Ishan Shivanand argues that real gratitude comes from inside, not from external blessings or rituals. He compares cultivating inner thankfulness to extracting a diamond from coal, saying this inner work transforms your life and naturally creates outward fulfillment.
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जो तुम्हारे कर्म से खुश नहीं, खुशी उसके भीतर से नहीं भी नहीं। जो थैंकलेस है थैंकलेस ले का, फिर थैंक फुलनेस भीतर से आती, धन्यवाद भीतर से आ। मैंने ऐसे कितने बालक देखे। जो थैंक लेस, पिता कुछ भी कर दे, उनके लिए, वो थैंक लेस। तुमने भी देखे होंगे, हां जी जी माता कुछ भी कर दे, थैंकलेस ही। फिर भगवती की तो खूब पूजा करेगा, घर में बैठी महिला को खूब दिखा रेगा, थैंक लेस होगी, थैंकलेस होता ही। और जो थैंकलेस है, हमें उसकी परवा ले क्यूकी? शिवयोगी तो वो मनुष्य है जो कोयले की खान से हीरा निकाल के ले आये। तुम मुझे छोड़ो, तुम मुझे भेड़ियों के सामने छोड़ो भेड़ियों का लीडर बन कर आ जाऊंगा। थ्रो विल कम बैक लीडिंग, द पैक इस हुई। i am the guy, who will pick even the dimon from the कोल माइन क्यों? क्योंकि हीरा भी तो मिट्टी में पड़ा होता है।