WHAT IS SO WRONG WITH EXISTING EDUCATION SYSTEM? | CASE STUDY ON EDUCATION SYSTEM | 2020

The Indian education system prioritizes exams and degrees over practical skills, leaving graduates unemployable. The speaker uses his own startup failures and Ritesh Agarwal's success without a degree to show there are other paths. He points to Japan's practical approach and warns that rote learning harms student mental health.
Questions this video answers
Ritesh Agarwal (described by speaker as age 26 and a billionaire in the anecdote).
Students and their parents (speaker issues a special message for parents).
A Telegram group (name referenced; link said to be in the video description)
कल होली है। लेकिन कुछ लोग होली नहीं मनाएंगे। और इसलिए नहीं कि यूंकि उनकी लाइफ में कोई प्रॉब्लम है, इसलिए क्योंकि उनके एग्जाम चल रहे हैं। हां, आज मैं बात कर रहा हूँ स्टूडेंट्स की और आज का स्पेशल मेसेज है पैरेंट्स के लिए। तो अगर आप स्टूडेंट और ये वीडियो देख रहे हैं तो यहीं पास कर 2 और मैं चाहता हूँ आगे का वीडियो आप पैरेंट्स को दिखाओ। उम्र 17 साल, गाँव बिसम, कटक, शहर, रायगर डिस्ट्रिक्ट। घरवालों की। बहुत जिद करने के बाद कॉलेज तो गया लेकिन कॉलेज में दिल नहीं लगा। इतिफाक से 1 इंटरनेशनल स्कॉलरशिप में एडमिशन हो गया। जिसके बाद उस स्कॉलरशिप की कंडीशन थी के कॉलेज छोड़ना पड़ेगा। कॉलेज भी छोड़ दिया, पढ़ाई भी नहीं की। आज उम्र 26 साल, बंदे का नाम रितेश अग्रवाल जो आज 1 बिलेनियर है। इस 26 साल के लड़के की नेटवर्क सेवेंटी एट अरब सिक्सटी सिक्स करोड़ से भी ज्यादा है इस साल। लेकिन बेचारे के पास 1 डिग्री भी नहीं समझे। आपके लिए यह छोटा सा मैसेज है। और ये कहानी सिर्फ रितेश अग्रवाल की नहीं है। ये कहानी ऐसे तमाम ऑन्टरपिनर्स की है, स्टार्ट अप्स की है। स्टार्ट अप ओनर्स की। मेरी भी कुछ ऐसी कहानी है। छोटे शहर। आजमगढ़ से हूं मैं बनारेस के पास आता है। शहर अच्छी चीजों में तो नहीं जाना जाता है। इन फैक्ट स्कूल में, मेरे बगल में जो बैठे थे वो भी नहीं जानते। आज तक की मैं उनकी क्लास में था, इतना इनविजिबल था। कुछ बच्चे होते हैं न। बहुत बुरे, उनको भी पहचानते सर जो बहुत अच्छे होते हैं। ऐसी तो मेरी किस्मत ही नहीं थी। पढाई में, खेल, खुद में किसी भी चीज का नाम ले लो। मैं किसी में अच्छा नहीं था। लेकिन क्या मैं फिर किसी लायक ही नहीं था। मैंने आई आई टी नहीं निकाला, मैंने ए आई ट्रिपल ही नहीं निकाला। लेकिन आज की डेट में, आईआईटीज में, आमस में मेरे लेक्चर्स होते हैं, मुझे इन्वाइट किया जाता है। चीफ गेस्ट टाटा जैसी कंपनी, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड कंपनी मुझे इन्वाइट करते हैं। अपने ऑफिस में। 