जो सब प्राणियों की बुद्धि वृत्ति की वृद्धि का साक्षी है, जो हमको सद्बुद्धि देता है इसलिए हम लोग के 2 परोदयातश्रीमंत्र में कहा जाता है की हमारी बुद्धि को प्रेरित तो परमात्मा मनुष्य की बुद्धि को जब हमारी वासनाएं हम छोड़ देते हैं तो भगवान की प्रेरणा से जब काम करते हैं तो सदा हमारे काम शुद्ध हो जाते हैं तो गायत्री के समान जैसे गायत्री, मंत्र सबको सद्बुद्धि देता है उसी प्रकार भगवान ने ब्रह्माजी को वेदों के द्वारा ज्ञान प्रदान किया वो परमात्मा है देने ब्रह्म हृदा आज कवयो मुनिया सूर्या जिस परमात्मा के स्वरूप को जानने में सूरी माने, बड़े, बड़े, विद्वान भी मोहित हो जाते हैं, ब्रह्मा भी मोहित हो जाता है, उस परमात्मा का हम दान करते हैं और जिस परमात्मा ने धामा से सदा, जो सत परमात्मा ज्ञान स्वरूप है, जो अज्ञान का भी ज्ञान है, मैं ब्रह्म को नहीं जानता ये भी ज्ञान जिससे होता है, वह परमात्मा सदा ज्ञान स्वरूप ही है और दूसरा दामला से गम के जन ्र्माकरकारिमृत में होकर जो अपने स्वरुपू प्रकाश से अज्ञान पर कार्य का नाश कर देता है, ऐसे परम सत् का ध्यान करते है तो ब्रह्म के सूर्य जब बीमयोयत्सरगोमिषा धामा सेन सदानरस्तगुहगम सत्यम परम दीमई 1 अर्थ दूसरा 1 अर्थ और है जो इस प्रसंग से संगत होता है की कृष्ण दपायनव्यसब्याज ने भगवान श्री कृष्ण के गुण गुणों का वर्णन करने के लिए ही श्रीमद भागवत की रचना की थी तो उसमें स्वर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति, मनमंतरशनकानरोध, मुक्ति, इन सब का वर्णन करने के पश्चात आश्चर्य वर्णन किया है तो दशमस्खंदमें आशय का वर्णन वो आज शय क्या है श्री कृष्ण तो श्री कृष्ण में है, सारे जगत के पिता हैं, पिता तो पहले ही से है, उसका जन्म क्या होगा लेकिन परमात्मा भी भक्तों की प्रार्थना से कभी कभी सबके पिता होते हुए ही पुत्र बन जाते हैं जैसे देव की वसुदेव पहले जन्म में कक्षा और अदिति थे, कक्ष और अदिति की प्रार्थना से वामन रूप में उतारित हुए, उसके पहले योग्य और रुचि से जो धर्म और रुचि से यज्ञ रूप से अवतरित हुए, अब देव की वसुदेव के रूप में भगवान पिता होते हुए भी पुत्र बन रहे हैं आध् जन्म आज परमात्मा का जन्म कैसे हुआ जब इस पृथ्वी में पापियों का भार बढ़ गया, सज्जन परेशान हो गए, देवताओं ने हाँ पृथ्वी अपने भार से पीड़ित होकर देवताओं के पास गई और देवता भगवान ब्रह्मा के पास गए और ब्रह्मा जी शीर समुद्र में, जहाँ भगवान शिव नारायण विश्राम हो रहा था, वहाँ पहुँचे और उनसे प्रार्थना की तो भगवान ने कहा ठीक है।
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