Part 3 Vishwa Kalyan Aashram Bhagwat Katha Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Saraswati

A Hindi transcript of a religious discourse (Shrimad Bhagavatam katha) delivered by a Hindu monk. The speaker opens with an invocation and explains the distinction between true (nishkama, nishkapat) dharma—devotion without desire—and hypocritical ritual done for fruit. He lists three types of suffering (daivik, bhautik, dehika), warns against envy and gossip, and recounts narratives (Narad's previous births, Sukhadeva and Parikshit, Ashwatthama's atrocity, Bhishma's teachings) to illustrate the salvific power of listening to the Bhagavatam. The speaker exhorts repeated hearing of the text for spiritual benefit and inner purification.
Chapters
A a a a a i जो नाम मात्र है, मिट्टी ही सच्ची है। मिट्टी से बनने वाले बर्तन बेकार हैं। मिटाएं सत केवल मिट्टी है। इसी प्रकार परम ब्रह्म, परमात्मा से उत्पन्न। यह जगत परमात्मा से भिंड नहीं है। सुधी कहती है तस्मालवाईतस्माल आकाश संभूता, आकाशादवायु, वायु रगनी, अगने रापा रेता। परमात्मा से आकाश उत्पन्न हुआ। आकाश से वायु, वायु से। अग्नि। अग्नि। इनमें तो व्यावृत्ति है, लेकिन जो परमात्मा है वह 1 रस है। वो 1 रस परमात्मा ही सत्य हैं। इसलिए सत्यम परम धीमही, उस परमसत्य का हम ध्यान करें। ए मार्श कृष्ण दीपायन ने मंगला चरण में स्मरण किया। कोई भी काम प्रारंभ करने के पहले किसी प्रकार का बिगन न हो, इसके लिए इष्ट देवता का स्मरण करना, शिष्ट वर्षों की परिपाटी आप ये बताते हैं। यह श्रीमद भागवत में है। क्या धर्म प्रोजित नरम सरनाम सताम वेध्य वस्तु सिबदमतापत्रउमूरनम श्रीमद भागवत। महामुनि कते किंबा परहरि शरा सजोरजवरुजितितकृत सुशुित्छनामें बताया गया। कृष्ण व्यास ने व्यासेन अश्विन श्रीमद भागवत धर्म रूप में, कृष्ण दिपायनव्यासइस। श्रीमद भागवत में धर्म का निरूपण करता हूँ। महाराज धर्म का निरूपण तो आप महाभारत में कर चुके। 17 पुराण में कर चुके। इसमें क्या विशेषता है? बोले इसमें विशेषता यह है कि इसमें धर्म का विशेषण है। प्रोषित कैतव प्रकरषणउज्जित। कईतो कपटफलाबसंधी फल की इच्छा से जो धर्म किया जाता है। बहुत कपट धर्म है। आप देखिये धर्म बहुत से लोग करते हैं लेकिन फल की इच्छा मन में पहली कर देते है। बहुत से लोग यहाँ कथा सुनने आये है। मन में पहली भावना रख दिये की हमारा ये काम हो जाए तो कोई न कोई कामना मन में रख कर जो धर्म किया जाता है। बहुत सा कपट धर्म है, कपट है? आप भगवान से प्रेम करते हैं, क्या भगवान से, भगवान से प्रेम करके कुछ चाहते हैं। अगर किसी दूसरी चाय से भगवान से प्रेम करते हैं तो जिसकी चाह है वो आपका ष्टता भगवान नहीं है। जैसे आप देखिए, सबेरे सबेरे उठकर किसान गोबर समेटता है। आगे आगे गाये जा रही है। पीछे पीछे टोकरा लेकर गोबर बहुत किसान समेट रहा है। उसका गोबर कोई दूसरा उठा है तो नाराज हो जाता है। तो वह गोबर से प्रेम करता है। नहीं गोबर इसलिए इकट्ठा कर रहा है। इससे वो खाद बनाएगा और खाद। अपने खेत में डालेगा। तो अनाज पैदा होगा। तो अनाज से उसका प्रेम है, गोबर से प्रेम नहीं है। इसी