Part 6 Vishwa Kalyan Aashram Bhagwat Katha Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Saraswati

A Hindi spoken sermon by Swami Swaroopananda Saraswathi retelling episodes from Bhagavata-type narratives. The speaker describes oppression of people by tyrannical rulers and demons, a moving allegory of a cow pleading to the gods, the gods' petition and assurance of a divine descent, and then recounts the Yadava royal lineage leading to the birth of Devaki's sons and Kansa's fear and threats. The tone mixes moral exhortation, scriptural citation, and storytelling.
Chapters
जरा संद, जो राजाओं को कैद करके नरबली चढाने वाला था। भौमासुर, जो राजाओं की कन्याओं का अपहरण करके 16 हजार कन्याओं का अपहरण कर चुका था। बाणासुर और कई उनके साथी थे, उन्हीं में ये दुर्योधन भी था। ऐसे अनेकों राजा के रूप में देय खा गए थे पृथ्वी में और वो प्रजा का उत्पीडन कर रहे थे। प्रजा का उत्पीडन कैसे होता है, जब उनको धर्म के मार्ग में, चलने में चलने से बाधा डाली जाती है। समझो उत्पीडन हो रहा है, धर्म से चलने वाले को सदा सुख मिलता है, उसका लोक परलोक बनता है और धर्म के विरुद्ध न करने से लोक परलोक करता है। तो धरती को मत कष्ट हुआ? तो गऊ बन गई। गोऊ बहुत दयनीय प्राणी माना जाता है। कहते हैं नरहरी कभी 1 थे, अकबर महाशय के साथ कहीं जा रहे थे, रास्ते में 1 गाय रम हो रही थी। अकबर ने पूछा ये गाय क्यों रम हो रही है? तो नरलीकमीने कहा कि गाय कह रही है कि अगर दुश्मन भी मुँह में तिनका दबा ले तो उसको लोग नहीं मरते है। हम तो चरती मार सकत को हम और कोई कटु बचन बोलती है। और हमारे मन में विषमता भी नहीं है कि हम हिंदू को मीठा दूध पिलाएं और तुर्क को कडवा पिलाएं। सबको मीठा दूध पिलाती हैं। लेकिन हमको क्यों मारा जा रहा है? कहते हैं उसने गोकुशी गो हत्या बंद कर दी। लेकिन आज दुर्भाग्य से भारत अभी भी गोमांस का सबसे बड़ा निर्यातक बना हुआ है। तो यह बड़ी दुर्वाद की बात है। तो गौर भूत। तो आज श्रम की कितना गह को लोग नहीं मरते हैं। गह अवध है। मांगा माना गाम अदिति दि हमारा वेद कहता है कि निरपराध है, अदिति है। अरे इसको मत मारो। वो गाय बनकर आँखों में आंसू भर के देवताओं के पास गए, देवताओं से जाकर अपना दुख सुनाया देवताओं के साथ ब्रह्मा के यहां गए और ब्रह्माजी उनको ले जाकर छीर संबंध में ले आये। सोरमुनिगंदवामिलि कर सलवा गेबिरंशिकेलोका संग, भूमि विचारि, गोतनधारिपरममिकलबोशों का ब्रह्मा सजाना न, अनुमान मोर का सुना बसाई जाकरितनेदासि सु। अभिनाशी हमरो ब्रह्मा जी गाय को, गौ को, देवताओं को साथ में लेकर जहाँ श्वेत दीप में शिर समुद्र में शेषनाथ की शैया पर आप देखिए, जैसे आप समुद्र देखते हैं, वैसे 1 दूध का समुद्र है, दूध ही दूध भरा हुआ है और दूध के जैसे श्वेत वर्ण का 1 सर्प है, जिसकी 1 साथ पना हैं, उनमें मणिया चमक रही हैं। कुंडली मार के वो सर्प बैठा हुआ है, समुद्र के भीतर उसमें 1 श्यामल मूर्ति पीतमवरधरिणी मूर्ति लेटी हुई है, अर्ध लेटी हुई है। लक्ष्मी जी उनके चरण दबा रही हैं। वो भगवान श्िमननारायणशांताकारम, बुजगसैनबदमभमसरेशम, विश्व, आरम्भ उनके यहां ये सब देवता गए और जाकर भगवान को पुरुष रूप से उन्होंने स्तवन किया और कहा महाराज हमारी रक्षा कीजिये पृथ्वी का बाहर उतारिए तो भगवान ने आकाशवाणी से देवताओं को आश्वासन दिया। आकाशवाणी