Part 7 Vishwa Kalyan Aashram Bhagwat Katha Jagadguru Shankaracharya Swami Swaroopanand Saraswati

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Chapters
पिता मा में समर मरंजा, देवमृताद्यातिरथइ तिमिंगिल दर यम कौरव सैन सागरम कृत्वा तरण बत्त पदम स्वयकप्लबा। हमारे जो पिता माँ थे, वो जब महाभारत के युद्ध में पहुंचे तो क्या देखते हैं? कारों की सेना क्या है तो समुद्र है। समुन्द्र में जैसे बड़े बड़े मगरमछ होते हैं, ऐसे देवा देवा, रत करन। 2 ये त्वेंग अस्तिमतसोतिवरनामों शत योजन स्तर 1 तिविरनामका मछली होता है, जो सौ योजन का लम्बा होता है। उस मछली को जो निकले वो और उसको भी जो निगले वो राग, तो ये ऐसे थे जो महार महारथी 1 साथ शास्त्रों अरथों को जो महारथियों को लगा दे, वो अधीर देव बता जा। रई तिमिंगल ऐसे जिंगलों से भरा हुआ ये कौर सैं सागर। इसमें यदि कोई जाय पार करने के लिए ये मछली ही निकल जाएगी, कैसे स्वयं सेन सागर को पार कर लेते हमारे पिता न, लेकिन यतपलवासमुद् को पार करने के लिए यदि कोई बहुत बड़ा जहाज मिल जाए और वो 1 ऐसा जहाज हो जो समुद्र से बड़ा तो fat me par हो जाये। यetबलवाजिनभगवान श्री कृष्ण के चरणों को जहाज बनाकर हमारे पिता माँ, कौर सागर को पार कर गए। महाराज वो भगवान श्री कृष्ण हमारे कुलदेव हैं, उनका सुनाइएगा अरे तेरा तो कोई सम्बंध नहीं है, कुल का होगा। राजा परिक्षित बोले कि महाराज यह शरीर उन्हीं का दिया हुआ है। donaekulusmidm malngmsntanmijm gurupndanajugobug kokin matusmisरntaयa महाराज संतान बीज गुरु पांडव पांडव और कुरु दोनो की संतान का 1 मात्र भी मेरा शरीर था, गुरु पांडवा, गुरु और पाण्डव 2 क्यों कहा बोले ब्राह्मण? परिब्राजक ने आय से कह दिया ब्राह्मण ही परिब्राजक होता है तो परिब्राजक करू, चाहे ब्राह्मण करू, अवस्था भेद हैं, इनकी उत्पत्ति दूसरे प्रकार से, उनकी उत्पत्ति दूसरे प्रकार के हैं। तो वही उन का यह संतान भी था। या यह है कि गुरु पांडवान पांडवों का जो संतान वीर था, उसका वर्णन कीजिए, तो गुरु का यहाँ करने का अर्थ लगा दिया तो हुआ या आप सुन चुके हैं कि उत्तर जब भगवान श्री कृष्ण की शरण में गई तो भगवान ने अंगुष्ठ प्रमाण शरीर बनाकर, शंखशग्रगदापद महात्मा लेकर द्रोणी के अस्त्र को बिफर कर के राजा परीक्षित के शरीर की रक्षा की, यहां तक कि जब तक उस बालक का जन्म नहीं हो गया, तब तक भगवान भी वहीं रहे, उत्तरा के घर में रहे और वो भगवान का दर्शन करते करते ही जीवित रहा और जब जन्म ले लिया तो वह देखने लगा कि वो कहाँ गया जो गर्भ में हमारी रक्षा करता था, परीक्षा की दृष्टि से देखने के कारण उसका नाम परीक्षित हो गया। तो महाराज वो भगवान श्री कृष्ण का चरित्र में सुनना चाहता हूँ। श्री शुकदेव जी ने कहा कि राजन चौथा दिन हो गया, आपने अभी पानी तक नहीं पिया है, पान का प्रबंध कर दीजिए, जैसे हमारे पंडित चाय पीने के लिए उड़ गए हैं तो बिना खाए तो रहना मुश्किल होता है lशaदiदशुनममधमविवा प्रिबंतमपरमुखम भोजचयुतम हरि कथा मृत महराज ये भूमि बड़ी दस्ता है, भूख को सहना बड़ा कठिन है? और मैंने तो फिर पानी भी छोड़ दिया, पर भूख भूख मुझे बाधित नहीं की है। न बाद ते कथा आती है। जब गांधारी के सौ पुत्र मारे गए तो गांधारी स्मशान में अपने पुत्रों के बीच में जाकर विलाप करने लगे। खाना पीना छोड़ दिया। सबने कहा गांधारी उठो उठो ना मानी। अब मैं बच्चों के साथ ही चली