17 साल की उम्र में मैंने भी स्टार्ट कर दिया था। अपना बिजनेस पता नहीं था, करना क्या है, कैसे करना है। लेकिन बस कर दिया था। और करते करते करते 6 बिजनेस बैक, टू, बैक फेल भी हो गए। लेकिन उसके बाद सक्सेस मिली सीखा की कैसे करते हैं। और कॉलेज के एजुकेशन से नहीं सीखा, सीखा करके, एक्सपीरियंस से इंटरव्यू करके ईवन बिजनेस कोचिस से सीखे। तब समझ में आया कि कैसे होती है। चीजें अपनी एग्जिस्टिंग कंपनी को भी लॉस से प्रॉफिट में लेकर आया। और आज की डेट में मेरी सॉफ्टेयर कंपनी 5 देशों में ऑलरेडी है। और हम सिर्फ 45 लोगों की महज टीम लेकर 5 देशों में अपने क्लाइंट्स फैला चुके हैं। ईवन आट ऑफ बिजनेस जो मेरी बिजनेस ट्रेनिंग कंपनी है। मुश्किल से 1 साल में हम 7 राज्य कवर कर चुके हैं। भारत में 17 साल की उम्र से लेकर 70 साल की उम्र तक के लोग मेरे स्टूडेंट है। मुझसे सीखने आते हैं कि बिजनेस कैसे करे और मिलियन डॉलर वर्द की 2 कंपनी स्टार्ट करने के बाद नेशनल न्यूज पर कवर होने के बाद आज मेरी उम्र ट्वेंटी एइट यर है। सिर्फ मैं ये सब क्यों बता रहा हूँ। उसके पीछे बहुत सिम्पल सा रीजन है क्योंकि मैं नहीं चाहता। हो सकता है आपका बच्चा पढाई में इतना स्मार्ट नहीं है, हो सकता है वो स्कूल में बहुत अच्छा परफॉर्म नहीं करता लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वो किसी लायक नहीं है। इसका मतलब ये नहीं कि वो कुछ नहीं कर पाएगा। लाइफ में मुझे भी नहीं पता था मेरे स्कूल लाइफ में की 1 टाइम आएगा जब मेरी इतनी फैन फॉलोविंग होगी, इतनी सक्सेस होगी। लेकिन आज ये सब हो पा रहा है तो मुझे होप है की आपके बच्चे में भी टैलेंट जो जरूरत है वो उसको सपोर्ट की जो मेरे माँ बाप ने किया। मुझे थोड़ा सा सपोर्ट लगता है, बहुत ज्यादा किया भी नहीं। थोड़ा सा सपोर्ट जो लगता है उतना भी अगर आपने कर दिया। और बच्चे में अगर आप जो जिस चीज के लिए वो बना होगा उस डायरेक्शन में थोड़ा सा भी चला गया तो सक्सेस उसके कदम चूमेगी और इंडिया के एजुकेशन सिस्टम की हालत किसी से नहीं छुपी है। लिटिल इंडिया स्टडी के अकॉर्डिंग साढे 3 लाख से ज्यादा बच्चे हर साल एम बी ए करके निकाल रहे हैं और उसके बाद भी 61 पर्सेंट तो एम्प्लॉयबल नहीं है जॉब की कमी नहीं है। मेरी कंपनी में रिक्वायरमेंट है, मैं हायर कर रहा हूं लेकिन दिक्कत क्या है जो लोग लाते हैं वो एम्प्लॉयबल नहीं है, उनको आता ही नहीं है। जो हमें चाहिए हमें इतनी मेहनत करनी पड़ती है जितनी कॉलेज टाइम में उनको कर लेनी चाहिए थी और तब जाकर वो एम्प्लॉयबल बनते हैं। आज की डेट में एम बी, ए, ने, इंजीनियरिंग, स्ने, मतलब कमर्शियल हाउस हो गए हैं, पैसा कमाने की फैक्ट्री हो गए हैं और आपकी फीस 5 लाख साढ़े 7 लाख, 10 लाख पंद्रह लाख रूपए तक की होती है। और उसके बाद जो जॉब लगती है वो शुरू होती है 10 हजार पंद्रह हजार से सोचो 10 हजार पंद्रह हजार तो आप शायद अपने ड्राइवर को दे देते होंगे। 