ये जो दिल्ली से जलती है, यह आकाशवाणी नहीं है, इसकी मत मानो। ये तो कुछ का, कुछ बताते हैं। आकाशवाणी जो है जो आपके पवित्र हृदय में अच्छी भावना उत्पन्न होती है। वो आकाशवाणी जब आप कोई बुरा काम करने के लिए चलते हैं तो भगवान कहते हैं यह मत कर। झूठ बोलने के लिए चलते हैं। तो भगवान कहते हैं मत बोल, यह आकाशवाणी तो आकाशवाणी को सब लोग नहीं सुन सकते। बहुत से लोग अपनी वासनाओं को आकाशवाणी बना लेते हैं। कई लोगों को देवता आ जाते हैं। सिर में आते है और कुछ का कुछ बताते है। अगर वो देवता उनके मन में सिर में आ गया तो 1 ही बात होनी चाहिए। तो कोई कुछ बताता है, कोई कुछ बताता। इसका मतलब है देवता नहीं बोल रहा है। उनकी बात हो तो ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी सुनी निशममबेदातसन। ब्रह्मा ने सुना देवताओं से कहा देखो, भगवान शिव नारायण की आकाशवाणी मैंने सुनी है। उन्होंने पहले से ही पृथ्वी के भार को, दुख को सुन लिया है और उसको दूर करने का निश्चय कर लिया है। आप भगवान का उतार होने वाला है। आप लोग भी वंश में जाके उतार लीजिये और जो बासुदेव की कला अनंत में शस्त्र बनाने वोभी भगवान का प्रिय करने के लिए उतार लेंगे और भगवान ब्रज में कुछ दिनों तक लीला करेंगे उनका प्रिय करने के लिए देवताओं की पत्नियां भी उतार धारण करें। इस तरह भगवान ने आश्वासन दिया और सब लौट के आ गए। इधर क्या होता है? कहते हैं यदुपति सूरसेन ने मथुरा को अपनी राजधानी बनाया और माथुर और दूसरे विषयों का ठीक से पालन करने लगे। 2 यदुवंशी राजाओं की वो राजधानी हो गई। उस समय वो राजधानी का राजा उग्रसैन था। उग्रसेन जो थे, यदुपति थे, उनके। भाई की कन्या थी देव की, देव की। जब विवाह के योग्य हुई तो वसुदेव जी के साथ उनका व्यवहार निश्चित हुआ। बस देवजी आए बरात लेके आए। देवी के साथ उनका साथ फेरा हुआ। बहुत बड़ा दहेज दिया उनको और देवकी कंस की चचेरी बहन थी। लेकिन कंश अपनी बहन से बड़ा स्नेह रखता था। बिदाई के समय कंश अपना स्वर्णिम व्रत लेकर आ गया। देवकी वसुदेव को उर्म रस में बैठाल कर ले जाने लगा। वसुदेवजी के घर की ओर बहुत पर प्रेम से ले जा रहा था। स्वयं सारथी बन गया था। आकाशवाणी हो गई असताअसातमशमुगरबु हनतायामबासेबुदो। अरे। अब इसका आठवां गर्भ तेरा मारने वाला होगा। जैसे ही सुना ये देखी ये इसका आठवां बेटा मेरा मारने वाला होगा। उसने घोड़ों की लगाम छोडी और देवकी का 1 हार से जुड़ा पकड़ के दूसरे हारते तलवार उठाई। बस काट दूं इसको न रहेगा। बांस बांसुरी देव की नहीं रहेगी तो कहा से आठवां। बेटा ने सोचा अब हम इससे लड़ने चलेंगे। तब तक हमारे ही लेगा तो समझाने लगे। सरागनीयगुणसोरई भगवान बोले या सस करा। saktmbginimanयa mुदaprvniहैकंसजi में सुना सलागन गुण वाले हैं, दोनों का यह बनाने वाले हैं। जो वीर हैं, वो किसी स्त्री को नहीं मारते हैं। अरे सामने जो व्यक्ति युद्ध करने आया हो, पुरुष दिखता हो, वहाँ परुष दिखाते हैं। नारियों को मारने में कौन सी? परुष कौन सा पुरुष है तो स्त्री को मारने में कोई वीरता नहीं है। और फिर उसमें भी अपनी बहन बहन में भी छोटी बहन और दवाहपरवाणीविवा के समय अभी अभी उसके माथे में सिंदूर लगा है। अरे कंस इसको मत मार। कल्चर ने कहा, यह मेरी बहन नहीं है, यह मौत है। तो मजदूर जी बोले, मृत्यु जन्म बता, वीरो देन, सा जाये, जवाब देवा मृत्यु प्राणयाम द्रव। कंस ये ऐसा नहीं है कि यही तुम्हारे लिए मृत्यु पैदा हो। जो भी प्राणी जन्म लेता है, उसके जन्म के साथ ही मृत्यु का भी जन्म हो जाता है। जैसे जैसे लोग बढ़ता है, मनुष्य बढ़ता है, उम्र बढ़ती है, वैसे वैसे मानो मौत के मुँह में चला जाता है। 