Ishan Shivanand argues that tasting divinity fills life with joy instead of dwelling on past pain. He distinguishes between long-term evolution taught in schools and short-term evolution we experience daily through acquired behavior and habit formation, using morning tea cravings as an example of how repeated desire creates cellular changes.
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हर बार तुम स्वाद ले ले के अगर दुख को याद करोगे। फिर वही पीड़ा बन जाएगी। तुम्हारे जीवन में अगर याद करना ही है, स्वाद लेना ही है। तो क्यों न तुम देवता का स्वाद लेना शुरू करो। तुम इस बात को समझो। विकास हर्ष हो रहा है। 1 है लॉग टर्म एवोलूशन, जो स्कूल में सिखाया गया बंदर से इंसान दूसरा है शार्ट टम एवोलूशन, जो जीते जी हम करते हैं एवोलूशन थ्रू एक्वायर्ड बिहेवियर, एवोलूशन थ्रू एक्वायर्ड बिहेवियर में फिर कहता हूँ एवोलूशन थ्रू एक्वायर्ड बिहेवियर कर्म के अनुसार विकास। और ये भी जो एवोलूशन है इसमें भी जेनेटिक म्यूटेशन होती है सेलुलर म्यूटेशन होती केसन प्वाइंट अगर सुबह उठते तुम्हारा चाय पीने का मन करता है, करता ही नहीं करता, चिंता मत करो, मैं जैसी नहीं करूंगा सुबह उठते हो चाय पीने का मन करता है। क्यूँ करता है पैदा तो ऐसे ही तुमने सेलुलर म्यूटेशन की, कर्म के अनुसार विकास किया। कैसे 1 बार चाय पी 2 बार चाय पी 3 बार चाय पी 4 बार चाय पी फिर सेल्स इवालवोनेशुरूहो चाय मांगते टगोर।