1 काम करने वाली बाई कमा लेती है, इतनी वहाँ से स्टार्टिंग होती है उस बंदे की। यहाँ तक कि दुख की बात तो ये है कि पंद्रह से 29 साल के बच्चों में सबसे ज्यादा जो डेथ का रीजन है वो सोसाइड है। इस बात के लिए हम बोलते है की हम युद्ध नेशन है ये जो डेट, जो लोन, जो स्टडी लोन के कर्जे से हम लाद देते हैं, बच्चों को जो सुसाइड करने लग जाते है बच्चे इसलिए हम बोल रहे हैं। यु है हम इस प्रॉब्लम को समझने का टाइम आ चुका है। अगर अभी भी आप इसी जंजाल में फंसे रहोगे न तो वही करते रहोगे जो ये लोग चाहते हैं आपसे करवाना और इनके इशारों पर नाचते रहोगे निकालो इनसे ट्रेडिशनल, स्टडीज ट्रेडिशनल तरीके आप काम नहीं कर रहे हैं क्योंकि समझो ये कॉलेजेज आपको हार्ड स्किल में लगे पड़े हैं ट्रेन करने में। लेकिन कंपनी को सिर्फ हार्ड स्किल नहीं चाहिए। वो हार्ड के साथ सॉफ्ट स्किल भी जाते हैं। अच्छा ऐसा नहीं है कि यह सुनने के बाद, यह समझने के बाद कि सॉफ्ट स्किल भी चाहिए, कॉलेजेज में सॉफ्ट स्किल स्टार्ट नहीं की बट की सॉफ्ट स्किल के नाम पे कैसे बोलना चाहिए इसका एग्जाम पेपर में लिखना होता है। मतलब मुझे कैसे बोलना चाहिए। मैं लिख कर आंसर दे रहा हूँ। अगर मुझे कैसे बोलना चाहिए पूछ रहे हो तो बोल के पूछो न, मुझसे बुलवा क्यूँ नहीं रहे हो, मुझसे लिखवा क्यूँ रहे हो ये वेग मेथड है सेल सिखा रहे हो और सेल्स का टेस्ट ले रहे। कब लिख कर बेचा है किसी ने सेल्स होती है वन टू, वन। आप देखा न देखो न की सामने वाला आपको कुछ बेच पा रहा है की नहीं अगर उसको सेल्स आती है की नहीं कितना रट के आंसर लिख पाये। इस बेसिस पर क्यों टेस्ट हो रहा है की उसको सेल्स आती है की नहीं और मैं बहुत क्लियर कर दूं। मैं कोई सिस्टम बदलने नहीं लिख रहा हूँ क्योंकि सिस्टम इतना रिजिड है और चेंज हो नहीं सकता है क्योंकि देखो मार्केट आज की डेट में 1 साल में 6 महीने में 2 साल में चेंज हो जाता है। जितनी देर में 1 ही यूनिवर्सिटी 1 कॉलेज ये बात समझ पाएगा उसको कर्यक्रम में बना पाएगा, उसकी किताब छापेगा और जाकर स्कूल में या कॉलेज में पढ़ाया जाएगा तब तक तो वो टेक्नोलॉजी आउटडेट हो जाएगी। तो ये सिस्टम फ्लॉड है। ये काम नहीं करेगा आप सोचो पिछले सेंचुरीज में सब कुछ बदल गया है। सिवाय हमारे कॉलेज के सौ साल हो चुके हैं लेकिन कॉलेज और स्कूल याद कर लो सौ साल पहले भी वैसे ही चल रहे थे जैसे आज चल रहे है। इनको बदलने की जरूरत है। और अगर ये नहीं बदलते कोई बात नहीं आप और हम मिलकर 1 पैरलल सिस्टम 1 इससे बेहतर तरीका निकाल सकते हैं जिससे की अपने आप ये सिस्टम एयर एलिमेंट हो जाए और किसी को फर्क ही न पड़े। कोई अपने बच्चे को कॉलेज में भेजना ही नहीं चाहेगा क्योंकि कॉलेज स्कूल तो लगे पड़े हैं आपसे आपका मेरी का आपके रिकॉल का टेस्ट लेने में कि ये कब हुआ था, बताओ वो कब हुआ था, बताओ क्यों बताओ मैं मोबाइल पे 1 सेकेंड नहीं लगता है मुझे गूगल पर सर्च करने में। इनफार्मेशन तो मुझे इन्फॉर्मेशन का बैंक क्यों बनाया जा रहा है। वैसे भी मेरा दिमाग इन्टरनेट से बड़ा तो नहीं हो सकता न सब कुछ स्टोर करने के लिए। लेकिन अगर मुझे ऐसी चीजें सिखाई जाए जो