Ishan Shivanand explains his guru's teaching on why we're born: the soul is like a drop of ocean that separates into a cloud, falls as rain, flows through rivers and valleys, then returns to the sea. Along the way it must experience love, duty, and hardship to prove itself before reuniting with God.
Chapters
मेरे गुरु ने मुझे मनुष्य बनना सिखाया। उन्होंने हा बेटा तू ग्रस्त बन, तू देख। और मैंने कहा मेरा जन्म भगवान से जुड़ने के लिए हुआ है। अगर मैं ग्रस्त बन गया तो बहुत कुछ अनुभव करना पड़ेगा। मेरे पिता ने कहा यही तो तुम गलत हो। भगवान से जुड़े तो वो बैठे थे, वहाँ पर प्रथ्वी पर क्यों आये हो, जुड़े बैठे थे, जुड जाओगे 1 दिन बूँद सागर को छोड़ती है। बादल बन। ताकि हिमालय पर गिरे और बह के सागर तक वापस आये। शायद देखना चाहती है की मेरा प्रेम सच्चा था या नहीं। और हर बार बूंद सागर को छोड़। कभी कहीं गिरती है, कभी कहीं गिरती है, लेकिन लौट के आती जरूर है। नदी बन। तुम्हारा जीवन हुआ है उस बूंद के समान। लेकिन जहाँ अगर बादल ने गिरा दिया, वहाँ पर गिरे रह गए। बहे नहीं तो सागर तक पहुँचना असम्भव है। तुम्हें पहाड़ो से गिरना होगा, तुम्हे जंगलों के बीच से निकलना होगा। तुम्हें गहरी वादियों में जाना होगा, तुम्हें अपने धर्म निभाने होंगे, अपने रिश्तों को प्रेम करना होगा। तब जा के 1 दिन तुम पाओगे तुम सागर में लौट गए। और उस दिन सागर बाहें फैलाए बैठा होगा। तुम्हारा जन्म इसलिए हुआ भगवान से तो तुम आये हो। भगवान में तो तुम चले जाओगे। लेकिन शायद भगवान यह देखना चाहता है कि मेरा अंश इस पृथ्वी पर कर क्या सकता है।