Ishan Shivanand reflects on twelve years in an ashram and contrasts the current age of Kalyug with what he calls Satyug, a time of heightened consciousness for those who practice mindfulness and devotion. He urges listeners to pursue the spiritual path and divine union rather than worldly pursuits.
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मैं अपने जीवन में आश्रम में पलाबडातीस साल तक मैंने हर प्रकार के मनुष्य को deखाspritality is not about if its aबutwen। ऐसा नहीं है, क्या मेरे साथ कुछ होगा, बात ये है की कब होगा होना है कितने बड़े बड़े नास्तिक से मिला जो 2002 हजार 12 में कुछ पूछ में आग लगी फटाफट ओम श्री दुर्गा मस्त नोट, अबाउट इफ सेन कभी न कभी तो कॉफी पीनी पड़ेगी, कभी न कभी तो प्रकृति तारे के चाटा मारे या तो चाहते हुए दिव्यता के मार्ग पर चलो, यह तो खुशी खुशी दिव्यता के मार्ग पर चलो। इसलिए आप लोगों को देख के मैं पहले वहाँ प्रणाम करता हूँ, फिर यहाँ प्रणाम करता हूँ। क्यों क्योंकी आप इस पूरी दुनिया में वो चंद 5 प्रतिशत लोग हों जिनके भीतर 1 इच्छा है, जिनकी चेतना बहुत खूबसूरत चेतना है, सप्त रिषियों की चेतना है क्यूंकि जहाँ पूरी दुनिया भेड़ चाल में लगी है, सिर्फ आप हो जो कहते हो नहीं, मैं कुछ और अनुभव करना चाहता हूँ, मै कुछ और प्राप्त करना चाहता हूँ, मैं कुछ और अपने जीवन में जागृत करना चाहता हूँ। मैं अपने भगवान तक पहुँचना चाहता हूँ पूरी दुनिया कलयुग में, लेकिन यहाँ यहाँ सतयुग है।