सिर्फ 1 इंसान कर सकता है। जो मशीन रोबोट या इन्टरनेट नहीं कर सकता वो सोचने की कैपेबिलिटी है मेरे साथ जो क्रिएटिविटी है मेरे पास उसको क्यों नहीं निकाला जा रहा है। मुझे इंसान क्यों नहीं रहने दिया जा रहा है। स्कूल जिस लिए बने थे वो काम तो बहुत अच्छे से आज तक कर रहे है और वो है लेबर बनाने का। इसलिए बने थे स्कूल ताकि फैक्टरी स्कूल लेबर मिल पाए मुझे बड़ी हँसी आई। जब मैं बैंगलोर गया और मैंने देखा की बहुत सारे बड़े उम्र के लोग 1 जैसी ड्रेस पहन के बस टाइम पर बस का वेट कर रहे थे। और उस चीज को मुझे तुरंत स्ट्राइक किया की बचपन से हम यही तो कर रहे हैं। स्कूल के बस टाइम पर हम ड्रेस पहन के स्कूल बस का इंतजार करते थे। कॉलेज स्टाइड पर हम कॉलेज बस का स्टाइड कॉलेज बस का इंतजार करते थे। आज ऑफिस के लिए हम ऑफिस बस का इंतजार कर रहे हैं। पूरी लाइफ हमने इसी तरीके से निकाल ली है और जल्दी कॉलेज स की भी नहीं है। सिखा कौन रहा है प्रोफेसर। 1 बात बताओ, कौन प्रोफेसर बनता है? कोई प्रोफेसर बनता कब है? जब कुछ नहीं कर पाता है तब वो प्रोफेसर बनने जाता है। ये इतनी कॉम्पिटेंट नहीं है, बिजनेस सिखा रहे हैं। वो प्रोफेसर जिन्होंने कभी बिजनेस नहीं किया, सेल सिखा रहे, वो प्रोसेस प्रोफेसर जिन्होंने कभी सेल्स नहीं की, साइंटिस्ट बना रहे हैं। वो प्रोफेसर जिन्होंने कभी साइंस लाभ नहीं देखी, प्रोफेशनल लेवल की साइंटिस्ट की लैब्स नहीं देखी। इसको न्यू यूजलेस नॉलेज नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे समझने की कोशिश करना। 1 बड़ी दिल की गहराई से निकाल के ये बात कह रहा हूँ, कनेक्ट करे तो प्लीज कमेंट करके बताना। कॉलेज स्कूल सिस्टम डिजाइन इस तरीके से है क्योंकि की फेलियर का डर बना रहे हैं। फेल मत हो जाना, कुछ भी करना, पास हो जाना, बाउंडरी के पास हो जाना। जबकि हर 1 सक्सेसफुल इंसान जानता है कि फेलियर से बड़ा कोई टीचर नहीं होता। तो इतना खौफ क्यों दिलाया जाता है। फेल होने से? क्यों नहीं? हम प्रैक्टिकली चीजों को सीख रहे हैं, क्यों नहीं हम सीख रहे हैं अपने फेलियर से? क्यों नहीं। हम समझ पा रहे हैं कि फेलियर से ही शुरुआत होती है सक्सेस की। कॉलेज स्कूल लगते हैं। 8, 10, 10 घंटे के लिए, ह्यूमन ब्रेन बनानी है। इस तरह से लगातार इतनी देर लगातार पढ़ने के लिए भी। ऐसे तो मेरे भी बॉक्स चॉप्स होती है। 10, 10 घंटे की, 12, 12 घंटे की। लेकिन उसमें इतना, इंटरटेनमेंट, इतना मस्ती, इतना कुछ होता है की वो सीख भी रहे होते, वो मौज भी कर रहे होते, वो अप्लाई भी कर रहे होते वहीं के वहीं, उसी शॉप में। और ऐसा नहीं है की कहीं अप्लाई नहीं किया गया या सारे स्कूल सिस्टम ऐसे है, जापान वालों को देख लो जापान। सक्सेसफुल है न हमसे, हमसे आगे ही है, न देश। वहाँ पर क्या होता है, वहाँ पर बच्चों को कितना प्रैक्टिकल सिखाया जाता है। अगर कलर भी सिखाते हैं तो कलर पर कोई नाम नहीं लिखते। वो सिखाते है की बड़े साइज का ब्लू और बड़े साइज का