Ishan Shivanand explains how we unconsciously erase positive memories while clinging to negative ones, creating a life dominated by negativity. He argues that deliberately letting go of bad memories and keeping good ones reshapes your perception and leads to success and happiness.
Chapters
1 बच्चा एडिट कर देगा अपने पिता के प्रेम को और केवल याद रखेगा वो समय जब पिता ने कष्ट दिया 1 माँ जिसने तुम्हे सब कुछ दिया तुम भूल जाओगे उस प्रेम को और याद रखोगे 1 या 2 बार अगर चिल्ला उठी हमारी एडिटिड मेमरीज होती है, आल्टर्ड होती है और डिलिटेड होती है। और शिव कहता है कि देखो अगर तुम अपनी मेमरीज को एडिट करते ही हो, ऑल्टर करते ही हो, डिलीट करते हो तो तुम ऐसे क्यों अपने जीवन को जीते हो की सकारात्मक भूल जाओ, नकारात्मक याद रखो और फिर नकारात्मक में जियो क्यूँ न कुछ ऐसी मेहनत की जाए की अगर कुछ भूलना ही है तो सकारात्मक की जगह तुम नकारात्मक भूल जाओ ताकि तुम सकारात्मक को पकड़ के अपना जीवन जी सको। बोलो हो सकता है हां जी नाजी क्यूँकी अगर भूलना ही भूल तुम जाते ही हो, अगर कर्म भारी होंगे तो जो अच्छा हुआ सब भूल जाओगे। और कोई तुमसे पूछेगा दुनिया कैसी है, जीवन कैसा है? तो तुम मदर इंडिया की तरह दुनिया में आये हो तो जीना ही पड़ेगा जिंदगी है, जहर तो होता है और शिव योगी कौन है जो कहता अगर मुझे भूलना ही है तो मैं सकारात्मक को क्यों त्याग में नकारात्मक को त्यागता हूँ, ठीक है जीवन में घटना आई, खत्म हुई, मैंने छोड़ी क्या किया, छोड़ दिया, छोड़ दे।