जाऊंगी। भगवान श्री कृष्ण ने कहा गांधारी उठो नमानी। भगवान मुस्करा कर चले गए। इतने में गांधारी को जोरों की भूख लगी। आँख में पट्टी बंधी थी। पट्टी खोल के देखा तो 1 बेर का पेड़ लगा था। उसने 1 पेड़ का बड़ का पेड़ था। उसने पकी पकी भीड़ पर लगी थी। इच्छा हो कि यही खा लूँ गई। हाथ से बेर तोड़ने का प्रयतन किया, लेकिन वह बेर ऊपर थे तो बेटों की लाश को खींच कर लायीं और उन पर चढ़ के बेर तोड़ने लगी। इतने में भगवान श्री कृष्ण ने आगे पूछ लिया गांधारी क्या कर रही है? बोलते हैं वाह सुदेव जरा कष्टम कस्टम निर्धन जीवित। हे वासदेव बुढ़ापा बड़ा कष्ट होता है। बुढ़ापा आने के बाद बड़ी दुर्दशा हो जाती है। याबदविपर्जनशक्त पावर निज परिवार रखता पश्चात जरजरभूतेदेबारदाम को भी की है। जब तक धन कमा के लाता है, परिवार के लोग तभी तक प्यार करते हैं। जब शरीर जर्जर हो जाता है तो कोई सीधी बात नहीं करता है। जब नौकरी से आता था, कमाकर आता था तो पहले बैल परिवार के लोग तैयार हो जाते थे कि भाई खिलाना है, पिलाना है। लेकिन जब रिटायरमेंट हो गया और पेंशन भी लिखा लिए अपने नाम पर तो फिर बाहर ताम कु परीक्षा दिए। कोई पूछता नहीं। अगर किसी से कुछ कहता है कि पानी दे। 2 का तुम्हारे हाथ पैर टूट गए हैं। क्या पी क्यों नहीं लेते हो। बार दाम को भी है और शरीर गलित हो गया। हो गए तो बुढ़ापे में बड़ी बुरी हालत हो जाती है। खाया पान खाया भोजन पछता नहीं है। 2 बार सुदेव जरा कस्टम बुढ़ापा सबसे बड़ा कष्ट कस्टम निर्धन जीवित और जीवन हो गृह्ताश्रमी हो। मनुष्य तो घर में कोई आ जाए, कोई कुछ देने को खिलाने, पिलाने को न हो। कस्टम बच्चा बीमार है, बच्ची बीमार है, इलाज करना है, पैसे हैं नहीं। निर्धन का जीवन बड़ा दुखद होता है। और पुत्र शोक महाकष्ट। पिता के रहते पुत्र मर जाए, मां के रहते पुत्र मर जाए। इस से बढ़ के कष्ट और क्या होगा। ये सबसे बड़े कष्ट है। लेकिन आज बस बात मेरी समझ में आ गया। कष्ट नात कष्ट तरम ुधा। बहक सबसे बड़ी कट है। भूख के पीछे आप देखिये, लोग देश छोड़कर प्रदेश जाते हैं पेट भरने के लिए। भूख के पीछे बरसते पानी में किसान घर से निकलकर खेत की मेंड़ बचाता है। भूख के पीछे सबेरे उठ के। कोई भी व्यक्ति अपने काम में लग जाता है। भूख के पीछे विच चोटी खोल के नाचती है। और भूख के पीछे साधु जंगल छोड़ के गर्त में आता है। ये चुना कष्टा कष्ट। दरम खुदा तो महाराज सुना बहुत कष्ट देने वाली होती है। लेकिन मैंने तो पानी भी छोड़ रखा है। फिर भी मुझे ये कष्ट नहीं दे रही है। क्यों अरे पानी की जरूरत क्या है? भोजन की जरूरत क्या है? जब किसी को अमृत पीने को मिल रहा हो। विवनतमपमुखामभजचुतम हरि कथामृत भगवान की कथा रूपी अमृत जो आपके मुखकमल से निकल रहा है, उसको मैं अपने कान के पात से पी रहा हूँ। तो महाराज भूख का तो पता नहीं है कहाँ चली गई। लेकिन 1 बात है जीवन का 1 मात्र का ही है। अगर कथा सुनाना बंद कर दोगे तो भर जीना कठिन हो जाएगा। इसलिए आप सुनाते जाइए। बहुत देर बात कहीं श्री शुकदेव जी ने कहा कि राजन बहुत अच्छी बुद्धि है। आपकी अरे मरते समय भगवान की कथा सुनने की इच्छा सामान्य बात नहीं। आपकी बुद्धि का निश्चय बहुत ही उत्तम है, जो आपके मन में इस प्रकार की भावना उत्पन्न हो गई है। वासुदेव कथा प्रश्न पुरुष 3 बनाती भक्त शूत्रिपतपनश्रिलम था। भगवान वासुदेव की कथा के संबंध में कोई प्रश्न करता है तो तीनों प्रकार के तीनों लोगों को पवित्र