उतनी। साइज का पिंक ले लिया तो क्या बनेगा परपल। लेकिन अगर बड़े साइज का ब्लू तो लिया लेकिन छोटे साइज का पिंक लिया तो बनेगा डार्क। ब्लू सोचो। इस तरीके से सीखा हुआ बच्चा उसको कलर के नाम की जरुरत नहीं है। वो हमेशा याद रखेगा कि किसके साथ क्या मिलाएंगे तो क्या बनेगा। ये शायद आपको भी नहीं पता होगा। इन फैक्ट थर्ड क्लास तक तो कोई एग्जाम भी नहीं होते। फोर्थ क्लास से पहली बार एग्जाम होता है क्यूंकि? इससे पहले सिर्फ और सिर्फ संस्कार संस्कार हम करते है। वो संस्कार की नॉलेज दे रहे होते हैं। मैनर्स की नॉलेज दे रहे होते हैं। क्यों नहीं हम ये सिखा सकते। अपने स्कूलों में। वो सिखाते हैं। इन शुरुआत के दिनों में सेल्फ कंट्रोल जस्टिस रिस्पेक्ट करना कैसे सिम्पल सिम्पल चीज है। पूरा स्कूल बच्चे धुल रहा है। जाहिर सी बात है अगर बच्चे सफाई करेंगे तो उनके मन में सब सिम अपने आप हो जायेंगे। न। सब बराबर हो गए। वर्कर्स की भी वो उतनी ही इज्जत करेंगे। क्योंकि उन्होंने खुद भी 2 है। उनको पता है कितनी मेहनत लगती है। इससे टीम वर्क भी होता है। 1 दूसरे की मदद भी हो जाती है। अच्छा मदद से याद आया। यहाँ तो उल्टा मदद करने को चीटिंग का नाम दे दिया जाता है। लाइफ वैसे नहीं चलती। लाइफ में कोलैबरेशन से काम होता है। तुझे ये आता है। मुझे यह आता है। चल। 1 दूसरे की मदद करते है। एग्जाम में करके देखो पकड़े जाओगे, बाहर निकाल दिए जाओगे। कॉलेज से तो तैयारी किस चीज की कर रहे हो। आप। स्कूल। कॉलेज का काम होता है लाइफ के लिए तैयार कराना। लेकिन जैसे स्कूल, कॉलेज चलता है लाइफ तो वैसी चली नहीं रही। स्कूल, कॉलेज में आप फेल हो जाते हो। आपके साथ मतलब जो वर्स्ट हो सकता है। न नाइटमेर बन जाता है, टॉर्चर हो जाता है। दिमाग में। 4 साल के उस टॉर्चर से निकालने में अगले 6 साल लग जाता है। आपको जब की रियल लाइफ ऐसे काम नहीं करती। रियल। लाइफ में आप फेल होते हो, आप सीखते हो, आप करेक्ट करते हो, आप आगे बढ़ते हो, आप फिर सीखते हो, फिर आगे बढ़ते हो। इन फैक्ट, फेल कितनी भी बार हो सकते हो, लेकिन 1 बार सक्सीड होते हो। लाइफ टाइम के लिए अचीवमेंट हो जाता है। 1 बार सक्सीड करना है, जबकि एग्जाम में हर बार सक्सीड करना है। उसके बाद भी अचीव नहीं हो रहा है। जापान के स्कूलों की 1 और बात बड़ी अच्छी लगी बच्चों सी सिखवाते है। अगर टीचर ने कुछ सिखाया और किसी बच्चे को समझ में आ गया। अब वो बच्चा सिखाएगा बाकी बच्चों को जिससे का मतलब अपना वाला कोई सिखा रहा। तो समझ रहे हो क्या बॉन्डिंग, क्या कनेक्शन बिल्ड हो सकता है। इसको। मैं भी अपनी वर्कशॉप में करता हूँ। इसको हम बोलते हैं टीच, टू लर्न। जितना आप सिखाने के लिए पढते हो उतना आप खुद के लिए कभी नहीं पड़ोगे। क्यूंकी भेजती हो जाएगी। अगर गलत सिखाए तो। तो सिखा सिखा के सीखो। आज नहीं तो कल। कंपनीज को ये बात समझ में आनी थी की सही बच्चे काम के बच्चे कैसे होते है। डिग्री वाले या टैलेंट वाले, गूगल, टेस्ला, एप्पल। इन सब को