Ishan Shivananand argues that Shiv Yoga redirects ambition from consumerism toward service and spiritual practice. He blames greed, not population, for ecological damage, and says true success means improving collective well-being rather than chasing limited-edition goods and fleeting trends.
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अगर शिव योग सनातन धर्म हम अपने जीवन में जीवित रखेंगे तो हमारे पास सेवा भी है, हमारे पास साधना भी है। और अगर साधना है तो फिर एम्बिशन होगा क्यों? क्योंकि शिवानंत, शिवकृपा, अनंता, एम्बिशन, तुम चाहते क्या हो? फिर छोटी सोच नहीं है कि मैं कितना खा लूँ, मैं कितना कर लू। अभी दुनिया जहान की सरकारें रो रही है, चीख रही है की प्रकृति खत्म हो रही है, पर्यावरण खत्म हो रहा है, पॉपुलेशन बढ़ रही है, नहीं पॉपुलेशन बढ़ने से प्रकृति नहीं खत्म हो रही है, लालच बढ़ने से प्रकृति खत्म हो रही है। 1 जमाना था जब घर में 4 पैंट, 4 शर्ट, 1 आदमी के लिए थी। आज की तारीख में तुम्हारी खुद की अलमारी में ऐसे ऐसे कपड़े हैं जो हमें तुम्हारी लेना देना है। एप्पल जैसी कंपनियों को समझ आ गया की नई टेक्नोलॉजी के पीछे लोग नहीं भाग रहे तो अब टेक्नोलॉजी भी नहीं बदलते। वो एस्थेटिक बदलते एस्थेटिक का मतलब है रंग बदल 2 आकार बदल 2 कोई 1 नई चीज आ जाए, कोई 1 लिमिटेड एडिशन आ जाए और उस लिमिटेड एडिशन के पीछे क्यों भागना है, क्योंकी लालच है, लालच क्यों है? क्योंकि जीवन में साधना और सेवा नहीं, धर्म नहीं, महादेव की हत्या करने की कोशिश और जहाँ महादेव हटे वहाँ आखिरी मनुष्य का जन्म हुआ। और जहाँ धर्म है वहाँ एम्बिशन भी है। और जहाँ एम्बिशन है वहाँ केवल खुद के एस्थेटिक के बारे में नही सोचना की 1 चिड़िया की तरह 4 नए पंख लग जाए, छोटे लोग छोटी सोच। अगर एम्बिशन है तो फिर सोच होनी चाहिए की मेरे हाथ से दुनिया की क्वालिटी ऑफ लाइफ कैसे चेंज हो, मेरे परिवार की क्वालिटी ऑफ लाइफ कैसे चेंज हो। अगर एंबिशन है तो सक्सेस है, अगर सक्सेस है तो वे राज्य है, अगर वे राज्य हैं तो साक्षात्कार।