कर देती है। कथा 1 तो जो कथा का वक्त है वो पवित्र होता है। उसका मन और वाणी पवित्र होती है। जो प्रश्न करता है वो बहुत होता है और जो सुनता है वो वयुद्ध होता है। आप देखिए यहाँ 100 8 भागवत की कथा हो रही है। जिसके मन में संकल्प हुआ वो पवित्र हो गया। जो यहाँ अजमान बन गए हैं वो पवित्र हो गए और जो कथा सुन रहे हैं वो भी पवित्र हो गया। तब बात तरिम ा। जैसे भगवान श्रीमन नारायण के चरणों का दोहन। जब भगवान वामन ने अपना चरण बढ़ाया 1 चरण पहुंच गया भगवान के ब्रह्मलोक में, ब्रह्माजी के ब्रह्मलोक में ब्रह्माजी ने देखा भगवान का सुंदर चरण कमल आया है। तुरंत पहुंचे और उनके चरण को धोकर अपने कमंडल में रख लिया। वो भगवान शिव नारायण का जो चरणोदक था, वही तो गंगा बना। तो वो गंगा ब्रह्मा जी के कमंडल में रही। फिर राजा राजा भागीरत आये। उन्होंने तपस्या करके गंगा से प्रार्थना की कि मां चलो। लेकिन गंगा आने को तैयार नहीं हो रही थी। मैं मृतलोक में नहीं जाऊंगी बड़े बड़े पापी आकर मुझे मुझमें स्नान करके मुझे अपवित्र कर देंगे, मैं मलिन हो जाऊंगी। मैं मृत लोक नहीं जाना चाहती। तो उनको संगा भगवान शंकर ने समझाया अरे माँ चलो। अगर पापी तुममे स्नान कर के तुम्हें मन मलिन करेंगे तो भगवान के भक्त आकर तुम्हारे में जब स्नान करेंगे तो वो सा पाप नष्ट हो जाएगा। ऐसे महापुरुष आयेंगे जो तीर्थों को भी तीर्थ कर देते हैं। तीर्थ गुरुवंत तीर्थानी स्वांत थे गला। अमृता भगवान गदाधारी को हृदय में धारण करने वाले महा पुरुष जहां जाते हैं वो तीर्थ न हो तो भी तीर्थ हो जाता और तीर्थ भी अगर है। उसका तीर्थ ही इसी से बनता है कि इसमें बड़े बड़े महापुरुष के स्नान करते हैं। तो गंगा तैयार हुई, बोली कि मेरा बैग कौन सा होगा? शंकर जी ने कहा मैं सहूँगा, ऊपर से कमंडल से धारा छूट, आप सोचो, हमारा आपका कमंडल थोड़ी सा ब्रह्मा का कमंडल था, जो धारा वहां से चली तो वो सोचती थी कि शंकर जी को बाहर ले जाऊंगी। लेकिन भगवान शंकर ने जब राहु बनाया तो वो गंगा का विशाल जल भगवान शंकर की जटा में 1 बूंद जैसा हो गया। गंगा को रास्ता नहीं, मिला की कहाँ से निकलूं जटा का जंगल। अंत में भगवान शंकर से प्रार्थना की गई। महाराज गंगा छोडो तो भगवान शंकर ने जटा को मोड़कर जो निचोड़ा तो 1 धारा चली गई। स्वर्ग में जिसका नाम अलकनंदा, दूसरी धारा चली गई। पाताल में जिसका नाम भोगावती और तीसरी धारा राजा भागीरत के रत के चात के साथ चलती हुई आई, उसका नाम भागीरथी पुरुष, 3 पुरा और दूसरा अर्थ यह है वो गंगा जावाई। जिन सगर के पुत्रों के उद्धार के लिए आई थीं, उनको तारा राजा भगीरत को तारा। और जो आज उसमें स्नान करते हैं, वो तरते हैं और इतना नहीं। जो गंगा का दर्शन करता है, वो तरता है। जो गंगा का जल पीता है, वो तरता है। और जो उसमें स्नान कर लेता है, वो तर जाता है। ऐसे ही भगवान की कथा का वक्ता श्रोता और उसका आयोजन करता तीनों पवित्र हो जाते हैं। आपने ये जो कथा कहीं, वह बहुत ही अच्छी है। जो आपके मन में इस प्रकार की भावना उत्पन्न हुई है। तो भगवान का स्वरुप विरियानितसदेभाजान। भगवान का जो स्वरूप है, वह सभी प्राणियों के भीतर बाहर रहते हैं, भीतर भी रहते हैं और बाहर भी रहते हैं। लोग कहते हैं आजकल सिनेमा में दिखाते हैं। ऊपर वाला देख रहा है। अरे ऊपर से क्या देखेगा, भीतर की कौन देखेगा। ऊपर वाला तो ऊपर ही ऊपर देख लेगा। वह तुम्हारे भीतर भी बैठा है, भीतर वाला देख