बात समझ में आ गई। बिना डिग्री के हायर कर रहे हैं ये लोग। तो जितने भी एजुकेशन, इंस्टिट्यूशंस, ईवेन कोचिंग सेंटर्स किस तरीके की दुकान चल रही है न। जो सिखा नहीं रहे हैं बस ट्रेन किए पड़े लगे पड़े हैं और सुसाइड का रीजन बन रहे हैं। उनकी दुकान बहुत ज्यादा लंबे टाइम तक टिक नहीं पाएगी। ये डिपेंड करता है आप पे और हम पे 1 दूसरे का अगर हम साथ दें एजुकेशन सिस्टम को रिफॉर्म करें हम भेजना ही बंद कर दे बच्चों को इनस्ट्यूटएंटस में इन फैक्ट। आज की डेट में पहले तो करियर मतलब इंजीनियरिंग डॉक्टर था आज की डेट में हर चीज तो करियर है आपको गाना गाना आता है करियर आप डांस कर सकते हो करियर आपको बाइक स्टंटिंग आती है करियर आपको क्या आता क्या आपको को जो भी आता है वो करियर बन सकता है। घूमना आता है वो भी 1 करियर है खाना खाना आता है वो भी 1 करियर है आज की डेट में गेम खेलना भी जब 1 करियर है मल्टी बिलियन डॉलर इंडस्ट्री है वीडियोज से मैं पहले भी बना चुका हूँ तो सोचा क्या करियर नहीं है तो आज इन यूं की जरुरत नही है आज जरुरत है आप यू ट्यूब का सहारा ले यूडी का सहारा लें डिपेंड करता है क्या सीखना चाहते है उससे रिलेटेड खान एकेडमी है अनएकेडमी है यू डेमी है तमाम ऐसे प्लेटफार्म से बिजनेस सीखना है तो मेरा सहारा ले मेरी ऑलरेडी वर्क शॉप होती है जिसमे हम बिजनेस पर बात करते हैं प्रैक्टिकल इम्फ्लीमिंटेशन दिखाते हैं 3 दिन की वर्कशॉप होती है जिसमें आप प्रैक्टिकली करके देख रहे होते हो पहले दूसरे दिन जो भी आपने सीखा तीसरे दिन तक आप अप्लाई कर डालते हो इमैजिन इस टाइप की अगर लर्निंग हमारा पार्ट बन जाए डे इन डे आउट का तो कितनी अमेजिंग ग्रोथ होगी। और इसी लर्निंग के माहौल को बनाये रखने के लिए मैंने 1 छोटी सी पहल की है मैंने टेलीग्राम पर 1 ग्रुप बनाया है जिसका नाम है हैशटैग आस भिन हैसटैग आस विनम आप सर्च कर सकते हैं या डिस्क्रिप्शन में लिंक है उसपे क्लिक करके ज्वाइन कर सकते हैं और उस फ्री ऑफ कॉस्ट से आप कोई भी सवाल बिजनेस से रिलेटेड अगर वहाँ पूछेंगे सवाल अच्छा लगेगा मैं आंसर दूंगा या फिर बहुत अच्छा लगेगा तो मैं वीडियो बना दूंगा और अगर बहुत ज्यादा अच्छा लगा तो वन टू वन फ्री में बात करने का मौका भी मिल सकता है आपको आपके हर 1 कमेंट को मैं बहुत ध्यान से पढ़ने वाला हूँ हमेशा की तरह हर वीडियो को देखने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करने के लिए जो टेलीग्राम ग्रुप बनाया उसको ज्वाइन करने के लिए हमें मोटीवेट करने के लिए थैंक यू सो मच टू ऑल माई सब्स्क्राइबर माई फैमिली ऑफ आर्ट ऑफ बिजनेस इस वेरी वेरी वेरी हैप्पी होली।
More from Abhinav

Watch These Entrepreneurs Get Recognized 🏆 #businessawards #cloudkitchen #success

They came from all over India — not just for an event, but for a deeper connection.

Before joining Platinum vs after Harish's transformation #businessgrowth #mentorship #success