प्रकार आप धर्म करते हैं। तो धर्म करने के पहले यदि आप कोई भावना बना लेते हैं तो आपका प्रेम उस भाविक भावित वस्तु से है, धर्म से नहीं है। अब आप देखिये महाराज मेरी भैंस खो गई है। हनुमान जी अगर बहस मिल जाएगी तो सवा पाव लड्डू चढ़ा दूंगा। तो समभाव लड्डू में भैंस मिल जाएगी। मजदूर भी नहीं मिलेगा। लेकिन हम भगवान से चाहते हैं कि वह मजदूर का काम करें। तो इस तरह के जो भक्त हैं, वो भी भक्त हैं। कम से कम भगवान में विश्वास तो करते हैं कि भगवान देते हैं, मांगने वाले को निराश नहीं करते। जो उनके सामने जाता है और जो इच्छा करता है, बो देते है। और हमारे भगवान शंकर तो ऐसे हैं जो मांगने वालों की प्रतीक्षा करते की आय। मांगने संसार के लोग मांगने वालों से डरते हैं। कोई चंदा मांगने न आ जाए, कोई भिखारी न आ जाए, कोई लेने वाला न आ जाए, इससे डरते हैं। और भगवान शंकर दोनों हाथ से लुटाते है। लो जो तुम चाहते हो, वो ले लो। लेकिन जो भगवान का भक्त है वो कहता है कि प्रमोद मुझमें यह बुद्धि नहीं है कि मैं आप से क्या माँगूँ। आपको जो अच्छा लगे, जिसमें मेरा हित हो, वो मुझे दे। 2 ये भक्त है जिसकी कोई और कामना न हो। आप देखिए धर्मा प्रोजित, गहतवुतरभरमा यहाँ पर प्रोजित कर प्रोजित कहत धर्म भगवान श्रीकृष्ण का अवतार होता है। गोपियां सुनती हैं। आत्मा भूषयानचक्रुवस्त्रा, गलपंजनांधीभी, गोपियां जब सुनती हैं। सौदा के घर में बेटा ने जन्म लिया है। यहूदा जाए लालना में, बीदर में सुनाई तो बढिया साड़ी लेगा और परिया उड़ती हैं, आँख में अंजन लगाती हैं। गले में हमेल पहनती है, हाथ में पहुंची पहनती है और मंगल थार। थमा सजाकर क्रम बद्ध होकर नंद के भवन में जाती हैं। ये जानती हैं कि यो बालक जन्मा है, वो परमात्मा का तार है में वेदन में सुनि आई, लेकिन परमात्मा से क्या कहती हैं, यह सौदा मेरा लाल, जुग जुग जिये भगवान को आशीर्वाद देते हैं। ला। आज जपिंजानाजरमपाहती बाल के बालक को आशीर्वाद देते हैं। भगवान को भक्त देता है। भगवान से मांगता नहीं है। ये आप जो सुन रहे हैं, स्मित भागवत की कथा, ये प्रार्थना नहीं है, ये भगवान को देना है। हम अपने हृदय से जो हमारा प्रिय है, उस प्रिय को भगवान बना रहे हैं। प्रेम तो सबके भीतर है। धर्म प्रयोजित कई तहोत्रपरमो तो इससे बढ़कर कोई धर्म नहीं है। भगवान से प्रेम करना ही हमारा परम पुरुषार्थ है। हम भगवान से और कुछ नहीं मानते। आप हमारे हो गए, आपने हमको दर्शन दे दिया, हमारे ऊपर, आपकी कृपा हो गई। इसी से हम तो ऐसा धर्म श्रीमद भागवत में वर्णित हैं। निष्काम धर्म, निष्कपट धर्म। और ये किसके लिए है? कौन इसका अधिकारी है? निर्मत्सरणम सतम। जो सच पुरुष निर्मत्सर है। दूसरों के उत्कर्ष को देखकर, जो जल उठता है, वह मच्छर युक्त है। मच्छर काई कलंक न लावा, मच्छर मत्सर से मनुष्य कलंकित होता है। दूसरों की बढ़ाई सुनकर दुखित होना मात्सर्य है। जो खल है, वो दूसरों की बढ़ाई सुनकर बड़े दुखी हो जाते हैं। जो काहू की सुनी बढ़ाई सास ले, जन जुडी आई, दूसरे की बढाई सुनकर बड़ी सास त्यारी, राम, राम मुझे। ऐसे लोग जिनके हृदय में प्रोत्कर्ष से कोई दुःख नहीं होता, जो उदार हैं, दूसरों की उन्नति को देखकर, जो प्रसन्न होते हैं, जो कहते हैं अरे चलो श्रीमद भागवत की कथा परमपावनी