Ishan Shivanand argues that young people spend mornings scrolling Facebook, Instagram, Twitter, and YouTube without thinking critically, consuming others' ideas instead of forming their own. This passive consumption erodes the mind's ability to think independently and generate original thoughts.
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अपनी खुद की धारना को देखना, अपने खुद के विचारों को समझना। आज की तारीख में कोई भी नौजवान अपने विचारों को देखता ही नहीं। किसी भी नौजवान के विचार, अगर, आप, सही, मायने में नापोगे, परखोगे उसके है ही नहीं। वी, आर, इन्फ्लुएंस, जेनरेशन, स्लेव, जनरेशन, गुलाम का मतलब, वो व्यक्ति जिसको सोचने का अधिकार नहीं। और आज की तारीख में कोई तुम्हे कहता नहीं, तुम्हे सोचने का अधिकार नहीं, तुम्हें बस सोचने का मौका नहीं दिया जाता। क्यूंकि सुबह उठते ही तुम ये नहीं देखते पत्नी। जिंदा है या नहीं, तुम देखते फ़ोन में बैठे है या नहीं, सीधा ही अपना फ़ोन निकाल दोगे। और कहीं तुम्हारा मन सोचने की कोशिश भी करता है। तुम उसको 1 इन्फॉर्मेशन ओवरलोड देना शुरू कर देते हो। मैं ऐसे ऐसे नौजवान को जानता हूँ जो सबसे पहले सुबह उठकर, पहले अपना फेसबुक देखते हैं, फेसबुक देख लिए, फिर इंस्टाग्राम देखते है, इंस्टाग्राम देख लिया, फिर स्नैप चाइट देखते है, फिर स्नैप चाइट देख लिया, फिर ट्विटर देखते है, फिर ट्विटर देख लिया, फिर देखते है, फिर यूट्यूब देख, फिर वाट्सएप देखते है, फिर वाट्सएप्प देख लिया, फिर फेसबुक देखते हैं। और फिर सालसा करना शुरू करते है। फेसबुक ट्विटर, वाट्सएप, वाट्सएप, फेसबुक, फेसबुक, फेक। ऐसा नहीं है कि सोचने का अधिकार नहीं, सोचने का मौका ही नहीं है। तुम जो बोलते हो, किसी और के शब्द हैं, जो सोचते हो, किसी और का विचार है, जो सोचते हो, तुम्हारी ओर फेंका गया। कहीं ऐसा तो नहीं जो राष्ट्रवाद भी हम करना चाह रहे है। हमारा ही नहीं जो हमें दिया गया, जो मुद्दा हमारी ओर फेंका गया और न जाने कैसे प्रेजेंट किया गया, क्या दिया गया, हमें बस दिया और हमने पकड़ लिया। और अगर ऐसा ही होगा, 1 साल, 2 साल, 3 साल, फिर हमारे मन के भीतर विचार की क्षमता खतम हो जाएगी।