विकृत विचार से बीमारी पैदा होती है। | ईशान शिवानंद

Eeshan Shivaanand explains how distorted thoughts act as a magnet for illness, creating subtle symptoms within six months before full disease manifests. Positive actions and good deeds can block this progression, and early detection of first symptoms offers a chance to prevent disease from taking hold.
Chapters
1 बीमारी को 6 महीने से साल भर लगता है, शरीर में मेनिफेस्ट होने के लिए सिमटम 6 महीने में आ जायेंगे, लेकिन बीमारी मेनिफेस्ट नहीं होगी, सिमटम, आ जायेंगे। मतलब तुमने अपनी सोच, अपने विचार से उस बीमारी को धीरे धीरे अट्रैक्ट करना शुरू कर दिया। अब सिमटम आ गये, सर दर्द होगा, तुम टेस्टिंग के लिए जाओगे, कोई बीमारी नहीं निकलेगी, फिर तुम टेस्टिंग के लिए जाओगे, बीमारी नहीं, फिर टेस्टिंग के लिए बीमारी नहीं। तुम डॉक्टर बदलते रहोगे की सर दर्द तो है, डॉक्टर बता नहीं पा रहे, जितने तुम्हारे अच्छे कर्म होंगे, उतना तुम्हारे कर्म, रोकेंगे कोशिश करेंगे, उस बीमारी को मेनिफेस्ट न होने दे। और ऐसे बहुत लोग मैंने देखे। 8 10 साल से उनके अच्छे कर्म लड़ रहे हैं, उनके विकारों से की बीमारी के सिमटम तो आ गए, लेकिन बीमारी नहीं। आने दे रहे। और वो बाबा से आकर कहते कि आप ही बता 2 हम में क्या गलत है? क्यूंकि जहाँ उनके अच्छे कर्म खत्म हुए, वहाँ वो बीमारी मेनिफेस्ट हो जाएगी, सिमटोमेटिक ऐसी कोजिटिवस्वरूप में। और 6 या 7 महीने बाद वो फिर टेस्ट कराने जाते हैं। और तब डॉक्टर कहता है, मुबार खोट हुआ है 6 महीने की मेहनत के बाद, इन्कुवेशन के बाद, जैसे 1 माँ अपने गर्भ में बच्चे को रोज खिलाती है, पिलाती है, ध्यान रखती है, वैसे तुम भी अपने विकारों को रोज खिलाते हो, रोज पिलाते हो, खूब ध्यान रखते हो। और 6 से 9 महीने की कड़ी तक कड़ी मेहनत और शिद्दत के साथ करत करत, अभ्यास ट्यूमर हो, सुजान करत करत, अभ्यास डायबिटीज, या जो कुछ भी, फिर हमने उसको मैनिफेस्ट कर लिया। और इसलिए कहा जाता था प्रिवेंशन इस बेटर की, जहाँ पहला सिमटम तुम्हे दिखाई दे। मतलब कुछ गलत प्रकार से मैं अपना जीवन जी रहा हूँ। अब मैं अपने जीवन को साध लो, एडिशन अपने शरीर में डालनी शुरू कर दूं, क्योंकि जितनी समस्याएं हैं, उनका कारण तुम्हारे प्राण शरीर में है। अगर 1 व्यक्ति को जेनेटिक डिसॉर्डर्स है, अगर 1 व्यक्ति को हाइपरथारोडिजम हाइपो थायराडिजम, उसके इस फेक में, कोई प्रॉब्लम सेलुलर लेवल पर कोई डिजीज है, ऑटो इम्यून डिसॉर्डर, तो उस व्यक्ति ने अपने विशुद्धि में बहुत कुछ भर के रखा है। अगर 1 व्यक्ति को नेत्रों में कोई समस्या है, नासिका में, कानों में कोई समस्या है, माइग्रेन होती है, रात को नींद नहीं आती, सिजोफ्रेनिया है, कोई भी डिलुजनल डिसॉर्डर है उस व्यक्ति का, आज्ञा चक्र में उसने भरा होगा। और अंत में सस्त्रा। अगर किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की कोगनेटिव डिजीज है, किसी भी प्रकार का साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर है, चाहे, बाईपोलर, चाहे, आर्टिस्टिक, कुछ भी तुम, सोचो, वो इसलिए क्योंकि उसने अपने सस्त्रा में बहुत गर्म भर लिए। और क्यूंकि सस्त्रा बंद हो गया, तो मेरा उस शिव तत्व से जोड़ टूट गया। और जहाँ उस शिव तत्व से मेरा कनेक्शन टूटा, तो अपने आप या तो डिप्रेशन होगा, या तो आटिज्म हो जाएगा, या बायपोलर हो जाएगा। क्या तुम बीमारी का नाम तो लो। फिर सारे के सारे कोर्गनिवडिसार्डर्स हैं। और इसलिए बहुत जरूरी है कि जब हम हीलिंग कर रहे हैं, तो सबसे पहले जितने विकार 1 व्यक्ति ठोस स्वरुप में अपने भीतर लिए बैठा है। सबसे पहले तो हम इस शक्ति को घुमाए और इन विकारों को भस्म करे।