रहा है और ऊपर वाला भी देख रहा है। तो वो परमात्मा सब प्राणियों के भीतर बाहर रहता है। जो उनको भीतर देखता है, उसको अमृतत्व प्रदान करते हैं और जो उनको बाहर दिखता है, उसको कालवन की मृत्यु प्रदान करते हैं। अर्थात अंतर मुख होकर भगवान का श्रवण करना चाहिए, सुनना चाहिए। अब यहां से कथा प्रारंभ होती है। भूमि, दतब्रव्याजदत्यानिक, सतायुतईआक्रांता, भूरि, भारेणो, ब्रह्मण, शरणमजयऊधरती। ये जो भूमि है, जिसमें हम लोग बैठे हैं, ये देवता है, यह कोई साधारण, भौतिक वस्तु नहीं है। इसका यह बहुत शरीर है। जो हम लोग देख रहे हैं, इसकी अधृछात्रीदेवता है। अगर चेतन न रहे तो चेतन रह ही नहीं सकता। अचेतन को रखने का, जोड़ के रखने का सामर्थ चेतन में ही होता है। तो धरित्री जो है, उसको जब पापी बढ़ जाते हैं तो वो कष्ट पाती? वो कहती हैं गिरिसार सिंधु भार नहीं मोह। जसमई गरु परदही मुझमें, पर्वत रहे, नदियां रहे हैं, समुद्र रहें, सबको सैल। सर्वसहा पृथ्वी का नामिक क्षमा है? लेकिन दूसरों से द्रोह करने वाले, अकारण लोगों को कष्ट देने वाले जो हैं, वो जब बढ़ जाते हैं तो मुझसे सहन नहीं होता। तो जिन से रक्षा की आशा है। और वहीं अगर भक्षक हो जाए। या प्रजा या तस्यास्ति। यदि बशम्यमकंम्यामिशरणम प्रजा। जिसकी गोद में सिर रखकर, लोग सोते हैं, यही सोचते हैं कि भाई अब इनकी गोद में सिर रख कर सोए हैं, अपना निर्भय अगर उसी के मन में दुर्भावना हो जाए। और सिर काटने लगे तो जब रक्षक ही भक्षक हो जाए तो किसकी शरण में जाए। तो राजा के बीच में दहित खड़े हो गए। कहते हैं सतयुग में जो थे, वो ही त्रेता में राक्षस हुए और राक्षस जो हुए। त्रेता में बुई जो बच गए, बोई द्वापर में राजा हुए और अब कलयुग में कुछ पंडित हो गए हैं। ब्राह्मण बन के। धर्म के विरुद्ध बोलते हैं। जहां धर्म की बात आती है, वहाँ उल्टी बुड्डी बात करते हैं। आप क्या करते हैं? ये समझ लेना चाहिए कि ये पहले जन्म के वह है। और नहीं तो ब्राह्मण का जन्म थोड़ा दुरलबहैयेदे चरम देह है, चरम देह दिजकरमेंपाही। इसके बाद कोई दूसरी देह की आवश्यकता नहीं पड़ती। ऐसी ये शरीर है। ऐसा ही शरीर। भगवान की कृपा से यह मनुष्य शरीर प्राप्त होता। ब्राह्मण शरीर प्राप्त होता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ब्राह्मण शरीर प्राप्त करके भी अपने ब्राह्मणत्व का विरोध करते हैं, बरणाश्मव्यवस्था का विरोध करते हैं, वेदों के विरुद्ध बोलते हैं। उनको का का जाएगा। तो उस समय राजा के बीच में दी ही खड़े हो गए थे। आप समझ लीजिए जरा सन, जो राजाओं को कैद करके नरबली चढ़ाने वाला था, भौमासुर, जो राजाओं की कन्याओं का अपहरण करके सोना हजार कन्याओं का आभरण कर चुका था। बाणासुर और कई उनके साथी थे। उन्हीं में ये दुर्योधन भी था। ऐसे अनेकों राजा के रूप में देय छा गए थे पृथ्वी में और वो प्रजा का उत्पीडन कर रहे थे। प्रजा का उत्पीडन कैसे होता है, जब उनको धर्म के मार्ग में चलने में चलने से बाधा डाली जाती है। समझो उत्पीडन हो रहा है। धर्म से चलने वाले को सदा सुख मिलता है। रस का लोक परलोक बनता है। धर्म के विरुद्ध चरण करने से लोग प्ररूप तो धरती को बहुत कष्ट हुआ। तो गऊ बन गई। गऊ बहुत दयनीय प्राणी माना जाता है। कहते हैं नरहरी कभी 1 थे, अकबर महाशय के साथ कहीं जा रहे थे, रास्ते में 1 गाय रम हा रही थी। अकबर ने पूछा ये गाय क्यों रह रही है? तो नरहरी कभी ने कहा कि गाय कह रही है कि अगर दुश्मन