कथा हो रही है। तुम भी चलो, हम भी चलते हैं तो दूसरों को भी अच्छे काम में लगाना, सब अच्छे काम करना, यह सज्जनों का काम है। तो ये श्रीमद भागवत की कथा ऐसे ही लोगों की है। धरमसराणमसतमवेद्यम, वास्त, मत्र, वस्तु श्िबदम और इसके द्वारा कोई ऐसी वस्तु का वर्णन नहीं किया जा रहा। है, नहीं जलाई जा रही है। जिस वस्तु को जानने से कुछ और जानना बाकी रह जाए, ऐसी वस्तु का ज्ञान इसके द्वारा होता है कि जिसको जानने के बाद जानने योग्य कुछ रह नही जाता। तापत्रय मूल नम तीनों प्रकार के ताप, दैकतदैविकताभौतिकताप 3 तापों से प्राणी तप्त हो रहा है। कहा भाई, कौन, कौन सी ताप हैं ये का। 1 तो दैविक ताप। आप किसी को हार दिखाइए, जन्म, पत्री दिखाई, कोई न कोई ग्रह प्रतिकूल, अवश्य होगा, राहु केतू सुख की दशा और इतना ही नहीं भूत प्रेत पिशाच की बाधा, देविक, बाधा एका। 1 भूकम्प हो जाना, गवर्नर मत जाना, कुछ का कुछ हो जाना, दैविक ताप। इसके अतिरिक्त दैविक ताप और देहिक ताप। दही ताप क्या है? कोई न कोई रोग शरीर में हैं, सबके शरीर में रोग है। आप याद करो, बचपन से लेकर आज तक यह शरीर कभी बिना दर्द के रहा है, कोई न कोई दर्द रहता है। और ये तो हो गई ब्याज पर दूसरी होती है आधी। मन में चिंता महाराज की लड़की बड़ी हो रही है, शादी करना है, लड़का पढ़ता लिखता नहीं है। और पाती हमारे अनुकूल नहीं है। अब पत्नी भी गड़बड़ हो रही है। ये मन में चिंताएं बैठे, बैठे रात को नींद खुल जाती है और नींद नहीं आती। बहुत से लोगों को नींद की गोली खाकर सोना पड़ता है। यह आदि और बहुत ताप। अब देखिये, कहते हैं मीन सजना संतोष रतिराम का मुर्ग मिचरा किसी का न ही किसी को मारता नहीं, तिनका है, पर उसके पीछे बहेलिया लग जाते है। मछली पानी पी के रह रही है, उसके पीछे ढीमर लग गया। सज्जन संतोष से जीवन बिता रहा है, उसके पीछे चल खोर लग जाते हैं। तो जीवन के सुना बैठे, बैठाए चुगलखोर बड़े खतरनाक होते हैं। क्यों भाई सो गए, क्या नहीं सो रहा हूँ, क्या बात है। 1 जरूरी बात आप से करनी थी, कौन सी बात अच्छा तो आप शो कल बात करें या बताई। 2 जो आज हम उसके वहाँ गए थे, उसने आपके बारे में ऐसे शब्द कहें गुस्सा। तो मुझे ऐसा आया की मार दू थप्पड़। लेकिन मैंने तुम्हारी संतोष संतोष के कारण कुछ कहा नहीं, कहा, कहाँ का, कहने की बात ही नहीं। जब बहुत पूछा तो कुछ बता के चला गया। वो चैन से सोएगा, जुगल जुगल को सुहल खोर चैन से सोएगा और तुम्हारी नींद खराब हो जाएगी, आपकी नींद खराब हो गया। और आदमी ही चुगलखोर। आदमी ही चुगलखोर नहीं होते, महिलाएं भी होती है क्यों घर में जब कोई नहीं रहेगा, बहु के पास पहुँचेगी और फिर उसके कान में भूख है। तेरी जिठानी की बात अच्छी सी डी है, उसका गहना अच्छा है। तेरा पति कुछ करता नहीं है, ये तेरे साथ व्यवहार अच्छा नहीं लग रहा, सासु तुम्हारे साथ कठोर व्यवहार करती है। कह सुन कर चली गईं और वो बेचारी भोली भाली अपना ग्रस्ती का जीवन बिगाड़ रही है। चुगलखोरों से सावधान रहना चाहिए, लेकिन चुगल खोर आपका पीछा नहीं छोड़ेंगे। ये बहुत ताप चले जा रहे हो। कुत्ते ने काट लिया, साफ ने काट लिया, एक्सिडेंट हो गया, नाव उलट गई, कई तरह के भौतिक ताप लगे हुए हैं। लेकिन ये श्रीमद भागवत रापताबतरयमूलनम तीनों प्रकार के तापों का