Ishan Shivanand explains that sadhana, or spiritual practice, is a priceless inheritance you must earn and protect, unlike money which can simply be spent. He connects consciousness to how divine energies like Shakti and Lakshmi show up in your life, even as physical pain. True spiritual wealth demands active pursuit, not passive receipt.
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संतों ने कहा था या देवी सर्वभूतेशु शक्ति रूपेण संस्थिता नमस्ते नमस्ते नमस्ते नमो नमा। चेतना के अनुसार तू जिस रूप में धागा मैं, उस रूप में तेरे जीवन में उत्पन हो जाएगी। शक्ति तो शक्ति, लक्ष्मी तो लक्ष्मी, सरस्वती तो सरस्वती। और अगर चेतना कुंठित होगी तो या देवी सर्वभूतेशु घुटना का दर्द रूपेण, संस्थिता, नमस्ते से, नमस्ते से मेरे घुटने, तेरे घुटने, सबके गुट ने नमन। जिस रूप में धागा प्रेरणा होगी तो तुम्हारे सपने भी गहरे होंगे और तुम परम दिव्यता को अपने जीवन में उत्पन कर पाओगे। इसलिए करना तुम्हारा गुरु तुम्हें गर्व के सौ कारण दे रहा है। मैंने भी बहुत दिए, लेकिन अपने मुह से बोलूंगा अच्छा नहीं लगेगा। तुम गूगल कर ले, आराम से बात करो। तुम्हे पता तो हो कि तुम्हारे यहाँ के संत केवल पूजा पाठ नहीं करते, क्रांति उत्पन करते? और या तो वो क्रांति तुम्हारी होगी या वो क्रांति किसी और की होगी। दुख की बात अगर पैसा विरासत है तो विरासत केवल दी जा सकती है। लेकिन अगर साधना विरासत है तो उस विरासत को कमाना पड़ेगा। अगर पैसा विरासत है तो कपूर को 2, सपूत को 2, कोई फर्क नहीं पड़ता, वो पैसा लेगा, खर्च डालेगा। लेकिन अगर साधना विरासत है तो विरासत केवल बेटे की नहीं हो सकती। विरासत उसकी होगी, जो भी कमाएगा। इसलिए हेशुभिहोगी मेरी प्रार्थना। यही है तुमसे और तुम्हारे लिए कि जो विरासत मेरे गुरु देना चाहते है, तुम उसे कमा सको, बचा सको।