भी मुँह में तिनका दबा ले तो उसको लोग नहीं मरते है। हम तो तिनका ही चरती है। अरिदंततरणधरहताइ नहीं मार। सकत को हम संतरण और कोई कटु बचन। वो बोलती है। और हमारे मन में विषमता भी नहीं है कि हम हिंदु को मीठा दूध पिलाए और तुर्क को कड़वा पिलायें। सबको मीठा दूध पिलाती हैं। लेकिन हमको क्यों मारा जा रहा है? कहते हैं उसने गोकुशी गो हत्या बंद कर दी। लेकिन आज दुर्भाग्य से भारत अभी भी गोमांस का सबसे बड़ा निर्यातक बना। तो ये बड़े दुर्वाद की बात है। तो गौर भूत। तो आज श्रम की किन्ना गोह को लोग नहीं मरते हैं। गहअवहैमाँगामानागाम। अदिति हमारा वेद कहता है कि निरपराध हैं, अदिति है। अरे, इसको मत मारो। तुम गाय बनकर आँखों में आंसू भर के देवताओं के पास गए। देवताओं से जाकर अपना दुख सुनाया देवता के साथ ब्रह्मा के यहाँ गए और ब्रह्माजी उनको ले जाकर छीर समुद्र में ले आये। सोरमुनिगंदवामिलिकर सलवा गेबिरंचिकेलोका संग, भूमि विचारि गोतनुदारिपरममिकल शों का ब्रह्मा सजाना, मन अनुमान मोर क सुना बसाई जाकर। इतने दासी सु अभिनाशी। हमर तोरसा राम सत्य छिरमतीरलयतयोपोदे ब्रह्माजी गाय को, गहकोवदेवताओं को साथ में लेकर जहाँ श्वेत दीप में शिर समुद्र में शेषनाग की शैया पर आप देखिए। जैसे आप समुद्र देखते हैं, वैसे 1 दूध का समुद्र है, दूध ही दूध भरा हुआ है और दूध के जैसे श्वेत वर्ण का 1 सर्प हैं। जिसकी 1 साथ पणा हैं, उनमें मनिया चमक रही हैं। कुंडली मार के वो सर बैठा हुआ है। समुद्र के भीतर उसमें 1 श्यामल मूर्ति पीतम्बर धरिणी मूर्ति लेटी हुई है, अर्ध लेटी हुई है। लक्ष्मी जी उनके चरण दबा रही हैं। वह भगवान श्रीमन, नारायण, शांताकारम, जगसैनबदमनभमसुरेशम विश्वार उनके यहां ये सब देवता गए और जाकर भगवान को पुरुष रूप से उन्होंने स्तवन किया और कहा महाराज हमारी रक्षा कीजिए पृथ्वी का बाहर उतारिए तो भगवान ने आकाशवाणी से देवताओं को आश्वासन दिया। आकाशवाणी ये जो दिल्ली से चलती है, यह आकाशवाणी नहीं है, इसकी मत मानो। ये तो कुछ का कुछ बताते हैं। आकाशवाणी जो है, जो आपके पवित्र हृदय में अच्छी भावना उत्पन्न होती है। वो आकाशवाणी। जब आप कोई बुरा काम करने के लिए चलते हैं तो भगवान कहते हैं यह मत कर, झूठ बोलने के लिए चलते हैं। तो भगवान कहते हैं मत बोल, यह आकाशवाणी तो आकाशवाणी को सब लोग नहीं सुन सकते। बहुत लोग अपनी वासनाओं को आकाशवाणी बना लेते हैं। कई लोगों को देवता आ जाते हैं, सिर में आते हैं और कुछ का कुछ बताते है। अगर वो देवता उनके मन में सिर में आ गया तो 1 ही बात होनी चाहिए। तो कोई कुछ बताता है, कोई कुछ बताता है। इसका मतलब ये है कि देवता नहीं बोल रहा है। उनकी बात ना हो तो ब्रह्मा जी ने आकाशवाणी सुनी निशमबेदातिसन। ब्रह्मा ने सुना देवताओं से कहा देखो, भगवान शिव नारायण की आकाशवाणी मैंने सुनी है। उन्होंने पहले से ही पृथ्वी के भार को, दुख को सुन लिया है और उसको दूर करने का निश्चय कर लिया है। आप भगवान का उतार होने वाला है। आप लोग भी वंश में जाके उतार लीजिये और जो बासुदेव की कला अनंत में शस्त्र बनाने वो भी भगवान का प्रिय करने के लिए उतार लेंगे और भगवान ब्रज में कुछ दिनों तक लीला करेंगे उनका पी करने के लिए देवताओं की पत्नियां भी उतार धारण करें। इस तरह भगवान ने आश्वासन दिया और सब लौट के आ गए। इधर क्या होता है? कहते हैं यदुपति सूरसेन ने मथुरा को अपनी राजधानी बनाया और माथुर और दूसरे विषयों का ठीक से