उन्मूलन कर देता है। श्रीमद भागवत बात सर्वे सुबेश, गत से दुर या बेस्ट, सर्व, सर्व, शास्त्री, हु और योग नाम तत्तम परम भा समस्त। वेदों में जिसका वर्णन हो, जिसका बोध होना कठिन हो, सब शास्त्र में वरिष्ठ हो और योगियों का परम तत्व जिसमें वर्णित हो, उस ग्रंथ का नाम श्रीमद भागवत है। श्रीमद भागवत महामुनि कते माँ मुनी। इसलिए मत, दौड़ो और किसी की कथा सुनने मत जाओ। आओ श्रीमद भागवत की परम पावनी कथा का श्रवण करो। यह क्या है। सद्ोरदधवरुद्धेत्कति भी सुवि अरे श्रवण करने से तो लाभ होता ही है। इसको सुनने की इच्छा मात्र से भगवान हृदय में विद्यमान हो जाती हैं। जाते कहाँ जा रहे हो? हम काली कोली को, जिला, संगम क्षेत्र में जा रहे हैं, क्यों जा रहे हो? वहाँ कथा हो रही है। हम भी चलेंगे आपके। मन में भी कथा सुनने की इच्छा हुई। अरे किस की कथा, कृष्ण की कथा, कृष्ण कौन, जो गोपियों के घर में जाकर माखन की चोरी करता था, जो दही चुराता था, जो गाल वालों के साथ गए चराता था, जिसमें गोरदन पर्वत उठाकर बृजवासियों की रक्षा की थी। आप के हृदय में जिसकी कथा सुनने की इच्छा उत्पन्न हुई, वो भगवान आ गए। इससे बढ़ के और क्या लाभ हो? su पर ही इधर उधर भटकने की आवश्यकता ही नहीं है। सुनो भागवत निगम कलबतरोरधलितमपलम, सुख मुखादमतदसयतम, मत भागवतम, रस, मालयम, मर रसिका, बुम, बाबु का रस को श्रीमद भागवत की कथा बारम बार सुनो। कहा ये कथा क्या है, कब बिशेषता है, इसमें का, ये फल है। कहाँ फल के काय का है, काम का है, कि अमरूद का है, कि संतरे का है। यह चीज का फल है, किस व्रिक्ष का फल है। निगम। कल्पतरू? 1 कल्पतरु स्वर्ग में है। जिस स्वर्ग के कल्पतरु के नीचे जो कल्पना की जाती है, वो चीज मिल जाती। लेकिन उस कल्प में केवल अर्थ और काम मिल सकता है, धर्म और मोक्ष नहीं मिल सकता। सर के कल भविष्य में बैठकर आप यह कल्पना करें कि 1 यंग का फल और हो जाए तो कुछ दिन स्वर्ग में और ले ले जाएंगे, उतरना ही पड़ेगा। वह धर्म नहीं मिलेगा, मोक्ष नहीं मिलेगा। लेकिन वे रूपी कल्प, तरू के नीचे आ जाए। तो अर्थ धर्म का मोक्ष। चारों पुरुषा अब में भी चाल हैं, पत्ते हैं, कैसी है। लेकिन ब्रिक्स में जो रस है, वह तब आता है जब वो फलता है, जब उसमें फल लगता है, तब उसका रस उसमें आता है। और अगर कच्चा तो छोड़ दिया जाए तो गलितमपरलमदरपक अपनी दाल में पक जाए। तो श्रीमत भागवत बेल रूपी कर। वक्ष का पका हुआ फल है। और सबसे बड़ी बात यह है कि अगर कोई अमरूद हो, आम हो, कोई और फल हो, तोते की चोंच लग जाए तो उसकी चोंच में अमृत होता है। सुकतेल सुआ कुतेल या सुखदेव रूपी सुख का मुह लगा हुआ है। सुख मुखा, ऐसा ये फल है। तो कैसे पीले। कोई भी फल आएगा, उसमें छिलका होगा, गुठली होगी, असर तो होगा, उसको छोड़ना पड़ेगा। तो श्रीमद भागवत में कुछ असर तो होना चाहिए। अरे कहाँ कहाँ सार रस। इसमें खेल का गुडली नहीं है, यह स्वयं रस है। इस साक्षात रसोबसाभगवानशमरपरमात्मा का स्वरूप है श्री वतमागवतमरसमालयम महाराज। हम कई बार भागवत सुन चुके हैं। कब तक सुने भाई बात ये है राम कथा जे सुनत आगाही रसबिशिषजाना तिन नाहीं। जो भगवान की कथा सुन के आगा जाते हैं, उनको उसका रस नहीं मिला। जिससे हमारा प्यार होता है, उसकी चर्चा हम बार बार करते हैं, हमारे कान