जब अवधूत के आशीर्वाद से लोगों के भाग्य बदल गए... || ईशान शिवानंद

A Rajasthan village trapped in drought and poverty meets an avdhoot named Shivanand at Gorakhnath's ashram. He gives them Lalita Diksha, a daily practice involving chanting, offering a portion of crops, and sharing blessed food. After they begin, rain comes on time, harvests improve, and the village prospers.
Chapters
मेरे गुरु मुझे राजस्थान के 1 गाँव की कहानी सुनाते हैं। राजस्थान का गांव था, बरसात नहीं होती थी, समय पर फसल नहीं उगती थी, सब लोग दुखी थे, भूखे थे, पैसा नहीं था। और 1 दिन गांव वालों ने सोचा कि 1 ज्योतिश कहां जाएंगे। अब राजस्थान में बहुत से गांव कस्बे होते हैं, कसबे का मतलब 1 बड़ा परिवार 1 गाँव का निर्माण कर देता है। तो उस कस्बे में सब 1 दूसरे के रिश्तेदार थे, तो वो कस्बा 1 महान ज्योतिश के पास गया और उस ज्योतिश ने बताया कि तुम सब के भाग्य में संपन्नता नहीं, सुख नहीं, शांति नहीं, तुम सबके भाग्य में दुख को अनुभव करना है। तुम्हारे भाग्य में साढ़े, साती और साढ़ेसाती का मतलब शनि देव। तुम्हें कुछ सिखाना चाहते हैं और शनी के सिखाने के तरीके विचित्र ही होते। उस ज्योतिश ने कहा कि देखो, हमें नहीं पता कि तुम अपने भाग्य का उदय कैसे कर सकते हो। ये ज्ञान तो बस सिद्धों तपस्पियों के पास है। अगर तुम्हे कोई मिल जाता है तो ठीक, पर मैं तो इतना ही बता सकता हूँ कि इस कस्बे में किसी का भी भाग्य उदे नहीं। दुखी पूरा कस्बा लौटता हुआ जा रहा था और महादेव की ऐसी माया हुई। भगवान गोरक्षनाथ गौशाला, जहाँ पर मेरे गुरु की तपो स्थली है, वहाँ पर उनका लकड़ा बग्गा चलना बंद हो गया। मदद मांगने के लिए अंदर आए तो देखा परम सिद्ध गुरु। अब धूत शिवानंद वहाँ बैठे और दुखी गाँव वाले माँसिदवधूत के चरणों में बैठ कर और अपना दुखड़ा बताया कि हमारा भाग्य उदय नहीं, हमारे गाँव में बरसात नहीं होती, फसल नहीं उगती, पानी खोजते हैं तो पानी नहीं, मिलता क्या करें? महासिदवदूत ने उन सबको ललिता की दीक्षा दी और कहा रोज, तुम पाठ करोगे और जब फसल उगती है, फसल का 1 हिस्सा तुम ललितारुदृश्यति की चौंकी कर, दान करोगे और फिर यही चीज दोहराते, रहना रोज पाठ करना और जब फसल उगे चाहे कम से कम होगा। चाहे 4 दाने क्यों न आओगे, तुम 1 चौकी रखना, जहाँ पे तुम जो शिवामृत मैंने तुम्हें दिया, वो बांटना और चौकी के बाद 1 हिस्सा। प्रसाद के स्वरुप में श्रद्धालुओं को अर्पित करते। गांव वालों ने अवधूत से शक्ति और ज्ञान प्राप्त किया। अपने कसबे लौट गये, बोले थे, जितनी समझ आए उतना। घर की बहु बेटियों ने पाठ करना शुरू किया। और कुछ महीने बाद जब फसल आई तो पहले से बहुत अच्छी फसल आई, फसल का 1 हिस्सा उन्होंने अलग कर लिया। उस दिन जैसे त्यौहार मना रहे हो। चौकी रखी, अवधूत का नाम लिया भजन गाय, माँ, भगवती के महादेव के कई लोग आये, कई लोगों के साथ ललितारुदरतृश्ति का पाठ किया। शिव मृत उनके साथ बाँटा और उन सब को प्रसाद देकर भेज दिया। हर बार फसल का समय होता है, हर बार वो इस प्रक्रिया को दोहराते और हर बार फसल बढ़नी शुरू हो गयी। बारिश समय पर होनी शुरू हो गई, भाग्य उदय हो गया। इतना खाना था कि कस्बे का रूप रंग निकल गया। जहाँ कच्चे घर थे, वहाँ बड़े घर बनाने शुरू कर दिए। लकडबग्गे की जगह घरों में ट्रैक्टर आ गए और 1 दिन बड़े बुजुर्गों ने सोचा कि यह क्या हो गया, हमारे भाग्य में तो सब कुछ था ही नहीं, दौड़े दौड़े जोशी के पास गए के भाई ये क्या हो रहा है, तुमने तो कुछ और पढ़ा था और अब तो जहाँ हम खोदते हैं, वहाँ हमें 16 इंच का बोर मिल जाता है, जो हम उगते है, उपजाऊ हो जाता है। तो ज्योतिश ने इनका भाग्य पड़ा और कहा अरे तुम्हारे भाग्य में तो इतनी तरक्की है, इतनी तरक्की है, इतनी तरक्की है कि आने वाली 7 पुस्ते राजा की तरह अपना जीवन व्यतीत करेंगे। कस्बे के बड़े बड़े दौड़े, दौड़े व दूध के पास गए, पैर पकड़ लिए, धन्यवाद किया और स्वीकार किया कि केवल 1 अवधूत, केवल शिव योग सनातन परम्परा ही ऐसी शक्ति है, जो इस प्रकार से भाग्य उदय कर सकती है।










