Ishan Shivanand distinguishes between slavish divinity rooted in ignorance and liberating divinity rooted in knowledge. He practices four mantras each morning and evening, and teaches that sadhana is continuous immersion in the infinite, not escape from pleasure and pain, leading to moksha while still alive.
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कर्म करना, जितना दिव्यता को भी गुलाम मत बनाना। जीतना गुलामी वाली दिव्यता क्या है? मैंने 4 मंत्र सुबह पड़े 4 मंत्र शाम को। अब शिव जी तो काम करता है या नहीं, वरना मैं विष्णु जी को नौकरी दे दूंगा। ये गुलामी वाली दिव्यता है, यह हमारी वाली नहीं है, यह अविद्या वाली दिव्यता है और विद्या वाली दिव्यता क्या है। मैं साधना बिमारी से ऊपर उठने के लिए थोड़े न कर रहा हूँ। सुख दुख तो जीवन का हिस्सा है, आयेगा जायेगा, सुख दुख आता है, तो क्या मैं सांस लेना बंद कर देता हूँ। सांस चलती रहती है। और अगर सांस चलती रहती है तो साधना भी चलती रहेगी। क्यों नहीं चलेगी साधना में क्यों रोका? साधना सुख दुख से ऊपर उठने के लिए थोड़ी ना है। साधना तो अनंत में लीन होने के लिए है। और ये सब तो अनुभव है। इन अनुभवों को मैं भोग रहा हूँ। और 1 दिन जब पूर्णता भोग लूंगा, मैं चला जाऊँगा। लेकिन मुक्ति वो नहीं जो मरने के बाद आती है। मुक्ति तब है जब जीते जी, हर साल, हर कण शिव मय हो रहा है।