Ishan Shivanand argues that positive affirmations like "I am rich" don't create lasting change without deep inner transformation. True progress requires what he calls Shiv Yog, a practice that goes beyond surface-level optimism to shift something fundamental within you.
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sivyoगbinnheशिवयोग कहता ही नहीं कि तुम ये करो या वो करो। शिव योग कहता है कि अगर कहने से ही करना होता तो कितने लोग कहाँ पहुँच गए होते, कितनी किताबें लिख दी गयी। पॉजिटिव थिंकिंग के, बैठ के, मुंगेरी लाल के सपने देखो, तुम कभी कर के देखना, अपने आप को बोलना। मैं बहुत अमीर हूँ, मैं बहुत अमीर हूँ, मैं बहुत अमीर हूं। अंदर से आवाज आएगी तो बेकारी है। पोस्टिव थिंकिंग यहाँ पर काम नहीं करती, करती भी है तो टेम्परेरी कितनी बार मैं देखता हूँ। शिविर में लोग जो केवल पोस्टिव थिंकिंग से ही आगे बढ़ना चाह रहे हैं, बैठे होंगे, गा रहे होंगे। तू प्यार का सागर है। और जैसे ही शिविर के बाहर जायेंगे, कोई आदमी जल्दी से उनकी चप्पल उठा लेगा। सागर छोडो चुल्लू भर पानी भी अगर ये बन ले। पर ऐसा होता नहीं। बनने से बात होती, केवल बताने से बात बनेगी। हमें 1 भीतर बदलाव लाना होगा, 1 गुणात्मक बदलाव, 1 जेनेटिक बदलाव, 1 एवोलूशनली बदलाव, हमें भीतर 1 विकास करना होगा और वो विकास केवल 1 ही प्रक्रिया से हो सकता है, जिसको कहा जाता है शिव योग, स धन।