पालन करने लगे। तो यदुवंशी राजाओं की वो राजधानी हो गई। उस समय वो राजधानी का राजा उग्रसेन था। उग्रसेन जो थे, यदुपति थे, उनके भाई की कन्या थी देव की। देव की। जब विवाह के योग्य हुई तो वसुदेव जी के साथ उनका व्यवहार निश्चित हुआ। बस देव जी आए बरात लेके आए। देवी के साथ उनका साथ फेरा हुआ। वो बुत बड़ा दहेज दिया। उनको और देवकी कंस की चचेरी बहन थी। लेकिन कंश अपनी बहन से बड़ा स्नेह रखता था। बिदाई के समय कंश अपना स्वर्णिम व्रत लेकर आ गया। देवकी वसुदेव को उरसनरसमेंबैठालकर ले जाने लगा। बस देवजी के घर की ओर बहुत पूरा प्रेम से ले जा रहा था। स्वयं सारथी बन गया था। आकाशवाणी हो गई। असताअशातमशमगरबू हनतायमबासेबुदो। अरे। अबु इसका आठवां गर्भ तेरा मारने वाला होगा। जैसे ही सुना री, ये देखी, ये इसका आठवां बेटा मेरा मारने वाला होगा। उसने घोड़ों की लगाम छोडी औरदेवी से जुड़ा पकड़ के दूसरे हार से तलवार उठाई। बस काट दूं इसको न रहेगा, बांस की बांसुरी देव की नहीं रहेगी। तो आठवां बेटा ने सोचा, अब हम इससे लड़ने चलेंगे। तब तक हमारे लेगा तो समझाने लगे। सरागनीयगुणसोरई। भगवान बोझयाससकर। saktmbaginimanयa muदबaprvniहै कंसजiआपरमेसुना सलागन गुण वाले हैं, दोनों का यह बनाने वाले हैं। जो वीर हैं, वो किसी स्त्री को नहीं मारते है। अरे सामने जो व्यक्ति युद्ध करने आया हो, परुष दिखाता हो, वहाँ परुष दिखाते हैं। नारियों को मारने में कौन सी? पर कौन सा पुरुष है तो स्त्री को मारने में कोई वीरता नहीं है। और फिर उसमें भी अपनी बहन बहन में भी छोटी बहन और परवाणीविवहाके समय अभी अभी उसके माथे में सिंदूर लगा है। अरे कंस इसको मत मार। कल्चर ने कहा, यह मेरी बहन नहीं है, यही मौत है। तो मजदूर जी बोले मृत्यु जन्म बताओ, वीरू देन, साजायतअजवाबंतेवा, मृत्यु मे प्राणिनाम द्रव। कल ये ऐसा नहीं है कि यही तुम्हारे लिए मृत्यु पैदा होगा। जो भी प्राणी जन्म लेता है, उसके जन्म के साथ ही मृत्यु का भी जन्म हो जाता है। जैसे जैसे लोग बढ़ता है, मनुष्य बढ़ता है, उम्र बढ़ती है, वैसे वैसे मानो मौत के मुँह में चला जाता है। 25 साल का हुआ तो 1 चौथाई मौत रूपी अजगर के पेट में चला गया। 50 साल का हुआ तो आधा चला गया, 75 का हो। या तो और चला गया। और आगे फिर कप? तो ये मौत जो है। मनुष्य के जन्म। बहुत लोग तो कहते हैं हमारा जन्म दिवस है, बर्थ है, बर्थ डे तो है, लेकिन तुमने किया, क्या? बर बना लिया। लेकिन ये तो सोचो कि इतने दिन के लिए कम हो गए। हमारी आयु के इतने दिन कम हो चुके हैं। अब जो बचे हैं, उनको सुधारो, वो तो सोचते। नहीं। तो आप मत सोचिए। मृत्यु तो होने वाली है, जो होने वाली है, उसको कोई रोक नहीं सकता। बोले महाराज ऐसा है। जिंदा रहेंगे तो संसार का, सुख भोगेंगे। शरीर नहीं रहेगा तो शरीर का, शरीर का, संसार का सुख कम होगा। बोले यह है कि अगर मृत्यु हो भी जाए तो मृत्यु के बाद जन्म होता है। तो ऐसा काम न करें कि जिससे अच्छा जन्म न मिले। कीड़े मकोड़े की उन्हीं में जाना पड़े। ऐसे काम करो। अगर मनुष्य शुभ कर्म करता है तो देव उन्हीं में जाता है, अशुभ कर्म करता है तो त्रिकोनी में जाता है, समान कर्म करता, पाप पुन्य। तो इस मनुष्य मन में आता। तो मनुष्य को पाप कर्म नहीं करना चाहिए। और मरने की तो बात मत, सोचो। शरीर तो मिलता ही है। और इसका प्रमाण स्वप्न है। जब हम सो जाते हैं, तब भी कोई न कोई शरीर रहता है। इसलिए तुम ऐसा काम मत करो। कंसल