सुप्त नहीं होते। अगर हमारा भगवान के चरणों में प्रेम है तो हम उनकी कथा को बार बार सुने। बहू बार कतेहैसेरामतेकालम। नए बेजां चिंतयारजानासरम का नाम मन। जब तक सो न जाओ, जब तक मुक्ति न हो जाए, तब तक भगवान के चरित्र का शरण करते हो। और ये श्रीमद भागवत तो ऐसी है कि जो मुक्त लोग हैं, जीवन मुक्त हैं, वे भी भगवान की कथा का सादर श्रवण करते हैं। जीवन मुक्त महामुनि जेऊ हरिगुण सुनहि निरंतर देव, ऐसा सिम भागवत हैं। इसलिए इसका पान करो। वेमिशरक्षेत्र में सोनकनिषिससवर्ष के 1 यग में विक्षित होकर बैठे थे, रात काल हवन होता था, फिर पौराणिक सूत भगवान की कथा सुनाते थे और शियों में प्रमुख सोनक जी थे। दवा की कथा है। श्रीमद भागवत की कथा में सुखदेव इसके वक्ता हैं और परीक्षित इसके श्रोता। और श्रीमद भागवत का प्रणयन नारद जी की प्रेरणा से ब्याज जी ने किया। ये हम आपको बता चुके हैं। नारद जी ने यह बतलाया कि भगवान के गुण गुणों का वर्णन करो तो उसी प्रसंग में नारद जी ने अपना पूर्व जन्म का मृत सुनाया। उन्होंने बताया कि में 1 पहले जन्म में 1 भेद बाजी ब्राह्मण की दासी का पुत्र था। तो उस ब्राह्मण के यहाँ कुछ सन्यासी छात्र मास करने के लिए आए तो उन्होंने मुझे उनकी सेवा में लगा दिया। उन महात्माओं की सेवा में करता था और उनके भोजन के पश्चात जो उनका जूठन होता था वो मैं खा लेता था तथा ग्रहण करता था। और जब वो भगवान की कथा सुनाते थे तो मैं भी कान लगाकर सुनता था। 4 महीने बड़े आनंद से बीते। उसके बाद जब वो महात्मा जाने ले जाने लगे तो मैंने कहा महाराज आप मत जाइए। मुझे भी कुछ बताइए तो जाते जाते और महात्माओं ने मुझे भगवान का ध्यान करना सिखा दिया, महात्मा चले गए। कहते हैं बंदसंतयासजनचरना हम सज्जन और सज्जन सत्पुरुष खल दोनों की बंदना करते हैं, गोस्वामी सुशिलाजी बोलते हैं, दोनों में अंतर क्या है? प्राण हर लें। कहते हैं असज्जन वो हैं जो मिलने के कारण मिलने पर दुख देते हैं और सज्जन वो हैं जो बिछुड़ते हैं तो मन में रस देते हैं, दुख दोनों देते हैं। तो नारद जी को दुख हुआ, फिर भी उन्होंने कुछ शांत के लिए उपदेश दे दिया। अब महात्मा चले गए लेकिन मन में 1 बंधन बना रहा, 1 आत्मा में जननी योषण मूढ़ा करी। मेरी माँ स्त्री थी, सेविका थीं, पढ़ी लिखी नहीं थीं और मैं ही उसका 1 मात्र आधार था। मुझमें उसका स्नेह था और मैं भी माँ को छोड़कर कहीं जा नहीं सकता था। 1 दिन वो गायब होने के लिए जा रही थी। रास्ते में सर ने काटा और उससे वो मर गई। जब मैंने सुना तो मैंने सोचा कि भगवान ने ये जो स्नेह का बंधन था वो काट दिया और मैं वहाँ से चल पड़ा। चलते चलते उत्तराखंड में किसी निर्जन स्थान पर बैठा जो उन महात्माओं ने ध्यान का विधान बताया था। उस विधान से मैंने जब ध्यान करना प्रारंभ किया तो मेरे हृदय में भगवान विराजमान हुए। शंकचकगदापद्महाथ में लिए श्यामल कानों में, कुंडल माथे में, मुकुट में, चरणों में, मेरे हृदय में जब आ गए तो मुझे न तो शरीर का ध्यान रहा, न संसार का ध्यान रहा। किन्तु सहसा व मूर्ति मेरे हृदय से विलुप्त हो गई। मैं आँख खोल कर देखने लगा। वो कहाँ चले गए। बहुत व्याकुल था, आकाशवाणी हुई हंता। इस जन्म में तू मेरा दर्शन नहीं कर सकता। जिनका अंत करण परिवार को नहीं है उनको मेरा