Ishan Shivanand explores how each person constructs their own truth, whether a story of suffering or a spiritual identity as a blessed yogi. He argues we internalize false beliefs like inflated balloons and must consciously choose which narrative shapes our lives.
Chapters
दुनिया में हजारों सच है और हर सच को मानने वाला कोई बैठा है और अगर हर व्यक्ति का अपना सच है। देन यू आलसो डिज़र्व योर ओन अगर हर व्यक्ति अपने सच को बना कर के बैठा है और मजे की बात जब मैं उनसे बात कर रहा हूँ उनकी आँखों में मैं देख सकता हूँ कि ये उनकी आत्मा है उन्होंने इंटरनलाइज कर तो लिया गुब्बारे को लेकिन गलत गुब्बारे को और मैं चाहे कुछ भी कह। 2 वो माने नहीं वाले, वो सोचने नहीं वाले, वो सुनने नही वाले, मैं चुपचाप नमशिवाय करके आ गया और मैं तुम्हें कहता हूँ अगर हर व्यक्ति का अपना सच है तो अब तुम्हारे हाथ में कि तुम किस सच का निर्माण करते हो अपने लिए? 1 सच यह भी है मैं दुखी हूँ, मैं हताश हूँ और कुछ नहीं हो सकता और दूसरा सच यह भी है की मै शिव योगी हूँ, मेरे गुरु की कृपा मेरे ऊपर है और उसके तेज से मेरा हर शहर का शिव हो रहा है।