25 साल का हुआ तो 1 चौथाई मौत रूपी अजगर के पेट में चला गया। 50 साल का हुआ तो आधा चला गया, 75 का हो गया तो और चला गया। और आगे फिर कप? तो ये मौत जो है मनुष्य के जन्म। बहुत लोग तो कहते हैं हमारा जन्म दिवस है। बर्थडे बर्थडे तो है, लेकिन तुमने अभी तक किया, क्या? बरी बना लिया। लेकिन ये तो सोचो कि इतने दिन के लिए कम हो गए। हमारी आयु के इतने दिन कम हो चुके हैं। अब जो बचे हैं, उनको सुधारो, वो तो सोचते नहीं। तो आप मत सोचिए। मृत्यु तो होने वाली है। जो होने वाली है, उसको कोई रोक नहीं सकता है। बोले महाराज ऐसा है, जिंदा रहेंगे। तो संसार का सुख भोगेंगे। शरीर नहीं रहेगा। तो शरीर का, शरीर का, संसार का सुख कम होगा। बोले यह है कि अगर मृत्यु हो भी जाए तो मृत्यु के बाद जन्म होता है। तो ऐसा काम न करें कि जिससे अच्छा जन्म न मिले। कीड़े मकोड़े की योनी में जाना पड़े। ऐसे काम करो। अगर मनुष्य शुभ कर्म करता है तो देव यूनी में जाता है, अशुभ कर्म करता है तो त्रिकोनी में जाता है, उस्मान कर्म करता। पाप पुण्य तो इस मनुष्य में आता है। तो मनुष्य को पाप कर्म नहीं करना चाहिए। और मरने की तो महात् मत। सोचो। शरीर तो मिलता ही है। और इसका प्रमाण स्वप्न है। जब हम सो जाते हैं, तब भी कोई न कोई शरीर रहता है। इसलिए तुम ऐसा काम मत करो। कंसल ने कहा, तुम ज्ञान ध्यान अपनी तरफ़ रखो, हम तुम रे खूब, ज्ञान ध्यान से रो। हूं। बात यह है पानी में पाखान भीजत है, भेलत नहीं। वैसे नर का ज्ञान जानत है, मानत नहीं। पानी में पत्थर को रखो चाहे सेंकड़ों। बस रखो भीतर तो सूखा ही रहेगा। ऐसे ही बहुत से लोग ऐसे हैं जो सुनते तो हैं, ज्ञान की बात भी जाते हैं, भेद नहीं। उनके मन में बात बैठती नहीं है। वो कहते ही जो हम कर रहे हैं, वही सच्चाई मे महाराज कह रहे। ये झूठ है। तो जब मारने को तैयार ही हो गया। तो कंस ने कहा कि भाई, किसी तरह मृत्यु को डालो, बाद में देखा जायेगा। उनका कंश, ये बताओ तुम को देवकी से भय है कि देवकी के पुत्र से भय है। का। देवकी से तो भाई नहीं हैं, इसके पुत्र से है। तो हम बचन देते हैं कि देवकी के पुत्र को हम तुम्हें दे देंगे। तुम डाल ना जन्म लेते। थोड़ी सा बच्चा रहेगा, उसी समय मार डालना तो जाओ, लेकिन रत से उतरो बात क्या है कि जो कल होते हैं, उनका प्रेम किस्से नहीं रहता। दामिनि, दमक, रहन, गन, माह और कल की प्रीति जता तिराही देव की बस देव को छोड़ दिया। देव की बस देव किसी प्रकार मौत के मोह से निकल के घर गए। कुछ काल के पश्चात देवकी ने 1 बालक को जन्म दिया। उस बालक का नाम था कीर्तिमान आप सोचिए बालक जन्म ले और माँ बाप अपने हाथ से उसको मौत के हाथ में सौंप दें कितना कठिन आता जोर से डरने वाले थे। बस देवजी भाई, हमने बचन दिया है। हम बचन देके उसको भंग नहीं करेंगे। कीर्तिमान को लेकर बलदेव जी आये और कंस के सामने रख दिया कि लो महाराज देवी का प्रथम पुत्र तो कंस को दे आए। बलदेव जी ले जाइए, जाइए, ले जाई। इससे कोई बात नहीं। आठवें पुत्र से को डर है तो पहला है। बसुदेव जी उस बात को लेके जा ही रहे थे। रास्ते में थे भी, इतने में मीना, बजाते, गाते, ना जी पधार जाते हैं, कंस के पास पहुँचते हैं।
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