दर्शन बड़ा। दुर्गा तुम तपस्या करते करते अपने हृदय को पवित्र बनाओ तो मैं भगवान की आराधना करता रहा। वही मैं नारद सत्संग के प्रभाव से दूसरे जन्म में ब्रह्मा का पुत्र बना हूँ और हाथ में वीणा लेकर भगवान के गुण गुणों का गान करता। ये सत्संग का प्रभाव ये नारजी ने बताया की भगवान के गुण गुणों के श्रवण से मैं दासी पुत्र ब्रह्मा का पुत्र हो गया। जब मैं भगवान को बुलाता हूँ तो भगवान आ जाते हैं। तो यह है कथा का महत्व। कथा आप सुनाइए आप। ये कथा का प्रारम्भ होता है। सो सुखदेव जी महाराज वहाँ कैसे आते हैं, कैसे राजा परीक्षित आते हैं। इसकी थोड़ी सी कथा महाभारत की। श्रीमत भागवत में आती। वहाँ कथा आती है कि जब दुर्योधन की जहां भीम ने अपनी गदा से तोड़ दी और वहां से चले गए तो अश्त्थामा 2 दृणाचारिका पुत्र था वो आया। दुर्योधन के सामने दुर्योधन ने कहा कि अश्वत्थामा देखिये मनुष्य के हृदय में जब ईर्षा और जलन होती है तो वह जाती नहीं। दुर्योधन ने कहा कि मुझे इस बात का दुख है कि ये पारा राजा हो जाएंगे। इनको मार डालो। हम तुमको हम सेनापति बनाते। अश्वत्थामा को सेनापति बना दिया। अश्वत्थामा सोचने लगा कि कैसे पांडवों को मारे। युद्ध प्राय समाप्त हो चुका था। शिविर में पांचों पांडव विश्राम करने जा रहे थे। भगवान श्री कृष्ण ने पांचों पांडवों को वहां से दूसरी जगह सुला दिया। द्रोपदी से जो 5 पानों के पुत्र उत्पन्न हुए थे उनको उस शिविर में सुना दिया। इधर अस्थामा बैठा बैठा सोच रहा था। युद्ध में पान को हराना बड़ा कठिन है? कैसे मैं विजय प्राप्त करूँ। इतने में उसने ही देखा। 1 उल्लू गहुओं के गमसूनोंमें अंडे फोड़ फोड़ के खा रहा है तो सोते हुए को मारना बड़ा सरल है। वालों के शिविर का पहला भगवान शंकर दे रहे थे। अश्वत्थामा उनका भक्त था। उनसे कहा महाराज भीतर चले जाने। 2 वहाँ जाने के बाद पहले तो उसने दृष्टा मारा और उसके बाद से हुए थे। उन सबका पांचों का सिर काट दिया और पांचों का सिर काट के दुर्योधन के सामने ले आया। लो महाराज व चौपाल। दुर्योधन ने कहा हम इनको देखना चाहते हैं, लाओ हमारे पास। तो पहला सिर जो दबाया तो वो पिचक गया। दूसरा जो भीम का पुत्र था, उसके सिर को दबाया तो वो भी भूल गया। अरे ये भी नहीं है। तुमने हमारे भीम के पुत्रों को पान के था। अरे ब्राह्मण तुमने हमको निर्वंश कर दिया। हम निर्वंश नहीं होना चाहते थे। तो हर्ष शोक के भीतर दुर्योधन की मृत्यु हो गई। इधर सबेरा हुआ। द्रोपदी ने देखा मेरे पांचों पुत्र मरे पड़े हैं। करुण विलाप करने लगी तो अर्जुन ने शांत न देकर कहा कि मैं तेरे आंसू तब पहुँचूंगा जब उस आतताई के सिर पर चढ़ कर तू स्नान करेगी। मैं पता लगता हूँ वो कहाँ है। तो चला भगवान श्री कृष्ण रथ में बैठ बैठ कर अर्जुन को ले जाने लगे और श्रत्थ ने देखा तो भागने लगा, फिर उसका पीछा किया। उसने अंत में ब्रह्म शीर्ष नाम का ब्रह्मा छोड़ दिया, जिसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। धृणाचार्य का यह पुत्र था। वह ब्रह्मा जब अर्जुन की ओर आने लगा तो भगवान से पूछा महाराज ये क्या हो रहा है? तो भगवान बोले यह ब्रह्मा है, इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं है। तुम भी अपना ब्रह्मा छोडो तो अर्जुन ने अपना बर्मा छोड़ा दोनों टकराए भयंकर। उनका पाप जैसा होने लगा। भगवान ने कहा स्थाम छोड़ना जानता है, लौटना नहीं जानता। तुमको। तुम्हारे। गुरु ने लौटना भी सिखा दिया था। तो दोनो को लौटा। 