Ishan Shivanand argues that love means nothing without action. He describes traveling through Rajasthan's deserts gathering roses for his guru, facing hunger and thirst, to show that real devotion requires sacrifice. Words alone are fantasy; love must be lived.
Chapters
जो प्यार दिखाया नहीं, वो प्यार है ही नहीं। जो प्रेम दिखाया नहीं, वो प्रेम है नहीं। जो खुशी दिखाई नहीं, वो खुशी है ही नहीं। जरुरी क्या है, जो यहाँ है, उसको ऊपर भी लाना है। हाँ जी नाची, अब इतना काफी है ही नहीं कि मैं बस बोलू प्यार है तो दिखाओ, क्योंकि अगर दिखाया नहीं, तो है ही नहीं। हम कहते हैं, बाबा जी, हमसे प्यार करते हैं। क्यूँ? क्यूंकि निकले। राजस्थान के रेगिस्तानों से बाहर, अरावली के पर्वतों से बाहर गए गली गली ढूंढ, तुम्हें जैसे 1 माली अपने बगीचे से गुलाब के फूलों को चुन कर 1 गुलदस्त का निर्माण करता है। तुम मेरे गुरु के गुलदस्ते हो। ढूंढा देश विदेश, जहाँ जा के ढूंढा, और जहाँ खुद नहीं गए, वहाँ मुझ बेचारे को भेजा। ऐसे ऐसे देशों में गया में तुम सोच नहीं सकते। कुछ खाने को नहीं मिलता था, कुछ पीने को नहीं। लेकिन फिर भी गुलाब ढूंढने, मेरे गुरु के गुलदस्ते के लिए गुलाब ढूंढने। और इसलिए आज तुम कहते हो, मुझे तो बाबा जी से बहुत प्रेम है, वह क्यों? क्योंकि उन्होंने प्रेम दिखाया। जिस सपने को जागृत नहीं किया, वो सपना सपना ही नहीं। कब तक बैठे रहोगे, कोने में झाग, मछेंदर गोरख खाया, कभी न कभी तो जाना होगा। अब सिर्फ इतना कहना काफी नहीं कि मैं मैं प्रेम करता हूँ अपने परिवार से। जो प्रेम दिखाया नहीं, वो प्रेम प् प्रेम में।