Ishan Shivanand argues that colonial rule and modern consumerism eroded self-confidence by making people question their own culture and traditions while accepting external products without thought. He calls for reclaiming confidence in yourself and your beliefs as the foundation for personal power.
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confidence ka ha en you believe in yourself and you believe in? who you are what you are? कहीं ऐसा तो नहीं, हमें अपने आप को क्वेश्चन करना सिखा दिया, जब हम 200 साल गुलाम थे, अपने कल्चर को क्वेश्चन करो, अपने सिद्धों को क्वेश्चन करो, अपने पुराणों को क्वेश्चन करो, अपनी साधना को क्वेश्चन करो, क्यूँ क्यूंकि शायद लॉड मेकर ने कहा की भैया इनका आत्मविश्वास बहुत ज्यादा है, तोड़ो लेट देम क्वेश्चन देम से और जितना ज्यादा खुद को क्वेश्चन करते हो, उतना ज्यादा दिल टूटता है और जितना ज्यादा दिल टूटता है, फिर कहीं और जाते हो किसी और के सच, किसी और के गुब्बारे को पकड़े और ऐसी जनता को मैन्युपलेट करना बहुत आसान है जिसका कोई कांफिडेंस नहीं, वो तो पानी के समान है, वह चलेगी कहीं भी, कुछ भी दे। 2 परफेक्ट कंजूमर आदि दवाइयाँ जो बाहर बैंड है, भारत में ओवर द काउंटर बिकती है, क्यूँ, ओपन कंजूमर, बेस्ट, कंजूमर सब कोश्चन करेंगे, अपने आप को कोश्चन करेंगे, दवा को क्वेश्चन नहीं करेंगे, अपने आप को कोश्चन करेंगे, अपने भगवानों को कोश्चन करेंगे, अपनी सभ्यता को कश्चन करेंगे, लेकिन खाने में ब टी साइड डाल 2 को चेन्नई करेंगे, वो खिला 2 खुशी खुशी, ऐसा तो नहीं, हम कार के चक्कर में इतना फंस गए, वी हैव स्टारट राइट थिंग, एक्सेप्ट रॉन थिंग्स और इसलिए मैं बात करता हूँ कांफिडेंस की, इसलिए बहुत जरूरी है हम इस बात को स्वीकार करे। समझे। cn।