Ishan Shivanand critiques how people blame Saturn or astrology for their problems instead of taking responsibility for their own mistakes. He argues that real change comes from genuine spiritual practice, not external excuses or superstitions like victim cards or planetary remedies.
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धर्म के नाम पर जितनी कुरीतियां भी बनी, क्यूँ क्यूँकि हम स्वीकार करने को तैयार ही नहीं कि हमारी गल्ती हो कैसे सकती? हम तो विकट हैं और जब तक हम विकट प्ले करेंगे तब तक बदलाव आ ही नहीं सकता। हर कोई विकार मेरे गुरु के भी सामने लोग आते है। कहते बाबा जी मेरी पत्नी ऐसी बनी नहीं रही, क्यूँ नहीं बन रही सनी गलत घर में बैठा है। बाबा जी तो जाने वो भी मजा लेते है। कहते तेरिसलेनीबंरी क्यूँकि तू रात को गलत घर में बैठा है, शनी सही घर में। जब तक तू रात को गलत घर में बैठेगा तेरी पत्नी ऐसी बनने नहीं वाली। लेकिन अब क्या करे? कौन स्वीकार करे मेरी गलती। शनि जी पर डाल 2 वो गलत है और तुम हबल टेलीस्कोप में देखना। शनी जी तो वह शुरू से थे, जान भी वही दुःख की बात है की हमारे पूर्वज जो साधना में विश्वास रखते थे, अब उन के वंशज साधना छोड़ शनी जी को देख विक्टम कार्ड प्ले करते तुम कोई भी शास्त्र, पर, किसी भी साधु ने, किसी भी संत ने, क्या कभी विक्टम कार्ड प्ले किया। वर को पता चला समस्या है। क्या किया उसने साधना की ध्रुव को पता चला समस्या है कोने में बैठकर रोया क्या क्या किया साधना की मारकंडे को पता चला 16 साल की उम्र में यमराज अंकल आये है, क्या किया विकट कार्ड नहीं प्ले किया, बाहर गए देखो दुनिया तो ऐसी है, क्या किया मारकंडे ने, क्या किया गरम करो मेरी।