1 तरह से अर्जुन ने लौटा लिया और दौड़कर अशत्थामा को पकड़ा पशु जैसा बांध के सभा में ले जाकर खड़ा कर दिया। आप देखिये सभा लगी है। यूलिटसिंहआसनपर बैठे हैं, ब अंग में द्रोपदी बैठी हैं, वहीं वर्जोंनकुलसैदेव बैठे हैं, ये सब बैठे हुए हैं। इतने में अशत्थामा जब सामने खड़ा किया जाता है। द्रोपदी कहती हैं मुच्छताममुच्छताेशो ब्राहमणो निराग गुरु, अरे छोड़। 2, छोड़, 2 ब्राह्मण हमारे गुरु हैं और वो गुरु जिनसे आपने अर्थशलसदी के। वोही तो अपने बेटे के रूप में सामने खड़े हैं। मैं नहीं चाहती कि जैसे मैं अपने बेटों के योग में रो रही हूँ, वैसे इसकी माँ रोये। ब्राह्मण का अपमान करना अनिष्टकारक होता है। युधिष्टर ने कहा बिल्कुल ठीक छोड़, 2। नकुल। सहदेव ने कहा छोड़, 2। मेम ने कहा नहीं सेानमदस्मता, इस दुष्ट को बिना छोड़ना चाहिए। भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि ब्राह्मण का शारीरिक बंद तो नहीं होना चाहिए, लेकिन दंड भी मिलना चाहिए। दोनों काम करो। अश्वत्थामा के माथे में 1 मणि थी। धनुष की नोक से उसको निकाल लिया और रस्सी छोड़कर। धक्का देखकर अस्सत्तामा को बाहर गया। बपनम ना धान थाना, नया पणम तथा ऐसी ब्रह्मबंधु नाम बदरा मूल बना देना, धन छीन लेना, घर से निकाल देना। ब्रामणो का यही बंद शारीरिक बदली अश्वत्थामा अपमानित होकर निकाला गया। धर भगवान जा रहे थे। इतने में उतरा उसने सोचा कि अब पांडवों को निर्वंश ही कर दूं। तो उसने सोचा कि अब इनका कोई वंश में रह नहीं गया। उत्तरा के पेट में अभिमन्यु का बच्चा है तो 5 बार निकाल कर। 5 पानों को छोड़ा और 1 बार उत्तरा के गर्भ को लक्ष्य करके छोड़ दिया। वो वार क्या था, पर मा या था। आप जब भगवान जा रहे थे तो वैसे वे वाला उतना आई महाराज महायोग हे महायोग, मेरी रक्षा करो, रक्षा करो मेरे पेट की ओर। 1 उल्का जैसा आ रहा है, कम कम माँ में भले ही मैं मर जाऊँ, मेरे बेटे का नाच नहीं होना चाहिए। तो भगवान श्री कृष्ण देखिये क्या करते हैं अंगुष्ठ प्रमाण स्वरूप बनाकर संघ चक्र गदा पद्म हाथ में लेके उत्तरा के पेट में चले जाते हैं और अपने सुदर्शन चक्र से बहमास का नाच कर देते हैं। यह सुदर्शन चक्र शक्ति है। सुदर्शन चक्र। अगर आपके ऊपर साईं उपद्र करता हो तो सुदर्शन चक्र का स्मरण कीजिये। संसार हम ये सुदर्शन का मंत्र है। इस मंत्र से आप उसका मुकाबला कर सकते। मत का नाश कर। 1 तरह से राजा परीक्षित की रक्षा की। 1 महात्मा ने प्रश्न किया है कि जब भगवान ने राजा परिक्षित को उत्तर के घर में जा कर बचा लिया तो ब्राह्मण के शाप से क्यों नहीं बचाया। यह प्रश्न है। तो इसका उत्तर यह है कि भगवान साधन देते हैं, साधन बचाते हैं। अब साधन को, शरीर को आप मोक्ष का साधन बना लो। आपके हाथ में तो साधन देना भगवान के हाथ में है और साथ का बोध करा देना गुरु के हाथ में। इसलिए भगवान ने राजा परीक्षित के शरीर की रक्षा की और शरीर की मृत्यु से 1 बार बचा दिया। लेकिन बार बार की मृत्यु से बचाने का उपाय सुखदेव रूपी गुरु ने किया। इसलिए गुरु भगवान से भी बड़ा होता है। गुरु, दोनों खड़े