Ishan Shivanand explains how your phone activity builds a detailed profile that companies and governments use to manipulate you. He cites Facebook's data sale before the 2016 U.S. election, then argues mindfulness about what you consume online is the only way to keep control of your own preferences.
Chapters
अब ये नहीं समझते ये गुलामी का कितना बड़ा प्रतीक है और गुलामी क्यों? क्योंकि जब आप फ़ोन पर बैठते हो तो समझो ज्ञान अंधा कैसे करता है। अब जब आप फ़ोन पर बैठते हो तो हर बार आप चुनते हो कि कौन सी वेबसाइट पर जाना है, कौन सी एप्लीकेशन डाउनलोड करनी है किस फोटो पर आप ज्यादा देर रुकते हो किस फोटो को आप नहीं पसंद करते और जो भी आप करते हो वो 1 प्रोफाइल बन गई वो आपका 1 डेटा बन गया ऐसा सोसाइटी। फिर ये डेटा कलेक्ट होता है, ऐज कंट्री ये डेटा कलेक्ट होता है? फिर इस डेटा के अनुसार जब इस डेटा को स्टडी किया जाता है, इस इंफॉर्मेशन को स्टडी किया जाता है तो हमें समझ आनी शुरू हो जाती है कि ये जो सोसाइटी है ये किस दिशा में जा रही है, इस सोसाइटी को क्या पसंद है, क्या नहीं पसंद और अगर इस सोसाइटी को हमें कुछ बेचना है तो किस प्रकार से बेचना है उस डेटा के द्वारा। इसलिए अभी फेसबुक का इतना बड़ा स्कैंडल हुआ क्यूंकि जो अमेरिका में इलेक्शन थे, तब पाया गया कि फेसबुक ये सारा डेटा बेच रहा है। तो पॉलिटिशंस को समझ आ गया की कौन सी बात करूँ, कौन सी नस दवाओं जिससे मुझे वोट आयेगा, क्यूँ क्यूँकि डेटा मिल गया मैं हर जीव के भीतर ये प्रकृति होती है। मूल प्रकृति, इसको मनोविज्ञानिक कहते हैं फ पी फिस् एक्शन पैठन।