ने कहा, तुम ज्ञान ध्यान अपनी तरफ रखो, हम तुम आरे खूब। ज्ञान ध्यान से बात यह है, पानी में पाखान भीजत है, भेलत नहीं। वैसे नर का ज्ञान जानत हैं, मानत नहीं। पानी में पत्थर को रखो चाहे सैकड़ों। बस रखो भीतर तो सूख ही रहेगा। ऐसे ही बहुत से लोग ऐसे हैं जो सुनते तो हैं, ज्ञान की बात भी जाते हैं, भेद नहीं। उनके मन में बात बैठती नहीं है। वो कहते ही जो हम कर रहे हैं, वही सच्चाई है। ये महाराज कह रहे? ये झूठ है। तो जब मारने को तैयार ही हो गया तो कंस ने कहा कि भाई, किसी तरह मृत्यु को डालो, बाद में देखा जायेगा। उनका कंश, ये बताओ तुम को देवकी से भय है कि देवकी के पुत्र से भय है। का। देवकी से तो भाई नहीं हैं, इसके पुत्र से है। तो हम बचन देते हैं कि देवकी के पुत्र को हम तुम्हें दे देंगे। तुम डाल ना जन्म लेते, थोड़ी सा बच्चा रहेगा, उसी समय मर डालना तो जाओ, लेकिन रत से उतरो बात क्या है कि जो कल होते हैं, उनका प्रेम किससे नहीं रहता। दामिनि, दमक, रहन, गन, माही और कल की प्रीति जता तिर नाहीं। देव की बस देव को छोड़ दिया। देव की बस देव किसी प्रकार मौत के मुह से निकल के घर गए। कुछ काल के पश्चात देवकी ने 1 बालक को जन्म दिया। उस बालक का नाम था कीर्तिमान आप सोचिए बालक जन्म ले और माँ बाप अपने हाथ से उसको मौत के हाथ में सौंप दें। कितना कठिन अता जोर से डरने वाले थे। बस देवजी भाई, हमने बचन दिया है। हम बचन देके। उसको भंग नहीं करेंगे। कीर्तिमान को लेकर बलदेव जी आये और कंस के सामने रख दिया कि लो महाराज देवकी का प्रथम पुत्र। तो कंस को दे आ। बलदेव जी ले जाइए, जाइए, ले जाई, इससे कोई बात नहीं। आठवें पुत्र से हमको डर है तो पहला है। बस देव जी उस बात को लेके जा ही रहे थे। रास्ते में थे, अभी कितने में वीणा बजाते गाते नारद जी पधार जाते हैं, कंस के पास पहुँचते हैं। उससे पूछते है कंस? क्या सोच रहे हो? कंस ने कहा महाराज संसार में भी सत्यवादी लोग हैं। क्या? क्या बात है का, वसुदेव अपने वचन का पक्का है। उसने जो हमको बचन दिया था, क्या हम अपना पुत्र दे देंगे। तो उसने दे दिया। तुम ने क्या किया? तो पहला है तो आठवे, डर था। तो 1 अष्ट दल कमल लिए हुए थे। नारणजी। बोले देखो, कौन सी पकड़िया 8 मी है, कौन सी पकड़ी 8 मी है। कहाँ से गनोगेनिचेेऊपर? बीच से अरे हाँ, ये तो बात गणबरहै। कई नीचे से उसने तुरंत बुलाया बना के बच्चे का पैर पकड़ कर घुमाया और पत्थर में पर के प्राण ले दिए। इस प्रकार के 6 पुत्र उत्पन्न हुए और 6 कंस के हाथ से मारे गए। बात क्या थी, कंश को उसका जो वास्तविक स्वरूप है, उसको दिखाना कंश नारदजी का उद्देश्य था कि कितना क्रूर है कि अपनी मौत को बचाने के लिए बालकों तक की हत्या करता है। बहुत से लोग छिपे हुए रहते हैं। उनके पाप को सामने करने पर ही समाज देखता है। तो फिर उनका धिकार होता है। तो नाराजी का काम यही है कि वो असुरों को ढूंढ ढूंढ कर भगवान के सामने करते हैं। जिससे कि पृथ्वी का भार कम हो। se putr देवकी मारे गए सप्त मंबशममदामयवनंतम, प्रजक्षदेगर्बो बहु देवक्याहर्ष शोक विवर्धन ऐसा है की जब महा पुरुष आते हैं तो उनका सिंहासन पहले आ जाता है। तो भगवान श्रीकृष्ण का सिंघासन शेषनाग अनंत। अब बात क्या है रामावतार में राम भगवान बड़े भाई थे, लक्ष्मण छोटे थे, लक्ष्मण जी शिषा उतार थे। तो कभी कभी भगवान राम के निश्चय से लक्ष्मण जी असहमत रहते थे, लेकिन कुछ बोल नहीं सकते थे कि भाई