काके लगाये गुरु, ऐसा गुरु होना जी जो भगवान का ज्ञान करा दे और घूम रहे। कप का गुरु का, बेहद का गुरु और बेहद का गुरू। जब मेले लगे ठिकाना तो परमात्मा के स्वरूप का सिद्ध, परमात्मा का स्वरूप बताना। ये गुरु का काम अस्तु राजा परीक्षित की रक्षा हुई। अब इधर क्या होता है? वो बिजी हो गए। अर्जुन के मन में पहले ही मोह हो गया था और मोह के कारण वो युद्ध से उपरत हो रहे थे। तो भगवान शिव ने गीता सुना कर अर्जुन के मुंह को दूर कर दिया। लेकिन युधिष्ठिर जी के मन में मोहरा हमने बुरा किया, राज्य के पीछे अपने स्वजनों का ही नहीं गुरु तक का बद करवा दिया। पिताना क बद करवा दिया, ये अंचित हो गया। तो उनके मन की गरानी भगवान श्री कृष्ण को मिटानी थी। तो देखिए जब तक गुरुभाव न हो जाए तब तक उपदेश का प्रभाव नहीं पड़ता है। तो भगवान श्री कृष्ण का दर्शन करने भगवान हस्तिनापुर में रहे। कुछ दिन राजा युदेरपृदिप्राता कहाँ लौट कर भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन करने जाते। 1 दिन क्या देखते हैं भगवान श्री कृष्ण ध्यान में मग्न े आँखों में आँसू भरे हुए हैं। शरीर रोमांच कंटकित हैं, शरीर का भान नहीं है। ध्यान में मगने बहुत देर तक देखते रहे, लौट के चले गए फिर आये, फिर आए। तो भगवान सावधान हो गए थे। तो युधे्टरने पूछा की भगवान सारा संसार आपका ध्यान करता है, आप उसका ध्यान करते है। तो भगवान श्रीकृष्ण बोले मैं अपने भक्तों का ध्यान करता हूँ, मैं भक्तों का भक्त हूँ। जेन ने पूछा वह कौन सा भाग्यशाली भक्त था जिसके ध्यान में आप निमग्न हो रहे थे तो भगवान कृष्ण बोले वो मेरा भक्त भीष्म है। सरसैया पर सोया हुआ भी अंतर मेरा ध्यान कर रहा है। चलो युलेटर उनका दर्शन किया तो भीष्म के प्रति युलेटेड के मन में बहुत श्रद्धा थी, गोवा गए पाँचों पार, भगवान श्री कृष्ण सब पहुंचे भगवान श्रीकृष्ण का जैसी दर्शन किया। आनंद में नेत्रों के जल से ही मानो भगवान को अर्घ दे दिया। प्यार की आग ऐसी होती उसके बाद पांचों पांडों ने प्रणाम किया, द्रोपदी ने प्रणाम किया फिर भीष्म ने राजा युधिष्ठिर को अनेक विषयों पर उपदेश किया। ज्ञान का उपदेश दे रहे थे, दुग्धी मुस्करा रही थी तो भीष्म ने पूछा बेटी तू क्यों मुस्करा रही है? पिता मां जिस समय दुर्योधन मेरा चील खींच रहा, खिंचवा रहा था, शासन मुझे नग्न करना चाहता था, उस समय आपका ये ज्ञान कहा गया था। तो बस ने कहा बेटी मैंने पापी दुर्योधन का धन खाया था। दूषित अन्न खाने से मन भी दूषित होता है। 10 जैसा खाओ, अन्न वैसा बने मन आज उपवास के बाद मेरा मन शुद्ध हो गया। इस तरह से युलेऔरिषिमुनीसवहा आ गए। महान बस्ती थे बाल ब्रह्मचारी जानी भगवान भरत, श्री कृष्ण भगवान के उपासक अंत में के यद् हवा, मुरवाह भगवान की स्तुति करते हैं। भीष्म मेरी बुद्धि नरंतर भगवान के स्वरूप में लग जाए जो सर्वव्यापी है, सातों में श्रेष्ठ हैं, जो सदा अपने स्वरूप में स्थित रहते हैं, फिर कभी कभी प्रकृति को साथ में लेकर व्यहार करना चाहते हैं तो जगत की उत्पत्ति होती है और उस जगत में भी लेते हैं। न, कमनमतमालवर्णमकरम, गौर वर्मा तीनों लोकों में सुन्दर समाज के समान श्यामल वर्ण सूर की अरुण किरणों के समान जिनके वस्त्र।
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