ये बड़े हैं। अब क्या किया जाए? भगवान ने कहा तुम ही बड़े भाई बन जाओ। हम ोटे हो जाते है। और अनंत क्या है। अनंत भगवान का सौ रुपए। भगवान का आधार दूसरी वस्तु नहीं हो सकती। भगवान किसमे प्रतिष्ठित हैं। स्व हिमनी अपनी महिमा में अनंत सारे विश्व के प्रपंच का बाद हो जाने के पश्चात जो शेष रह जाता है वो नित शुद्ध, बुद्ध, मुक्त स्वभाव अनंत परमात्मा है। उसी में भगवान का अवतार होता है। तो वो अनंत आए गर्भों बहु देव। क्या देवकी के गर्भ में जब आए तो वसुदेव देवकी के मन में हर्ष भी हुआ और शोक भी हुआ। हर्ष इस बात का कि जैसे 6 मारे गए वैसे ये भी मारा जाएगा। और शोक किस बात का है इस बात का कि हम आठवां आने वाला है। और शोक इस बात का कि जैसे माना गया ये भी बेचारा मारा जाएगा। भगवान ने सोचा कि अपने बड़े भैया की रक्षा करना चाहिए। तो योगमाया को भगवान ने बुलाया और कहा गच्छ देवी भद्र गोबगोबलंकितम, हे देवी, तुम ब्रज में चली जाओ, जहां पर गए और गोपियां रहती हैं। वह नंद की पत्नी यशोदा से तुम अवतार धारण करो और उसके पहले जो बसुदेव की 1 पत्नी रोहणी नंद के भवन में छिपकर रह रही है। देवकी के उधर का सातवा गर्व देवकी के पेट से निकालकर रोहणी के उदर में डाल 2 ऑफर तुम ही उतार ले लो। जब तुम ऐसा काम करोगी। सर्व काम, बलेश्वरी, सब इच्छित वरों को देने वाली तुम्हारी पूजा होगी और जगह जगह तुम्हारे स्थान बनेंगे। दुर्गा, काली, बिजिया, बेशमी, माया, ईशानी। आज तुम्हारे नाम होंगे, कात्यानी तुम्हारा नाम होगा। इस प्रकार योग माया से भगवान ने कहा योगमाया ने वैसा ही किया। देवकी के गर्भ को वहां से उठाकर रोइनी के गर्भ में रोनी के उदर में डाल दिया और ऐसी माया फेरी की नगर के लोग कहने लगे देखो कैसा दुष्ट हैं। बैन को ऐसा धमकाया कि 7 गर्म गिर गया। अब उसके पश्चात भगवान आते है, भगवान कैसे आते हैं? भगवान भी विश्वात्मा विश्वात्मा है, वो आते हैं। पहले बसदेव जी के मन में आसान सभा मन, आनक दुंद आनक दुंदुभी बस। देव जी का 1 नाम भी भी है। आनक दुंदभी। जब इनका जन्म हुआ था तो नगाड़े बजने लगे थे। इसलिए कि इन्हीं के घर में उनके पुत्र के रूप में भगवान का उतार। तो पहले भगवान वसुदेवजी के मन में आते हैं। बसुदेव जी के मन में जब भगवान आये तो इतना तेज उनका बढ़ गया कि कोई उनकी तरफ देख नहीं सकता था। सूर्य के समान प्रकाश हो गया और कंस का अकार मैं कारागार प्रकाश से युक्त हो गया। उसके पश्चात के मन से भगवान देव के मन में जाते हैं। तो गनमंगमताशमसमाइतम शuरसuतेनदेवi था। नंद करम मनस्त कहते हैं जगत का मंगल करने वाला, जो भगवान अच्युत कांच है। वसुदेवजी के मन से देवकी जी ने अपने मन में ग्रहण किया। यह गर्भाधान है, प्राकृत गर्भाधान नहीं हुआ। दीक्षा क्रम से 4 प्रकार की दीक्षा होती है। 1 मंत्र दीक्षा गुरु शिष्य को मंत्र का उपदेश करते हैं। दूसरी होती है स्पर्श दीक्षा। गुरु अपने शिष्य के मस्तक पर कर कमल रखकर उसका कल्याण कर देते हैं। जैसे पक्षी अंडे कोसे से बड़ा कर देता है। और तीसरी चाक्शिषीदीक्षा मछली अपने अंडे छूती नहीं है, केवल प्रेम से देखकर पालती है। करुण हमारी दृष्टि से शिष्य को देखकर गुरु अपने शिष्य का कल्याण करते हैं और पांचवी मानसी, क्षा मन से ही अपने मन को भगवान को शिष्य के मन में डाल देते हैं। इस तरह से देवकी के मन में भगवान आये। देवकी के मन में जब भगवान आये।
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